NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कश्मीर का भविष्य क्या है?
घाटी में व्याप्त विरोध के लिए निश्चित रूप से विरोध प्रदर्शन की सामाजिक रज़ामंदी पर आंतरिक बातचीत का रास्ता खोलने के अलावा कोई दूसरा आसान विकल्प नहीं है।
अजय गुदावर्ती
20 May 2019
कश्मीर का भविष्य क्या है?
Image Courtesy : Kamran Yousuf

कश्मीर की स्थिति को लेकर विडंबना का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि मोदी सरकार के पिछले पाँच वर्षों में यह सुर्खियों में बना रहा फिर भी यहाँ सबसे कम मतदान हुआ। लगता है कि कश्मीर ऐसे स्थान में प्रवेश कर गया है जहाँ से वापसी का रास्ता नहीं है।चाहे जो भी राजनीतिक दल सत्ता में हो  यह कश्मीरी मुसलमानों द्वारा आज़ादी के लिए तेज़ होती आवाज़ तथा आत्मनिर्णय और इसके जवाब में इस भारतीय राज्य में द्वारा बढ़ता दमन और रोज़मर्रा की हिंसा, उनके बीच चार दशकों से चल रहा एक बुनियादी गतिरोध है।

उदार लोकतंत्र में धरातल पर मौजूद स्थिति की तुलना में राजनीतिक संवाद तेज़ी से बदलता है और संघर्ष क्षेत्रों में ये स्थिति जारी रहती है लेकिन राजनीतिक संवाद प्रभावित होता है जहाँ यह शुरू हुआ था और इसलिए समाधान आसानी से नहीं होते हैं। कश्मीर का ये राजनीतिक संवाद आज़ादी की बिना शर्त घोषणा और एक अलग राष्ट्र-राज्य की मांग करते हुए कमोबेश ऐसा ही रहा है। कश्मीर को लेकर वैश्विक और राष्ट्रीय स्थिति बदलती रही है। क्या कश्मीर में राजनीतिक विरोध ने इन परिवर्तनों के बारे में अवगत कराया है? क्या वे कश्मीर में वर्तमान राजनीतिक संवाद से परिलक्षित होते हैं?

विश्व स्तर पर वर्ष 1993 में अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार पर विएना कन्वेंशन के बाद इसकी आधिकारिक तौर पर मान्यता दी गई थी कि ग़ैर-औपनिवेशीकरण की अवधि समाप्त हो गई है और कोई कॉलोनियाँ नहीं हैं और आत्मनिर्णय अब विश्व में कहीं भी प्रमुखता से नहीं है। इसी तरह के अधिकांश संघर्ष जैसे कनाडा में क्यूबेक, चीन में तिब्बत और भारत में नागालैंड ने मामले को अधिक स्वायत्तता से सुलझाया है न कि आत्मनिर्णय या संबंध विच्छेद से।

भूमंडलीकृत दुनिया में वैश्विक अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंध के कारण भौगोलिक क्षेत्रों की फिर से कल्पना की जा रही है। निस्संदेह राष्ट्र-राज्यों के भीतर स्थान-विषयक मांगें जैसे कि अलग राज्यों के गठन से कोई परिणाम नहीं निकलते हैं। हाल में तेलंगाना के गठन का उदाहरण लिया जा सकता है। न तो किसान की आत्महत्या का मामला समाप्त हुआ है और न ही बेरोज़गारी की समस्या दूर की गई है। कुछ ही समय में तेलंगाना में असंतोष पनप रहा है और मैं समझता हूँ कि युवा अपने बुनियादी कुछ अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरेंगे।

विकास का वैश्विक मॉडल किसी भी विकल्प को जगह नहीं दे रहा है; इस मुद्दे को हल करने के लिए राजनीतिक पार्टी में महज़ परिवर्तन के लिए कृषि संकट और बेरोज़गारी प्राकृतिक रूप से कहीं अधिक गहरी और संरचनात्मक हैं। सड़कों पर पथराव करते हुए कश्मीर के युवा विकास के मॉडल पर चर्चा किए बिना अपनी दुर्दशा की उम्मीद करेंगे?

