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​गत 5 वर्षों में पदों में कटौती से सरकारी नौकरियों पर छाए असुरक्षा के बादल
संघ लोकसेवा आयोग द्वारा 2016-17 में भर्ती किए गए कुल उम्मीदवार 6,103 की तदाद 2019-20 में 30 फीसदी घट कर महज 4,399 रह गई।
कौशल चौधरी, गोविंद शर्मा
09 Feb 2022
unemployment

सुधांशु सिंह उस उत्सुकता का उदाहरण हैं, जिसके साथ नौकरी के इच्छुक कोई उम्मीदवार सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार की तलाश करता है और उसको पा जाने पर खुद को बेहद भाग्यशाली मानता है। उत्तर प्रदेश (यूपी) के आजमगढ़ में एक सरकारी विभाग के क्लर्क की नौकरी पाने में सफल होने पर उनका कहना है, "मैं निजी नौकरी में जितना कमाता था, उसकी तुलना में यहां उसका आधा कमाता हूं, लेकिन फिर भी मैं खुश हूं और अपने भविष्य को लेकर काफी सुरक्षित महसूस करता हूं।" 

बेंगलुरु में दोगुनी पगार वाली आईटी की अपनी अच्छी-भली नौकरी छोड़ कर सरकारी क्लर्क बनने वाले और उसके आधे वेतन पर संतुष्ट होने वाले सुधांशु सिंह देश के उन करोड़ों स्नातकों/स्नातकोत्तरों की जमात में शामिल हैं, जो अपने लाभ के लिए, आजीविका की सुरक्षा के लिए और खास कर नौकरी के बाद पेंशन की गारंटी के लिए एक 'बेहतर' सरकारी नौकरी की तलाश में हैं।

दुर्भाग्य से, नौजवानों में आजीविका की सुरक्षा की इस भावना को नरेन्द्र मोदी सरकार के पिछले पांच वर्षों में सरकारी नौकरियों के लिए भर्तियों की तदाद में धीरे-धीरे भारी कटौती करते हुए उनके डर में बदल दिया है। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा भर्ती किए गए उम्मीदवारों की कुल संख्या में लगभग 30 फीसदी कटौती की गई है। यह बात खुद सरकार ने पिछले साल लोकसभा में अपने एक उत्तर में बताया है कि यूपीएससी ने 2016-17 में जहां कुल 6,103 उम्मीदवारों की नियुक्ति की थी, वहीं 2019-20 में कुल 4,399 सफल अभ्यर्थियों की ही नियुक्ति की थी। 

कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) की भर्ती परीक्षा घोटालों और देरी से बुरी तरह बाधित हुई है। वहीं, इंस्टिट्यूट ऑफ़ बैंकिंग पर्सनेल सेलेक्शन (IBPS) द्वारा क्लर्क और प्रोबेशनरी ऑफिसर (PO) के पदों पर की जाने वाली भर्तियों की संख्या में भी कमी आई है।

रेलवे भर्ती बोर्ड (आरआरबी) की गैर-तकनीकी लोकप्रिय श्रेणी (एनटीपीसी) परीक्षा के उम्मीदवारों द्वारा हाल ही में केंद्रीकृत रोजगार के पहले चरण के कंप्यूटर आधारित परीक्षण के परिणामों को लेकर हिंसक आंदोलन किए गए हैं। 

आरआरबी द्वारा 14-15 जनवरी को जारी एनटीपीसी की अधिसूचना सीईएन ​01/2019​​ ​रेलवे के प्रति चिंता की ओर इशारा करता है, जहां 2 लाख रिक्तियां होने के बावजूद जिसका धीरे-धीरे निजीकरण किया जा रहा है। 

इसके बरअक्स, उत्तर प्रदेश में भी नौकरी की तलाश में लगे युवा इस विकट स्थिति से बेहद चिंतित और निराश  हो गए हैं। "नरेन्द्र मोदी ने 2014 में जब लोकसभा का चुनाव लड़ा था तो उन्होंने हर साल 10 मिलियन से अधिक नौकरियां देने का वादा युवाओं से किया था। स्वाभाविक रूप से, हमें सरकारी नौकरियों की संख्या में वृद्धि की उम्मीद थी," गाजीपुर के शिवम कुमार कहते हैं, "लेकिन जब से वे प्रधान मंत्री बने हैं, एसएससी, बैंकिंग, रेलवे या राज्य सरकार में नौकरियों की संख्या घटती ही जा रही है।" 

पीओ रिक्तियों की संख्या में भारी गिरावट का उल्लेख करते हुए कुमार कहते हैं कि इसी परिदृश्य में युवाओं के लिए सरकार की चिंता एक "तमाशा" बन कर रह गई है। "आईबीपीएस जहां साल में 15,000 पदों के लिए विज्ञापन देता था, अब उसकी घटाकर 1,500 कर दी है​, "उन्होंने आगे कहा, “मैं और मेरा परिवार लंबे समय से भाजपा के कट्टर समर्थक रहे हैं लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए हम इस पार्टी को न तो विधानसभा चुनाव में और न ही अगले लोकसभा चुनाव में वोट देंगे।”

