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राजनीति
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इजराइल, यूएई के बीच के रिश्तों की करीबियां खुलकर सामने आ चुकी है 
एक बार फिर से फिलिस्तीनियों को राजनीतिक मोहरे के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है,जिनका अमेरिकी-इसरायली-अमीराती दस्तावेज में जिक्र तक नहीं है, और जिन्हें अपने खुद के भविष्य के बारे में फैसला करने की प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। 
एम. के. भद्रकुमार
17 Aug 2020
इजराइल, यूएई के बीच के रिश्तों की करीबियां खुलकर सामने आ चुकी है 
यूएई क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद बिन ज़ायेद: फिलिस्तीनी नेतृत्व ने यूएई पर इजराइल के साथ राजनयिक सम्बंध स्थापित करने पर ‘उनकी पीठ पर छुरा घोंपने’ का आरोप लगाया है.

कहावत है कि सफलता का सेहरा बाँधने तो कई पिता सामने आ जाते हैं, लेकिन असफलता की सूरत में हर बार अनाथ रहना ही पड़ता है। इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात के बीच हाल ही में हुए विवादास्पद शांति समझौते में तो पहले से ही दो पिता रहे हैं- इसमें से एक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और दूसरे हैं इसरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू। लेकिन ट्रम्प के दामाद और मध्य-पूर्व मामलों के सलाहकार जारेड कुशनर भी इस बीच ढीठपना दिखाते हुए इसके तीसरे बाप होने का दावा करते दिख रहे हैं।

ट्रम्प और नेतन्याहू ने खुले तौर पर अपने पितृत्व का दावा किया है – नेतान्याहू तो इस मामले में ट्रम्प से भी दो कदम आगे जाते दिख रहे हैं। इनकी बैचेनी को समझा जा सकता है: दोनों ही चुनावी चक्र में गोल-गोल घूम रहे हैं, इसलिए कह सकते हैं कि किसी भी सफलता की कहानी में से अपने लिए राजनैतिक हिस्सेदारी बटोर लेने के ऐसे किसी भी दुर्लभ मौके को इन दोनों में से ही कोई भी चूकना नहीं चाहता है।

वहीँ दूसरी तरफ संयुक्त अरब अमीरात के क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद बिन जायद इस यूएई-इजरायल समझौते को साकार करने में अपनी अपरिहार्य भूमिका को स्वीकार करने तक से कतराते नजर आ रहे हैं। अरब की सड़कों पर नजर गड़ाए शेख ने इस मामले में खुद को अभी तक लो प्रोफ़ाइल रखा है, हालाँकि इज़राइली और अमीरातियों के बीच चल पनपे इस तूफानी रिश्ते को तकरीबन एक चौथाई सदी तक का समय बीत चुका है, और बाजार में ये सच्चाई किसी खुले रहस्य की तरह सबको पता है।

ट्रम्प, नेतन्याहू और शेख मोहम्मद के बीच चल रही पूर्ण सामंजस्य वाले हितों के समागम को लेकर कोई संदेह की स्थिति कभी नहीं रही, जिसके अंततः समाहित होने का किस्सा अब खुलकर सबके सामने बेपर्दा हो चुका है। संयुक्त बयान में अपनी इस सफलता की सार्वजनिक घोषणा करने से पहले इन तीनों ने गुरुवार के दिन एक दूसरे के साथ बात की थी।

लेकिन इस सबके बावजूद जब हकीकत में कोई बालक सशरीर रक्त और मज्जा समेत नमूदार होने लगे, तो इसे देख सनसनी फैलनी स्वाभाविक थी, और जो फैली भी। घुमफिरकर स्वर लहरी हर बार यही आ रही है कि इज़राइल ने इस कांच की छत को तोड़ने का काम किया है, और आगे बढ़कर अरब का हाथ हाथ थामा है। यह मध्य पूर्वी राजनीति में यह एक नाटकीय अहसास को रेखांकित करता है। एक बार फिर से फिलिस्तीनियों को, जिनका इस अमेरिकी-इजरायल-अमीराती दस्तावेज़ में उल्लेख तक नहीं है, को एक राजनीतिक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया है और अपने खुद के ही भविष्य के बारे में निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर रखा गया है।