कश्मीर में निरंतर और अक्षुण्ण संघर्ष का ज़िम्मेदार शेख़ अब्दुल्लाह को बताया जाता है। लेकिन उनके द्वारा किए गए भूमि सुधारों को लेकर कश्मीरियों ने विरोध प्रदर्शन जारी नहीं रखा। यह तभी संभव हुआ है क्योंकि भयानक ग़रीबी नहीं है और निर्वाह योग्य जीवन संभव है। लेकिन यह आर्थिक गतिशीलता की तलाश कर रहे युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा करने में विफ़ल रहा है।

इसी तरह जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट और यासीन मलिक समाजवाद की बात करने के लिए जाने जाते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। हुर्रियत ने कभी भी अलगाववाद की अपनी बयानबाज़ी से परे विकास के मॉडल पर कोई गंभीर संवाद नहीं किया। हुर्रियत ख़ुद युवा पीढ़ी में अपनी वैधता के संकट से जूझ रहा है।

वास्तव में घाटी में कोई विश्वसनीय नेतृत्व नहीं है जो बढ़ते असंतोष को एक सार्थक दिशा दे सके। पाकिस्तान के साथ गठजोड़ करने का विकल्प अब कोई आकर्षक विकल्प नहीं है क्योंकि पाकिस्तान ख़ुद आर्थिक संकट और जिहादी आतंक का शिकार है। घाटी में असंतोष की प्रकृति पाकिस्तान में राजनीतिक और आर्थिक स्थिति से मेल नहीं खाती है। धार्मिक राष्ट्रवाद कुछ हद तक इस ख़ाली स्थान को भरने में कामयाब रहा है हालांकि कश्मीर का धार्मिक चरित्र इस तरह के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता है। निस्संदेह यहाँ कश्मीर ख़ुद के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है। इस्लाम के चरित्र में गहरी आस्था के बजाय भारत की मुख्य भूमि के सशक्त राष्ट्रवाद को पीड़ा पहुँचाने के लिए युवा आईएसआईएस का झंडा उठाते हैं। बुरहान वानी (मारा गया हिजबुल कमांडर) घाटी का हीरो और एक नए युग का प्रतीक न केवल अपनी मौत को लेकर बल्कि अमरनाथ यात्रा के लिए अपने सहयोग की भावना व्यक्त करने को लेकर भी बन गया। सांस्कृतिक संगम के लिए ये तड़प धार्मिक राष्ट्रवाद की विशिष्टता के साथ नहीं हो सकती।

आंतरिक रूप से कश्मीर के कुलीन लोग इस संघर्ष का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं हैं। सभी संघर्ष क्षेत्रों की तरह चाहे पूर्वोत्तर हो या मध्य भारत कश्मीर में भी भ्रष्ट कुलीन वर्ग है जो विकास पैकेजों और इस भारतीय राज्य के बड़े पैमाने पर उदारता से विकसित हुआ है। घाटी में राजनीतिक, नौकरशाही और व्यवसायिक अभिजात वर्ग के बीच सांठगांठ शायद भारत की मुख्य भूमि की तुलना में कहीं अधिक मज़बूत है। इस भारतीय राज्य ने घनिष्ट मित्र कुलीन वर्ग के माध्यम से घाटी में संरक्षण और स्थिति को नियंत्रित करने में कोई क़सर नहीं छोड़ी है। स्थानीय पुलिस और उग्रवादियों के बीच संघर्ष का हालिया वाक़या उस तबाही का एक उदाहरण है जो बाहर की दुनिया के लिए महसूस और दिखाई देने वाली निर्भीक प्रतिबद्धता में मौजूद है।

