NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
खेल
राजनीति
ईस्ट बंगाल, मोहन बागान और भारतीय फुटबॉल का कॉरपोरेट श्राप
कोलकाता फुटबॉल लीग (सीएफ़एल) में ईस्ट बंगाल और मोहन बागान के खेलने से इंकार करना, यह दर्शाता है कि कैसे दो ऐतिहासिक क्लब धीरे-धीरे अपने मुख्य मूल्यों से अलग जा रहे हैं। लेकिन बात सिर्फ़ इन मूल्यों की नहीं है। दरअसल एक आम आदमी के खेल से अब भारतीय फुटबॉल को कुछ चुने हुए निजी लोगों की संपत्ति तक सीमित कर दिया गया है।
जयदीप बसु
15 Sep 2021
mohan bagan
कैप्शन: ईस्ट बंगाल के प्रशंसकों द्वारा 21 जुलाई को निकाला गया जुलूस हिंसक हो गया। ऐसा तब हुआ, जब क्लब के अधिकारियों का समर्थन कर रहा प्रशंसकों का एक दूसरा समूह, पहले समूह के लोगों के साथ भिड़ गया। इसके जवाब में पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा. लाठी चार्ज मे

21 जुलाई को ईस्ट बंगाल के सैकड़ों समर्थक क्लब के अधिकारियों के खिलाफ़ प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर निकल गए। यह प्रदर्शन ईस्ट बंगाल क्लब के अधिकारियों द्वारा निवेशकों के साथ अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर करने से इंकार करने के विरोध में हुआ था। 

लेकिन जुलूस हिंसक हो गया। ऐसा तब हुआ, जब क्लब के अधिकारियों का समर्थन कर रहा प्रशंसकों का एक दूसरा समूह, पहले समूह के लोगों के साथ भिड़ गया। इसके जवाब में पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा। टकराव के बाद करीब़ 50 लोगों को हिरासत में लिया गया, वहीं 6 लोग घायल होगए। 

ईस्ट बंगाल क्लब टेंट के सामने इकट्ठा हुए प्रशंसक अधिकारियों से तुरंत समझौते पर हस्ताक्षर करने की मांग कर रहे थे, ताकि क्लब का निवेशक श्री सीमेंट पर्याप्त पैसा लगा सके और इंडियन सुपर लीग के लिए SC ईस्ट बंगाल की मजबूत टीम को खड़ा किया जा सके। 

पिछले 100 सालों में कोलकाता में कई रैलियां, विरोध प्रदर्शन, हड़तालें हुई हैं। चाहे वह विएतनाम में वामपंथी-लोकतांत्रिक सरकारों के पक्ष में हों या क्यूबा या फिर देश के दूरदराज के इलाकों में किसानों और कामग़ारों पर उत्पीड़न के खिलाफ़।

लेकिन ऐसा बमुश्किल ही देखा गया है कि युवा लोगों का एक समूह मध्य कोलकाता में जुलूस निकालते हुए एक बड़े कॉरपोरेट हॉउस द्वारा शहर की विरासत माने जाने वाले संस्थान पर अधिग्रहण की मांग करें। वह भी सिर्फ़ इसलिए ताकि एक प्रतियोगिता में हिस्सा लिया जा सके, वह भी ऐसी प्रतियोगिता, जो अभूतपूर्व प्रशासनिक प्रश्रय के बावजूद भी अपनी पहचान नहीं बना पाई है। शायद यह कोलकाता का बदलता मिजाज है। 

यह सही है कि प्रदर्शन का एक दूसरा पहलू भी है- सदस्यों का एक समूह, क्लब के चुने हुए सदस्यों की अकुशलता भरे रवैये से नाराज़ है। पिछले एक दशक में क्लब की असफलता से भी इन लोगों में नाराज़गी बढ़ी है। इसलिए इन लोगों को यह उम्मीद है कि एक कॉरपोरेट घराने का पेशेवर रवैया कोई जादुई सुधार लेकर आएगा। पिछले सीज़न में धुर विरोधी एटीके मोहन बागान की सफ़लता ने भी इस धारणा को मजबूत किया है। 

विरोध प्रदर्शन और हिंसा के ठीक 5 हफ़्ते बाद, भारतीय फुटबॉल के मक्का में कॉरपोरेट पेशेवर रवैये का स्वाद चखने को मिला। एटीके मोहन बागान ने स्टेट एसोसिएशन IFA को बताया कि वे स्थानीय लीग CFL में खेलने की स्थिति में नहीं थे। जबकि इस लीग में यह मोहन बागान 1914 से लगातार खेलती आ रही हैं।

आधिकारिक तौर पर एटीके मोहन बागान के अधिकारियों ने कहा कि वे AFC कप कैंपेन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए CFL में हिस्सा नहीं ले रहे हैं। कुछ दिन बाद बोर्ड के निदेशक मंडल के एक सदस्य ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए कहा कि अगर एटीके मदद के लिए आगे ना आया होता, तो 132 साल पुराना क्लब केवल मुहावरों में ही रह गया होता। उन्होंने कहा कि एटीके की मदद के बिना मोहन बागान कभी एएफसी कप के सेमीफाइनल में खेलने की सोच भी नहीं पाता। 

