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जीडीपी में हेरफेर : देश को धोखे में रखकर क्या हासिल होगा?
गलत विकास की दर दिखाकर सरकार की छवि चमकायी जा सकती है लेकिन अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान पहुंचता है। 4.5 फीसदी विकास दर होने पर राजकोषीय खर्चे को नियंत्रित करने के जो उपाय सोचे जाएंगे वह 7 फीसदी विकास दर होने पर नहीं सोचे जा सकते हैं।
अजय कुमार
11 Jun 2019
gdp

प्रशासनिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की एक बात कभी नहीं समझ में आएगी कि वह अपने दौर की सरकारी कमियों को तब क्यों उजागर करते हैं, जब वह अपने पद से इस्तीफ़ा दे चुके होते हैं या सेवानिवृत्त हो चुके होते हैं। हो सकता है कि इसके पीछे कोई डर हो या उनका कोड ऑफ़ कंडक्ट उनके आड़े आता हो लेकिन अगर कोड ऑफ़ कंडक्ट जैसी कोई बात होती है तो  प्रशासनिक सत्यनिष्ठता या एडमिनिस्ट्रेटिव इंटिग्रिटी जैसे मूल्य भी होते है, जिसके तहत अगर प्रशासनिक व्यक्ति की जानकारी में अगर कुछ गलत हो रहा है तो उसे देखकर आंख मूंद लेना या झुकना एडमिनिस्ट्रेटिव इंटीग्रिटी के खिलाफ होता है। हालांकि नौकरी में रहते सत्ता से टकराना हर किसी के लिए आसान नहीं होता।

इन सारी बातों के साथ चलते हुए मोदी सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम  के ताजा विश्लेषण पर बात करते हैं। अरविन्द सुब्रमण्यम के नाम से हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में India’s GDP Mis-estimation: Likelihood,Magnitudes, Mechanisms, and Implications  नाम से एक शोध पत्र छपा है। इसमें उन्होंने साबित किया है कि साल 2011 से 2017 के बीच जीडीपी मापने के पैमाने को बदलकर सलाना जीडीपी7 फीसदी दिखाई गई लेकिन ऐसा नहीं था, हर साल जीडीपी को 2.5 फीसदी अधिक करके दिखाया गया। यानी वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 4.5 फीसदी थी, जिसे 7 फीसदी के तौर पर दिखाया जा रहा था।

आगे बढ़ने से पहले से यह समझना जरूरी है कि सुब्रमण्यम साल 2011 से लेकर साल 2017 तक की बात कर रहे हैं और इस दौरान केवल भाजपा की सरकार नहीं थी, कांग्रेस की भी सरकार थी।  

इंडियन एक्सप्रेस में सुब्रमण्यम लिखते हैं कि यह बात सही है कि पैमाने बदलकर आंकड़े जारी करने जैसी बहुत सारी बातों पर राजनीतिक शोरगुल साल 2014 के बाद शुरू हुआ। लेकिन इस काम की शुरुआत यूपीए के दूसरे कार्यकाल में हो चुकी थी। और यहाँ समझने वाली बात है कि आंकड़ें मापने के पैमाने बदलने की पहल राजनेताओं द्वारा नहीं होती बल्कि उन टेकनोक्रैट द्वारा होती है, जो इन कामों में लगे होते हैं। इसी वजह से यूपीए के दूसरे कार्यकाल के अंतिम साल में जीडीपी दर में अचानक से बहुत अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गयी।  
अपने रिसर्च पेपर में अरविंद सुब्रमण्यम ने बहुत सारे साक्ष्यों से यह साबित किया है कि कैसे जीडीपी मापने के मेथड (तरीका) बदलने से दरों में बढ़ोतरी हुई है। इंडियन एक्सप्रेस में दो साक्ष्यों का उल्लेख किया है। इसके तहत उन्होंने जीडीपी मापने के 17 प्रमुख संकेतक (key indicators ) लिए है। गणना का काल 2002-17है। बिजली का उपभोग, दुपहिया वाहनों की बिक्री, व्यावसायिक वाहनों की बिक्री, हवाई यात्रा का किराया,औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक (IIP) उपभोक्ता वस्तुओं का सूचकांक, पेट्रोलियम, सीमेंट, स्टील, और सेवाओं और वस्तुओं का आयात-निर्यात। इन सेक्टरों के आधार पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का मूल्यांकन होता है। 2011 तक तो इन संकेतकों के जरिये मिली बढ़ोतरी और जीडीपी बढ़ोतरी में तो समानता रही लेकिन उसके बाद अचनाक से वृद्धि हुई, जो इन संकेतकों से मिली वृद्धि दर से अधिक थी। बिना रिसर्च पढ़े,  किसी बाहरी के लिए ऐसा कैसे हुआ समझना मुश्किल है? इसपर अरविन्द सुब्रमण्यमम कहते हैं कि साल 2011 के बाद फॉर्मल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से मिले आंकड़ों के साथ बहुत अधिक छेड़छाड़ की गई।    

यही नहीं अरविंद सुब्रमण्यम  ने भारत की तुलना 71 उच्च और मध्यम अर्थव्यवस्था वाले देशों से की है। इसके लिए अलग से पैमाने लिए हैं। कर्ज़, निर्यात, आयात और बिजली। क्रॉस कंट्री तुलना करने के बाद सुब्रमण्यम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि साल 2011 तक तो भारत के साथ दूसरे अन्य देशों की जीडीपी विकास दर सामान्य चल रही थी लेकिन उसके बाद भारत की जीडीपी में दूसरे देशो की तुलना में बड़ा इजाफा हुआ और यह इजाफा 2.5 फीसदी के करीब था। इसी तरह सारे तरीकों के जरिये सुब्रमण्यम ने यह साबित  किया है कि जीडीपी को बढ़ा चढ़ा कर दिखया गया था। अरविन्द सुब्रमण्यम यह भी कहते हैं कि जीडीपी आकलन के सारे तरीके पूरी तरह से सार्वजनिक होने चाहिए ताकि देश और दुनिया के विशेषज्ञ उस पर अपनी राय रख सकें।  

आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना एक दिखावटी किस्म का चलन है। यह चलन सरकारों में लग जाए तो नीति निर्माण की पूरी प्रक्रिया गड़बड़ा सकती है। शायद यही हो भी रहा है। बेरोजगारी से लेकर कृषि संकट से सही तरह से लड़ने के लिए जीडीपी विकास की सही स्थिति का पता होना ज़रूरी है। गलत विकास की दर दिखाकर सरकार की छवि चमकायी जा सकती है लेकिन अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान पहुंचता है। 4.5 फीसदी विकास दर होने पर राजकोषीय खर्चे को नियंत्रित करने के जो उपाय सोचे जाएंगे वह 7 फीसदी विकास दर होने पर नहीं सोचे जा सकते हैं। हमने जॉबलेस ग्रोथ जैसी शब्दावलियाँ सुनी है, जिससे ऐसा लगता है कि विकास तो हो रहा है लेकिन रोजगार पैदा क्यों नहीं हो रहा है? जीडीपी के सही आंकड़ें से यह पता चलता है कि न विकास हो रहा है और न ही रोजगार पैदा हो रहा है। इस तरह से यह केवल सरकारी छवि की बात नहीं है कि सही आंकड़ें जारी किये जाए बल्कि यह किसी भी देश की जरूरत है कि सही आकंड़े मिले ताकि वह सही तरह से नीति निर्माण का काम कर सके।

GDP growth
GDP
chief economic advisor of modi government
arvind subramniam
GDP growth-rate

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