NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
NDTV पर आजीवन बैन की माँग करने वाले सुभाषचंद्रा के ज़ी न्यू़ज़ को अब इमरजेंसी नज़र आ रही है !
यह सत्ता का वही रवैया है जो बार-बार रंग दिखाता है
मीडिया विजिल
05 Jan 2017
NDTV पर आजीवन बैन की माँग करने वाले सुभाषचंद्रा के ज़ी न्यू़ज़ को अब इमरजेंसी नज़र आ रही है !

पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने धूलागढ़ में हुए सांप्रदायिक दंगे की रिपोर्टिंग को लेकर ज़ी न्यूज़ के ख़िलाफ़ जो fIR कराई है, वह कुछ और नहीं पत्रकारिता पर अंकुश लगाने की एक कोशिश ही कही जाएगी। यह सत्ता का वही रवैया है जो बार-बार रंग दिखाता है, फिर चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो….पत्रकारों के पास इससे लड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।

लेकिन……!

क्या वाक़ई मामला इतना सीधा है। क्या ज़ी को सिर्फ़ इसलिए पत्रकारिता के मोर्चे का सिपाही मान लेना चाहिए क्योंकि उसके पास ख़बर दिखाने का लाइसेंस है ?आज ज़ी को पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब समझ में आ रहा है, लेकिन अभी दो महीने भी नहीं हुए जब ज़ी के मालिक और बीजेपी के सांसद सुभाषचंद्रा ने एनडीटीवी पर आजीवन प्रतिबंध की वक़ालत की थी। तब यह चैनल कहाँ खड़ा था ? तब वह एनडीटीवी को उसी तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बता रहा था जैसे कि आज उसे सांप्रदायिक सद्भाव की राह का रोड़ा कहा जा रहा है। 

वैसे ख़ुद ज़ी के संपादक सुधीर चौधरी अपने एक संपादकीय सहयोगी के साथ तिहाड़ जेल की हवा खा चुके हैं और मसला किसी ख़बर दिखाने का नहीं, एक उद्योग समूह से सौ करोड़ से ज़्यादा की उगाही का था। ज़ी की ओर से तब भी इमरजेंसी की दुहाई दी गई थी, जैसे अब दी जा रही है। 

कुछ दिन पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से तीखे सवाल पूछने वाले ज़ी संवाददाता महेंद्र सिंह की नौकरी सुधीर चौधरी ने ले ली थी, तब उन्हें इमरजेंसी का ध्यान नहीं आया? जब जेएनयू को बदनाम करने के लिए फ़र्ज़ी वीडियो गढ़े गए तब भी सुधीर चौधरी को कुछ ग़लत नहीं लगा ! ज़ी के ही एक प्रोड्यूसर विश्वदीपक ने नौकरी से इस्तीफ़़ा देकर बताया था कि न्यूज़रूम का माहौल किस कदर सांप्रदायिक और घुटन भरा है। कैसे जेएनयू को बदनाम करने के लिए ख़बरों का खिलवाड़ किया गया था। 

यह बात कैसे भुलाई जा सकती है कि जेएनयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार  की हाईकोर्ट में पेशी कै दौरान हुई दिल्ली के तमाम पत्रकारों की पिटाई  के ख़़िलाफ़ जब प्रतिवाद जुलूस निकला तो सुधीर चौधरी मज़ाक उड़ा रहे थे। छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड तक में आए दिन होने वाले पत्रकार उत्पीड़न भी उनके लिए मायने नहीं रखते।

सच बात तो यह हैकि ज़ी न्यूज़ आज़ाद पत्रकार समूह की हैसियत अरसा पहले खो चुका है। वह पूरी तरह बीजेपी की नीतियों के साथ ख़ुद को नत्थी कर चुका है। ज़ी के मालिक सुभाषचंद्र के राज्यसभा जाने के साथ यह बात और स्पष्ट हो चुकी है। कौन भूल सकता है कि सुधीर चौधरी ने अपने डीएनए में वैज्ञानिक परीक्षण के साथ यह बताया था कि 2000 रुपये के नए नोट में चिप लगी है। ज़ी न्यू़ज़ आजकल ख़ुद को राष्ट्रवादी पत्रकारिता का अलंबरदार बताता है जिसकी नज़र में दूसरों की देशभक्ति संदिग्ध है। ख़ासतौर पर सेक्युलर लोगों की। 

