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राजनीति
जम्मू और कश्मीर : सरकार के निशाने पर प्रेस की आज़ादी
जम्मू-कश्मीर प्रशासन की नई मीडिया नीति की वजह से क्षेत्र के पत्रकार चिंतित हैं। उनका मानना है कि इससे प्रेस की आज़ादी पर और लगाम लगाने की कोशिश की जाएगी। इसी मुद्दे पर मुकुलिका आर ने बात की पत्रकार फ़हाद शाह से।
फ़हाद शाह, मुकुलिका आर
24 Dec 2020
जम्मू और कश्मीर

इस साल जून में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने प्रेस की आज़ादी और स्वतंत्र आवागमन पर लगाम लगाने की ताजा कोशिश के तहत "नई मीडिया नीति, 2020" की घोषणा की। फेक न्यूज़ और गलत जानकारी पर लगाम लगाने की आड़ में नई मीडिया नीति, सरकार को कश्मीर में प्रकाशित हर ख़बर पर पूर्ण नियंत्रण देती है। यह नीति सरकार को अधिकार देती है कि वो किसी ऐसे मीडिया से जुड़े शख़्स या संस्थान पर आपराधिक कार्रवाई कर सके, जो कोई भी ऐसी चीज प्रकाशित करता हो, जिसे राज्य "झूठ" या "फ़र्ज़ी" करार देता हो। नीति यह भी कहती है कि जो मीडिया संस्थान "राज्य के मानकों" पर खरे नहीं उतरते, उनसे जम्मू और कश्मीर सूचना व जनसंपर्क विभाग विज्ञापन वापस ले सकता है या उन्हें विज्ञापन की आगे मनाही कर सकता है।

जम्मू-कश्मीर के पत्रकार एक ऐसा अनोखा समूह हैं, जो लगातार राज्य के दमन के बीच सालों से काम करते आ रहे हैं, उन्हें ताज़ा कदम में कुछ भी नया नहीं लगता, बल्कि वे मानते हैं कि यह पहले से ही मौजूद बाधाओं की बढ़ोत्तरी है। ऑनलाइन न्यूज़ प्लेटफॉर्म द कश्मीर वाला के संस्थापक और मुख्य संपादक फ़हाद शाह लगातार पुलिस समन, हिरासत और दूसरे हमलों के ज़रिए राज्य का दमन सहते रहे हैं। 2017 में शाह को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने मनमाने ढंग से उठा लिया था और उनसे उनके काम के बारे में घंटों तक पुलिस पूछताछ करती रही थी। 2018 में उनके कमरे में एक आंसूगैस का गोला डाल दिया गया, उस वक़्त वे अपने कार्यालय में ही मौजूद थे। इस साल 20 मई को पुलिस ने उनसे एक बार फिर एक ऐसी रिपोर्ट के बारे में पूछताछ की, जिससे पुलिस की "बदनामी" हुई थी। 3 अक्टूबर को हाल में शाह और उनके साथी कर्मचारियों को काम से घर आते वक़्त हिरासत में ले लिया गया था और इसके उनसे घंटों तक पूछताछ की जाती रही थी।

इन्हीं घटनाओं के बीच इस साल शाह को इस साल के "रिपोर्टर्स विदऑउट बॉर्डर्स प्रेस फ़्रीडम अवॉर्ड" के लिए नामित किया गया था, यह प्रेस की आज़ादी को बरकरार रखने में उनके प्लेटफॉर्म की अहम भूमिका की पहचान करने वाली घटना थी। इन सारे हमलों के बावजूद शाह, जो राज्य की इन कोशिशों को डर पैदा करने वाली मानते हैं, वे रत्तीभर भी टस से मस नहीं हुए। फ़हाद शाह मुकुलिका आर के साथ हुए इंटरव्यू में इस पर और प्रकाश डाल रहे हैं।

मुकुलिका आर: कई सालों से जम्मू-कश्मीर में पत्रकार राज्य और मिलिटेंसी के दमन के नीचे रहने के लिए मजबूर हैं। नई मीडिया नीति के बारे में क्या अलग चीज है, जिसका आप सभी विरोध कर रहे हैं?

