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भारत
राजनीति
“मेरी आवाज़ आप तक पहुंच गई लेकिन उनका क्या जो वहां बस्तर में जूझ रहे हैं?”
दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क एंड अदर्स ने कॉन्फ्रेंस ऑन डिफेंड दि डिंफेंडर्स यानी हकों की आवाज़ उठाने वालों की रक्षा के लिए सम्मेलन का आयोजन किया।
मुकुल सरल
19 Sep 2018
कॉन्फ्रेंस ऑन डिफेंड दि डिंफेंडर्स

“आज भी पुलिस-प्रशासन से लड़ाई चलती रहती है। आज भी पुलिस वाले मेरा दुपट्टा खींच लेते हैं, कभी थाने से भगा देते हैं...लेकिन मुझे कोई शिकायत नहीं, क्योंकि मैंने ये लड़ाई का मैदान खुद चुना है...मेरी आवाज़ आप तक पहुंच भी गई लेकिन उनका क्या जो वहां बस्तर में जूझ रहे हैं।”

ये कहना है कि बस्तर की आवाज़, आदिवासियों के हकों के लिए लड़ने वालीं सोनी सोरी का। वे आज यहां दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क एंड अदर्स के कार्यक्रम में अपने अनुभव साझा कर रही थीं। कॉन्फ्रेंस ऑन डिफेंड दि डिंफेंडर्स यानी हकों की आवाज़ उठाने वालों की रक्षा के लिए आयोजित इस कॉन्फ्रेंस में सोनी सोरी को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया था। इस मौके पर उनके संघर्ष से जुड़ी एक फिल्म भी दिखाई गई।

छत्तीसगढ़ के बस्तर की रहने वाली सोनी सोरी का संघर्ष बड़ा है। आदिवासियों के पक्ष में बोलने की उन्हें ऐसी-ऐसी सज़ाएं दी गईं कि सुनकर ही रौंगटे खड़े हो जाते हैं, दिल दहल जाता है। आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन की लड़ाई लड़ने पर उन्हें नक्सलवादी कहा गया और तरह-तरह से प्रताड़ित किया गया। यहां तक कि पुलिस द्वारा उनकी योनि में पत्थर तक डाले गए। उनके मुताबिक उन्हें प्रताड़ित करते हुए पुलिस का कहना था कि इसे ऐसा कर दिया जाए कि ये शर्म से मर जाए। लेकिन नहीं, वे दोगुनी ताकत से फिर खड़ी हो गईं।

दिल्ली में आज उन्होंने कहा कि “मेरे भीतर कई सवाल हैं। ये सवाल नहीं कि सोनी सोरी के साथ क्या हुआ, हालांकि जो हुआ वो बेहद दर्दनाक था, उसे मैं आज भी महसूस करती हूं। उस समय मैं कुछ और थी और आज कुछ और हूं। हालांकि आज भी प्रताड़ना कम नहीं हुई है।” सोनी ने आज के बस्तर की हालत बताई और बताया कि किस तरह अभी 14 सितंबर को एक बच्ची के साथ फोर्स वालों ने बलात्कार किया और किस तरह पुलिस ने बच्ची की जान बचाने और इलाज कराने की बजाय उन्हें प्रताड़ित किया। किस तरह लोगों को फर्जी मुठभेड़ों में मार दिया जाता है। किस तरह झूठे गिरफ्तार किया जा रहा है।  

उन्होंने कहा कि वहां आज भी बहुत लोग इस वजह से भी आवाज़ उठाने से डरते हैं क्योंकि शिकायत करने पर फिर पीड़ितों को मारा जाता है। हम कानून की बात करते हैं, हम हक की आवाज़ उठाते हैं तो हमें नक्सलवादी कहा जाता है। इस मौके पर उन्होंने भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में अर्बन नक्सल के नाम पर पकड़े गए सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा का भी जिक्र किया। सोनी ने सवाल किया कि आखिर इन लोगों को क्यों पकड़ा गया, क्या इसलिए क्योंकि ये गरीब आदिवासियों की आवाज़ उठाते हैं?

सोनी ने दुख जताते हुए कहा कि देश में बहुत कुछ गलत हो रहा है लेकिन

वो सबकी आवाज़ नहीं उठा पातीं क्योंकि उनका अपना बस्तर ही लहूलुहान है।

उन्होंने कहा कि मुझे देश के किसी भी हिस्से में जाना होता है तो कोर्ट को बताकर आना होता है, लेकिन मुझे अपने बस्तर के भीतर भी गांवों में नहीं  जाने दिया जाता। वहां जहां मैं खेली, बड़ी हुई वहां जाने पर भी मेरे ऊपर प्रतिबंध है, तो ये कैसी आज़ादी है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी दोनों तरफ से पिस रहे हैं। पुलिस तो हमें मारती ही है, कई बार नक्सली भी मुखबिर होने के शक में गांव वालों को मारते हैं। आदिवासी दोनों तरफ से मारे जाते हैं। हमारा जीवन पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया है। लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर कभी शिकायत नहीं करुंगी, क्योंकि हम जब तक ज़िंदा रहेंगे लड़ते रहेंगे।

