NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क़ुर्बान जाऊं ऐसी ‘फ़क़ीरी’ पर बार-बार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गत् 8 नवंबर को घोषित की गई नोटबंदी का दुष्प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है।
तनवीर जाफ़री
13 Dec 2016
क़ुर्बान जाऊं ऐसी ‘फ़क़ीरी’ पर बार-बार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गत् 8 नवंबर को घोषित की गई नोटबंदी का दुष्प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है।

हालांकि नोटबंदी की घोषणा के बाद सरकार द्वारा जनता को यह आश्वासन दिया गया था कि 50 दिन में हालात सामान्य हो जाएंगे। परंतु 35 दिन बीत जाने के बावजूद अभी तक जनता को राहत मिलने की कोई किरण नज़र नहीं आ रही है।

नोटबंदी के समर्थन में सरकार के पक्षकारों तथा इसके विरोध में विपक्षी नेताओं के वक्तव्यों को यदि दरकिनार कर दिया जाए और केवल देश के जाने-माने अर्थशास्त्रियों की बातों पर ही गौर किया जाए तो हमें यही नज़र आ रहा है कि प्रधानमंत्री का नोटबंदी का फैसला देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाला है।

यकीनन उद्योग तथा व्यापार जगत में इसके दुष्परिणाम सामने भी आने लगे हैं। डॉलर की तुलना में रुपया कमज़ोर पड़ता जा रहा है।

दूसरी तरफ नोटबंदी की घोषणा से लेकर अब तक इस विषय पर प्रधानमंत्री स्वयं अपने कई अलग-अलग बयान देते आ रहे हैं। और उनके लगातार बदलते जा रहे बयानों से भी जनता में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।

जिस समय प्रधानमंत्री ने एक हज़ार व पांच सौ रुपये की प्रचलित करंसी की नोटबंदी की घोषणा की थी उस समय उनके निशाने पर भ्रष्टाचार को समाप्त करना,काले धन को बाहर लाना,आतंकवाद पर काबू पाना तथा नकली करंसी पर अंकुश लगाना मुख्य रूप से शामिल था।

नोटबंदी की घोषणा के फौरन बाद ही आतंकवादियों के पास से नई करंसी भी बरामद की जा चुकी,दो हज़ार रुपये की नई नोट का प्रयोग रिश्वत व भ्रष्टाचार में भी किया जाने लगा और इंतेहा तो यह है कि स्वयं भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा हुआ एक कार्यकर्ता तथा उसकी बहन पंजाब के मोहाली में दो हज़ार रुपये की नकली नोट बनाने के आरोप में लाखों रुपये की दो हज़ार की नकली नोट के साथ गिरफ्तार भी हो लिया। जबकि दूसरा भाजपा कार्यकर्ता तमिलनाडु में लाखों रुपये की नई नकदी नोट के साथ पकड़ा गया।

उधर विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि एक हज़ार रुपये की नोट की तुलना में दो हज़ार रुपये की नोट काला धन जमा करने वालों के लिए और अधिक मददगार साबित होगी।

गोया जिन उम्मीदों को लेकर प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा की थी उन सभी उम्मीदों पर नोटबंदी की घोषणा के मात्र 20 दिन के भीतर ही पानी फिर गया है।

नोट बंदी के एक पखवाड़े के बाद सरकार ने जनता को अपने फैसले का औचित्य इन शब्दों में बताना शुरू किया कि देश में ‘कैशलेस’ व्यवस्था लागू होनी चाहिए, तभी काला धन व भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकेगा। परंतु जब सरकार जनता के दबाव में इस निष्कर्ष पर पहुंचने लगी कि देश की बाज़ार व्यवस्था को पूरी तरह ‘कैशलेस’ नहीं बनाया जा सकता तब प्रधानमंत्री ने शब्दों का ताना-बाना रचते हुए जनता से ‘लेस कैश’ व्यवस्था स्थापित करने का आह्वान कर डाला।

उधर इन सारी कवायद के बीच पूरे देश के बैंकों व एटीएम में लंबी-लंबी कतारों का लगना जारी है तथा पैसों की कमी के चलते आम लोगों में हाहाकार मचा हुआ है। अब तक लगभग ८५ लोग पूरे देश में इन्हीं लंबी कतारों में खड़े होकर अपनी जान गंवा चुके हें। जनता की परेशानियों में इज़ाफा होता जा रहा है। शादी-विवाह,पढ़ाई-लिखाई, क्रय-विक्रय, लेन-देन, तनख़्वाह, किराया-भाड़ा, डीज़ल-पैट्रोल, खेती-बाड़ी, बीज,खाद, दवा-इलाज तथा मज़दूरी आदि सब कुछ बुरी तरह से प्रभावित हो चुका है।