यूएस-इज़राइल-यूएई के संयुक्त बयान में इस बात का दावा किया गया है कि तेल अवीव और अबू धाबी के बीच के संबंध यदि पूरी तरह से सामान्य हो जाते हैं तो यह "क्षेत्र में महान संभावनाओं को उजागर करने वाला साबित हो सकता है।" बयान में आगे कहा गया है कि आने वाले हफ्तों में इजरायल और यूएई विभिन्न क्षेत्रों जैसे कि पूँजी निवेश, पर्यटन, सीधी उड़ान, सुरक्षा, दूरसंचार, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में, संस्कृति, पर्यावरण, पारस्परिक दूतावासों की स्थापना और “पारस्परिक हितों से जुड़े अन्य क्षेत्रों” में भी इस समझौते के तहत आगे बढ़ने जा रहे हैं।

इसका एक ठोस परिणाम यह निकलकर आ सकता है कि इजरायल वेस्ट बैंक में अपने कब्जे की योजनाओं पर “विराम” लगा ले। स्पष्ट तौर पर अबू धाबी के लिए इसमें फिलिस्तीन समस्या के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को जारी रखने का दावा करने का मौका तो बनता ही है। लेकिन यह गायब नहीं होने जा रहा।

फिलिस्तीनी सरकारी अनुमानों के हिसाब से अबू धाबी के शेखों ने उनके साथ विश्वासघात किया है और इजरायल की कब्जे की योजनाएं एक विराम के बाद एक बार फिर से नेतन्याहू के एजेंडे में नजर आने लगेंगी।

इजरायल की ओर से अमीरातियों के लिए एक और लोकप्रिय उपहार यह दिया गया है कि वे "सभी मुसलमान जो अमन के साथ आते हैं, वे अल अक्सा मस्जिद के दर्शन और इबाबत कर सकते हैं, और इसके साथ ही येरुशलम के अन्य पवित्र स्थल भी सभी धर्मों के शांतिपूर्ण उपासकों के लिए खुले रखे जायेंगे।"

मजे की बात यह है कि इस संयुक्त बयान में इस बात का पूर्वानुमान लगाया गया है कि "अन्य देशों के साथ भी अतिरिक्त राजनयिक गतिरोध भंग कर पाना संभव है।" कुशनर ने इस बात के संकेत दिए हैं कि अन्य जीसीसी राज्य भी अमीरात के पथ का अनुगमन कर सकते हैं। इसे सुनिश्चित करने के लिए शेख मोहम्मद ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ अपनी इस पहल को समन्वित किया होगा। दांव इस बात पर लगा हुआ है कि इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की कतार में अगले राष्ट्र क्या बहरीन और ओमान हो सकते हैं।

भू-राजनीतिक दृष्टि से इस संयुक्त वक्तव्य में जो घोषणा की गई है उसके अनुसार अमेरिका, इजरायल और यूएई ये तीनों देश मिलकर मध्य पूर्व के लिए कूटनीतिक, व्यापार और सुरक्षा सहयोग का विस्तार करने के लिए एक रणनीतिक एजेंडा तैयार करने जा रहे हैं, जोकि इन तीनों देशों के “इस क्षेत्र में खतरों और अवसरों के मद्देनजर समान दृष्टिकोण पर आधारित होने जा रहा है। इसके साथ ही कूटनीतिक जुड़ाव, बढ़े हुए आर्थिक एकीकरण और बेहतर सुरक्षा समन्वय के जरिये स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए एक साझा प्रतिबद्धता को मजबूती प्रदान की जायेगी।”

यह सब कब और कैसे होगा यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन इस संयुक्त बयान में दिलचस्प बात यह रही कि इसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ईरान का जिक्र नहीं किया गया है। ऐसा लगता है कि यूएई ने ईरान के साथ अपने संबंधों में सुधार के लिए की गई शुरूआती कूटनीतिक पहल को इतनी जल्दी पटरी से नहीं उतारने का मन बनाया है। इस बात की संभावना है कि वर्तमान में अमीरात के लिए ईरान के उभार की तुलना में तुर्की-कतर की धुरी कहीं अधिक परेशानी में डालने वाली हो। ऐसा इसलिये क्योंकि आज के दिन इन दो देशों को मुस्लिम ब्रदरहुड के परामर्शदाता की भूमिका हासिल है।

इजरायल-अमीरात के बीच के सौदे में जो बात साफ-साफ़ नजर आ रही है वह यह कि अरबों ने फिलिस्तीनी संघर्ष के साथ "धोखाधड़ी" की है। वहीँ इज़राइल निश्चित तौर पर अपने दीर्घकालिक रणनीतिक को साकार कर पाने में एक बड़ी छलांग लगाकर एक बड़े विजेता के तौर पर नजर आ रहा है।

