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मोदी जी! हमें शब्दों से न बहलाइए, अपना इरादा साफ़ बताइए
लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसा बहुत कुछ कहा, जिसपर बहस की काफ़ी गुंजाइश है। इनमें सीडीएस के नए पद पर तो बात होनी ही है, लेकिन ‘ईज ऑफ लिविंग’ की बात भी कम ख़तरनाक़ संकेत नहीं दे रही है।
मुकुल सरल
16 Aug 2019
modi
फोटो साभार : financial express

जब आपके खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने पर भी पाबंदी लगाई जा रही हो, ऐसे समय में ‘सरकार’ का यह कहना कि सरकार का आम लोगों के जीवन में कम से कम दख़ल होना चाहिए, तब इस पर हंसी नहीं आती, बल्कि डर लगता है। डर लगता है यह सोचकर कि इसका आशय क्या है? क्या पहले से ही निजीकरण की मार झेल रही आम गरीब जनता को पूरी तरह पूंजीपतियों और बाज़ार के हवाले छोड़ दिया जाएगा?

15 अगस्त को 73वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसा बहुत कुछ कहा, जिसपर लंबे समय तक बहस होगी, और ऐसा बहुत नहीं भी कहा, जिसे कहा जाना चाहिए था। ऐसा बहुत कुछ जिसे सरकार समर्थक और स्वयंभू हिन्दुत्व के ठेकेदारों द्वारा अंजाम दिया जा रहा है, जिस पर रोक लगनी ज़रूरी है। इसके अलावा सबसे अहम जम्मू-कश्मीर के लिए ऐसा कुछ जो आहत और परेशान कश्मीरियों को कुछ सांत्वना देता।

ख़ैर प्रधानमंत्री ने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं जिनमें सबसे अहम है चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ़ (सीडीएस) की नियुक्ति। यानी एक ऐसा व्यक्ति जो संभवतया तीनों सेनाध्यक्षों के ऊपर होगा। अभी तक हम ऐसे व्यक्ति के तौर पर सिर्फ़ राष्ट्रपति को जानते और मानते आए हैं कि वही तीनों सेनाओं (थल सेना, जल सेना और वायु सेना) के प्रमुख हैं।

अब इस नये पद की क्या ज़रूरत या भूमिका होगी यह तो रक्षा मामलों के जानकार ही बताएंगे। क्या सीडीएस तीनों सेनाओं के समन्वयक की भूमिका निभाएगा, या सेना और सरकार के सलाहकार की या उससे कुछ ज़्यादा? क्या ये तीनों सेनाओं पर सरकार या ‘एक व्यक्ति या एक दल’के एकछत्र अधिकार की कवायद है? या इसके कुछ और ढके-छुपे गंभीर संकेत हो सकते हैं? ये सब कुछ जानने-समझने की चीजें हैं।

प्रधानमंत्री ने इसे आधुनिक समय की ज़रूरत बताते हुए कहा, "सीडीएस न केवल तीनों सेनाओं की निगरानी करते हुए नेतृत्व करेंगे, बल्कि वह सैन्य सुधारों को भी आगे बढ़ाने का काम करेंगे।"

इसके अलावा प्रधानमंत्री ने भारत को 2022 से पहले ही सिंगल यूज प्लास्टिक मुक्त देश बनाने की बात कही। लेकिन उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बात कही, वो थी जनसंख्या विस्फ़ोट को लेकर काम करने की बात। इस बात को लेकर उनके समर्थक काफ़ी कुछ ख़ुश हैं और मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक और हथियार की तरह देख रहे हैं।

हिन्दुत्ववादियों का मानना रहा है कि देश की जनसंख्या बढ़ाने में मुसलमान सबसे आगे हैं। उनका मानना रहा और वे इसे लगातार प्रचारित भी करते हैं कि मुसलमानों की जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है और जल्द ही एक दिन ऐसा आएगा जब मुसलमानों की जनसंख्या हिन्दुओं से ज़्यादा हो जाएगी, जबकि यह कहना और मानना तथ्यात्मक दृष्टि से बिल्कुल ग़लत है। तथ्य यही है कि मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि की दर में पहले की अपेक्षा कमी आई है जबकि हिन्दुओं की वृद्धि दर बढ़ी है।