कुछ अर्थशास्त्रियों तथा उद्योग से जुड़े लोगों का तो यहां तक मानना है कि यदि आज ही सब कुछ सामान्य हो भी जाए फिर भी उद्योग तथा व्यापार व्यवस्था को पटरी पर आने में कम से कम 6 महीने का समय लग सकता है।

परंतु प्रधानमंत्री ने इस दिशा में अपने कदम इतने आगे बढ़ा लिए हैं कि संभवत: अब स्वयं उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि इस खतरनाक स्थिति से आखिर कैसे निपटा जाए, लिहाज़ा वे कभी जनता को शब्दों की बाज़ीगरी से तो कभी जनता के बीच आंसू बहाकर तो कभी अपने त्याग व फकीरी जैसी तरह-तरह की दूसरी भावनात्मक बातें सुनाकर जनता को बहलाने की कोशिश कर रहे हैं।

पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने मुरादाबाद में एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘मैं लड़ाई लड़ रहा हूं आपके लिए, ज़्यादा से ज़्यादा यह मेरा क्या कर लेंगे हम तो फकीर आदमी हैं झोला लेकर चल पड़ेंगे’। उनके इस बयान की पूरे देश में जमकर खिल्ली उड़ाई गई।

ज़ाहिर है देशवासियों ने इसके पहले विशेष विमान पर चलने वाला, आए दिन विदेश यात्राएं करने वाला, दिन में कई-कई बार मंहगी पोशाकें बदलने वाला तथा अपना नामधारी दस लाख रुपये कीमत का सूट पहनने वाला, बेशकीमती घड़िय़ां पहनने वाला आत्ममुग्धता का दीवाना शहंशाह रूपी ऐसा फकीर पहले कभी नहीं देखा था।

देश ने अंबानी व अडानी जैसे उद्योगपतियों से दोस्ती रखने वाले ऐसे फकीर की पहले कभी कल्पना भी नहीं की थी।

परंतु प्रधानमंत्री का स्वयं को फकीर कहकर जनता को प्रभावित करने की कोशिश भी जनता को रास नहीं आई।

इसके पहले भी वे जनता के बीच अपने आंसू बहाते हुए यह बता चुके हैं कि उन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। परंतु उनका यह त्याग भी जनता के गले से नहीं उतरा।

देश में यह सवाल किया जाने लगा कि प्रधानमंत्री ने आखिर किस चीज़ का त्याग किया और त्याग करने के बाद ही क्या उन्हें सत्ता सिंहासन हासिल क्या हुआ?

ज़ाहिर है त्याग वह करता है जिसके पास त्याग करने के लिए कुछ हो और उस त्याग के बाद वह वास्तव फकीरी के रूप में नज़र आए।

हालांकि फकीरी और झोला लेकर चला जाऊंगा जैसा वाक्य निश्चित रूप से जनता की हमदर्दी हासिल करने के लिए बोला गया परंतु राजनैतिक विशलेषकों द्वारा इस बयान को इस नज़रिये से देखा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के जो कदम उठाए थे वह पूरी तरह असफल हो चुके हैं और आने वाले समय में स्थिति और अधिक खतरनाक व गंभीर होने की संभावना है। लिहाज़ा प्रधानमंत्री के झोला उठाकर चले जाने के बयान के भीतर छुपे मर्म को समझना ज़रूरी है।

गोया यदि देश की अर्थव्यवस्था बेकाबू हुई और सरकार इस पर नियंत्रण पाने में असफल रही तो प्रधानमंत्री स्वेच्छा से जाएं या न जाएं परंतु परिस्थितियां स्वयं ऐसी पैदा हो सकती हैं कि उन्हें सिंहासन छोड़ना भी पड़ सकता है।

उच्चतम न्यायालय ने भी नोटबंदी लागू होने के फौरन बाद यह चेतावनी दे दी थी कि नोटबंदी के कारण अव्यवस्था फैलने की स्थिति में देश में दंगे-फ़साद भी फैल सकते हैं।