इसके बाद एटीके मोहन बागान ने निदेशक के निंदनीय वक्तव्य के लिए माफ़ी मांगी। लेकिन कई लोगों को लगता है कि यह सिर्फ़ तात्कालिक वापसी है। मोहन बागान की एक शताब्दी से पुरानी विरासत को ख़त्म करने की एक पूरी योजना बनाई गई है। यह योजना भविष्य में फिर सिर उठाएगी। 

80 साल के पूर्व भारतीय फुटबॉल खिलाड़ी सुकुमार समाजपति अपने युवा दिनों में दोनों टीमों के लिए खेले हैं। हालांकि उनके सबसे अच्छे दिन ईस्ट बंगाल के साथ रहे। हाल में जब क्लब और उसके निवेशक समझौते पर हस्ताक्षर करने को लेकर जुबानी जंग में लगे हुए थे, तब समाजपति को क्लब के अधिकारियों ने प्रस्तावित समझौते पर नज़र डालने और उसमें उल्लेखित अनियमित्ताओं को प्रशंसकों के सामने रखने को कहा था। 

फुटबॉल के बाद एक सरकारी बैंक के उच्च अधिकारियों में रहे समाज पति एक बार क्लब पहुंचे, लेकिन उन्होंने अपनी खराब सेहत का हवाला देते हुए दूसरी बार जाने के इंकार कर दिया। वह पूरी तरह निराश नज़र आए। 

वह कहते हैं, "दोनों पक्षों की अपनी कमियां हैं। आजकल कोलकाता के यह दोनों प्रसिद्ध क्लबों को पेशेवर रवैये के साथ नहीं चलाया जा रहा है। मौजूदा तरीको को देखते हुए बड़े पैसे वाले कॉरपोरेट का प्रवेश अपरिहार्य हो चुका है। CFL में ना खेलना मुझे हैरान करता है। इससे यह अंदेशा होता है कि दशकों में बनाई गई क्लब की विरासत को ख़त्म करने योजनाबद्ध कोशिशें हो रही हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।"

समाजपति की ही तरह एक और दूसरे फुटबॉल खिलाड़ी प्रसंथा बनर्जी ने भी दोनों में से किसी एक क्लब के साथ खेलते हुए 14 सीजन बिताए हैं। उन्होंन कहा, "मुझे दुख है कि CFL को दोनों क्लबों के बिना खेला जा रहा है। यह शहर की फुटबॉल संस्कृति को गहरा धक्का है। एएफसी कप में अच्छा करने की कोशिश का मोहन बागान के फ़ैसले का स्वागत है। लेकिन मुझे बताइए कि क्या एएफसी कप में हिस्सा लेने वाले सभी क्लब अपनी घरेलू लीग को नज़रंदाज करने हैं? दोनों ही क्लबों के बड़ी संख्या में सदस्य हैं। अगर इन लोगों को अपने क्लबों को खेलते हुए देखने का मौका नहीं मिल रहा है, तो उन्हें पैसे क्यों देना चाहिए?"

लेकिन कॉरपोरेट नियंत्रण में आ चुके इन दोनों क्लबों ने इन तर्कों को तरज़ीह नहीं दी। एस सी ईस्ट बंगाल के पास पहले से ही एक तर्क तैयार था कि वे क्लब और निवेशक के बीच टसल होने के चलते अब भी एक मजबूत टीम खड़ी नहीं कर पाए हैं। एटीके मोहन बागान ने कहा कि उनके स्पेनिश कोट एंटोनियो हबास एएफसी कप पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं।

हाल में कुछ युवाओं ने "मोहन बागान सपोर्टर्स एंड मेंबर्स" नाम से एक समूह बना लिया है। इस समूह की मांग है कि मोहन बागान के नाम से एटीके हटायया जाए। उन्होंने इसके लिए विरोध प्रदर्शन किया और प्रेस कॉन्फ्रेंस कर क्लब से एटीके के साथ संबंध ख़त्म करने को कहा। वे शायद इस बात से प्रेरित थे कि उनके चिर प्रतिद्वंदी ईस्ट बंगाल के निवेशकों ने मौजूदा सीज़न के बाद खुद को क्लब से अलग करने का ऐलान किया है। 

इस समूह के प्रशंसकों की मंशा पर सवाल उठाने की कोई वज़ह नहीं है, बल्कि पिछले सीज़न में वे चूक गए थे, जब बहुत हो-हल्ले के बीच एटीके का मोहन बागान के साथ विलय किया गया था। ISL में खेलने का मौका मिलने की बात बहुत बड़ी दिखाई दे रही थी। प्रशंसकों के बहुमत ने तार्किकता को खारिज़ कर दिया था और पर्दे के पीछे से कल्ब के प्रबंधन ने क्लब की 80 फ़ीसदी हिस्सेदारी बेच दी। प्रशंसकों के सामने बस अच्छे भविष्य की तस्वीर पेश की गई। 