फ़हाद शाह: मैं मानता हूं। कश्मीर में पत्रकार बहुत मुश्किल स्थितियों में काम कर रहे हैं, खासकर अगस्त, 2019 के बाद तो पत्रकारिता का पेशा बहुत ही ज़्यादा मुश्किल हो गया है। बाद के महीनों में सरकार नई मीडिया नीति लाई, जिसका एक संस्थान के तौर पर “द कश्मीर वाला” पुरजोर विरोध और आलोचना कर रहा है। लेकिन दुर्भाग्य से इस काले कानून के खिलाफ़ दूसरे प्रेस संस्थानों और पत्रकारों ने बहुत ज़्यादा असहमति नहीं जताई है। द कश्मीर वाला की तरफ से मैंने कश्मीर प्रेस क्लब को ख़त भी लिखा, जिसमें इस नीति के परिणाम बताए गए थे और बताया गया था कि क्यों इस नीति के खिलाफ़ उन्हें आवाज़ उठानी चाहिए। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि कश्मीर में ज़्यादातर पत्रकारों ने चुपचाप इस नीति को मान लिया है और इसलिए खुद पर लगाम लगा रहे हैं।

मेरा मानना है कि अपनी पत्रकारिता पर खुद ही सेंसरशिप लगाना एक बीमारी है। मुझे समन मिलते रहे, हिरासत में लिया जाता रहा, वह भी सिर्फ़ इसलिए क्योंकि हमने राज्य के सेंसरशिप के पैंतरों को मानने या अपने काम में बदलाव लाने से इंकार कर दिया। मुझे नहीं लगता कि सरकार ने मीडिया घरानों को ऐसी कोई कानूनी नियमावली दी है, जिसमें कहा गया है कि रिपोर्टिंग को बंद कर दिया जाए, लेकिन इसके बावजूद कुछ बड़ी घटनाओं को अख़बारों में प्रकाशित नहीं किया गया। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

नई मीडिया नीति क्रूरता की स्तर तक सख़्त है। हमने इसे “पत्रकारिता का नौकरशाहीकरण” कहा। द कश्मीर वाला ने इसके खिलाफ़ खुलकर और बेहद तीखे शब्दों में लिखा है, निश्चित तौर पर हम आगे भी ऐसा करना जारी रखेंगे। क्योंकि इस नीति में कानून लागू करने वाली एजेंसियां तक पत्रकारों के पीछे पड़ सकती हैं, हमारी पृष्ठभूमि का परीक्षण किया जाएगा और इसकी जांच सिर्फ़ आपके द्वारा प्रकाशित की गई सामग्री को आधार बनाकर की जा सकती है। यह सारा काम पत्रकारों में डर भरने के लिए किया जा रहा है, ताकि वे सरकार की आलोचना करने वाले लेख ना लिखें। लेकिन पत्रकारिता का काम ही सरकार, सार्वजनिक संस्थानों और सार्वजनिक नौकरशाहों की ज़्यादतियों को सामने लाना है। इसीलिए हम एक प्रेस संस्थान के तौर पर स्वतंत्र खड़े रहते हैं।

मुकुलिका: चीज़ें अब कितनी बद से बदतर हुई हैं? विशेष दर्जे के ख़ात्मे, उसके बाद लगाए गए संचार प्रतिबंध और दूसरे दमनकारी कार्रवाईयों के बाद, क्या आप बता सकते हैं कि इन दिनों कश्मीरी पत्रकारों की रोज़ाना की जिंदगी घाटी में कैसी रहती है?

फ़हाद: जैसा मैंने कहा, अगस्त 2019 के बाद मीडिया के लिए अब चीजें पुरानी जैसी नहीं रही हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह इंडस्ट्री खुद से खुद पर लगाए सेंसरशिप की बीमारी से ग्रस्त हो गई है। व्यवहारिक तौर पर यह चीज पत्रकारिता की हत्या कर रही है। सरकार के बारे में लिखना ठीक है, लेकिन लोगों और उनकी आवाजों का प्रतिनिधित्व करने में नाकाम रहना सीधे-सीधे विनाशकारी है। अब यही हो रहा है।

मेरा मानना है कि मेरा पत्रकारीय जीवन दूसरों से थोड़ा अलग है। मुझे समन मिले हैं, राज्य द्वारा हिरासत में लिया गया है और कई घंटों तक पूछताछ की गई है। मुझे आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष धमकियां मिलना जारी है। कई बार मुझसे तब कुछ स्टोरीज़ को हटाने के लिए कहा गया, जब वे किसी खास संस्थान के खिलाफ़ जा रही होती हैं। जब मैं लोगों से मिलता हूं, तो वे मुझसे पूछते हैं “आप खुले में इस तरीके से क्यों घूम रहे हैं?” वे मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित होते हैं। इन सारी चीजों से मैं मानसिक ट्रामा की स्थिति से गुज़र रहा हूं, जिससे मैं रोज़ एक जंग लड़ता हूं। मन में किसी तरह की शांति नहीं है, हालांकि यहाँ चीजें हमेशा से ऐसी ही रही हैं। हमारे पेशे में बहुत सारे दूसरे लोगों के साथ भी यही स्थिति है। लेकिन हमने क्या किया है? हमने कश्मीर में जो हो रहा है, उसकी रिपोर्टिंग की, हमने कोई मन से तो स्टोरीज़ बनाई नहीं हैं। यह सारी चीजें तथ्य हैं, जिन्हें से कई शायद “बाहर नहीं आना” चाहिए था।

मुकुलिका: जम्मू और कश्मीर को कई लोग राज्य के दमन, सर्विलांस और ताक़त के दुरुपयोग की प्रयोगशाला मानते हैं, जिन्हें दूसरे किसी राज्य में दोहराया जाना है। लेकिन इसके बावजूद भारत की मुख्यधारा की मीडिया के द्वारा उम्मीदों के मुताबिक़ समर्थन नहीं किया गया। आप इसे कैसे देखते हैं? आप मीडिया के समर्थन को किस तरीके से देखते हैं? नई मीडिया नीति पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया समुदाय की प्रतिक्रिया अब तक क्या रही है?

