NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
इरोम शर्मिला: दमदार अनशन के 15 वर्ष
संघर्ष संवाद
12 Nov 2015

विशेष सशस्त्र बल अधिनियम के खिलाफ इरोम शर्मिला के अनशन के 15 वर्ष पूरे हो गए है। भारतीय लोकतंत्र को सर्वाधिक लज्जित करने वाली इस घटना से न तो कांग्रेस और न ही भाजपा नीत सरकारें छुटकारा दिलवाना चाहती है। कोढ़ में खाज की तरह अब मेघालय स्थित गोरा पहाड़ियों के अशांत क्षेत्र में भी इस कानून को लागू करने की मांग उठ रही है। इरोम के अनशन को नैतिक समर्थन देता शमीम जकारिया महत्वपूर्ण आलेख;

ढेर सारे समाचार लिखे जा चुके हैं। अखबारों में खूब सारे स्तंभ भी लिखे जा चुके है। तमाम तथ्य खोजे जा चुके हैं और हद से भी ज्यादा विश्लेषण भी हो चुका है। वैश्विक पत्रकारों की जमात इस कहानी के दोनों पक्षों का भी खूब बखान कर चुकी है। परंतु आज मैं  इसे एक पत्रकार के नाते नहीं लिख रही हूँ। इस क्षण मैं पत्रकारिता के अपने पुरोधाओं से अपना यह चोला उतारने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। पत्रकारिता में मुझे निष्पक्ष रहना पढ़ाया गया है। संभवतः मैं आज अपनी नैतिकता का निरादर कर रही हूँ। आज मैं जानबूझकर पक्षपाती होना चाहती हूँ। क्योंकि मैं आज आपको इरोम चारु शर्मिला की कहानी का केवल एक पक्ष ही सुनाऊँगी।

मैं जब यह लिखने बैठी हूँ तब इरोम शर्मिला का दमनकारी सेना विशेष अधिकार अधिनियम (अफ्स्पा) के विरुद्ध निरंतर चले आ रहे धर्मयुद्ध का एक और कष्टकारी वर्ष बीत गया है। यह सब कुछ 2 नवंबर 2000 को शुरु हुआ था। यह तिथि मणिपुर के इतिहास पर हमेशा एक काला दाग बनी रहेगी। उस दिन मणिपुर की इंफाल घाटी में स्थित मालोम नामक एक कस्बा बदनाम और वीभत्स जनसंहार का साक्षी बना था। उस दिन यहां भारतीय अर्धसैन्य बल में से एक आसाम राइफल्स, जो कि इस राज्य में कार्यरत है, ने बस स्टाप पर इंतजार कर रहे दस मासूम नागरिकों को क्रूरतापूर्वक गोली मार दी थी। मारे गए लोगों में महिलाएं, वृृद्ध एवं बच्चे भी शामिल थे। उन निरपराध आत्माओं की मर्मांतक चीख और रुदन भी उस वीभत्स खून खराबे में धुल सा गया। संभवतः मृत सन्नाटा ही उस शैतानी एनकाउंटर का एकमात्र साक्षी था। उस शैतानी वातावरण का सुस्पष्ट लाइसेंस तब भी अफ्स्पा था और आज भी वही है।

इरोम चारु शर्मिला उस दिन गुरुवार अपने साप्ताहिक उपवास पर थी जिसे कि वह बचपन से करती आ रही थी। दुर्भाग्यवश प्रत्येक अन्य गुरुवार की तरह उसका वह उपवास कभी समाप्त नहीं हुआ और 15 बरस बाद वह आज तक भी जारी है। संभवतः यह उपवास हमारे लिये ज्यादा मायने नहीं रखता। मायने रखती है निकटता। अन्ना हजारे के 12 दिन के उपवास ने देश को हिला दिया था और विश्वभर में क्रांतिकारी लहरें फैल गई थीं। परंतु शर्मिला की 15 बरसों की लड़ाई किसी भीड़ में खो गई दिखती है। 700 हफ्तों से ज्यादा वक्त से बिना भोजन व पानी के लड़ी जा रही इस लड़ाई में अब संभवतः मानव की अधिक रुचि नहीं रह गई है।