स्पष्ट रूप से देखें तो इजरायल और यूएई दोनों ही भविष्य के लिहाज से एक संक्रमणकालीन दौर की तैयारी में जुटे हैं, जिसमें वे अपने संसाधनों को जुटाकर अपने हितों को बेहतर तरीके से सुरक्षित कर सकते हैं। मध्य पूर्व में अमेरिका की क्षेत्रीय रणनीति की चाल-ढाल को देखते हुए जीसीसी शासकों के मन में काफी गुस्सा है, जो कि अमेरिका में नवंबर में चुनाव परिणामों में बन रही अनिश्चितताओं के चलते और तेज हो चली है।

बिडेन के राष्ट्रपति बनने का अर्थ है कि न सिर्फ ईरान के प्रति ट्रम्प के "अधिकतम दबाव" वाली नीति का अचानक से खात्मा, बल्कि अमेरिकी-ईरानी सगाई की एक बार फिर से बहाली हो सकती है, जो कि फारस की खाड़ी के सुन्नी कुलीनों और इजरायल के लिए काफी तकलीफदेह साबित हो सकती है।

इससे भी निराशाजनक स्थिति तब बन सकती है यदि डेमोक्रेटिक प्रशासन ने जैसा कि उसने वादा किया है, वाकई में यमन में चल रहे युद्ध से अमेरिकी कदमों को वापस खींच लेता है, या इस क्षेत्र में मानवाधिकारों और लोकतंत्र को बढ़ावा देने के काम में लग जाता है। मध्य पूर्व के मुस्लिम रंगमंच पर डेमोक्रेटिक की भूमिका से बराक ओबामा युग में वापसी संभव हो सकती है।

बुनियादी तौर पर देखें तो सुरक्षा प्रदाता के तौर पर अभी तक की अमेरिका की ऐतिहासिक भूमिका अब बदलती जा रही है। और यही वह जगह है जहां पर यूएई के लिए तुर्की-कतर धुरी उसके लिए एक अस्तित्ववादी खतरा नजर आने लगती है। हम तुर्की की इस्लामवादी नीतियों और "नव-तुर्कवाद" का मुकाबला करने के लिए इज़राइल-यूएई मिलन की उम्मीद कर सकते हैं। और यहीं तुर्की और यूएई के बीच के संघर्ष में लीबिया एक रंगमंच के तौर पर इस्तेमाल होता दिखता है।

वहीँ तुर्की के परिप्रेक्ष्य से देखें तो इज़राइल और यूएई की भूमिका उसके विरोधी के तौर पर है, जो कुर्दों को अपना समर्थन देते हैं। तुर्की-इजरायली संबंधों में किसी भी सार्थक सुधार को तब तक सिरे से नकार कर रखा जाना चाहिए जब तक राष्ट्रपति रेसेप एर्दोगन हमास को बढ़ावा देना बंद नहीं कर देते। इस बीच एर्दोगन का मानना ​​है कि यूएई एक बार फिर से 15 जुलाई 2016 जैसी तख्तापलट की तैयारी में है, जिसमें उसने उसकी हत्या करने और सरकार को उखाड़ फेंकने की असफल कोशिश की थी।

अपनी पहली टिप्पणी में आज एर्दोगन का कहना था कि वे यूएई के साथ तुर्की के राजनयिक संबंधों के निलंबन या उसमें कमी करने पर विचार कर रहे हैं। एर्दोगन के अनुसार “मैंने विदेश मंत्री को इस बारे में निर्देश दे दिए हैं। मैंने इसमें कह दिया है कि हम अबू धाबी प्रशासन के साथ राजनयिक संबंधों को या तो निलंबित कर सकते हैं या अपने राजदूत को वहाँ से हटा सकते हैं।“

कुलमिलाकर कहें तो तुर्की और कतर के लिए इजरायल-यूएई रणनीतिक गठजोड़ किसी सुरक्षा चुनौती के तौर पर है। तुर्की, कतर और ईरान के लिए यह अवसर किसी स्वर्ग से प्राप्त उपहार के समान है, जो उन्हें फिलिस्तीनी प्रतिरोध के चैंपियन के तौर पर रंगमंच पर केन्द्रीय भूमिका को अपनाने का मौका प्रदान कर रहा है। तुर्की के विदेश मंत्रालय की ओर से इस सम्बंध में बेहद कठोर शब्दों में बयान आया है, जिसमें कहा गया है "इतिहास और इस क्षेत्र के लोगों का विवेक कभी भी यूएई द्वारा अपने संकीर्ण स्वार्थों की खातिर फिलिस्तीनी संघर्ष के साथ धोखा देने वाले धूर्त व्यवहार को न तो भूलने जा रहा है, और न ही कभी माफ़ करने जा रहा है।"

