NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
कॉर्पोरेट फंडिंग पर लगाम न लगी तो देश में चुनाव आईपीएल में तब्दील हो जाएंगे!
1972 से लेकर 1999 तक जो कवायदें चुनावों में बढ़ते धनबल और बाहुबल के प्रभावों को रोकने की हो रहीं थीं, वो सिरे से गायब हैं और हाल ही में देश के अटार्नी जनरल सुप्रीम कोर्ट में यह कहते नज़र आते हैं कि चुनाव खर्च और फंडिंग के बारे में जानने की ज़रूरत देश की जनता को नहीं है।
सत्यम श्रीवास्तव
20 Apr 2019
सांकेतिक तस्वीर

भारत के जनतंत्र में चुनाव और सरकार का गठन बुनियादी पक्ष हैं। इन दोनों पक्षों के बीच भारत की उदारवादी जनतांत्रिक राजनैतिक व्यवस्था के तहत सहज सामंजस्य और आपसी तालमेल की दरकार है। अगर ऐसा नहीं होता है तो हम चुनाव की प्रक्रिया में महज़ दर्शक होने की भूमिका में महदूद हो जाने के लिए अभिशप्त हैं।

आज का युग उत्तर-सत्य (पोस्ट–ट्रुथ) का युग है जहां सत्ता का रास्ता वास्तविक मुद्दों से नहीं बल्कि गढ़ी गईं धारणाओं से होकर जाता है। इस ‘पोस्ट ट्रुथ’ युग में यह धारणा ठोस विश्वास का रूप ले चुकी है कि राजनैतिक दल अब चुनाव अपनी विधारधारा से प्रेरित जनाधार के बल पर नहीं बल्कि हर दल में एक व्यक्ति और उसकी ब्रांडिंग के बूते लड़ रहे हैं और जीत भी रहे हैं क्योंकि तमाम माध्यमों से जनता के मन में यह ब्रांडिंग गहरी पैठ बना चुकी है। कमोबेश हर प्रमुख राजनैतिक दल की सच्चाई यही है।  

जो व्यक्ति या नेता अपने कुशल प्रबंधन से चुनाव के लिए फंडिंग ला सकता है, मीडिया को प्रभावित कर सकता है वो जबरन जनता का नेता बना दिया जा सकता है। ‘हवा’ और ‘लहर’ ऐसी ही नयी शब्दावलियां बना दी  गयी है जो मतदाताओं के मनोविज्ञान पर गंभीर असर डालती हैं। यह हवा या लहर अब सड़कों पर नेता द्वारा किए गए संघर्ष या उसकी विचारधारा के आधार पर नहीं बल्कि उसकी ब्रांडिंग के आधार पर तय होती है। ब्रांडिंग के लिए असीमित धनबल दरकार है। यह धन कहाँ से आता है? यह आज की निर्वाचन राजनीति का सबसे बड़ा सवाल होना चाहिए? जिसे लेकर आम तौर पर कोई खास बात नहीं हो रही है। हालांकि सत्ता विरोधी लहर पैदा होना चुनाव का अभिन्न हिस्सा रही है लेकिन 2019 के आम चुनाव के दो चरण पूरे हो जाने और 184 सीटों के मतदान के बाद भी यह शब्द हिंदुस्तान की मीडिया में सुनाई नहीं दिया। कायदे से हर पाँच साल में होने वाले चुनाव सत्ता में बैठे राजनैतिक दल का मूल्यांकन ही होने चाहिए लेकिन ऐसे समय में जब समाज का हर तबका समय समय पर मौजूदा सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करता रहा हो, चुनाव के समय उस असंतोष पर चर्चा ही न होना कुछ अजीब लगता है।  