यह सही है कि धूलागढ़ की घटना पर पश्चिम बंगाल या बाक़ी देश के मीडिया ने तूल नहीं दिया या कहें कि संयम दिखाया। इरादा इस आग को फैलने से रोकना था। बहरहाल ज़ी को यह हक़ था कि वह रिपोर्टिंग करे। लेकिन उसने जो दिखाया वह इसके इरादे के खोट को ज़ाहिर कर रहा था। उसने बताया कि "पश्चिम बंगाल में हिंदुओं का हाल वैसा ही है जैसे कि पाकिस्तान में है" और धूलागढ़ में हिंदुओं पर एकतरफ़ा हमला हुआ और उन्हें अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। हक़ीक़त यह है कि वहाँ हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों ही एक दूसरे पर हमलावर हुए और दोनों ही समुदाय के लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है। 

इसमें संदेह नहीं कि वाममोर्चे के शासन के दौरान पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक झगड़े नहीं होते थे और यह घटना ममता बनर्जी के शासन पर कलंक है, लेकिन ज़ी न्यू़ज़ ने वहाँसच्चाई की पड़ताल नहीं की, बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों की 'ज़रूरत' के मुताबिक़ वीडियो रपटें तैयार कीं।

बहरहाल, ममता बनर्जी सरकार ने अगर मुक़दमा दर्ज कराया है तो उसे अदालत में अपनी बेगुनाही साबित करनी पड़ेगी लेकिन ज़ी को पत्रकारों की ओर से कोई सहयोग मिलेगा, इसमें संदेह है। पत्रकारों और पत्रकारिता की मर्यादा पर अगह ज़ी न्यूज़ खरा नहीं उतरता तो फिर उसे  इनकी दुहाई देने का हक़ भी नहीं है। 

Courtesy: मीडिया विजिल
मीडिया
सोशल मीडिया
बंगाल
जी न्यूज़
ममता बनर्जी

Related Stories

सोशल मीडिया हब या जन निगरानी का एक उपकरण?

भारत एक मौज : भारतीय मीडिया और फ्लाईंग नीमो

आप , भाजपा और भजन मंडली

बंगाल में बढ़ता सांप्रदायिकता का खतरा

आध्यात्मिकता के नाम पर जारी कारोबार और राजनीति का विलय

बंगाल निकाय चुनाव और अलोकतांत्रिक तृणमूल सरकार

चहचहाटों में बदलती अभिव्यक्ति की आज़ादी

विधानसभा चुनाव और भाजपा: मोदी लहर या कुछ और?


बाकी खबरें

  • Banaras
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव : बनारस में कौन हैं मोदी को चुनौती देने वाले महंत?
    28 Feb 2022
    बनारस के संकटमोचन मंदिर के महंत पंडित विश्वम्भर नाथ मिश्र बीएचयू IIT के सीनियर प्रोफेसर और गंगा निर्मलीकरण के सबसे पुराने योद्धा हैं। प्रो. मिश्र उस मंदिर के महंत हैं जिसकी स्थापना खुद तुलसीदास ने…
  • Abhisar sharma
    न्यूज़क्लिक टीम
    दबंग राजा भैया के खिलाफ FIR ! सपा कार्यकर्ताओं के तेवर सख्त !
    28 Feb 2022
    न्यूज़चक्र के आज के एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार Abhisar Sharma Ukraine में फसे '15,000 भारतीय मेडिकल छात्रों को वापस लाने की सियासत में जुटे प्रधानमंत्री' के विषय पर चर्चा कर रहे है। उसके साथ ही वह…
  • रवि शंकर दुबे
    यूपी वोटिंग पैटर्न: ग्रामीण इलाकों में ज़्यादा और शहरों में कम वोटिंग के क्या हैं मायने?
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश में अब तक के वोटिंग प्रतिशत ने राजनीतिक विश्लेषकों को उलझा कर रख दिया है, शहरों में कम तो ग्रामीण इलाकों में अधिक वोटिंग ने पेच फंसा दिया है, जबकि पिछले दो चुनावों का वोटिंग ट्रेंड एक…
  • banaras
    सतीश भारतीय
    यूपी चुनाव: कैसा है बनारस का माहौल?
    28 Feb 2022
    बनारस का रुझान कमल खिलाने की तरफ है या साइकिल की रफ्तार तेज करने की तरफ?
  • एस एन साहू 
    उत्तरप्रदेश में चुनाव पूरब की ओर बढ़ने के साथ भाजपा की मुश्किलें भी बढ़ रही हैं 
    28 Feb 2022
    क्या भाजपा को देर से इस बात का अहसास हो रहा है कि उसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कहीं अधिक पिछड़े वर्ग के समर्थन की जरूरत है, जिन्होंने अपनी जातिगत पहचान का दांव खेला था?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License