NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
चिकित्सकीय पितृसत्तावाद के दृष्टिकोण से ग्रस्त दिव्यांगता विश्वविद्यालय अध्ययन विधेयक
यह विधेयक विकलांगता (दिव्यांगता) को किसी अंग की निष्क्रियता या रोगग्रस्त शरीर के रूप में देखता है, जिसकी देखभाल के लिए सेवाओं की ज़रूरत है। यह विकलांग लोगों के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर धकेले जाने के एक स्रोत के रूप में भेदभाव की असलियत को नज़रअंदाज़ करता है।
हरलीन कौर
06 Jan 2021
med
प्रतीकात्मक चित्र

विकलांगता एक अनियमिततारूपी शब्द है और यहां तक इसे समझने के लिए अनेक दृष्टिकोण से समझने ज़रूरत है। हालांकि विकलांगता को शारीरिक विकृति, नुकसान, विकृति विज्ञान और विचलन का समानार्थी समझा जाता रहा है। विकलांगता के प्रति यह दृष्टिकोण सत्तासंबंधी रुझान को दर्शाता है, जो विकलांगता की समस्या का हल चिकित्सा और पुनर्वास में ढूँढता है। इसलिए, विकलांगता चिकित्सा, सोशल वर्क और शिक्षा मुख्य रूप से मेडिकल और पैरा-मेडिकल पेशेवरों पर निर्भर है, जो इस समस्या के इलाज को जानते हैं।

विकलांगता के अधिकारों को लेकर शुरू हुआ अभियान, विकलांगता को सांस्थानिक देखभाल, इलाज और धर्मार्थ के मसले से अलग कर, उसको न्याय और अधिकार के मुद्दे में रूपांतरण की मांग करता है। इस अभियान के उप-उत्पाद के रूप में विकलांगता अध्ययन (डीएस) एक अकादमिक क्षेत्र के रूप में उभरा है। यह डीएस उस कारण की तलाश कर रहा है, जिसके तहत विकलांगता को प्रस्तुत किया जाता है—राजनीति के ज़रिए, संस्थागत प्रबंधों के ज़रिए, आर्थिक प्राथमिकता के रूप में और निश्चित रूप से, भाषा के अनुप्रयोग और दुरुपयोग के ज़रिए। विकलांगता का अध्ययन उसके चिकित्सकीय और पुनर्वास के दृष्टिकोण को चुनौती देता है और इसको समझने के लिए एक विशिष्ट ज्ञान की अपेक्षा करता है।

इस तरह के ज्ञान का उत्पादन विकलांग व्यक्तियों और दुर्गम परिदृश्यों, समाजों, और संस्थानों द्वारा अक्षमता की उनकी प्रक्रिया के अनुभव और दृष्टिकोण को प्रभावित करता है..और युद्ध, पुनर्वास, पर्यावरणीय नस्लवाद, राज्य-अधिकृत हिंसा और नरसंहार सहित एक अधिक वैश्विक काल्पनिकता को शामिल करता है।

इसलिए, विकलांगता का अध्ययन सक्षमों के पक्ष में भेदभाव रखने के तौर-तरीकों और उत्पादकतावादी दुनिया के मानदंडों पर सवाल उठाने से संबंधित हैं, जो शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को सांस्कृतिक रूप से मूल्यहीन तथा भौतिक रूप से हाशिए पर डाल देता है। इसका संबंध उस विश्व व्यवस्था के खिलाफ हमारी आवाज उठाने से भी है, जो लोगों को उनके अधिकार से वंचित करती है और उन्हें भूख व निर्धनता की पराकाष्ठा की तरफ धकेल देती है और वह युद्ध (अपंग बनाने वाले सभी कारणों के विरुद्ध) को भी उचित ठहराता है।

विकलांगता को देखने, उस पर बातचीत करने तथा उसके बारे में सोचने के नए और उभरते तरीकों को पहचानते हुए दिव्यांग व्यक्तियों का अधिकार अधिनियम-2016 विकलांगता को एक “विकसित होती अवधारणा” मानता है। इसलिए यह विकलांगता को देखने के प्रमुखता पर आधारित चिकित्सीय तथा व्यक्तिवादी विचार को विकलांगता के एक वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में स्थापित करता है। केंद्र सरकार ने अभी हाल में ही दिव्यांगता अध्ययन विश्वविद्यालय और पुनर्वास विज्ञान विधेयक-2021 के प्रस्ताव पर लोगों से इस पर राय मांगी है। कुल 128 पेज के प्रस्ताव में तीन पाठ हैं : पहले पाठ में विधेयक के बारे में विवरण है (34 पृष्ठ), दूसरे में परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट (63 पेज) है और तीसरे में ईएफसी मेमो (31 पेज) का ब्योरा है।