इससे पहले गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने भी अपना संघर्ष सबसे साझा किया। उन्होंने बताया कि किस तरह नव उदारीकरण से पहले बस्तर में काम करने पर उन्हें सराहना मिलती थी, सरकारी कमेटियों में उन्हें शामिल किया जाता था, लोक अदालत में जज के साथ बैठाया जाता था लेकिन जबसे उदारीकरण का दौर शुरू हुआ वही सरकार के सबसे बड़े दुश्मन बन गए और उनके आश्रम को रौंद दिया गया। आदिवासियों पर अत्याचार और बलात्कार की कहानियों की उन्होंने देश के गृहमंत्री तक से शिकायत की लेकिन कुछ नहीं हुआ, उल्टे आदिवासियों पर अत्याचार बढ़ गया। उनका कहना है कि सरकार ने कॉरपोरेट की तरफ से अपने ही निवासियों के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है। अंबानी-अडानी के लिए ज़मीनें और अन्य संसाधन जुटाने के लिए आदिवासियों पर अत्याचार किया जा  रहा है। उनसे उनका जल-जंगल-जमीन छीना जा रहा है।

हिमांशु कुमार ने इस बात का दुख जताया और शिकायत की कि जनता की तरफ से लड़ने वालों को अक्सर अकेला छोड़ दिया जाता है, और उन्हें भी अकेला छोड़ दिया गया।  

कॉन्फ्रेंस ऑन डिफेंड दि डिंफेंडर्स

इससे पहले के सत्र में पत्रकारों पर हमले को लेकर बात की गई। इस सत्र में वरिष्ठ पत्रकार हरतोष बल, अमित बरुआ, भाषा सिंह और पामेला फिलिपोसे ने अपनी बात रखी। सभी ने पत्रकार और पत्रकारिता दोनों पर बढ़ रहे हमलों पर चिंता जाहिर की।

भाषा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हमले बढ़े हैं लेकिन उसका प्रतिरोध भी उसी तरह तेज़ हुआ है। छोटे अखबार हों या छोटी-छोटी जगह काम करने वाले पत्रकार हों, उन्होंने हमलों के बावजूद खामोश होने से इंकार कर दिया है। डरने से इंकार कर दिया है। उन्होंने मीडिया में नौकरियों की स्थितियों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि आज बेशतर पत्रकार ठेका मजदूर हो गए हैं। लगातार नौकरियां छीनी जा रही हैं, लेकिन मीडिया के एक बड़े वर्ग में इस पर बात नहीं होती। कोई चिंता नहीं जताई जाती।  इन सब मुद्दों को कोई बड़ा संस्थान नहीं उठाता लेकिन ये अच्छी बात है कि लोग फिर भी रास्ते निकाल रहे हैं, भले ही एक बड़ी नदी के तौर पर नहीं, छोटे ही सही लेकिन प्रयास हो रहे हैं। एक वैकल्पिक मीडिया चाहे वो छोटे पत्र-पत्रिका हों, न्यूज़ वेबसाइट हों बड़ी मजबूती से अपनी बात रख रही हैं और इसमें दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला की आवाज़े सामने आ रही हैं। यह अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है।

वरिष्ठ पत्रकार और कारवां मैगजीन के राजनीतिक संपादक हरतोष सिंह बल ने कहा कि आज किसी एक मीडिया संस्थान को बचाने का सवाल नहीं है बल्कि आज पूरी पत्रकारिता ही खतरे में है। पूरा का पूरा मीडिया ही ध्वस्त हो गया है। उन्होंने जज लोया की स्टोरी को लेकर भी अपने अनुभव साझा किए। और हैरत जताई कि आज किस तरह बड़े-बड़े अख़बार भी बिना कोई सवाल उठाए कैसे सरकार या आरएसएस की स्टोरी छाप रहे हैं।

इस सत्र का संचालन कर रहीं वरिष्ठ पत्रकार पामेला फिलिपोसे ने भी पत्रकारिता पर हमले और पत्रकारों की हत्याओं पर ऐसी ही चिंताएं जाहिर कीं। उन्होंने गौरी लंकेश को भी याद करते हुए कहा कि वे अंग्रेजी की एक जानी-मानी पत्रकार थीं लेकिन जब उन्होंने कन्नड़ में लिखना शुरू किया तो उनकी हत्या कर दी गई। इसके माध्यम से पामेला ने ये बताने की कोशिश की कि भाषा की पत्रकारिता का क्या मतलब है। आप जैसे ही आम जनता की जबान में लिखना-बोलना शुरू करते हैं आपके ऊपर हमले बढ़ जाते हैं।  

दिन भर के इस कार्यक्रम में आरटीआई एक्टविस्ट, वकीलों, दलित, अल्पसंख्यक और मानवाधिकार कार्यकर्ता, और राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमलों को लेकर भी बात की गई।  

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Bastar
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