फ़हाद: मीडिया का समर्थन बेहद ज़रूरी होता है। लेकिन आप सही हैं। सिर्फ़ कुछ प्रकाशनों और संपादकों को छोड़कर, ज़्यादातर मीडिया घराने हमारे पक्ष में खड़े नहीं हुए। व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए मुंबई, दिल्ली और विदेश के कुछ दोस्तों ने समर्थन जताया है। यूरोप और अमेरिका में रहने वाले कछ संपादक-पत्रकार लगातार संपर्क में रहते हैं और हमारी स्थिति के बारे में अकसर पूछते रहते हैं। वे जिस भी तरीके से हमारी मदद कर सकते हैं, उसे करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

स्वतंत्र मीडिया घरानों के लिए जरूरी है कि वे एक साथ आएं और एक ऐसा तंत्र बनाएं, जिसके ज़रिए यह मीडिया घराने, ना केवल कश्मीर बल्कि पूरी दुनिया में सतत् बने रह सकें। मेरा मानना है कि सिर्फ़ कश्मीर में ही मीडिया इन समस्याओं का सामना नहीं कर रही है। हमारे पास दूसरे उदाहरण भी हैं। इजिप्ट या हॉन्गकॉन्ग को देखिए। जानिए कि इन क्षेत्रों में स्वतंत्र मीडिया किन हालातों से गुजर रही है। जब प्रशासन काम करने के लिए एक खुला माहौल देने को तैयार नहीं होता, तो काम करना मुश्किल हो जाता है। भारतीय मीडिया को हमारे हालातों के बारे में ज़्यादा बेहतर तरीके से समझना चाहिए। लेकिन आखिर में उनमें से ज़्यादातर घराने सिर्फ़ इस चीज से चिंतित रहते हैं कि उनका राजस्व कहां से आता है। वे सिर्फ़ अपने दर्शकों के लिए काम कर रहे होते हैं, जो सिर्फ़ यह जानना चाहती है कि कश्मीरियों का दमन किस तरीके से किया जा रहा है।

लेकिन इसी दौर में भारत के कई राज्यों के लोग और गैर सरकारी संस्थान मदद करने के लिए आगे आए हैं। वे हमारे साथ जुड़ना चाहते हैं और हमारी बेहतरी के लिए समाधान और नए तरीके निकालना चाहते हैं। मैं आशा करता हूं कि यह चीज जारी रहे और हम कश्मीर में मीडिया के लिए बेहतर माहौल बना सकें।

मुकुलिका: क्या आप हमें द कश्मीर वाला द्वारा की गई खोजों के बारे में बता सकते हैं? संचार प्रतिबंध के दौरान मैगज़ीन ने कैसे काम किया?

फ़हाद: 2010 में सड़कों पर हुए प्रदर्शन में सरकारी सुरक्षाबलों द्वारा 100 से ज़्यादा नागरिकों की हत्या के एक साल बाद 2011 में मैंने द कश्मीर वाला वेबसाइट लॉन्च की थी। इस मैगजीन का मूल विचार हमेशा से यही रहा है कि कश्मीर की कहानी, कश्मीर के लोगों द्वारा ही पूरी दुनिया को सुनाई जाए। एक पत्रकार के तौर पर मैंने अनुभव किया है कि कैसे भारत में कई संपादक कश्मीर से जुड़ी रिपोर्टों और प्रस्तावित लेखों के सुझावों को छांटते हैं, ताकि उनके विमर्श में यह चीज संतुलन बना सके। इसलिए हम एक विवादित क्षेत्र में पैराशूट पत्रकारिता की जगह क्षेत्रीय पत्रकारिता को बढ़ावा देना चाहते थे।

