NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
समाज
भारत
राजनीति
नुसरत जहां का दूसरे धर्म में विवाह और देवबंद का फतवा
विभिन्न समुदायों के लोग सदियों से न केवल भारत में एक साथ रह रहे हैं बल्कि एक-दूसरे के तौर तरीकों को भी अपनाते रहे हैं।
राम पुनियानी
02 Jul 2019
Nusrat
फोटो साभार: New Indian Express

नुसरत जहां नवनिर्वाचित सांसद हैं। उन्होंने हाल ही में निखिल जैन से शादी की है। उनकी शादी और उनके द्वारा लगाए गए सिंदूर और पहने गए चूड़ा व मंगलसूत्र ने लोगों का ध्यान खींचा है। सिंदूर, चूड़ा और मंगलसूत्र हिंदू विवाहित महिलाएं पहनती हैं।

एक मुस्लिम द्वारा इन सभी चीजों के इस्तेमाल ने लोगों को आश्चर्य में डाल दिया है लेकिन वे नहीं जानते कि भारत एक ऐसा देश है जहां विभिन्न संस्कृतियां एक साथ रहती हैं और एक दूसरे को प्रभावित करती हैं। निखिल जैन से उनकी शादी को लेकर नाराज देवबंद मदरसा के एक मौलाना ने इस आधार पर फतवा जारी किया कि कुरान में मुस्लिम महिला को इस्लाम से बाहर शादी करना प्रतिबंधित है। इसके जवाब में साध्वी प्राची ने नुसरत जहां का बचाव करते हुए कहा कि अगर हिंदू लड़की की शादी मुस्लिम लड़के से होती है तो उसे बुर्का पहनना होगा।

इस आलोचना को लेकर नुसरत जहां ने बेहद शालीन तरीके से ट्वीट किया: "मैं एक समावेशी भारत का प्रतिनिधित्व करती हूं जो जाति, पंथ तथा धर्म की सीमा से परे है।" उन्होंने आगे कहा, "मैं मुस्लिम हूं और मैं जो कुछ भी पहनती हूं उस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। आस्था पहनावा से परे है और सभी धर्मों के अमूल्य सिद्धांतों पर विश्वास करने और आस्था रखने से कहीं ज़्यादा है।”

शादी व्यक्तिगत पसंद का मामला है और आप जो कुछ भी पहनते हैं वह भी व्यक्तिगत पसंद की ही बात है। जहां तक मंगलसूत्र, बिंदी, साड़ी आदि पहनने की बात है ते ये ऐसे प्रतीक हैं जो खुशी से भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन गए हैं। जब लोग इसे अपनाते हैं तो उनका स्वागत है लेकिन उन पर थोपने से प्रतिक्रिया होती है और विरोध पैदा होता है। सदियों से हिंदू और मुस्लिम एक साथ रह रहे हैं और एक-दूसरे के तौर-तरीकों को अपना रहे हैं।

आपसी सम्मान भारतीय सामाजिक जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। जबकि विभाजनकारी वर्गों ने अन्य धर्मों के प्रतीकों के इस्तेमाल के प्रति कठोर रवैया पेश किया है, औसत दर्जे के लोग प्रचलित धर्मों की चीजों को अपनाते चले गए हैं। हमारे बीच के रूढ़िवादियों ने इन प्रवृत्तियों को लेकर शोर मचा रखा है, हालांकि खुले दिमाग वाले लोगों ने इन विविधताओं पर खुशी का इजहार करते इनका स्वागत किया है। यह अंतर्विरोध हमारे साहित्य, कला, वास्तुकला और धर्मों की सामाजिक प्रथाओं में सामने आया है। लोग धार्मिक त्योहारों के संयुक्त उत्सव में भी शामिल हैं। इनकी झलक चारों ओर बिखरी हुई है, जवाहरलाल नेहरू के 'भारत की खोज' के कुछ हिस्सों में इसे चित्रित किया गया है। वर्तमान में लेखक सोहेल हाशमी (हिंदुस्तान की कहानी) द्वारा इसके भाव को शामिल किया गया है।

