NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
झारखंड : वामपंथी दलों को बाहर रखकर क्या मजबूत हो सकेगा विपक्षी महागठबंधन?
झारखंड और बिहार जैसे जनआंदोलनों वाले प्रदेशों में वामपंथी दलों की उपस्थिति ऐसी नहीं है कि उन्हें बंद कमरों के विपक्षी तालमेल बैठकों में ही कमतर घोषित कर दिया जाए।
अनिल अंशुमन
19 Feb 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: Freepressjournal

सोमवार, 18 फरवरी को झारखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि 2019 के संसदीय चुनाव में महागठबंधन द्वारा राज्य के वामपंथी दलों को एक सीट भी देना मुश्किल है, विधानसभा चुनाव में इन्हें सीट दी जाएगी। इस बयान को मीडिया ने फौरन रुचि लेकर काफी प्रमुखता दी है कि - सीटों के सवाल पर महागठबंधन की गांठ नहीं खुल रही है और अब कांग्रेस–वाम दल आमने–सामने आ गए हैं। बाहर से देखने पर तो यह बहुत महत्व का नहीं लगता है लेकिन झारखंड प्रदेश के मौजूदा राजनीतिक हालात में इसके दूरगामी निहितार्थ हैं। क्योंकि देश के साथ साथ इस प्रदेश में भी वर्तमान सरकार के खिलाफ ज़मीनी विपक्ष के रूप में विविध जनआंदोलन ही दीख रहे हैं। जिनका नेतृत्व कांग्रेस तो नहीं ही कर रही है। बावजूद इसके बंद कमरों में बैठकर महज सीटों के बँटवारे में वामपंथी दलों को दरकिनार कर भाजपा विरोधी जंग फतह करने की कवायद “सुनहरे ख्वाब” जैसा ही होगा।

इस संदर्भ में पिछले दिनों देश के प्रमुख वामपंथी दल के महासचिव द्वारा लोकसभा चुनाव पूर्व किसी कारगर महागठबंधन निर्माण को संभव नहीं बताये जाने को, नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। क्योंकि सिर्फ ‘भाजपा हराओ’ के नाम पर देश के विविध विशिष्ठाताओं वाले राज्यों की अपनी स्थानीय स्थितियों को नकारकर, सिर्फ ऊपर ही ऊपर यांत्रिक ढंग से किया गया कोई महागठबंधन फलदायी नहीं होनेवाला। वैसे भी जैसे–तैसे विकल्प बनाने के कड़वे स्वाद को जनता अब तक नहीं भूली है। इसीलिए मोदी जी समेत उनके सारे सिपहसालार भी अपने हर भाषणों में पुराने दौर के महागठबंधनी कड़वे अनुभवों को चीख-चीखकर याद दिला रहे हैं। साथ ही मीडिया के जरिये महागठबंधनी जमात में हो रहे खींचतान और आपसी टकराव को भरपूर मसाले के साथ परोसने के हर मौके का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है। ताकि विपक्षी वोटों में अधिक से अधिक बिखराव को हर हाल में सुनिश्चित किया जा सके।

इन सुनियोजित खुराफ़ातों के बाद भी यह तो समझना ही होगा कि आज यदि ‘अच्छे दिनी राज’ के खिलाफ देश की जनता क्षुब्ध होकर आवाज़ उठा रही है तो वह किसी स्थापित राष्ट्रीय पार्टी या नेता विशेष के प्रभाव मात्र से ही नहीं हो रहा है। वहीं, विपक्ष के भी किसी राजनीतिक दल कि ऐसी हैसियत नहीं रह गयी है कि वो पूरे देश की जनता पर सिर्फ अपने ही प्रभाव का दावा कर सके। जैसा कि पिछले तीन राज्यों के विधानसभा चुनावी नतीजों से उत्साहित एक राष्ट्रीय पार्टी के नेताओं को ये भ्रम हो रहा है कि वे ही एकमात्र विकल्प हैं।    

झारखंड और बिहार जैसे जनआंदोलनों वाले प्रदेशों में वामपंथी दलों की उपस्थिति ऐसी नहीं है कि उन्हें बंद कमरों के विपक्षी तालमेल बैठकों में ही कमतर घोषित कर दिया जाय। हाल के वर्षों में इन प्रदेशों में हुए और हो रहे विविध ज्वलंत जन मुद्दों के आंदोलनों के संचालन या नेतृत्वकर्त्ता के रूप में सबसे अधिक वामपंथी दलों की उपस्थिति बनी हुई है। 2014 के संसदीय चुनाव में तो ‘मोदी लहर’ के बीच भी कोडरमा सीट पर भाकपा माले प्रत्याशी ने ढाई लाख से भी अधिक वोट लाकर भाजपा प्रत्याशी को कड़ी टक्कर दी थी। लेकिन राज्य के महागठबंधनी महारथी इसे दरकिनार कर अपना प्रत्याशी देने पर तुले हुए हैं, जिसका यही परिणाम होने की पूरी संभावना है कि भाजपा विरोधी माहौल होने के बावजूद विपक्षी वोटों में बिखराव का लाभ भाजपा को मिल जा सकता है।

