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भारत
राजनीति
कश्मीरी पंडितों की वापसी का मिथक : स्थानीय पंडितों के नज़रिए से 
जब नब्बे हुआ तो बाक़ी देश में किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन अब चीज़ें बदल चुकी हैं।अगर भारत में दक्षिणपंथ मज़बूत होगा तो कश्मीर में इस्लामी चरमपंथ और प्रभावी होगा और अगर कश्मीर में लहू बहेगा तो भारत भी शान्ति से नहीं रह पायेगा
अशोक कुमार पाण्डेय
13 Nov 2019
kashmir
घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए बने फ्लैट

अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने और जम्मू और कश्मीर राज्य को दो हिस्सों में बांटकर केंद्र शासित राज्य में तब्दील कर देने के निर्णय को न्यायसंगत ठहराने के लिए कश्मीरी पंडितों की वापसी को एक प्रमुख तर्क की तरह इस्तेमाल किया गया। दक्षिणपंथी ताक़तों द्वारा यह मुद्दा लम्बे समय से घाटी के भीतर अलोकतांत्रिक कार्यवाहियों के साथ-साथ देश भर में अल्पसंख्यकों के प्रति बढ़ती हुई दमनात्मक कार्यवाहियों को सही ठहराने के लिए ढाल की तरह इस्तेमाल होता रहा है। 

 कश्मीरी पंडितों के एक हिस्से ने दिल्ली से लन्दन तक इस क़दम पर सार्वजनिक रूप से खुशियाँ मनाईं और इसकी ख़बरें अखबारों के पहले पन्नों तथा चैनलों के राष्ट्रवादी शोर-गुल में प्रमुखता से कवर की गईं। इन सबके लिए कश्मीर का लॉक डाउन एक नज़रअंदाज़ किये जाने लायक बात थी, जिसको दिखाना या जिसकी चर्चा करना राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल था और चूंकि इसकी वजह से तीन दशकों से अधिक समय से विस्थापित कश्मीरी पंडितों की वापसी संभव हो रही थी तो यह राष्ट्रहित का मामला था। 

 इस उत्साह का सबसे खुला रूप दक्षिणपंथी समूह के साथ अपनी नज़दीकी के लिए जाने जानी वालीं एक गायिका की डल लेक पर छठ मनाने की घोषणा में दिखाई दिया, शायद उन्हें यह दृढ़ विश्वास होगा की कश्मीरी पंडित भी उन्हीं की तरह छठ पूजा करते होंगे। ज़ाहिर है की वह इस बात से पूरी तरह अनजान थीं की कश्मीर के अपने त्यौहार हैं और अपनी संस्कृति जिसमें उत्तर-भारत में मनाए जाने वाले ज़्यादातर हिन्दू पर्व नहीं शामिल होते।  वैसे यहाँ यह बता देना भी समीचीन होगा कि कश्मीर में वैसे तो दशहरे की कोई परम्परा नहीं रही है लेकिन स्थानीय पंडितों द्वारा 2007 से दशहरे का आयोजन किया जा रहा था, जिसमें दोनों धर्मों के लोग उत्साह से हिस्सा लेते थे लेकिन इस साल लॉकडाउन के कारण दशहरे का आयोजन संभव नहीं हुआ। आज जब लॉकडाउन के सौ दिन पूरे हो चुके हैं तो एक बार इन सब दावों की जांच-परख कर लेना बेहतर होगा। 
 
अपनी कश्मीर यात्रा(ओं) के दौरान मैं कश्मीर घाटी के विभिन्न हिस्सों में रह रहे कश्मीरी पण्डितों से मिला। यह कई लोगों के लिए आश्चर्यजनक तथ्य हो सकता है कि कुछ पंडितों ने कभी अपना घर नहीं छोड़ा और आज घाटी के विभिन्न भागों में लगभग 808 हिन्दू परिवार रहते हैं, जिनमें से अधिकतर पंडित हैं। साथ ही घाटी में कोई 6000 सिख परिवार भी रह रहे हैं।

विस्थापन, 370 और वापसी 

विस्थापित पण्डितों की संख्या (डेढ़ लाख से लेकर सात लाख से भी अधिक के दावे किये गए हैं) या इसमें तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन की भूमिका के विवाद में गए बगैर यह कहा जा सकता है कि 1991 और उसके बाद हुआ पंडितों का विस्थापन 1947 के बाद भारत के इतिहास में घटी सबसे त्रासद घटनाओं में से एक है। 

यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि जब 1947 में जम्मू सहित पूरे उत्तर भारत में साम्प्रदायिक हत्याओं और विस्थापन का खूनी खेल चल रहा था तो घाटी में पूरी तरह से शान्ति थी, और जो घाटी में नब्बे में हुआ उसका शेष भारत पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा, जबकि पंडितों को लगता था कि अगर उनके साथ कुछ हुआ तो देश भर के हिन्दू उनके पक्ष में उठ खड़े होंगे।  जम्मू से बाहर इस विस्थापन पर किसी का ध्यान नहीं गया।