नुसरत जहां के पसंद को लेकर की जा रही प्रतिक्रियाएं परेशान करने वाली हैं। हमें भारत की आत्मा के रूप में देश की विविधता और समरूपता को स्वीकार करने के लिए सीखने की जरूरत है। देवबंद मौलाना के फतवे को समझने की ज़रुरत है। चूंकि फतवा किसी विशेष व्यक्ति की राय होती है; इसमें ईश्वर का आदेश नहीं होता है। हमारे जीवन की दिशा तय करने के लिए हमारे पास भारतीय लोकाचार और भारतीय संविधान मौजूद हैं। देवबंद के इस मौलाना की राय के विपरीत ऐसे कई अन्य इस्लामिक विद्वान हैं जो मुस्लिम महिलाओं का इस्लाम से बाहर शादी करने को स्वीकार करते हैं। आज कई इस्लामिक विद्वान हैं जो अंतरधर्म विवाह और समान सेक्स संपर्क को सही ठहराएंगे। मुख्य बात यह है कि सामाजिक प्रथाएं समय के साथ विकसित होती हैं और समाज की बेशकीमती धोरहर है।

लोगों को पता है कि कुछ फतवों ने तमाशा खड़ा किया है, जैसे कि लेखक सलमान रुश्दी की किताब 'द सैटेनिक वर्सेज' के खिलाफ अयातुल्ला खुमैनी द्वारा फतवा जारी किया गया था। यह एक राजनीतिक खेल था। हालांकि इसके विपरीत मौलानाओं द्वारा कई फतवे जारी किए गए हैं, जो शांतिपूर्ण ढ़ंग से जारी हो जाते हैं, क्योंकि कोई फतवा अपनी प्रकृति में बाध्यकारी नहीं होते है।

साध्वी प्राची जो कह रही हैं वह महज जुमलेबाजी है क्योंकि वे हिंदू धर्म की लड़की और दूसरे धर्म के लड़के के अंतरधार्मिक विवाह की ही आलोचना करती हैं। समाज में लव जिहाद जैसे जुमले उछाले गए। यहां पर मुख्य सिद्धांत यह है कि मुस्लिम लड़के हिंदू लड़कियों को लुभा रहे हैं और उन्हें इस्लाम में परिवर्तित कर रहे हैं। इस मुद्दे पर बहुत कुछ हुआ है; हमने हादिया के मामले को देखा है जहां एक हिंदू लड़की ने इस्लाम अपनाया और एक मुस्लिम लड़के से शादी की। लंबी लड़ाई के बाद वह अपनी पसंद की आजादी को जीतने में सफल रही। दूसरी ओर रिजवान की मौत के बाद प्रियंका तोडी और रिजवान का मामला समाप्त हो गया। इसके विपरीत भी कुछ घटनाएं मौजूद हैं, जहां एक मुस्लिम लड़की के परिवार ने अंकित सक्सेना की हत्या कर दी जिससे वह शादी करना चाहता था। फिल्म तुरुप जिसमें इस विषय को शामिल किया गया है वाकई देखने लायक है।

संप्रदायवाद के उदय के साथ रूढ़िवाद और विभाजन बढ़ गया है। देवबंद के मौलाना को नुसरत जहां गंभीरता से नहीं ले रही हैं। जहां को अपने धर्म के अनुसरण की पूर्ण स्वतंत्रता है। उनके ट्वीट से यहां विकसित हुए प्रमुख सभ्यतामूलक मूल्यों का पता चलता है। यह दुखद है कि पिछले कुछ दशकों ने इन मूल्यों को नजरअंदाज कर दिया है और प्रथाओं के रुप में चयनित हिंदू प्रथाओं को पेश करने का प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्र के एकीकरण में अंतरजातीय तथा अंतरधर्म विवाह का स्वागत किया जाना चाहिए। यहां याद आता है कि बाबासाहेब अम्बेडकर जाति को समाप्त करने की दिशा में अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देना चाहते थें। इसी तरह महात्मा गांधी भी केवल अंतर्जातीय विवाह में शामिल होते थें। वर्तमान समय में एक तरह जहां खाप पंचायतें समान गोत्र विवाहों का विरोध करने के लिए खड़ी होती हैं, वहीं दूसरी तरफ सांप्रदायिक ताकतों द्वारा अंतर्जातीय विवाह का विरोध किया जाता है।

दूसरी तरफ ज़ायरा वसीम जो दंगल में अपनी एक्टिंग के बाद सुर्खियों में आई थी उन्होंने इस एक्टिंग को अपने धर्म के लिए बाधा के रूप में बताते हुए अपनी फ़िल्मी करियर को छोड़ने का फैसला किया है! व्यक्तिगत पसंद तो ठीक है लेकिन हर कोई यह जानता है कि बॉलीवुड और अन्य क्षेत्रीय फिल्मों में बड़ी संख्या में मुस्लिम अभिनेत्रियां हैं।