इस सब पर आगे ख़ूब विवाद होना है। लेकिन एक और अहम बात जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से बहुत भोलेपन से कही, वो बेहद ख़तरनाक़ है। ये बात थी आम लोगों के जीवन में सरकार के दख़ल को और कम करने की। हालांकि ये बात पहली बार नहीं कही गई है, पिछले पांच सालों में मोदी इसे अलग-अलग मंचों से कई बार दोहरा चुके हैं। वे इसी बात को ‘मिनिमम गवर्मेंट एंड मैक्सिमम गवर्नेंस’ के नाम से भी कई बार दोहरा चुके हैं। 15 अगस्त को उन्होंने ‘ईज ऑफ लिविंग’पर ज़ोर दिया।

उन्होंने कहा, “रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में सरकारों का दख़ल नहीं होना चाहिए, न सरकार का दबाव हो, न सरकार का अभाव हो। ”

यह बात जितनी सुनने में अच्छी लगती है, हक़ीक़त में उतनी है नहीं। इसका मतलब वैसा ही है जैसे कहा गया कि श्रम सुधार के लिए 44 कानूनों को 4 में समाहित कर दिया। इस तरह श्रम कानूनों को मजबूत और बेहतर बनाने की बजाय और कमज़ोर कर दिया गया। मज़दूर संगठन इसका लगातार विरोध कर रहे हैं।

ये सिर्फ़ शब्दों का फेर है। दरअसल आम लोगों की ज़िंदगी मे सरकार का दख़ल कम करने के नाम पर सरकार धीरे-धीरे सबकुछ निजी हाथों में सौंपती जा रही है। खुली प्रतिस्पर्धा के नाम पर सबकुछ बाज़ार के हवाले किया जा रहा है। 90 के दशक में हमें एक शब्द दिया गया था उदारीकरण,  आर्थिक सुधार के नाम पर शुरू किए गए उदारीकरण के नतीजे हमारे सामने हैं। इसके बाद शब्द मिला विकास, उसका विनाश हम देख चुके हैं। हम देख रहे हैं कि देश के सारे संसाधन, सारी दौलत चंद पूंजीपतियों के हाथों में सीमित हो गई है। सरकारें इसी तरह शब्दों से हमें ठगती है। अभी ठगी के आपने नए शब्द ख़ूब सुने ही हैं, जिन्हें जुमला कहा गया, जैसे ‘अच्छे दिन’, ‘सबका साथ, सबका विकास’ और अब इसमें ‘सबका विश्वास’ भी जुड़ गया है।

अब मोदी जी लालकिले से कह रहे हैं कि सरकार का दबाव नहीं, सरकार का अभाव नहीं। इसका मतलब समझिए। हमारी सरकारों ने पहले ही शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार जैसे ज़रूरी और बुनियादी अधिकार के क्षेत्र से भी अपने हाथ लगभग खींच लिए हैं। आज सरकारी स्कूल चौपट हैं और प्राइवेट स्कूल फल-फूल रहे हैं। यही हाल सरकारी अस्पताल और  प्राइवेट अस्पताल का है।

सरकार की नवरत्न कंपनियां तक बेची जा रही हैं, रक्षा सौदों तक में निजी पार्टनर को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह सब हम अपने सामने होता देख रहे हैं।

हम देख रहे हैं कि किस तरह बीएसएनल, डाकघर और अन्य सरकारी संस्थाओं को बर्बाद किया जा रहा है। हम देख रहे हैं कि किस तरह पीपीपी के नाम पर रेलवे के निजीकरण की योजना है।

रोज़गार के नाम पर सरकार के पास देने को कुछ नहीं है, सिवाय पकौड़ा बेचने की राय के। जो भी रोज़गार है और प्राइवेट क्षेत्र में हैं और वहां शोषण का हाल आप देख ही रहे हैं, मज़दूरों की तो बात ही छोड़िए, पत्रकार ही बंधुआ हो गए हैं और चुनिंदा हाथों में आते ही मीडिया, गोदी मीडिया में बदल गया है।     