अफ्स्पा के अंतर्गत वर्दीधारियों को उपलब्ध अमर्यादित अपार शक्तियां अक्सर इसे अनियंत्रित बना देती हैं जो कि सार्वजनिक जीवन के लिए हानिकारक सिद्ध होता जाता है। इसके प्रावधानों में बिना सबूत या वारंट के छापा मारना और ताकत का इस्तेमाल और इस दौरान जान से मारा जाना भी शामिल है। कमीशन प्राप्त एवं गैर कमीशन प्राप्त दोनों वर्ग के सैनिकों को इसके माध्यम अभयदान मिला हुआ है। ऐसे व्यक्ति जिसने संगीन अपराध किया हो या ऐसा शक हो कि इसने ऐसा किया है या यह ताकत का इस्तेमाल कर सकता है को बिना वारंट गिरफ्तार किया जा सकता है। ऐसी गिरफ्तारी के लिए किसी भी स्थान में प्रवेश किया जा सकता है और खोजबीन की जा सकती है।

अन्य प्रावधानों के साथ ही साथ गोला बारुद पाये जाने की आशंका एवं इसकी जब्ती के लिए किसी भी व्यक्ति को गलत तरीके से भी रोका जा सकता है। आज जब मैं इंटरनेट पर समाचार देख रही थी तो एक प्रसिद्ध समाचार साइट पर मैंने पढ़ा, ‘‘भारत ‘राष्ट्रब्रांड‘ के संदर्भ में विश्व का 7वां सर्वाधिक मूल्यवान देश बना। इसकी ‘‘ब्रांडवेल्यू‘‘ में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई और अब यह 2.1 अरब डालर के बराबर है। 19.7 अरब डालर के साथ अमेरिका पहले स्थान पर है और चीन दूसरा सबसे मूल्यवान देश। संभवतः यह सच ही है। क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था मानव टीस या कसक का ध्यान नहीं करती। डेढ़ दशक के इस काल के दौरान सरकारें बदलीं, तमाम तरह के विचार विमर्श हुए, लेकिन 15 वर्ष का समय भी संभवतः इस विषय पर किसी तर्कपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं था। एक ओर उसके धर्मयुद्ध को लेकर भारी भरकम राजनीतिक रस्साकशी चलती रही वहीं दूसरी ओर किसी पहरेदारी वाले अस्पताल के एक बिस्तरे को अस्थायी जेल में परिवर्तित कर दिया गया जहां इरोम शर्मिला सतत् बीमार और गिरफ्तार है तथा ‘‘आत्महत्या का प्रयास‘‘ का आपराधिक आरोप झेल रही है। परंतु वस्तुतः दोष कहां है ? मेरे पास इसका  उत्तर नहीं है। प्रत्येक वर्ष उसके इस धर्मयुद्ध को मनाने के लिए तमाम सारे उपक्रम होते हैं।

दुर्भाग्यवश हम इसके ज्यादा बहुत कुछ कर सकते हैं। इरोम शर्मिला और उस क्षेत्र में मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर तमाम लेख लिखे गए हैं और मैं भी उनके लेखकों में से एक हूँ। इन वर्षों में कुछ बेफिजूल से तमगे जैसे ‘‘मणिपुर की लौह महिला‘‘, विश्व की सबसे दीर्घावधि तक अनशन करने वाली, ‘‘मानवाधिकारों के लिए ग्वांग्जु पुरस्कार, मायिल्लमा पुरस्कार, लाइफ टाइम अचीवमंेट अवार्ड (एशिया मानवाधिकार आयोग), रवींद्रनाथ टैगोर पुरस्कार, भारत की सर्वोच्च प्रतिभा और ऐसे अंतहीन संग्रहण उन्हें प्राप्त हुए। लेकिन यह सम्मान आदि बहुत कम मायने रखते हैं। जब उसने यह अथाह दर्दभरा धर्मयुद्ध शुरु किया था तब उसकी उम्र 28 वर्ष थी आज वह 43 वर्ष की है। उसके नारीत्व के शानदार वर्ष यूं ही ‘‘भस्मीभूत‘‘ हो गए लेकिन प्रशासन की दशा व दिशा में कोई परिवर्तन नहीं आया।

