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कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती: वे पहले ही ज़रूरत से कम टैक्स देते थे 
बजट दस्तावेज़ों के अनुसार, भारत में बड़े पूँजीपतियों के व्यापार पर प्रभावी कर की दर 26.3 प्रतिशत थी, हालांकि वैधानिक दर 34.6 प्रतिशत है।
सुबोध वर्मा
22 Aug 2019
Translated by महेश कुमार
ministry of finance
प्रतीकात्मक तस्वीर Image Courtesy: HuffPost India

एक रपट के मुताबिक़ प्रस्ताव यह है कि कॉर्पोरेट करों को 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर देना चाहिए। ख़बरों के मुताबिक़, इस रपट को केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के सदस्य अखिलेश रंजन की अध्यक्षता वाले पैनल ने वित्त मंत्री को सौंपा है। हालांकि, इस साल के शुरू में बजट दस्तावेज़ों में केंद्र सरकार द्वारा दिए गए कॉर्पोरेट करों के आंकड़ों से पता चलता है कि कॉर्पोरेट जगत पहले से ही वैधानिक दरों के मुक़ाबले बहुत कम भुगतान कर रहे हैं। वास्तव में, सबसे बड़े कॉरपोरेट घराने, जिनका मुनाफ़ा वार्षिक 500 करोड़ से ज़्यादा है, केवल 26.3 प्रतिशत कर का भुगतान करते हैं, जबकि उनके लिए वैधानिक दर 34.61 प्रतिशत है। [नीचे चार्ट देखें]

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ये आंकड़े 2017-18 के हैं और बजट प्राप्ति की रिपोर्ट के एनेक्सचर 7 में शामिल हैं, जिन्हें इस साल जुलाई में नवनिर्वाचित मोदी सरकार ने प्रस्तुत किया था। यह 8,41,687 कॉर्पोरेट रिटर्न के विश्लेषण पर आधारित है जिन्हें 31 मार्च, 2019 तक वित्तीय वर्ष 2017-18 [मूल्यांकन वर्ष 2018-19] के लिए दाख़िल किया गया था। इन कंपनियों ने 4.48 लाख करोड़ रुपये की कॉर्पोरेट कर की देनदारी की सूचना दी है जिसमें अधिभार और शिक्षा उपकर भी शामिल है।

इन कंपनियों को इससे कितना लाभ हुआ? दस्तावेज़ के अनुसार, 3.91 लाख कंपनियों (जो सभी कंपनियों की 46.41 प्रतिशत है) ने मुनाफ़े के रूप में 15.18 लाख करोड़ रुपये और कर योग्य आय 11.24 लाख करोड़ रुपये को रिपोर्ट किया है। लेकिन 3.61 लाख कंपनियों (जो कुल कंपनियों का 43.11 प्रतिशत है) ने घाटे के रूप में 9.08 लाख करोड़ दिखाए और दूसरी तरफ़ 88,214 कंपनियों (जो 10.48 प्रतिशत हिस्सा है) ने शून्य लाभ की सूचना दी है। कई कंपनियां, जैसा कि कुछ ऑब्ज़र्वर संदेह करते हैं, करों से बचने के लिए किसी लाभ या नुकसान की रिपोर्ट नहीं करती हैं। लेकिन वह एक अलग कहानी है।

जब सरकार या टैक्स नौकरशाह वर्तमान कर की दर 30 प्रतिशत होने की बात करते हैं, तो उनका वास्तव में मतलब औसत वैधानिक कर दर होता है क्योंकि ये दरें उनकी आय के आकार के साथ बदलती रहती हैं। 1 करोड़ रुपये तक की आय वाली कंपनियों के लिए कर की दर 30.9 प्रतिशत है; 10 करोड़ रुपये तक की आय वाली कंपनियों के लिए यह 33.06 प्रतिशत है; और 10 करोड़ रुपये से अधिक आय वाले कंपनियों के लिए यह 34.61 प्रतिशत है। इसका औसत भार 34.40 प्रतिशत की औसत वैधानिक दर निकलता है।

जैसा कि ऊपर दिए गए चार्ट में देखा जा सकता है, कर की उच्चतम दरों का भुगतान मध्यम आकार के कॉर्पोरेट्स द्वारा किया जा रहा है जिनकी आय सीमा 10-50 करोड़ रुपये की है। जबकि छोटे और सबसे बड़े पूंजीपति सबसे कम कर देते हैं।

