NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कर्नाटक के नतीजों के बारे में कुछ जिज्ञासु तथ्य
मोदी का जादू ख़त्म हो रहा हैं, कांग्रेस को बीजेपी से ज्यादा वोट मिले हैं और किसान दोनों पार्टियों से नाराज हैं।
सुबोध वर्मा
17 May 2018
Translated by महेश कुमार
karanataka

जबकि कर्नाटक की राजनीति अपेक्षित खरीद-फरोख्त के व्यापार और अनिश्चितता के एक और दौर में घुस चुकी है, चुनाव के नतीजे उत्सुक तथ्यों को पेश करते हैं जो टीवी एंकर और उस पर बोलने वाले टिप्पणीकारों को चारा उपलब्ध करता है। ये उनमे से कुछ तथ्य है।

1. मोदी का "जादू" खत्म हो गया है: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उच्च-डेसीबल अभियान के दौरान राज्य में 21 रैलियों को संबोधित किया, कांग्रेस पर निशाना साधा और अपनी सरकार की प्रशंसा की। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि कर्नाटक का मतदाता मोदी सरकार के बारे में नहीं सोच नहीं रहा था और वह केवल राज्य या स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहा था। परिणाम दिखाते हैं, 2014 के आम चुनावों के बाद बीजेपी के वोट शेयर में कुछ सात प्रतिशत की कमी आई है। 2013 के चुनावों में, येदियुरप्पा और रेड्डी भाइयों ने बीजेपी को छोड़ अपनी स्वयं की पार्टी केजेपी और बीएसआरसी का गठन किया था। इन दोनों के साथ बीजेपी के वोट शेयर को जोड़कर देखें तो, उन्होंने 2013 में 32.4 प्रतिशत वोटों को हाशिल किया था। वहां से वे 2014 में 43.4 प्रतिशत तक पहुंच गए और 2018 में यह घटकर 36.2 प्रतिशत हो गया। यह पांच वर्षों में 4 प्रतिशत  कम हुआ है।  यह अमित शाह के सभी तरह के बूथ प्रबंधन और मोदी के भाषणों के बावजूद हुआ। निश्चित रूप से, मोदी का  "जादू" अब बरकरार नहीं है।

karantaka

2. बीजेपी की तुलना में कांग्रेस के पास अधिक वोट हैं: ऐसा लगता है जोकि अपने आप में अजीब बात है कि बीजेपी द्वारा 36.2 प्रतिशत वोटों की तुलना में कांग्रेस के पास 38 प्रतिशत वोट हैं। और फिर भी, बीजेपी को  मुकाबले कांग्रेस की 78 और जेडी-एस को 37 सीट की तुलना में 104 सीटें मिली हैं। यह दो कारणों से हुआ है। एक, तीन क्षेत्रों में - बॉम्बे कर्नाटक, मध्य और मालनाद और तटीय – में बीजेपी ने 98 सीटों पर 66 सीट जीतकर निर्णायक रूप से कांग्रेस की तुलना में वोटों का बड़ा हिस्सा प्राप्त कर लिया है। उदाहरण के लिए तटीय बेल्ट में बीजेपी को कांग्रेस के 40 प्रतिशत की तुलना में लगभग 52 प्रतिशत वोट मिले। और दो, संबंधित तथ्य यह है कि बीजेपी के लिए जीत का औसत मार्जिन इन तीन क्षेत्रों में कहीं अधिक रहा। उदाहरण के लिए, तटीय क्षेत्र में, बीजेपी का विजय का औसत मार्जिन कांग्रेस के 8787 की तुलना में 23,409 है। राज्यव्यापी स्तर पर, बीजेपी के जीतने का मार्जिन इतना अलग नहीं है - कांग्रेस का 15,818 मत है जबकि बीजेपी का 18,954 मत है। इसका मतलब है कि कर्नाटक जीतने और दक्षिण में द्वार खोलने के बारे में सभी हुप्पला के बावजूद भाजपा जनता के समर्थन के मामले में कांग्रेस से पीछे है।

3. बीजेपी ने ग्रामीण और 'शहरी/ग्रामीण' क्षेत्रों को खो दिया: राज्य की 150 ग्रामीण सीटों में बीजेपी ने 69 और कांग्रेस ने 51 सीट जीती। लेकिन वोट शेयर के मामले में बीजेपी हार गई: उन्हें कांग्रेस की 37.4 प्रतिशत मत की तुलना में 34.7 प्रतिशत मत मिले। 20 अर्ध-ग्रामीण सीटों या 'शहरी/ग्रामीण' सीटों में, बीजेपी ने कांग्रेस के 37 प्रतिशत की तुलना में 32 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। दोनों पार्टियों ने जेडी-एस को 5 (23 प्रतिशत वोट) और अन्य सीटों के साथ 7 सीटें साझा कीं। यह केवल 52 शहरी सीटों में था कि कांग्रेस के कांग्रेस की 20 सीटों और 39.5 प्रतिशत वोटों की तुलना में कांग्रेस को 28 सीटें और 42 प्रतिशत वोट मिले थे।