एक दौर था जब राजनीति में शुचिता पर इसलिए ज़ोर दिया जाता था ताकि इसका अपराधीकरण न हो। दागी प्रत्याशी को चुनाव प्रत्याशी बनाना आम तौर पर राजनैतिक दल पसंद नहीं करते थे। खैर अपराधीकरण तो अब पुरानी बात हो गयी है और यह भारतीय समाज में व्यापक रूप से स्वीकार भी की जा चुकी है। लेकिन ब्रांडिंग और राजनैतिक/चुनावी फंडिंग को लेकर एक सवाल अभी भी व्यापक समाज में बना हुआ है। क्योंकि इसने न केवल राजनीति में भ्रष्टाचार की जड़ों को सींचा है बल्कि राजनैतिक दलों के अंदर आंतरिक लोकतन्त्र की बुनियादी ज़रूरत को गैर ज़रूरी बना दिया है। ऐसे में एक बड़ा तबका खुद को इस खेल से बहुत दूर छिटका हुआ पाता है।

अभी सत्रहवीं लोकसभा के लिए जारी आम चुनाव, किसी स्टेडियम में चल रहे आईपीएल का ही एक अन्य संस्करण जैसा लग रहा है। हमें पता है कि इस खेल में जो खिलाड़ी खेल रहे हैं वो खेल भावना से नहीं बल्कि पेशेवराना ढंग से अपने और अपने मालिकों के व्यावसायिक हितों की पूर्ति के लिए खेल रहे हैं। ये खरीदे हुए खिलाड़ी हैं जो अपनी टीम के लिए नहीं बल्कि अपने मालिकों के लिए खेल रहे हैं। यहाँ खिलाड़ियों का ध्यान अपने हुनर की बारीकियों पर नहीं है बल्कि वो किसी तरह खेल में उत्तेजना भर देना चाहते हैं। 4-5 घंटे के एक मैच को ज़्यादा से ज़्यादा रोमांचक और  मनोरंजक बना देना चाहते हैं। फिर अगर गेंद को बाउंड्री से बाहर भेजने में ज़्यादा मनोरंजन हो रहा हो तो वो गेंद को बाउंड्री के बाहर भेजेंगे और अगर आउट हो जाने में मैच में रोमांच बढ़ेगा तो वो आउट हो जाएँगे। हमने देखा है कि किस तरह मैदान पर मैदान से बाहर बैठे सटोरियों के इशारों पर खिलाड़ी चले हैं। किस तरह क्रिकेटर अपने क्रिकेट के लिए नहीं बल्कि सट्टेबाजों के लिए खेले हैं। अब कोई भ्रम नहीं है, लेकिन यह इतना साफ भी नज़र नहीं आता कि हम मज़ा लेना बंद कर दें। जिन्हें समझ में आ गया है वो इस पूरे आयोजन से बाहर हैं। हम जानते हैं 1999 के बाद से कैसे क्रिकेट को राष्ट्रवाद से जोड़ा गया। अपने समय के मूर्धन्य और ऊंचे कद के पत्रकार/संपादक श्री प्रभाष जोशी ने भी शायद यह नहीं सोचा होगा कि दो देशों के बीच खेले जा रहे एक जेंटलमैन खेल में राष्ट्रवाद की यह उत्तेजना अंतत: राष्ट्रवाद की व्यावसायिक उपयोगिता में तब्दील हो जाएगी। आज हम राष्ट्रवाद के जिस फूहड़ संस्कारण को चुनावी रैलियों में पेश्तर पा रहे हैं वो इसी उत्तेजना से पैदा हुआ है जिसे कार्पोरेट्स ने सींचा है और बाज़ार ने उसे आकार दिया है।

हिंदुस्तान में बहुदलीय व्यवस्था है जहां सैकड़ों राजनैतिक दल राज्यों व केंद्र में सत्ता के लिए संघर्ष करते हैं। हिंदुस्तान जैसे विशाल भौगोलिक व विविधता सम्पन्न देश में यह बहुदलीय व्यवस्था ही जम्हूरियत को इसकी पूरी संभावनाओं के साथ ठोस राजनैतिक ज़मीन मुहैया करा सकती है। ऐसे में इन तमाम दलों को जनता के बीच पहुँचकर अपनी सोच व आकांक्षाओं का प्रचार –प्रसार करने के भी समान अवसर मिलना चाहिए जिसमें फंडिंग एक मुख्य माध्यम हो सकता है।