प्रस्तावित विश्वविद्यालय का पहला लक्ष्य “पेशेवरों, शोधार्थियों और शिक्षकों को प्रशिक्षित करना और उन्हें विकसित करना होगा।” विश्वविद्यालय में आठ विभाग: दिव्यांगता अध्ययन विभाग, पुनर्वास विज्ञान विभाग, श्रव्य, वाक् भाषा निदान, और भारतीय संकेत भाषा विभाग, विशेष शिक्षा विभाग, मनोविज्ञान विभाग, कृत्रिम, अस्थि विज्ञान, सहायक तकनीक विभाग, नर्सिंग विभाग, और समावेशी वैश्विक डिजाइन विभाग होंगे। इन विषयों में स्नातक और उच्चस्तरीय कक्षाओं तक अध्ययन कराया जाएगा।

हालांकि प्रस्ताव विकलांगता अध्ययनों के लक्ष्यार्थों पर विश्लेषण प्रस्तुत नहीं करता है और यह पुनर्वास विज्ञान के मसले पर भी चुप्पी साधे हुए है। पाठ्यक्रमों के शीर्षकों से यह पता लगता है कि प्रस्तावित विश्वविद्यालय पैरा-मेडिकल और सोशल वर्क पेशेवरों के साथ-साथ विशेष शिक्षक तथा वैश्विक समावेशी डिजाइन में वास्तुशिल्पी तैयार कर रहा है। अत: विश्वविद्यालय का प्राथमिक जोर विकलांग की सेवा करने वाले लोगों को तैयार करना है। इसलिए यह विधेयक विकलांगता के बारे में चिकित्सीय पितृसत्तात्मकता के विचार की ओर संकेत करता है। जबकि यह शरीर के रोग तथा उनके संदर्भों को लेकर बनी उच्च समझदारी की अवहेलना करता है। इसलिए ऐसा मालूम होता है कि यह विधेयक विकलांगता को किसी अंगों की निष्क्रियता या रोगग्रस्त शरीर के रूप में देखता है, जिसकी देखभाल के लिए सेवाओं की ज़रूरत है। यह विधेयक विकलांग लोगों के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर धकेले जाने के एक स्रोत के रूप में भेदभाव की असलियत को नज़रअंदाज़ करता है। यह विकलांगता के बारे में एक तरफ नए ज्ञान के प्रति उपेक्षा-भाव दिखाता है कि विकलांगता को लेकर चिकित्सकीय पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण अभी भी जारी है और यह सामाजिक पूर्वाग्रह के समान है।

इसके अलावा, यह विधेयक स्थापना से छह साल के भीतर एक आत्मनिर्भर विश्वविद्यालय का प्रस्ताव करता है। इस प्रकार, विश्वविद्यालय अपने संसाधन का 50 फीसद हिस्सा फीस के रूप में छात्रों से वसूल करेगा और शेष 50 फीसद संबद्धता फीस और पाठ्यक्रम की डिज़ाइन आदि मदों से जुटाएगा। ईएफसी मेमो के पेज 14 पर इस मद से जुटाए जाने वाले संसाधनों के बारे में एक विस्तृत सारणी (टेबल) दी गयी है। इसके अनुसार, विश्वविद्यालय में दाखिला कराने वाले एक छात्र से सालाना 1 लाख रुपये ट्यूशन फीस, 0.75 लाख होस्टल फीस और अन्य मदों में 0.25 लाख रुपए वसूल किए जाएंगे। इस तरह, प्रति छात्र प्रति को वर्ष को दो लाख रुपए देना होगा। दूसरी तरफ, केंद्र सरकार द्वारा करदाताओं की आय के बारे में अगस्त 2020 में जारी एक रिपोर्ट बताता है कि देश के 57 फीसद से ज्यादा करदाता प्रति वर्ष 2.5 लाख रुपए से भी कम कमाते हैं। इन सब को मिला कर देखा जाए तो देश की आबादी के सर्वाधिक छात्रों के लिए यह विश्वविद्यालय दुष्प्राप्य ही रहेगा।

कुल मिला कर, यह विधेयक हड़बड़ी में तैयार किया लगता है क्योंकि यह न तो शीर्षकों के मुहावरे को स्पष्ट करता है और न ही यह विकलांगता के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करता है। इसके अलावा, इस मसौदे में उद्देश्यों के विवरण पुनर्वास परिषद ऑफ इंडिया (आरसीआइ) से बहुत मेल खाते हैं। इसी तरह, विश्वविद्यालय के नाम और इसके एक कोर्स में ‘दिव्यांगता अध्ययन’ संदर्भ के उपयोग के अलावा, यह स्पष्ट नहीं है कि इस क्षेत्र में उभरते ज्ञान के प्रति यह नया विश्वविद्यालय किस तरह का रुख रखेगा। और, जबकि दस्तावेज़ प्रस्तावित ‘आत्म-निर्भर विश्वविद्यालय’ की समावेशी डिज़ाइन पर जोर देता मालूम होता है, लेकिन यह अधिकतर छात्रों के लिए वित्तीय रूप से बहिष्करण ही साबित होगा।