4. जाति के कारकों को तोड़ दिया गया: यदि आप मानते हैं कि तथाकथित चुनाव विशेषज्ञ जो मुख्यधारा के मीडिया रिक्त स्थान को भरते हैं, जाति चुनावी नियति का सबसे बड़ा निर्धारक है। लेकिन इस हालिया कर्नाटक सहित सभी चुनावों पर नजदीक से पता चलता है कि जाति ओवर-राइडिंग कारक नहीं है। उदाहरण के लिए, यह कहा गया था कि 120 सीटों में महत्वपूर्ण लिंगयत उपस्थिति है और जहां यह माना गया कि यह कांग्रेस और बीजेपी का भाग्य निर्धारित करेगा। लेकिन परिणाम बताते हैं कि इन सीटों में कांग्रेस को 38 प्रतिशत  वोट मिले जबकि बीजेपी को 40.6 प्रतिशत मिले। स्पष्ट रूप से समुदाय ने दोनों तरीकों से मतदान किया। वोक्कालिगा का 64 सीटों पर प्रभुत्व था, ऐसा माना जाता था कि जेडी-एस को वोटों का विशाल बहुमत मिलेगा। लेकिन हकीकत में, कांग्रेस को जेडी-एस के (34.2 प्रतिशत) की तुलना में मामूली रूप से अधिक वोट (34.4 प्रतिशत) मिले, भाजपा को 24.3 प्रतिशत वोट शेयर मिला।

 

karantaka

5. दलितों और आदिवासियों को विभाजित किया गया: 36 अनुसूचित जाति आरक्षित सीटों में कांग्रेस को बीजेपी (39 प्रतिशत) वोट मिले जबकि भाजपा को (35 प्रतिशत) लेकिन कम सीटों के साथ समाप्त हुआ। इसके विपरीत, 15 एसटी आरक्षित सीटों में, कांग्रेस को बीजेपी के (40 प्रतिशत) की तुलना में थोड़ा कम वोट (38 प्रतिशत) वोट मिला लेकिन भाजपा के 6 की तुलना में 8 सीटें मिलीं। स्पष्ट रूप से समुदायों ने ब्लॉक में मतदान नहीं किया, जैसा अक्सर माना जाता है।

karantaka

विस्तृत परिणाम दिखाते हैं कि क्षेत्रीय कारक, किसानों के मुद्दे और नौकरियां वोटिंग प्रवृत्तियों को निर्धारित करने वाले कारक थे, जो अक्सर जाति और क्षेत्रीय मुद्दों को प्रभावित करते हैं । लेकिन सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि बीजेपी - और शाह और मोदी की चुनावी मशीन - कर्नाटक जीतने में नाकाम रही है। यही कारण है कि कांग्रेस और जेडी-एस के बाद चुनाव गठबंधन एक व्यवहार्य विकल्प है। उनके बीच भाजपा के 36.2 प्रतिशत  की तुलना में उनके बीच वोट की हिस्सेदारी 56 प्रतिशत से अधिक है।


बाकी खबरें

  • सबरंग इंडिया
    फादर स्टेन स्वामी की हिरासत में मौत 'हमेशा के लिए दाग': संयुक्त राष्ट्र समूह
    21 Mar 2022
    संयुक्त राष्ट्र वर्किंग ग्रुप ने मनमानी हिरासत पर भारत सरकार से उन परिस्थितियों की प्रभावी जांच करने को कहा जिनके कारण फादर स्टेन स्वामी की मृत्यु हुई थी
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    कांग्रेस का असल संकट और 'आप' के भगत अम्बेडकर
    20 Mar 2022
    कांग्रेस का असल संकट क्या है? 18 और 23 असंतुष्ट नेताओं के ग्रुप वैचारिक दबाव-समूह हैं या चुनावी राजनीति में अपने-अपने स्वार्थ के अखाड़ेबाज? पंजाब में अपनी शानदार चुनावी सफलता के बाद आम आदमी पार्टी(आप…
  • itihas ke panne
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या लाभार्थी थे भाजपा की जीत की वज़ह?
    20 Mar 2022
    'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस अंग में नीलांजन बात करते हैं समाजशास्त्री हिलाल अहमद से. वे बात करते हैं देश के बदलते चरित्र की.
  • Kanwal Bharti
    राज वाल्मीकि
    भेदभाव का सवाल व्यक्ति की पढ़ाई-लिखाई, धन और पद से नहीं बल्कि जाति से जुड़ा है : कंवल भारती 
    20 Mar 2022
    आपने 2022 में दलित साहित्य के समक्ष चुनौतियों की बात पूछी है, तो मैं कहूँगा कि यह चुनौती अब ज्यादा बड़ी है। हालांकि स्थापना का संघर्ष अब नहीं है, परन्तु विकास और दिशा की चुनौती अभी भी है।
  • Aap
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: राष्ट्रीय पार्टी के दर्ज़े के पास पहुँची आप पार्टी से लेकर मोदी की ‘भगवा टोपी’ तक
    20 Mar 2022
    हर हफ़्ते की ज़रूरी ख़बरों को एक पिटारे में एक बार फिर लेकर हाज़िर हैं अनिल जैन
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License