आज हिंदुस्तान में करीब 411 राजनैतिक दल अस्तित्व में हैं। जिनमें केवल 7 राजनाइटिक दल ही राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त हैं। इसके अपने पैमाने हैं और जिनमें अनिवार्यता संख्या और भौगोलिक प्रसार ही प्रधान हैं। एक समृद्ध लोकतन्त्र के लिए यह ज़रूरी है कि विभिन्न राजनैतिक दलों के बीच साफ सुथरी प्रतिस्पर्द्धा तो हो ही, साथ में सभी दलों को समान अवसर मिलें कि वो जनता के बीच अपने विचारों को पहुंचा सकें।

लेकिन जिस तरह से चुनावी फंडिंग का स्वरूप बदला है और यह आईपीएल की माफिक कार्पोरेट्स के प्रभाव में आई है लोकतन्त्र के लिए अनिवार्य शर्तों के खिलाफ जा रही है।

1972 से ही चुनाव–सुधार पर औपचारिक ढंग से सोच–विचार शुरू हो गया था।  1972 में संसद की संयुक्त समिति ने निर्वाचन कानून में संशोधनों पर पेश की गयी अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा था कि चुनाव में राजनैतिक दलों द्वारा किए जाने वाले जायज़ खर्चों का दबाव धीरे धीरे राज्य को ले लेना चाहिए। इसके बाद जय प्रकाश नारायण समिति ने 1975 और 1978 में राजनैतिक दलों को राजकोष से समान फंडिंग की सिफ़ारिशें की थीं।

इसके बाद 1990 में चुनाव सुधारों पर गठित  दिनेश गोस्वामी समिति ने भी इस ज़रूरत को दोहराया और चेतावनी के तौर पर यह भी कहा कि जिस तरह से चुनावों में धन बल और बाहु बल का प्रभाव बढ़ता जा रहा है उससे यह पूरी प्रक्रिया भ्रष्ट हुई है और इसके लिए तत्काल ठोस कदम उठाए जाने की ज़रूरत है अन्यथा यह पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। इस समिति ने कारपोरेट फंडिंग पर बैन लगाने की सिफ़ारिश भी पूरी शिद्दत से की थी।

1998 में इंद्रजीत गुप्ता समिति का गठन भी इन्हीं मामलों को लेकर हुआ था। इस समिति ने 1999 में अपनी रिपोर्ट संसद में पेश की। इसी दौरान विधि आयोग ने भी अपनी 170वीं रिपोर्ट दी। इन दोनों रिपोर्ट्स में भी राज्य प्रायोजित फंडिंग की ज़रूरत पर बल दिया गया।

अब हालत यह है कि 1972 से लेकर 1999 तक जो कवायदें चुनावों में बढ़ते धनबल और बाहुबल के प्रभावों को रोकने की हो रहीं थीं और सर्वदलीय बैठकों में इन समितियों की सिफ़ारिशों पर मंथन हो रहा था वो सिरे से गायब हैं और हाल ही में देश के अटार्नी जनरल सुप्रीम कोर्ट में इसी तरह के मामले में यह कहते नज़र आते हैं कि चुनाव खर्च और फंडिंग के बारे में जानने की ज़रूरत देश की जनता को नहीं है।

इसके अलावा मौजूदा सरकार ने जिस तरह से कारपोरेट फंडिंग के लिए संसद में पेश फायनेंस बिल के माध्यम से खुले तौर पर दरवाजे खोले हैं उसने चुनाव सुधार के इस अहम पहलू को देश के एजेंडा से ही बाहर कर दिया है।

2019 के चुनाव अब तक के सबसे ख़र्चीले चुनाव साबित होने जा रहे हैं। हालांकि यह कहना भी अटकलों से काम लेना होगा क्योंकि किस दल को कितना चंदा मिला है वह पता करना लगभग मुमकिन नहीं रहा है। इतना ज़रूर है कि मौजूदा सरकार ने जो संशोधन किए हैं उसका सबसे ज़्यादा फायदा उसी को मिला है।