हम तो केवल दरवाजे पर दस्तक दे सकते हैं, ताला तो व्यवस्था को ही खोलना है। हम जबरन तोड़ तो सकते हैं लेकिन तब हमें ‘‘व्यवस्था विरोधी‘‘ करार दिया जाएगा। इस वजह से संभवतः और अधिक संख्या में ‘‘चेतना के कैदी‘‘ प्रवृत्त भी हो जाएंगे। हमारे पास तो सिर्फ इतना ही बचा है कि हम तब तक धैर्यपूर्वक इंतजार करें जब तक कि हमारे कानून निर्माता बंद दरवाजों के पीछे नाश्ता, दोपहर और रात का भोजन करते हुए किसी समाधान के लिए विमर्श करते रहें। याद रखिए, उसी दौरान इरोम शर्मिला को नाक में जबरदस्ती कुछ डाला जाता रहेगा। (सप्रेस) (काउंटर करंट से साभार)                        

 शमीम जकारिया लंदन स्थित भारतीय पत्रकार हैं। वे मूलतः गोहाटी (असम) से है। 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।

सौजन्य: संघर्ष संवाद

इरोम शर्मिला
अफ्स्पा
मणिपुर
असम
दमन

Related Stories

असम सीरियल ब्लास्ट में रंजन दैमारी सहित 15 दोषी करार

असम: एनआरसी अद्यतन से बढ़ी असुरक्षा की भावना

असमः नागरिकता छीन जाने के डर लोग कर रहे आत्महत्या, एनआरसी की सूची 30 जुलाई तक होगी जारी

क्या भाजपा शासित असम में भारतीय नागरिकों से छीनी जा रही है उनकी नागरिकता?

पागलपंति मैराथन में सबसे आगे बिप्लब देब

मणिपुरी राष्ट्रवाद को गलत तरीके से मनाना

गुजटॉक: शोषण का एक जरिया


बाकी खबरें

  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: इस बार किसकी सरकार?
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में सात चरणों के मतदान संपन्न होने के बाद अब नतीजों का इंतज़ार है, देखना दिलचस्प होगा कि ईवीएम से क्या रिजल्ट निकलता है।
  • moderna
    ऋचा चिंतन
    पेटेंट्स, मुनाफे और हिस्सेदारी की लड़ाई – मोडेरना की महामारी की कहानी
    09 Mar 2022
    दक्षिण अफ्रीका में पेटेंट्स के लिए मोडेरना की अर्जी लगाने की पहल उसके इस प्रतिज्ञा का सम्मान करने के इरादे पर सवालिया निशान खड़े कर देती है कि महामारी के दौरान उसके द्वारा पेटेंट्स को लागू नहीं किया…
  • nirbhaya fund
    भारत डोगरा
    निर्भया फंड: प्राथमिकता में चूक या स्मृति में विचलन?
    09 Mar 2022
    महिलाओं की सुरक्षा के लिए संसाधनों की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन धूमधाम से लॉंच किए गए निर्भया फंड का उपयोग कम ही किया गया है। क्या सरकार महिलाओं की फिक्र करना भूल गई या बस उनकी उपेक्षा कर दी?
  • डेविड हट
    यूक्रेन विवाद : आख़िर दक्षिणपूर्व एशिया की ख़ामोश प्रतिक्रिया की वजह क्या है?
    09 Mar 2022
    रूस की संयुक्त राष्ट्र में निंदा करने के अलावा, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में से ज़्यादातर ने यूक्रेन पर रूस के हमले पर बहुत ही कमज़ोर और सतही प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दूसरों…
  • evm
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: नतीजों के पहले EVM को लेकर बनारस में बवाल, लोगों को 'लोकतंत्र के अपहरण' का डर
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में ईवीएम के रख-रखाव, प्रबंधन और चुनाव आयोग के अफसरों को लेकर कई गंभीर सवाल उठे हैं। उंगली गोदी मीडिया पर भी उठी है। बनारस में मोदी के रोड शो में जमकर भीड़ दिखाई गई, जबकि ज्यादा भीड़ सपा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License