एक तरफ जहां विभाजनकारी विचारधारा का विस्तार अपनी भारतीयता को बाकी सब से ऊपर दिखाने वाली नुसरत जहां की पसंद का विरोध कर रहा है वहीं दूसरी तरफ वसीम की पसंद को प्रभावित कर रहा है।

बदलते समय के अनुसार धर्मों के नैतिक मूल्यों की प्रधानता और हमारे मानदंडों और प्रथाओं को अपनाने को लेकर चर्चा की ज़रुरत है। भारतीय संस्कृति की मिली जुली, समावेशी रुझानों को बढ़ावा देने और एक ऐसा वातावरण बनाने की जरूरत है जहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा बनी रहे और जहां हम जिससे भी चाहें उससे प्रेम करने के लिए स्वतंत्र रहें और हम जिस पेशे को पसंद करते हैं उसका चयन करने में डर महसूस न करें।

राम पुनियानी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी है।

Nusrat
West Bengal
AITMC
MP
member of parliament
islamophobia and right wing party

Related Stories

इस आग को किसी भी तरह बुझाना ही होगा - क्योंकि, यह सब की बात है दो चार दस की बात नहीं

नज़रिया: कांग्रेस को चाहिए ममता बनर्जी का नेतृत्व, सोनिया गांधी करें पहल

बंगाल चुनाव : क्या चुनावी नतीजे स्पष्ट बहुमत की 44 साल पुरानी परंपरा को तोड़ पाएंगे?

बात बोलेगी: बंगाल के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने को गहरे तक प्रभावित करेगा ये चुनाव

किसान आंदोलन की सफल राजनैतिक परिणति भारतीय लोकतंत्र की ऐतिहासिक ज़रूरत

वामपंथ, मीडिया उदासीनता और उभरता सोशल मीडिया

बीच बहस: आह किसान! वाह किसान!

प्रेम और पसंद के अधिकार पर पाबंदी के ख़िलाफ़ जिहाद बिल कलम

फ़ुटपाथ : ट्रंप, मोदी, आदित्यनाथ और इस्लामोफ़ोबिया

बंगाल : क्या है उस महिला की कहानी, जिसे दुर्गापूजा की थीम बनाया गया है?


बाकी खबरें

  • kisan andolan
    न्यूज़क्लिक टीम
    किसान आंदोलन का एक साल: जश्न के साथ नई चुनौतियों के लिए तैयार
    26 Nov 2021
    दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन को आज एक साल पूरा हो गया। 26 नवंबर 2020 को शुरू हुआ यह आंदोलन आज अहम मोड़ पर है। पहली जीत के तौर पर यह आंदोलन तीनों कृषि क़ानूनों को वापस करा चुका है और अब दूसरी बड़ी…
  • kisan andolan
    न्यूज़क्लिक टीम
    ग्राउंड रिपोर्ट: किसानों ने Mr. PM को पढ़ाया संविधान का पाठ
    26 Nov 2021
    ग्राउंड रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने दिल्ली की सरहद टिकरी बॉर्डर पर बैठीं किसान औरतों और मर्दों के साथ-साथ नेताओं से बात करके यह जानने की कोशिश की कि आखिर मोदी की घोषणा पर उन्हें क्यो नहीं…
  • sex ratio
    अजय कुमार
    1000 मर्दों पर 1020 औरतों से जुड़ी ख़ुशी की ख़बरें सच की पूंछ पकड़कर झूठ का प्रसार करने जैसी हैं!
    26 Nov 2021
    औरतों की संख्या मर्दों से ज़्यादा है - यह बात NFHS से नहीं बल्कि जनगणना से पता चलेगी।
  • up police
    विजय विनीत
    जंगलराज: प्रयागराज के गोहरी गांव में दलित परिवार के चार लोगों की नृशंस हत्या
    26 Nov 2021
    दलित उत्पीड़न में यूपी, देश में अव्वल होता जा रहा है और इस सरकार में दलितों व कमजोरों को न्याय मिलना दूर की कौड़ी हो गया है। यदि प्रयागराज पुलिस ने दलित परिवार की शिकायत पर कार्रवाई की होती और सवर्ण…
  • kisan andolan
    मुकुंद झा
    किसान आंदोलन के एक साल बाद भी नहीं थके किसान, वही ऊर्जा और हौसले बरक़रार 
    26 Nov 2021
    26 नवंबर 2020 को दिल्ली की सीमाओं से शुरू हुए किसान आंदोलन के एक साल पूरे होने पर टिकरी, सिंघू और ग़ाज़ीपुर बॉर्डर हज़ारों की संख्या में किसान पहुंचे और आंदोलन को अन्य मांगों के साथ जारी रखने का अहम…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License