बयान में आगे कहा गया है “यह बेहद चिंताजनक है कि यूएई ने अपनी ओर से एकतरफा कार्रवाई के जरिये अरब लीग द्वारा विकसित (2002) अरब शांति योजना से दूर जाने और नकारने का प्रयास किया गया है। इस तीन-तरफा घोषणा को किसी भी सूरत में फ़िलिस्तीनी संघर्ष के समर्थन के तौर पर प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।”

ईरानी विदेश मंत्रालय ने इसे यूएई की ओर से "रणनीतिक मूर्खतापूर्ण" कदम घोषित किया है। तेहरान के बयान में कहा गया है कि "जो खंजर फिलिस्तीनी राष्ट्र और मुस्लिम जनता इन दोनों पर घोंपा गया है, इसका उल्टा असर पड़ने जा रहा है। इस क्षेत्र में यहूदी शासन और प्रतिक्रियावादी सरकारों के खिलाफ एकता और एकजुटता को बढ़ावा मिलने से रेजिस्टेंस एक्सिस को और मजबूती मिलने जा रही है।"

संतुलन के आधार पर देखें तो फ़ारस की खाड़ी के अधिनायकवादी अरब शासनों को सुरक्षा प्रदाता के तौर पर अमेरिका की भूमिका को इजराइल किस हद तक पूरा कर सकता है, इसे देखा जाना अभी शेष है। ये पेट्रोडॉलर राज्य अभी तक अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को आउटसोर्स करते आये हैं। और इजरायल की खुफियागिरी की क्षमता और विरोध का गला घोंट कर रख देने में उसकी विशेषज्ञता, शेखों की जागीरों के बेहद काम आने वाली हो सकती है।

वहीँ इजरायल के लिए जीसीसी देश एक आकर्षक बाजार के तौर पर महत्व के हो सकते हैं। व्यापार और आर्थिक संबंधों में विस्तार की इसमें काफी गुंजाइश है। इज़राइल की उच्च तकनीक वाले उद्योग यहाँ निवेश, परियोजना निर्यात और यहां तक ​​कि हथियारों की बिक्री के अवसरों तक को भुना सकते हैं। लेकिन अरब की जनता की राय किस प्रकार से इजरायल की मौजूदगी को देखती है, यह अभी भी सवालों के घेरे में है।

इजराइल से इस बात की उम्मीद करना काफी अधिक होगा कि वह फिलिस्तीनी लोगों को झुकाने और तोड़ने के लिए अवैध बस्तियों के निर्माण करने, रंगभेद शासन को बनाए रखने और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हमला करने जैसे अपने हिंसक उपायों से बाज आने वाला है। दिलचस्प तथ्य यह है कि कई वामपंथी और उदारवादी अमेरिकी यहूदी संगठनों ने संबंधों को सामान्य बनाने वाले इस इजरायल-यूएई समझौते को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि इसमें "जश्न मनाने जैसी कोई बात नहीं" है।

उन्होंने इस डील को ट्रम्प और नेतन्याहू की नवीनतम चाल के तौर पर खारिज कर दिया है, जिसमें यूएई की ओर से मदद और प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह अमेरिका और इज़राइल में "महामारी, आर्थिक संकट, नागरिक अशांति और जनता के बीच तेजी से गिरते समर्थन" से बचने के लिए की जा रही नौटंकी और जनता का ध्यान भटकाने के सिवाय कुछ भी नहीं है।"

दरअसल इस प्रकार की आलोचना के पीछे काफी कुछ सच्चाई नजर आती है। मुद्दे की बात तो यह है कि ट्रम्प और नेतन्याहू दोनों ही इस समय अपने ही तरीके से, गहरे राजनीतिक संकट के बीच से गुजर रहे हैं, और इन दोनों को ही कोई न कोई सफलता की कहानी को अपने नाम भुनाने की बैचेनी छाई हुई है। लेकिन इस सबमें सबसे पेचीदा पहलू शेख मोहम्मद को लेकर है, कि आख़िरकार इस सबसे उसे मुस्लिम मध्य पूर्व के राजनीतिक संदर्भ में क्या कुछ हासिल होने वाला है, जो उसने इतना बड़ा जोखिम उठा लिया है।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Israel, UAE Finally Consummate Their Relationship

UAE
Israel
Arab Nations
Palestinian cause

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