कारण स्पष्ट थे – देश रथ यात्राओं और बाबरी मस्जिद विध्वंस और उसके बाद देश भर में लगी दंगों की आग जैसी चुनौतियों से जूझ रहा था। लेकिन जैसा कि कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पण्डितों के संगठन ‘कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति’ के नेता संजय टिक्कू कहते हैं, ‘जब नब्बे हुआ तो बाक़ी देश में किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन अब चीज़ें बदल चुकी हैं।

अगर भारत में दक्षिणपंथ मज़बूत होगा तो कश्मीर में इस्लामी चरमपंथ और प्रभावी होगा और अगर कश्मीर में लहू बहेगा तो भारत भी शान्ति से नहीं रह पायेगा।’
 
बीजेपी के एक ताक़तवर और सत्ताधारी संगठन के रूप में उभरने के बाद कश्मीरी पंडितों के वापसी की बातें फिर से उठना शुरू हुईं। दुर्भाग्य से विस्थापन को दक्षिणपंथी अतिवाद की ढाल की तरह इस्तेमाल किया गया और पंडितों का एक हिस्सा दक्षिणपंथी राजनीति के इस खेल में शामिल होता गया। 

देखा जाए तो जो 35 ए देश के बाक़ी हिस्से के लोगों के लिए कश्मीर में ज़मीन या संपत्ति खरीदने में बाधक था उसका 1991 के बाद या उसके पहले विस्थापित कश्मीरी पंडितों पर कोई प्रभाव नहीं था। उनके पास राज्य की नागरिकता का सर्टिफिकेट हमेशा से था और इस तरह उनके पास वे सारे अधिकार थे जो किसी अन्य कश्मीरी के पास थे। अगर कोई बाधा थी तो वह थी सुरक्षा और शांति। एक और बड़ी बाधा रोज़गार के अवसरों की उपलब्धता है।  

नब्बे के दशक में 53 दिनों तक आतंकवादियों की क़ैद में रहने के बावजूद कश्मीर छोड़ने वालीं राज्य सरकार की पूर्व मंत्री खेमलता वखलू 370 हटाने के इस क़दम का स्वागत तो करती हैं लेकिन इसके लम्बे दौर में पड़ने वाले प्रभावों को लेकर बहुत मुतमइन नहीं हैं। कश्मीरी पंडितों की वापसी के सवाल पर वह रोज़गार के अवसरों की अनुपलब्धता की बात करती हैं। विस्थापित पंडितों में से अधिकाँश देश के भीतर और बाहर अच्छी तरह से बस चुके हैं। श्रीमती वखलू का अपना उदाहरण देखें तो उनके सभी बच्चे घाटी से बाहर बसे हुए हैं।

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खेमलता वखलू

यही डॉ विमला धर के लिए भी सही है जो श्रीनगर के पाश इलाक़े राजबाग में एक ख़ूबसूरत बंगले में अकेले रहती है। डॉ धर के पति डॉ एस एन धर का भी उस दौर में अपहरण हुआ था। असल में, ज़्यादातर संपन्न कश्मीरी परिवार अपने बच्चों को शिक्षा के लिए कश्मीर से बाहर भेज रहे हैं और चाहते हैं कि वे शांत जगहों पर अच्छी नौकरियों पाकर बस जाएँ। 

औद्योगीकरण और विकास : मिथक और असलियत 

पांच अगस्त के बाद एक और दावा जो बार-बार किया गया वह यह कि इससे तेज़ी से औद्योगीकरण होगा और घाटी में रोज़गार के नए अवसर उपलब्ध होंगे।  हालांकि यह अक्सर नहीं बताया जाता है कि व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए वहां ज़मीन हमेशा से उपलब्ध थी।अपने उस प्रसिद्ध भाषण में जिसके बाद उन्हें महबूबा मुफ़्ती ने मंत्रिमंडल से हटा दिया था, कश्मीर के तत्कालीन वित्त मंत्री हसीब द्राबू ने कहा था कि कश्मीर एक ‘सोल्ड आउट डेस्टिनेशन’ है और कश्मीर की समस्या मूलतः एक सामाजिक समस्या है, मतलब यह कि शान्ति का न होना कश्मीर में निवेश न हो पाने की इकलौती वजह है। 

आप साठ के दशक के अंतिम वर्षों की वह घटना याद कर सकते हैं जब वहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री ग़ुलाम मोहम्मद सादिक ने इंदिरा जी से कहा था की ‘अगर मैं आपसे सी आर पी ऍफ़ की एक और बटालियन माँगूं तो आप अगले ही दिन भेज देंगी लेकिन अगर एक उद्योग मांग लूं तो वर्षों तक उस पर कोई कार्यवाही नहीं होगी।'