(लेखिका राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान, (नेपा) नई दिल्ली में रिसर्च स्कॉलर हैं)

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

paternalistic-view-disability-afflicts-university-disability-studies-bill

disability
Rights of Persons with Disabilities Act
2016
University of Disability Studies and Rehabilitative Sciences Bill
2021
Marginality
Disability Services
Rehabilitation
Disability Studies

Related Stories

फरीदाबाद : आवास के मामले में सैकड़ों मजदूर परिवारों को हाईकोर्ट से मिली राहत

क्रिप्टोकरेंसी पर मोदी सरकार का नया बिल निवेशकों को राहत देगा या नुकसान?

खोरी पुनर्वास संकट: कोर्ट ने कहा एक सप्ताह में निगम खोरीवासियों को अस्थायी रूप से घर आवंटित करे

पुनर्वास की मांग को लेकर खोरी गांव के मज़दूर परिवारो ने जंतर-मंतर पर दिया धरना!

पठानकोट: भूमि अधिग्रहण के तरीके की मुखालफ़त में वृद्ध फोन टावर पर चढ़े

बिहार: विकलांगों को लेकर सरकारी नीतियां नाकाफ़ी, पेंशन मामूली और अनियमित

विकलांग केवल सड़क पर चलने के लिए टैक्स दें यह तो बहुत बड़ी नाइंसाफी है!

हाथरस रेप: कैसे राज्य SC-ST पीड़ितों के मुआवज़े व पुनर्वास के अधिकार को लागू करने में नाकामयाब रहा है

‘विकलांगता’ क्या मख़ौल या मज़ाक उड़ाने का विषय है?

गोदावरी बाढ़ पीड़ितों के प्रति आंध्र सरकार की बेरुखी के ख़िलाफ़ वाम पार्टियों का प्रतिरोध


बाकी खबरें

  • प्रेम कुमार
    यूपी विधानसभा चुनाव : लाभार्थी वर्ग पर भारी आहत वर्ग
    08 Mar 2022
    लाभार्थी वर्ग और आहत वर्ग ने यूपी विधानसभा चुनाव को प्रभावित किया है। इसमें कोई संदेह नहीं है। मगर, सवाल यह है कि क्या इन दोनों वर्गों के मतदाताओं ने वोट करते समय जाति, धर्म और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं…
  •  Election commission
    अनिल जैन
    जनादेश-2022:  इस बार कहीं नहीं दिखा चुनाव आयोग, लगा कि सरकार ही करा रही है चुनाव!
    08 Mar 2022
    आमतौर पर चुनाव आयोग की निष्पक्षता कभी संदेह से परे नहीं रही। उस पर पक्षपात के छिट-पुट के आरोप लगते ही रहे हैं। लेकिन पिछले सात-आठ वर्षों से हालत यह हो गई है कि जो भी नया मुख्य चुनाव आयुक्त आता है, वह…
  • dalit
    ओंकार सिंह
    यूपी चुनाव में दलित-पिछड़ों की ‘घर वापसी’, क्या भाजपा को देगी झटका?
    08 Mar 2022
    पिछड़ों के साथ दलितों को भी आश्चर्यजनक ढंग से अपने खेमे में लाने वाली भाजपा, महंगाई के मोर्चे पर उन्हें लंबे समय तक अपने साथ नहीं रख सकती। 
  • EXIT POLL
    न्यूज़क्लिक टीम
    5 राज्यों की जंग: ज़मीनी हक़ीक़त, रिपोर्टर्स का EXIT POLL
    08 Mar 2022
    देश के पांच महत्वपूर्ण राज्यों यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर ने अपना फ़ैसला सुना दिया है। जनादेश ईवीएम में बंद हो चुका है। लेकिन उससे पहले ही एग्ज़िट पोल के बक्से खुल चुके हैं। लेकिन हम न…
  • सोनम कुमारी
    भाजपा ने अपने साम्प्रदायिक एजेंडे के लिए भी किया महिलाओं का इस्तेमाल
    08 Mar 2022
    वर्ष 2019 में जब पूरे देश में CAA कानून का विरोध हो रहा था और मुस्लिम महिलाएँ सड़कों पर नागरिकता पर उठे सवालों का प्रतिरोध कर रही थी,  तब बीजेपी के कई नेताओं ने उन्हें “रेप” की धमकी दी और शाहीन बाग…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License