बड़े पूँजीपतियों का प्रोफ़ाइल 

केवल 373 कंपनियां हैं जिन्होंने 500 करोड़ रुपये के मुनाफ़े या उससे अधिक के लिए कर की सूचना दी। यदि, सारे के सारे मुनाफ़े को एक साथ रखा जाए तो औद्योगिक घरानों के इस कुलीन वर्ग की आय 2017-18 में 8.86 लाख करोड़ हुई है, जो सभी कॉर्पोरेट घरानों की आय का 46 प्रतिशत से अधिक बैठता है। उन्होंने निगम करों में 2.3 लाख करोड़ रुपये अदा किए जो सभी कॉर्पोरेटों द्वारा किए गए सभी करों के भुगतान का 52 प्रतिशत है। और फिर भी, उनके लिए सबसे कम प्रभाव वाली कर की दरें थीं। स्पष्ट रूप से सरकार के ज़हन में कर में रियायत करते हुए उन्हें ध्यान में रखा गया था और इन बड़े पूँजीपतियों ने इसका पूरा लाभ उठाया था।

कर की कम दरों वाले कुछ सेक्टर हैं: जिसमें हवाई परिवहन (20.28 प्रतिशत); लीज़ (आवासीय और गैर-आवासीय) भवनों की ख़रीद और बिक्री पर (22.96 प्रतिशत); संग्रह, शुद्धि और पानी के वितरण पर (17.36 प्रतिशत); बिजली का उत्पादन, संग्रह और वितरण (20.95 प्रतिशत); सीमेंट, चूने और प्लास्टर के निर्माण पर  (22.30 प्रतिशत); फ़ार्मास्यूटिकल्स, औषधीय रसायन और वनस्पति उत्पादों के निर्माण पर (25.35 प्रतिशत); परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों के निर्माण पर (21.61 प्रतिशत); और कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की निकासी पर (20.36 प्रतिशत)।

खुले रूप से, यह सूची ऐसी लग रही है जैसे कि कर रियायतें लोक कल्याण उन्मुख क्षेत्रों को दी जाती हैं। लेकिन, तथ्य यह है कि इनमें से अधिकांश क्षेत्र में आज निजी क्षेत्र के महत्वपूर्ण शेयर हैं। दूसरे शब्दों में, इन गतिविधियों में शामिल कॉर्पोरेट्स (जैसे कि, रिलायंस, पतंजलि, बिसलेरी और नेस्ले, सभी रियल एस्टेट टाइकून, जेट एयरवेज़ आदि) प्रभावी रूप से बहुत कम कर का भुगतान कर रहे हैं। और, विडंबना यह है कि इनमें से कई सेक्टर ऐसे हैं जो सभी रियायतों के बावजूद डूब रहे हैं!

उन्हें इतनी छूट कैसे मिल जाती है?

यह सब क़ानूनी और बोर्ड से ऊपर की बात है। सरकार ख़ुद कॉरपोरेट घरानों को रियायतें देती है। ये कर व्यवस्था की कमियां हैं, जिन्हें अक्सर क़ानून में शामिल किया जाता है और कुछ प्रकार के उद्योगों को प्रोत्साहित करने के नाम पर उन्हें ज़रूरी रियायतें दे दी जाती हैं। इन रियायतों से संचित लाभ वैधानिक और प्रभावी (या वास्तविक) कर दरों के बीच के अंतर को बताता है।

दस्तावेज़, वास्तव में, कॉरपोरेट घरानों को कितनी रियायतें दी गई हैं, इसकी एक तस्वीर पेश करता है। यह  चौंका देने वाला आंकड़ा है - वर्ष 2017-18 में 1.09 लाख करोड़ रुपये से ऊपर की रियायत दी गई है। यह पिछले वर्ष के 93.6 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक है।

प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में "धन सृजनकर्ताओं" (पढ़ें कॉरपोरेट्स तबक़ा) के बारे में बात करते हुए कहा कि वे सम्मान के पात्र हैं और उन्हें किसी प्रकार के संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि "यदि धन का सृजन नहीं किया जाता है, तो इसे वितरित नहीं किया जा सकता है तो देश में ग़रीबों को लाभ नहीं मिलेगा"। कॉर्पोरेट करों को कम करने का नवीनतम सुझाव इस सोच के अनुरूप ही है। लेकिन इन अभिजात वर्ग के कॉरपोरेट्स ने पहले से ही तय रियायतों को हासिल कर लिया है, इससे ऐसा तो नहीं लगता कि लोगों के लिए इससे कुछ भी अच्छा निकलेगा।

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