लेकिन यह सब चीजें 5 अगस्त, 2019 को एकदम से ज़मीन पर आ गईं, जब सरकार ने संचार के सभी माध्यम बंद कर दिए और इस क्षेत्र के हालिया इतिहास में सबसे कड़े कर्फ्यू लगा दिए। हमारी वेबसाइट पर लाखों का ट्रैफिक आता था, जो लगभग शून्य तक गिर गया। निजी बाज़ार अपनी मृत्यु के करीब पहुंच रहा था, हम अपनी आर्थिक तौर पर अपनी वेबसाइट के ट्रैफिक पर निर्भर थे और बिना इंटरनेट के ना तो हम कुछ प्रकाशित कर पा रहे थे और ना ही कुछ कमा पा रहे थे। इससे हमारे एक साप्ताहिक प्रिंट अख़बार के नए प्रोजेक्ट को भी झटका लगा। सुरक्षा संबंधी लॉकडाउन और संचार प्रतिबंध के चलते हम प्रिंटिंग प्रेस तक नहीं पहुंच पाए।

इसके बावजूद हमने दमन के इस दौर में अपनी रिपोर्टिंग जारी रखी। हमारी टीम के दो सदस्य साप्ताहिक तौर पर कश्मीर के बाहर जाते रहे, ताकि हमें इंटरनेट मिल सके और हम नई दिल्ली से अपनी स्टोरीज़ प्रकाशित कर सकें। आर्थिक दिक्कतों के चलते हमें कम दर्जे वाले प्रिंट न्यूज़पेपर में खुद को बदलना पड़ा, लेकिन सबसे अहम यह बात रही कि हमने सबसे अहम दौर में अपना काम, रिपोर्टिंग और सभी ताजा मुद्दों का विश्लेषण करना जारी रखा। यह वह दौर था जिसने कश्मीर को हमेशा के लिए बदल दिया।

मुकुलिका: आप और आपके साथी कर्मचारियों को हाल में हिरासत में लेकर जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा “द कश्मीर वाला” में आपकी रिपोर्टिंग के लिए प्रताड़ित किया गया। इससे पहले 2017 और 2018 में भी आपको ऐसे ही अनुभवों से गुजरना पड़ा था, इसके अलावा वक़्त-वक़्त पर आपको पुलिस द्वारा समन भेजे जाते हैं। आप जैसे पत्रकारों को ऐसे अनुभवों से गुजरने के बाद दोबारा हिम्मत बांधकर काम पर जाने के लिए कौन सी चीज प्रेरित करती है, जबकि राज्य आपको नियमित तौर पर शारीरिक और मानसिक दबाव से गुजरने के लिए मजबूर करता है?

फ़हाद: मुझसे किया गया मेरा वो वादा कि मैं अपने लोगों की कहानी हर हाल में सुनाऊंगा, यह वादा मुझे हमेशा से हिम्मत देता रहा है। यह विश्वास और निश्चित तौर पर इतिहास में सही पक्ष में रहने के बारे में है। और मेरा प्रबल तौर पर मानना है कि यह सही पक्ष है। हम हर दिन खुद को यह कहकर मूर्ख नहीं बना सकते कि अब रिपोर्टिंग के लिए कुछ नहीं है।

इस साल हमने जो भी बड़ी स्टोरीज़ कीं, वे ज़्यादातर घटनाओं पर आधारित थीं। दिलचस्प बात यह है कि हमें प्रभावित क्षेत्रों के ज़्यादातर लोगों ने इनके बारे में शुरुआती सूचना दी थी। लोगों को हम पर भरोसा है, वे जानते हैं कि जब अन्याय होता है, तो किनके पास जाया जाए और मेरा विश्वास है कि हमने अब तक उन्हें गलत साबित नहीं किया है। हम भविष्य में भी ऐसा नहीं होने देंगे। यह जनसेवा की पत्रकारिता है, जिसे मैं अपने ही समुदाय के लोगों द्वारा चलाना चाहता हूं। इसलिए हमारे पास मेंबरशिप मॉडल है, जहां लोग, हमारे पाठक हमें पैसा दे सकते हैं, ताकि हम आगे काम जारी रख सकें। हम चाहते हैं कि द कश्मीर वाला को लोग समर्थन करें, ना कि समाज के ताकतवर संस्थान, जिनका मीडिया की तस्वीरों को मोड़ने से हित जुड़ा होता है।

यह इंटरव्यू वर्दा दीक्षित और उमर बेग़ की मदद के बिना संभव नहीं हो सकता था।

फ़हाद शाह एक पत्रकार और लेखक हैं, जो स्वतंत्र मल्टीमीडिया न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म “द कश्मीर वाला” चलाते हैं। उन्होंने कश्मीर यूनिवर्सिटी और SOAS, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से पढ़ाई की है। शाह ने “एंथोलॉजी ऑफ ऑक्यूपेशन एंड रेसिस्टेंस: राइटिंग्स फ्रॉम कश्मीर (ट्रांकेबर, 2013) का संपादन और “ब्रिंग हिम बैक” (2015) नाम की डॉक्यूमेंट्री का निर्देशन किया है। वह श्रीनगर में रहते हैं।

मुकुलिका आर इंडियन कल्चरल फ़ोरम, नई दिल्ली की सदस्य हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

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