अब यह मुद्दा जनता के हाथों में होना चाहिए, इसे केवल राजनैतिक दलों के ऊपर नहीं छोड़ा जा सकता। क्योंकि अगर चुनावों में राजनैतिक दलों की फंडिंग की ज़िम्मेदारी ऐसे ही कॉर्पोरेट्स के हाथों में रही तो हम इस जम्हूरियत में तमाशबीन से ज़्यादा हैसियत के नहीं रह पाएंगे।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

2019 आम चुनाव
General elections2019
2019 Lok Sabha elections
electorial funding
political parties' funding
corporate funding
Electoral Bonds
Transparency
IPL cricket
corporate funding of political parties

Related Stories

आम चुनावों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के बारे में विचार की जरूरत

झारखंड : ‘अदृश्य’ चुनावी लहर कर न सकी आदिवासी मुद्दों को बेअसर!

विपक्ष की 100 ग़लतियों से आगे 101वीं बात

आपको मालूम है, मतगणना के वक़्त एग्ज़ाम रूम में बैठा युवा क्या सोच रहा था?

लोकसभा चुनाव के स्तर में इतनी गिरावट का जिम्मेदार कौन?

लेखक-कलाकारों की फ़ासीवाद-विरोधी सक्रियता के लिए भी याद रखा जाएगा ये चुनाव

वाह, मोदी जी वाह...! भक्ति की भक्ति, राजनीति की राजनीति

क्या ये एक चुनाव का मामला है? न...आप ग़लतफ़हमी में हैं

मायावती ने मोदी लहर को दबा दिया

बीजेपी को भारी पड़ेंगी ये 5 गलतियां?


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    राजस्थान : दलितों पर बढ़ते अत्याचार के ख़िलाफ़ DSMM का राज्यव्यापी विरोध-प्रदर्शन
    22 Mar 2022
    दलित शोषण मुक्ति मंच(DSMM) ने पूरे प्रदेश में विरोध-प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री का इस्तीफ़ा माँगा है और कहा राजस्थान सरकार कमजोर तबके की सुरक्षा में विफल रही है। 
  • एपी
    रूस-यूक्रेन अपडेट: सुरक्षा गांरटी मिलने पर नाटो की सदस्यता पर चर्चा को तैयार यूक्रेन
    22 Mar 2022
    यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने सोमवार देर रात कहा कि वह संघर्ष-विराम, रूसी सैनिकों की वापसी और यूक्रेन की सुरक्षा की गारंटी के बदले में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की सदस्यता नहीं…
  • उद्धव सेठ
    यहूदियों के नरसंहार को दर्शाता उपन्यास ‘माउस’ पर प्रतिबंध सिर्फ एक पाखंड है
    22 Mar 2022
    बच्चों के लिए चित्रकथा बनाने वाले भारतीय रचनाकारों और शिक्षाविदों के मुताबिक़, टेनेसी स्कूल की ओर से लगाया गया यह प्रतिबंध बच्चों को असली ज़िंदगी की नग्नता और नस्लवाद को देखने से नहीं रोक सकता।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,581 नए मामले, 33 मरीज़ों की मौत
    22 Mar 2022
    देश में कोरोना से पीड़ित 98.74 फ़ीसदी यानी 4 करोड़ 24 लाख 70 हज़ार 515 मरीज़ों को ठीक किया जा चुका है।
  • सबरंग इंडिया
    कश्मीरी पंडितों ने द कश्मीर फाइल्स में किए गए सांप्रदायिक दावों का खंडन किया
    22 Mar 2022
    उस वक्त की हिंसा से बचे हुए लोग इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि कैसे भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तान प्रायोजित विद्रोही समूहों के कार्यों के लिए दोषी ठहराया जा रहा है और उन्हें बदनाम किया जा रहा है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License