तबसे अब  तक हालात और बदतर ही हुए हैं। नब्बे के दौर में शहीद हुए प्रसिद्ध ट्रेड यूनियन नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता हृदयनाथ वांचू के पौत्र और एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता डॉ अमित वांचू एक और महत्त्वपूर्ण सवाल उठाते हैं – घाटी में आप कैसे निवेश की उम्मीद करते हैं? यहाँ कोई भारी उद्योग नहीं लग सकता।आप पर्यटन को और विकसित कर सकते हैं या इसे एक शैक्षणिक हब बना सकते हैं या फिर हर्बल फार्मिंग कर सकते हैं।इन सबके लिए अच्छी गवर्नेंस और शान्ति की ज़रूरत है।’ और उस शान्ति की कोई संभावना फ़िलहाल नहीं दिखाई देती।

 संजय टिक्कू लगभग गुस्से में कहते हैं, ‘विस्थापित पंडितों के सेलीब्रेशन ने हमारी ज़िन्दगी यहाँ मुश्किल में डाल दी है।अनुच्छेद 370 पर जो क़दम उठाया गया है उसने इस समस्या को और सौ वर्षों के लिए उलझा दिया है, साम्प्रदायिक विभाजन को तीखा कर दिया है और सहिष्णुता घटा दी है।’ यह 5 अगस्त से ही जारी सविनय अवज्ञा से एकदम स्पष्ट है और घाटी में घूमते हुए कोई भी लोगों के गुस्से और पूर्ण मोहभंग को महसूस कर सकता है।

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संजय टिक्कू

टिक्कू आगे कहते हैं, ‘ मेट्रो शहरों में शांतिपूर्ण जीवन जी रहा और शानदार पैसे कमा रहा कोई कश्मीरी पंडित घाटी में क्यों लौटना चाहेगा? असल सवाल यह है कि क्या वे लौटना चाहते हैं? अगर हाँ, तो अब तक उन्हें क्या रोक रहा था और अब क्या बदल गया है? हरि सिंह स्ट्रीट पर मेडिकल सामानों की दुकान चलाने वाले रूप कृष्ण कौल और दक्षिण कश्मीर के वलरहामा गाँव के रतनलाल तलाशी भी यही दुहराते हैं। बडगाम के पास शेखपुरा ट्रांजिट कैम्प में रहने वाले मनोहर ललगामी कश्मीर में शिक्षा व्यवस्था में गिरावट और लगातार इसके इस्लामी कट्टरपंथ का शिकार होते जाने को भी घाटी से छात्रों के बाहर जाने के लिए जिम्मेदार बताते हैं। वह पूछते हैं, ‘जहाँ साल में कई-कई महीने कॉलेज बंद रहते हैं, आप अच्छी शिक्षा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? 

जीत या फिर खो दिया गया अवसर? 
 

इसलिए घाटी के बाहर के पंडितों का यह उत्साह उनके ऊपर जीत के भाव से अधिक बाहर आया है जिन्हें वे अपने विस्थापन के लिए जिम्मेदार मानते हैं और इसमें लौटने की संभावना की ख़ुशी बहुत कम है। पंडितों और मुसलमानों की वर्तमान पीढ़ियों के बीच की शत्रुता अब और कटु तथा वाचाल हो गई है क्योंकि अपने दादाओं से उलट उन्हें एक-दूसरे के साथ रहने और उस सहकार का कोई अनुभव नहीं और वे एक तरफ़ विस्थापन तो दूसरी तरफ़ सेना के दमन की कहानियाँ सुनते बड़े हुए हैं। जमात ए इस्लामी, कश्मीर का कश्मीरी मुस्लिम मानस पर गहरा असर है तो विस्थापित पंडितों के बड़े हिस्से के मानस को उभरते हुए हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथ ने एक ताक़त का एहसास कराया है और उन्होंने व्यापक हिन्दू पहचान के भीतर अपनी स्थानीय कश्मीरी पहचान को लगभग पूरी तरह तिरोहित कर दिया है। विस्थापित पंडितों के अधिकांश बच्चे अपनी  मातृभाषा भूल चुके हैं, जो घाटी और वहां की परम्पराओं से उनकी सबसे मज़बूत कड़ी थी। अंतर्जातीय विवाह अब आम हैं और जैसा कि रूप कृष्ण कौल कहते हैं, ‘लौटने का छोडिये सबसे बड़ा ख़तरा तो यह है कि कहीं कश्मीरी पंडित संस्कृति और पहचान ही न ख़त्म हो जाये।’ 


(अशोक चर्चित किताब ‘कश्मीरनामा’ के लेखक हैं और इनकी अगली किताब ‘कश्मीर और कश्मीरी पण्डित’ राजकमल प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य है।)  

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kashmir after 100 day
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Development in Kashmir
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