मोहन बागान और ईस्ट बंगाल के लाखों समर्थक बड़ी तस्वीर पर नज़र डालने से चूक गए; एक आम आदमी के खेल से अब फुटबॉल को भारत में इतना ही सीमित कर दिया गया है कि उसका मालिकाना हक़ सिर्फ़ कुछ लोगों के हाथ में आ गया है। इसलिए खेल का कोई भी मंच, चाहे वह लीग हो या क्लब, उसे निजी खिलाड़ियों द्वारा प्रबंधित करना होगा। पारंपरिक तरीके से प्रशंसकों और समर्थकों के जिस आधार से ताकत हासिल की जाती थी, अब उसे या तो ख़त्म करना होगा या खरीद लेना होगा। 

ईस्ट बंगाल के अधिकारियों को लगता है कि उन्होंने निवेशकों को इस सीज़न के बाद क्लब छोड़ने के लिए मजबूर कर, मौजूदा चलन से पार पा लिया है। तब यह अधिकारी बड़ी तस्वीर पर नज़र डालने में नाकामयाब रहे हैं। पूरे तंत्र को AFC और AIFF के ज़रिए सफ़लता के साथ बदल दिया गया है। ईस्ट बंगाल को भी समझौता करना ही होगा।

मोहन बागान का एटीके के साथ विलय ख़त्म करने की मांग कर रहे समूह के प्रतिनिधिक सदस्य सुमित घोष कहते हैं, "हम जानते हैं कि यह एकतरफा जंग है, ताकतवर विरोधियों के सामने असमान लड़ाई है। लेकिन हम संघर्ष करना जारी रखें और आशा करेंगे कि एक दिन हमारी जीत होगी।"

घोष ने असमान लड़ाई के बारे में जो बात कही, उसपर कोई शक नहीं है। उनका तेज जज़्बा कई अनसुलझे सवालों का जवाब दे देता है। क्लबों को आगे अपनी विरासत और इतिहास को बचाने की लड़ाई लड़नी होगी, जबकि पूरी व्यवस्था कुछ लोगों के फायदे के लिए तोड़ दी गई है। बल्कि जब यह व्यवस्था तोड़ी जा रही थी, तो यह क्लब बुरे तरीके से हार रहे थे। 

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

 

East Bengal, Mohun Bagan and Indian Football’s Corporate Woes

 

Indian Football
Mohun Bagan
East bengal
Protest
ISL

Related Stories

भारतीय फ़ुटबॉल टीम बनाम आईएसएल : कोच इगोर स्टीमेक को है नेशनल कैम्प में खिलाड़ियों की मौजूदगी की चिंता

कट, कॉपी, पेस्ट: राष्ट्रवादी एजेंडे के लिए भारतीय खिलाड़ियों के सोशल मीडिया का इस्तेमाल

शर्मनाक : बलात्कार का मज़ाक है स्टुअर्ट बैक्सटर की ‘पेनल्टी’ को ‘रेप’ से जोड़ने वाली भद्दी बात!

गोवा में कोलकाता डर्बी: केवल मूर्ख ही इसके पीछे दौड़ेंगे!


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामले घटकर 10 लाख से नीचे आए 
    08 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 67,597 नए मामले सामने आए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 9 लाख 94 हज़ार 891 हो गयी है।
  • Education Instructors
    सत्येन्द्र सार्थक
    शिक्षा अनुदेशक लड़ रहे संस्थागत उत्पीड़न के ख़िलाफ़ हक़ की लड़ाई
    08 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने शिक्षकों को आश्वस्त किया था कि 2019 तक उन्हें नियमित कर दिया जायेगा। लेकिन इस वादे से भाजपा पूरी तरह से पलट गई है।
  • Chitaura Gathering
    प्रज्ञा सिंह
    यूपी चुनाव: मुसलमान भी विकास चाहते हैं, लेकिन इससे पहले भाईचारा चाहते हैं
    08 Feb 2022
    पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गांव के मुआयने से नफ़रत की राजनीति की सीमा, इस इलाक़े के मुसलमानों की राजनीतिक समझ उजागर होती है और यह बात भी सामने आ जाती है कि आख़िर भाजपा सरकारों की ओर से पहुंचायी जा…
  • Rajju's parents
    तारिक़ अनवर, अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव : गांवों के प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या की कहानी
    08 Feb 2022
    महामारी की शुरूआत होने के बाद अपने पैतृक गांवों में लौटने पर प्रवासी मज़दूरों ने ख़ुद को बेहद कमज़ोर स्थिति में पाया। कई प्रवासी मज़दूर ऐसी स्थिति में अपने परिवार का भरण पोषण करने में पूरी तरह से असहाय…
  • Rakesh Tikait
    प्रज्ञा सिंह
    सरकार सिर्फ़ गर्मी, चर्बी और बदले की बात करती है - राकेश टिकैत
    08 Feb 2022
    'वो जाटों को बदनाम करते हैं क्योंकि उन्हें कोई भी ताक़तवर पसंद नहीं है' - राकेश टिकैत
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License