चंदौली के एक सेवानिवृत्त ट्रेन टिकट परीक्षक, सोमवेश तिवारी, अपने दो बेरोजगार स्नातक बेटों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है, “हम शिक्षा क्षेत्र में नौकरी के अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उम्मीद है कि मेरे बेटों को जल्द ही नौकरी मिल जाएगी। स्कूलों में बहुत सारे पद खाली हैं।" हालांकि उन्हें इसको लेकर संशय है कि "यह क्या मोदी-योगी [आदित्यनाथ] शासन में हो पाएगा।” 

तिवारी सरल तर्क देते हैं,  “यदि आप लोगों को नौकरी और नौकरी की सुरक्षा प्रदान करते हैं, तो वे कमाएंगे और खर्च करेंगे, जिससे अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। हमारी सरकार लाभ कमाने वाली संस्था नहीं होनी चाहिए। जाहिर है, सरकार के कल्याणकारी राज्य के आदर्श बहुत दूर चले गए हैं।” वे आगे कहते हैं कि, “रोजगार की यह वर्तमान स्थिति किसी अन्य पार्टी के लिए मतदान की गारंटी बन गई है। मैंने बचपन से देखा है कि कैसे मेरे विस्तारित परिवार ने हमेशा भाजपा का समर्थन किया है। लेकिन जब हम अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचते हैं तो लगता है कि हमें किसी और पार्टी को वोट देना चाहिए।” 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), चंदौली के पूर्व जिलाध्यक्ष और वर्तमान सदस्य राजेश कुमार भी सार्वजनिक क्षेत्र की गिरावट की आलोचना करते हैं। उनका कहना है “मैं और मेरा परिवार सक्रिय रूप से भाजपा और आरएसएस का समर्थन करते रहे हैं। लेकिन मैं मानता हूं कि भाजपा के शासन में सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरियों और रिक्तियों की संख्या में भारी कमी आई है।” 

संविदा पर काम पर रखने के माध्यम से काम को आउटसोर्स करने के लिए सरकार की 'लागत बचत' रणनीति पर सवाल उठाते हुए कुमार कहते हैं, "आपने देखा होगा कि सरकारी अस्पतालों, विश्वविद्यालयों, कार्यालयों और डाकघरों में निम्न पदों की नौकरियां जैसे क्लर्क के लिए भी आउटसोर्सिंग की जा रही है। संविदा कर्मचारी 10,000 ​से ​15,000​​ रुपये के कम वेतनमान पर भी काम करने के लिए तैयार बैठे हैं, वह भी ​नौकरी की सुरक्षा के बिना ही। बैंकों में निचले स्तर के पदों को अनुबंध के आधार पर और सरकारी क्लर्क के वेतन का एक तिहाई वेतन पर भरा जा रहा है।”

इलाहाबाद से यूपी प्रांतीय सिविल सेवा के उम्मीदवार शेखर कुमार को लगता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की गिरावट सबसे कमजोर वर्गों के उत्थान को सीधी चोट पहुंचाती है। वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों की संख्या में कमी अपरोक्ष रूप से आरक्षण को रोकने का एक तरीका है। यह संवैधानिक आरक्षण प्रणाली को खत्म कर देगा। ” 

भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) या भारतीय लोक सेवा (आईपीएस) जैसी सबसे अधिक मांग वाली नौकरियों के लिए यूपीएससी की रिक्तियों की तादाद 2014 से लगभग 40 फीसदी कम हो गई है जबकि पर्याप्त आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की अच्छी खासी कमी बनी हुई है। दिल्ली में पढ़ रहे लखनऊ से सिविल सेवा के इच्छुक राहुल कुमार रिक्तियों और सरकार के दावों को लेकर असमंजस में हैं। वे कहते हैं कि “एक तरफ, सरकार अपनी रिपोर्ट में सिविल सेवकों की कमी का दावा करती है। लेकिन इसने पिछले वर्षों के 1,200-1,300 पदों के लिए विज्ञापन की बजाए इस साल महज 861 पदों के लिए रिक्तियां निकाली हैं। वहीं दूसरी ओर, सरकार इस कमी को दूर नहीं करना चाहती है।" 

यूपीएससी के माध्यम से सिविल सेवाओं में लेटरल इंट्री उम्मीदवारों की संभावनाओं को बाधित कर सकता है। लेटरल एंट्री का उद्देश्य निजी क्षेत्र से कुशल विशेषज्ञों की अनुबंध के आधार पर नौकरशाही में वरिष्ठ पदों पर भर्ती करना है। 

लेकिन इस लेटरल एंट्री में आरक्षण के प्रावधान न होने पर चिंता जताई जा रही है। इस तरह “संवैधानिक बाध्यताओं को पूरा न किए जाने की कीमत पर अपनी विचारधारा का समर्थन करने वालों से नौकरशाही को पाट दिए जाने के सरकार के एजेंडे” की ओर इशारा करते हुए कुमार कहते हैं, "इसके जरिए तो सरकार अपनी विचारधारा का समर्थन करने वाले किसी भी व्यक्ति को काम पर रख सकती है।”

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

अंग्रेजी में मूल रूप से लिखे लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें 

https://www.newsclick.in/insecurity-clouds-govt-job-security-number-jobs-tanks-5-years

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