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मोदी का चुनाव अभियान, शिवनाथ ठुकराल और फेसबुक इंडिया
मोदी के चुनाव अभियान में शामिल रहे शिवनाथ ठुकराल का फेसबुक इंडिया में रहना क्या कुछ सवाल खड़े करता है? और कांग्रेस को क्यों इस बात का संदेह है कि 2019 के चुनावों में फेसबुक पक्षपात कर सकती है।
सिरिल सैम, परंजॉय गुहा ठाकुरता
01 Apr 2019
शिवनाथ ठुकराल। (फाइल फोटो)
Image Courtesy: Exchange4media

एनडीटीवी में एंकर के तौर पर काम कर रहे शिवनाथ ठुकराल ने अक्टूबर, 2009 में चैनल की नौकरी छोड़कर एस्सार समूह में काम करना शुरू किया। एस्सार समूह तहलका पत्रिका द्वारा गोवा में आयोजित ‘थिंक फेस्ट’ के प्रायोजकों में से एक था। बाद में इस पत्रिका ने ठुकराल की पत्नी शैली चोपड़ा को नौकरी दी। अब उनकी पत्नी ‘शी दि पीपल’ के नाम से एक अभियान चलाती हैं।

तेल, गैस, स्टील और बिजली के क्षेत्र में काम करने वाला एस्सार समूह कई बार विवादों में घिरा है। इसके बाद ठुकराल कार्नेगी फाउंडेशन में काम करने लगे। इस फाउंडेशन में काम करने के बाद वे फेसबुक इंडिया की टीम में वरिष्ठ पद पर शामिल हो गए। अन्खी दास के साथ मिलकर चुनावों के तैयार की जारी फेसबुक की टीम से जुड़े। ठुकराल अपने बैंकर मित्र अनुज गुप्ता के साथ मिलकर हीरेन जोशी को ‘मेरा भरोसा’ और दूसरे ऐसे वेब पेज बनाने में 2013 में मददगार रहे। वे भाजपा की सोशल मीडिया टीम के अनाधिकारिक सदस्य बन गए।

2014 के चुनावों के पहले के ‘मेरा भरोसा’ पेज को देख पाना हमारे लिए मुश्किल था। इसमें हमारी मदद निशांत सक्सेना ने की। हमें पता चला कि इस पेज पर कांग्रेस की अध्यक्ष रही सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के खिलाफ खबरें प्रकाशित होती थीं। इसके जरिये मोदी के विरोधियों की छवि खराब करने की कोशिश हुई और मोदी की छवि मजबूत करने की। 

इसकी कुछ ख़बरों के शीर्षक के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। एक खबर का शीर्षक था- “कैसे सोनिया गांधी ने प्याज की कीमतों को बढ़वाया।” दूसरे का शीर्षक था- “सोनिया गांधी ने भारत को अफ्रीका से भी बुरा बना दिया।” उसी साल नवंबर में अनुज गुप्ता ने ‘मेरा भरोसा’ के अपने एक लेख में लिखा कि मोदी के सत्ता में आते ही लाइसेंस राज से मुक्ति मिलेगी। उस वक्त गुप्ता हांगकांग और मुंबई में काम करने वाले स्ट्रैटजिक डिसिजन ग्रुप के साथ जुड़े हुए थे।

‘मेरा भरोसा’ में नौकरी मांगने वाले एक व्यक्ति ने कहा कि वे मुंबई में जून, 2013 में गुप्ता से दक्षिणपंथी संगठन ‘सुबोधिनी’ के वेबसाइट लॉन्च के अवसर पर मिले थे। बाद में इस व्यक्ति का साक्षात्कार गुप्ता और ठुकराल ने लिया।

प्रोद्युत बोरा कहते हैं कि अर्द्ध-राजनीतिक कार्यकर्ता का स्वतंत्र प्लेटफॉर्म में शामिल होना गंभीर सवाल खड़े करता है। कांग्रेस के एक नेता ठुकराल के मोदी के अभियानों और हीरेन जोशी से संबंधों का हवाला देते हुए कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि 2019 के चुनावों में फेसबुक जैसा प्लेटफॉर्म बगैर किसी का पक्ष लिए काम कर पाएगा। एक दूसरे आईटी पेशेवर ने कहा कि ठुकराल उन्हें राजनीतिक तौर पर किसी पार्टी के लिए प्रतिबद्ध नहीं दिखते, वे सिर्फ अपने नियोक्ता के लिए काम करते हैं।

फेसबुक में आने से पहले ठुकराल के कामों के बारे में जब हमने फेसबुक के प्रवक्ता से सवाल पूछा तो हमें सीधा जवाब नहीं मिला। उन्होंने कहा, ‘हमारा लक्ष्य बेहतर लोगों को नियुक्त करने का रहता है। यह भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में किया जाता है। शिवनाथ की नियुक्ति में भी इस प्रक्रिया का पालन किया गया था।’

2014 के चुनावों के पहले ‘मेरा भरोसा’ के अलावा और भी कई प्रयोग चल रहे थे। कमल संदेश और मेरे सपनों का भारत जैसे प्रयोग भी भाजपा के पक्ष में चल रहे थे। स्वराज्य पत्रिका चलाने वाले प्रसन्ना विश्वनाथन उस वक्त सेंटर राइट चला रहे थे।

हमारे सोशल मीडिया सीरीज़ के अन्य आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :-

कैसे फेसबुक और भाजपा ने एक-दूसरे की मदद की?

2014 में मोदी का चुनाव अभियान गढ़ने वाले राजेश जैन आज विरोधी क्यों हो गए हैं?

चार टीमों ने मिलकर गढ़ी नरेंद्र मोदी की बड़ी छवि!

सोशल मीडिया पर मोदी के पक्ष में माहौल बनाने वाले अहम किरदार कौन-कौन हैं?

#सोशल_मीडिया : लोकसभा चुनावों पर फेसबुक का असर?

किसने गढ़ी मोदी की छवि?

क्यों फेसबुक कंपनी को अलग-अलग हिस्सों में बांटने की मांग उठ रही है?

मुफ्त इंटरनेट के जरिये कब्ज़ा जमाने की फेसबुक की नाकाम कोशिश?

#सोशल_मीडिया : लोकसभा चुनावों पर फेसबुक का असर?

क्या सोशल मीडिया पर सबसे अधिक झूठ भारत से फैलाया जा रहा है?

#सोशल_मीडिया : सत्ताधारियों से पूरी दुनिया में है फेसबुक की नजदीकी

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फर्जी सूचनाओं को रोकने के लिए फेसबुक कुछ नहीं करना चाहता!

#सोशल_मीडिया : क्या सुरक्षा उपायों को लेकर व्हाट्सऐप ने अपना पल्ला झाड़ लिया है?

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#सोशल_मीडिया : कई देशों की सरकारें फेसबुक से क्यों खफा हैं?

सोशल मीडिया की अफवाह से बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा

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