घाटी में व्याप्त विरोध के लिए निश्चित रूप से विरोध प्रदर्शन की सामाजिक रज़ामंदी पर आंतरिक बातचीत का रास्ता खोलने के अलावा कोई दूसरा आसान विकल्प नहीं है जिसमें पुंछ और राजौरी के सीमावर्ती क्षेत्रों के गुज्जर और पहाड़ी जनजातियों के ख़िलाफ़, लद्दाख के मुसलमानों के ख़िलाफ़ प्रचलित पूर्वाग्रह शामिल हैं जो शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच व्यापक विभाजन की प्रकृति, घाटी में वर्गवाद और नस्लवाद की प्रकृति, लिंग और महिलाओं के स्थान के सवाल, संस्थानों और पदानुक्रम की आंतरिक प्रकृति जो किसी भी स्वतंत्र विचार की अनुमति नहीं देता, विकास का मॉडल जो कि समावेशी हो सकता है, कश्मीरी पंडितों और अन्य सभी ग़ैर-मुस्लिम समुदायों के लिए जगह जो घाटी में अल्पसंख्यक हैं ऐसे कई अन्य मुद्दों में शामिल हैं। राज्य से जुड़ा स्वयं संप्रभु भी प्रकृति रूप से बेहद सामाजिक है। इस तरह के संवाद को खोलने से उन विकल्पों का मार्ग प्रशस्त होगा जिनका हम फ़िलहाल स्पष्टता से कल्पना नहीं कर सकते हैं।

(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर पॉलिटिकल साइंस में सहायक प्रोफ़ेसर हैं। उन्होंने हाल ही में 'इंडिया आफ़्टर मोदी: पॉपुलिज़्म एंड द राइट’ पुस्तक लिखी है। इस लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

Jammu and Kashmir
Kashmir Valley
Kashmir conflict
Militancy
Hurriyat
Yasin Malik
Burhan Wani
Self-determination
secession Azaadi
Independence
Nagaland
Tibet
Quebec

Related Stories

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

कश्मीरी पंडितों के लिए पीएम जॉब पैकेज में कोई सुरक्षित आवास, पदोन्नति नहीं 

यासीन मलिक को उम्रक़ैद : कश्मीरियों का अलगाव और बढ़ेगा

आतंकवाद के वित्तपोषण मामले में कश्मीर के अलगाववादी नेता यासीन मलिक को उम्रक़ैद

जम्मू में आप ने मचाई हलचल, लेकिन कश्मीर उसके लिए अब भी चुनौती

जम्मू-कश्मीर परिसीमन से नाराज़गी, प्रशांत की राजनीतिक आकांक्षा, चंदौली मे दमन


बाकी खबरें

  • भाषा
    हड़ताल के कारण हरियाणा में सार्वजनिक बस सेवा ठप, पंजाब में बैंक सेवाएं प्रभावित
    28 Mar 2022
    हरियाणा में सोमवार को रोडवेज कर्मी देशव्यापी दो दिवसीय हड़ताल में शामिल हुए जिससे सार्वजनिक परिवहन सेवाएं बाधित हुईं। केंद्र की कथित गलत नीतियों के विरुद्ध केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के एक संयुक्त मंच ने…
  • आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: “काश! हमारे यहां भी हिंदू-मुस्लिम कार्ड चल जाता”
    28 Mar 2022
    पाकिस्तान एक मुस्लिम बहुल और इस्लामिक देश है। अब संकट में फंसे इमरान ख़ान के सामने यही मुश्किल है कि वे अपनी कुर्सी बचाने के लिए कौन से कार्ड का इस्तेमाल करें। व्यंग्य में कहें तो इमरान यही सोच रहे…
  • भाषा
    केरल में दो दिवसीय राष्ट्रव्यापी हड़ताल के तहत लगभग सभी संस्थान बंद रहे
    28 Mar 2022
    राज्य द्वारा संचालित केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (केएसआरटीसी) की बसें सड़कों से नदारत रहीं, जबकि टैक्सी, ऑटो-रिक्शा और निजी बसें भी राज्यभर में नजर नहीं आईं। ट्रक और लॉरी सहित वाणिज्यिक वाहनों के…
  • शिव इंदर सिंह
    विश्लेषण: आम आदमी पार्टी की पंजाब जीत के मायने और आगे की चुनौतियां
    28 Mar 2022
    सत्ता हासिल करने के बाद आम आदमी पार्टी के लिए आगे की राह आसन नहीं है। पंजाब के लोग नई बनी सरकार से काम को ज़मीन पर होते हुए देखना चाहेंगे।
  • सुहित के सेन
    बीरभूम नरसंहार ने तृणमूल की ख़ामियों को किया उजागर 
    28 Mar 2022
    रामपुरहाट की हिंसा ममता बनर्जी की शासन शैली की ख़ामियों को दर्शाती है। यह घटना उनके धर्मनिरपेक्ष राजनीति की चैंपियन होने के दावे को भी कमज़ोर करती है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License