महागठबंधनी जोड़तोड़ की कवायदों को देखते हुए झारखंड प्रदेश के वामपंथी दलों ने भी अपना गठबंधन बनाकर राज्य की 14 सीटों में से अपने प्रभाव इलाके के चार सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। जिसके लिए इनका दावा है कि क्षेत्र की जनता के मुद्दों को लेकर सबसे अधिक वे ही सक्रिय रहें हैं और उनका भी एक निश्चित जनाधार है। जिसके आधार पर इनका दावा भी है कि जनता व उसके सवालों के साथ चुनाव के पहले भी हैं और चुनाव के बाद भी रहेंगे। इसलिए इस चुनाव में भी वर्तमान की जनविरोधी भाजपा शासन को हटाने के लिए वे राज्य की विशिष्ट स्थानीय परिस्थितियों में सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों के साथ मिलकर एकजुट लड़ाई आगे बढ़ाएँगे। भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव ने तो स्पष्ट तौर पर कहा है कि – “वामपंथी ताकतों के बिना विपक्ष का मजबूत गठबंधन नहीं बन सकता।”

इस तथ्य से शायद ही किसी को इंकार होगा कि वर्तमान समय में कोई भी गठबंधन तभी प्रासंगिक और सफल हो सकेगा जब वह जनता के ज्वलंत मुद्दों के साथ पूरी ईमानदारी और सक्रियता के साथ ज़मीन पर खड़ा हो सकेगा। क्योंकि सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि आज आगर इस देश अथवा किसी भी प्रदेश के व्यापक लोग जिन नीतियों से तंग तबाह हुए हैं, यदि उनमें कोई बदलाव नहीं होता है तो किसी सरकार के रहने या नहीं रहने मात्र से ही वास्तविक समाधान नहीं होनेवाला। इन्हीं संदर्भ में वामपंथी दलों व उनके नेता–कार्यकर्ताओं की जनता और उसके सवालों को लेकर जारी सक्रियता–प्रतिबद्धता को लेकर किसी के प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं है।

Jharkhand
General elections2019
2019 आम चुनाव
BJP
Congress
left parties
Left unity
Left politics
mahagathbandhan

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोविड -19 के टीके का उत्पादन, निर्यात और मुनाफ़ा
    08 Feb 2022
    आज हम डॉ. सत्यजीत के साथ कोविड -19 के टीके का उत्पादन के बारे में बात करेंगे, टीके के निर्यात को ले के दुनिया के अलग- अलग देशों और उनके कंपनियों की नीतियों को भी समझेंगे और इन टीकों से जो बड़ा…
  • Uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव : रुद्रप्रयाग में दस साल पहले प्रस्तावित सैनिक स्कूल अभी तक नहीं बना, ज़मीन देने वाले किसान नाराज़!
    08 Feb 2022
    रुद्रप्रयाग विधानसभा के जखोली विकासखंड के थाती-बड़मा गांव में 2013 में सैनिक स्कूल प्रस्तावित किया गया था मगर आज तक यहाँ सरकार स्कूल नहीं बनवा पाई है। पढ़िये न्यूज़क्लिक संवाददाता मुकुंद झा की यह…
  • Media
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ‘केंद्रीय मीडिया प्रत्यायन दिशा-निर्देश-2022’ : स्वतंत्र मीडिया पर लगाम की एक और कोशिश?
    08 Feb 2022
    यह सरकारी दिशा-निर्देश ऊपर से जितने अच्छे या ज़रूरी दिखते हैं, क्या वास्तव में भी ऐसा है? ‘‘सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता’’ या ‘जन व्यवस्था’ जितने आवश्यक शब्द हैं, इन्हें लागू करने की नीति या…
  • union budget
    सी. सरतचंद
    अंतर्राष्ट्रीय वित्त और 2022-23 के केंद्रीय बजट का संकुचनकारी समष्टि अर्थशास्त्र
    08 Feb 2022
    केंद्र सरकार आखिरकार केंद्रीय बजट में ठहरे/गिरते सरकारी राजस्व व्यय और पूंजीगत व्यय में स्पष्ट वृद्धि के बीच में अंतर क्यों कर रही है?
  • jammu and kashmir
    अनीस ज़रगर
    जम्मू-कश्मीर : क्षेत्रीय दलों ने परिसीमन आयोग के प्रस्ताव पर जताई नाराज़गी, प्रस्ताव को बताया जनता को शक्तिहीन करने का ज़रिया
    08 Feb 2022
    महबूबा मुफ़्ती का कहना है कि बीजेपी गांधी के भारत को गोडसे के भारत में बदलना चाहती है। इस लक्ष्य के लिए जम्मू-कश्मीर को प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License