अब बाक़ी हस्तक्षेप भी ख़त्म कर प्राइवेट खिलाड़ियों को खुलकर खेलने का मौका दिया जा रहा है।

हम तो चाहते हैं मोदी जी, कि सरकार और उसके समर्थकों का इस बात में कोई हस्तक्षेप न हो कि हमें क्या खाना चाहिए, क्या नहीं। क्या पहनना चाहिए, क्या नहीं। कौन सा डे मनाना चाहिए, कौन सा नहीं।

लेकिन हम चाहते हैं कि कारखाना मालिक श्रम कानून लागू करे इसके लिए सरकार सख़्ती से हस्तक्षेप करे।

मज़दूर-कामगार को न्यूनतम वेतन मिले इसके लिए सरकार हस्तक्षेप करे।

हम चाहते हैं कि शिक्षा सस्ती हो और एक समान हो इसके लिए सरकार दख़ल दे। न सिर्फ़ सरकारी स्कूल सुधारें जाएं, बल्कि निजी स्कूल पर भी फीस इत्यादि को लेकर अंकुश हो।  

सबको अस्पताल में अच्छा इलाज मिले, सस्ती दवा मिले, इसके लिए सरकार हस्तक्षेप करे। न सिर्फ़ सरकारी अस्पताल बेहतर हों, बल्कि प्राइवेट अस्पताल भी ग़रीबों का मुफ़्त या सस्ता इलाज करें, इसके लिए सरकार दख़ल दे।

सबको रोज़गार मिले इसके लिए सरकार दख़ल दे और अपने तौर पर नयी नौकरियों का सृजन करे।

हाथ से मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह बंद हो, सीवर में आदमी का उतरना बंद हो और उनका अच्छे से पुनर्वास हो, भेदभाव ख़त्म हो, सबको गरिमापूर्वक जीने का अधिकार मिले इसके लिए सरकार दख़ल दे।

लूट-हत्या, बलात्कार घटें, महिलाओं पर अत्याचार घटें इसके लिए सरकार हस्तक्षेप करे।

हां, हम चाहते हैं कि इन मामलों में आप यानी सरकार हस्तक्षेप करे, मोदी जी, हम आपके हस्तक्षेप का स्वागत करेंगे।

लेकिन हमें मालूम है आप ऐसा कुछ भी नहीं करने जा रहे। आपका पिछले पांच साल का कार्यकाल इसका गवाह है। गरीबों को उज्ज्वला और शौचालय जैसी कुछ सुविधाएं और योजनाएं आपने ज़रूर दी हैं, लेकिन उसमें भी दावों और हक़ीक़त में बहुत फर्क है, साथ ही उनको उनके सभी अधिकार मिलें इसके लिए कोई कोशिश नहीं हुई है।

हम चाहते हैं कि गरीब, दलित, पिछड़ों, महिलाओं के लिए प्राइवेट नौकरियों में भी आरक्षण हो इसके लिए सरकार पूरा प्रयास और हस्तक्षेप करे।

हम चाहते हैं कि पूरे देश में भूमि सुधार लागू हों, इसके लिए भी सरकार भरपूर हस्तक्षेप करे।

आप कह रहे हैं कि 'सरकार का अभाव नहीं', लेकिन क्या आपके 'सरकार का अभाव नहीं' का मतलब सिर्फ़ इतना है कि जहाँ हमारा जल जंगल ज़मीन छीनने की ज़रूरत होगी वहां सरकार दख़ल देगी। जहां अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनने की ज़रूरत होगी वहां सरकार दख़ल देगी। जहां नागरिकता ख़त्म करने की ज़रूरत होगी, वहां सरकार दख़ल देगी। इस सबको हम अपने सामने होता देख रहे हैं। इसलिए हमें शब्दों से न बहलाइए, अपना साफ़ इरादा बताइए।

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