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भारत
राजनीति
क्या इस अंधेरे दौर में भगत सिंह के विचार राह दिखायेंगे ?
युवाओं को आज समझना होगा कि जब शिक्षा लगातार निजीकरण की ओर मोड़ी जा रही है और गरीब और पिछड़े वर्गों से उसे दूर किया जा रहा है I ऐसे समय में शासक वर्ग चाहता है कि विद्यार्थी अपने हकों के लिए लड़ने के बजाये बस उनकी जी हुजूरी करें I इसी के खिलाफ भगत सिंह हमें चेता रहे थे , इसीलिए आज TISS से JNU और SSC तक के सभी छात्र आन्दोलन महत्वपूर्ण हो जाते हैं I
ऋतांश आज़ाद
23 Mar 2018
भगतसिंह
Image Courtesy: indiaTV

“ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म पर राजा होने की आशा कर सकता है। एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनन्द की तथा अपने कष्टों और बलिदान के लिये पुरस्कार की कल्पना कर सकता है। किन्तु मैं क्या आशा करूँ? मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा – वह अन्तिम क्षण होगा। मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जायेगी।"

ये शब्द हैं भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारी भगत सिंह के, जिन्होंने 1930 के अपने लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ” में ये पंक्तियाँ लिखी थी I आज 23 मार्च भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का शहादत दिवस है I 23 मार्च 1931 के दिन इन तीनों क्रांतिकारियों को ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने फांसी के तख्ते पर लटका दिया था I इस दिन पर देश भर के राजनेता उनकी शान में बड़े बड़े भाषण देते हैं और गली गली में भगत सिंह की मूर्तियों पर मालाएँ चढ़ाई जाती है I आज युवा भगत सिंह की टी शर्ट पहनते हैं और अपनी गाड़ियों के पीछे उनकी तस्वीरें लगाते हैं I लेकिन सवाल ये है कि क्या उन्हें पता है कि भगत सिंह ने असल में किन आदर्शों के लिए अपनी जान दी ? क्या भगत सिंह जिस आज़ादी की बात कर रहे थे उसके आस पास भी हम पहुँच पाए हैं ?

आज के समय में जब त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिराई जा रही है ,जब नवउदारवाद का दौर चल रहा है जिसमें एक एक करके राज्य अपने जन कल्याणकारी कार्यक्रमों से पीछे हटता जा रहा है,  ग़रीबी बढ़ रही है और जब साम्प्रदायिकता उबाल पर है, तब भगत सिंह युवाओं को क्या प्रेरणा दे सकते हैं ?

इस सवाल का जवाब ढूँढने के लिए हमें भगत सिंह के विचारों को गहराई से समझना होगा I हमें ये समझना होगा कि जिस तरह शासक वर्ग और उसकी पार्टियाँ उन्हें दर्शाना चाहती हैं, वे उससे बहुत दूर थे I आम धरणा ये बनायी गयी है कि भगत सिंह एक ऐसा क्रांतिकारी था ,जिसने एक अंग्रेज़ अफसर को मारकर और संसद में बम फेंकर भारत को आज़ादी दिलानी चाही I लेकिन अगर भगत सिंह और उनके साथियों के बयान देखे जाएँ तो एक अलग ही तस्वीर बनती है I जनवरी 1930 में कोर्ट के कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने कोर्ट को कहा कि “पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते , बल्कि इंक़लाब की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होते हैं I” उन्होंने जज को इंक़लाब का मतलब भी समझाया उन्होंने बताया कि क्रांति का अर्थ है समाज में मूलभूत परिवार्तन जिससे ऊँच नीच ख़तम हो जाए और आर्थिक समानता स्थापित हो I

स्कूल की इतिहास की किताबों और आम धारणा में भगत सिंह के समाजवादी बनने के पहलू को भी छुपाया जाता है I हाल में ये भी आरोप लगाया जा रहा है कि भगत सिंह को कम्युनिस्ट की तरह पेश करना वामपंथ की एक राजनीतिक चाल है I इसका जवाब हमें भगत सिंह के लेखों और विचारों से मिल जाता है I भगत सिंह ने 2 फरवरी 1931 उनकी मौत के 1 महीने पहले एक लेख लिखा जिसका नाम है “To Young Political Workers”(युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए ) इस में कहा कि युवाओं को बस्तियों और गावों में जाकर मज़दूरों और किसानों को संगठित करने का काम करना चाहिए क्योंकि “किसान और मज़दूर ही क्रांति के असली सैनिक हैं I” इसी लेख में वे लिखते हैं कि कांग्रेस ये कार्य कभी नहीं करेगी क्योंकि वह शासक वर्ग यानी ज़मींदारों और पूंजीपति वर्ग की पार्टी है I वे युवाओं से लेनिन के सिद्धातों पर एक पार्टी बनाने का आवाहन करते हुए कहते हैं “हमें पेशेवर क्रांतिकारियों की ज़रुरत है यह पूर्णकालिक कार्यकर्ता शब्द लेनिन को बहुत प्रिय था , जिनकी क्रांति के सिवा और कोई आकांक्षा न हो , और न जीवन को दूसरा लक्ष्य हो I” वे आगे कहते हैं “किसानों और मज़दूरों को संगठित करने और उनकी सक्रिय सहानुभूति प्राप्त करने के लिए यह बहुत ज़रूरी है I इस पार्टी को कम्युनिस्ट पार्टी का नाम दिया जा सकता है I”