नोटबंदी के फैसले के बाद कुछ खबरें व आंकड़े ऐेसे आए जिससे यह पता चला कि जिन गरीबों ने प्रधानमंत्री योजना के अंतर्गत् जनधन खाते खुलवाए थे उनमें बड़ी संख्या में ऐसे खाताधारक भी हैं जिन्होंने काला धन रखने वालों की मोटी रकम अपने खातों में कुछ पैसों की लालच में जमा करा दी। स्वयं को फकीर बताने वाले हमारे प्रधानमंत्री ने मुरादाबाद में ही यह भी कहा है कि वे -‘ऐसी व्यवस्था लाने जा रहे हैं जिससे जनधन एकाऊंट में जमा पैसा खाताधारकों का ही हो जाएगा। फिर वह पैसा चाहे जिसका रहा हो’।

ज़रा इस कथन के कार्यान्वन पर गौर कीजिए कि हमारे देश का प्रधानमंत्री अपनी गरीब जनता को क्या सीख देना चाह रहा है तथा यदि ऐसा होता है तो उन गरीब खाताधारकों को कितनी परेशानी उठानी पड़ सकती है तथा उनके विश्वास को कितनी ठेस पहुंच सकती है?

क्या किसी प्रधानमंत्री पर यह शोभा देता है कि वह हिंसा, अराजकता, अव्यवस्था तथा अविश्वास पैदा करने वाले बयान दे तथा जनता को इसके लिए प्रेरित करे?

सच पूछिए तो प्रधानमंत्री की ऐसी ‘फकीरी’ पर बार-बार कुर्बान जाने को दिल चाहता है।

Courtesy: हस्तक्षेप
नरेंद्र मोदी
काला धन
रिज़र्व बैंक
नोट बंदी

Related Stories

रोज़गार में तेज़ गिरावट जारी है

अविश्वास प्रस्ताव: विपक्षी दलों ने उजागर कीं बीजेपी की असफलताएँ

यूपी-बिहार: 2019 की तैयारी, भाजपा और विपक्ष

चुनाव से पहले उद्घाटनों की होड़

अमेरिकी सरकार हर रोज़ 121 बम गिराती हैः रिपोर्ट

नोटबंदी: वायू सेना ने सौंपा 29.41 करोड़ का बिल

जीएसटी ने छोटे व्यवसाय को बर्बाद कर दिया

स्विस बैंकों में भारतीयों की राशी बढ़ी, लेकिन यह खुलासा सिर्फ ऊँठ के मुँह में जीरे सामान है

मोदी के एक आदर्श गाँव की कहानी

पीएमएफबीवाई: मोदी की एक और योजना जो धूल चाट रही है


बाकी खबरें

  • govt employee
    अनिल जैन
    निजीकरण की आंच में झुलस रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए भी सबक़ है यह किसान आंदोलन
    28 Nov 2021
    किसानों की यह जीत रेलवे, दूरसंचार, बैंक, बीमा आदि तमाम सार्वजनिक और संगठित क्षेत्र के उन कामगार संगठनों के लिए एक शानदार नज़ीर और सबक़ है, जो प्रतिरोध की भाषा तो खूब बोलते हैं लेकिन कॉरपोरेट से लड़ने…
  • poverty
    अजय कुमार
    ग़रीबी के आंकड़ों में उत्तर भारतीय राज्यों का हाल बेहाल, केरल बना मॉडल प्रदेश
    28 Nov 2021
    मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स के मुताबिक केरल के अलावा भारत का और कोई दूसरा राज्य नहीं है, जहां की बहुआयामी गरीबी 1% से कम हो। 
  • kisan andolan
    शंभूनाथ शुक्ल
    हड़ताल-आंदोलन की धार कुंद नहीं पड़ी
    28 Nov 2021
    एक ज़माने में मज़दूर-किसान यदि धरने पर बैठ जाते थे तो सत्ता झुकती थी। पर पिछले चार दशकों से लोग यह सब भूल चुके थे।
  • Hafte Ki Baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    संवैधानिक मानववाद या कारपोरेट-हिन्दुत्ववाद और यूपी में 'अपराध-राज'!
    27 Nov 2021
    संविधान दिवस के मौके पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोपों-प्रत्यारोपो की खूब बौछार हुई. क्या सच है-संविधानवाद और परिवारवाद का? क्या भारत की सरकारें सचमुच संविधान के विचार और संदेश के हिसाब से…
  • crypto
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या Crypto पर अंकुश ज़रूरी है?
    27 Nov 2021
    मोदी सरकार क्रिप्टोकरेंसी पर अंकुश लगा रही हैI लेकिन आखिर यह क्रिप्टोकरेंसी है क्या? क्या यह देश में मुद्रा की जगह ले सकती है?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License