भगत सिंह के साथी और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य रहे शिव वर्मा ने अपने लेख “क्रांतिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास” में बताया है कि भगत सिंह और सुखदेव शुरूआती दिनों में अराजकवादी राजनीतिक दार्शनिक बुकानिन से प्रभावित थे I लेकिन बाद के दिनों में ख़ासकर 1928 से ज्यादतार लोग मार्क्सवादी हो गए थे इसमें भगत सिंह सबसे आगे थे I जेल जाने के बाद तो इन विचारों में और धार आयी इसकी छाप हम भगत सिंह की जेल डायरी , 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' , 'युवा क्रांतिकारियों के लिए' और उनके बाकी के लेखों में साफ़ देख सकते हैं I बताया जाता है कि अपने अंत समय में भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे I

शिव वर्मा अपने इसी लेख में एक जगह लिखते हैं कि कि भगत सिंह में पढने और जानने कि इतनी जिज्ञासा थी कि एक बार क्रांतिकारियों के हमदर्द राजाराम शास्त्री ने कहा था “भगत सिंह वस्तुतः पुस्तकों को पढ़ता नहीं निगलता था , लेकिन फिर भी उसकी जिज्ञासा की पिपासा सदा अनबुझी रहती थी I”

इस दौर में जब नेता और शिक्षक JNU और बाकी के विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को राजनीति से दूर रहने की सलाह देते हुए दिखते हैं भगत सिंह उन्हें बिलकुल उल्टा करने की सलाह देते हैं I

वे अपने जुलाई 1928 में लिखे लेख “विद्यार्थी और राजनीति” में लिखते हैं “यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढाई करना है , उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए, लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना शिक्षा में शामिल नहीं ? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ सिर्फ क्लर्की करने के लिए हासिल की जाए I”

युवाओं को आज समझना होगा कि जब शिक्षा लगातार निजीकरण की ओर मोड़ी जा रही है और गरीब और पिछड़े वर्गों से उसे दूर किया जा रहा है I ऐसे समय में शासक वर्ग चाहता है कि विद्यार्थी अपने हकों के लिए लड़ने के बजाये बस उनकी जी हुजूरी करें I इसी के खिलाफ भगत सिंह हमें चेता रहे थे , इसीलिए आज TISS से JNU और SSC तक के सभी छात्र आन्दोलन महत्वपूर्ण हो जाते हैं I

आज जबकि सांप्रदायिक उन्माद और गाय के नाम की जाने वाली राजनीति अपने चरम पर है और खुद सत्ताधारी पार्टी फासीवाद की ओर मोड़ने की कोशिश कर रहे है, तब भगत सिंह शायद हमें रास्ता दिखा सकते हैं I वे अपने 1928 में लिखे अपने लेख “सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज” में लिखते हैं कि “इन धर्मों ने हिन्दुस्तान का बेडा गर्क कर दिया है” I वे आगे लिखते हैं “जहाँ तक देखा गया है , इन दंगों के पीछे सांप्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ होता है I इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली I वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र करने का बीड़ा उठाया हुआ था और जो सामान राष्ट्रीयता  और स्वराज के दमगजे मारते नहीं थकते थे ,वही या तो अपने सिर छुपाये बैठे हैं या धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं I” आगे वे बताते हैं कि कैसे अखबार साम्प्रदायिकता फैलाने का काम कर रहे हैं I

इन शब्दों से क्या ऐसा नहीं लगता कि भगत सिंह आज की बात कर रहे हैं ? साम्प्रदायिकता की बीमारी का इलाज भी वे इस लेख में आगे देते हैं I वे लिखते हैं "अगर आम लोगों को में वर्ग चेतना का विकास किया जाए यानी अगर मज़दूर और किसानो को समझाया जाए कि उनके असली दुश्मान पूँजीपति हैं न कि दूसरे धर्म के गरीब, तो इस समस्या का हल निकल सकता है I वे कहते हैं कि रूस की तरह रंग, धर्म , नस्ल और राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर मज़दूरों और किसानो को सत्ता हाथ में लेने के प्रयास करने चाहिए I"

उनके लेखों से ये साफ़ हो जाता कि उनकी आज़ादी का सपना था साम्राज्यवाद और पूंजीवादी व्यवस्था से आम लोगों की आज़ादी I एक ऐसा समाज जहाँ इंसान द्वारा इंसान का शोषण नहीं होता हो , इस सपने की झलक HSRA के घोषणपत्र में भी दिखाई पड़ती है और अदालत में दिए गए उनके बयानों में भी I

आज जब बड़े पूंजीपति और ज़मींदार और उन्ही का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियाँ (चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी ) देश की सत्ता पर काबिज़ हैं I जब पूंजीपति पार्टियों की नीतियों से लगातार बेरोज़गारी, ग़रीबी, किसान आत्महत्या, मजदूरों की बदहाली, युवाओं की शिक्षा तक पहुँच की समस्या, महिलाओं का शोषण और दूसरी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं ऐसा मालूम होता है कि भगत सिंह की आज़ादी से हम कोसों दूर हैं I

आज समय आ गया है कि युवा मूर्तियों , टी शर्ट के प्रतीकों से आगे बढ़कर भगत सिंह के विचारों को समझें और शोषण की इस व्यवस्था के खिलाफ बेबाकी से प्रतिरोध में खड़े हों I आगे का रास्ता इन्ही जन संघर्षों से होकर गुज़रेगा I इस पर क्रांतिकारी कवि पाश की कविता “भगत सिंह ने पहली बार" की ये पंक्तियाँ याद आती हैं  

“जिस दिन फाँसी दी गई
उनकी कोठरी में लेनिन की किताब मिली
जिसका एक पन्ना मुड़ा हुआ था
पंजाब की जवानी को
उसके आख़िरी दिन से
इस मुड़े पन्ने से बढ़ना है आगे, चलना है आगे I”

भगत सिंह
पूंजीवाद
शोषण मुक्त समाज
समाजवादी क्रांति
समानता

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