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“हम जंगल की संतान हैं”: आदिवासी वकीलों के तौर पर हमारी यात्रा 
2012 में हम बाईस वकीलों और दो कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों के एक दल ने, जो कि सभी आंध्र प्रदेश के विभिन्न जनजातियों से आने वाले आदिवासी थे, ने सीएसडी के क्षमता-निर्माण कार्यक्रम में शिरकत की थी। 
द लीफलेट
12 Aug 2020
आदिवासी वकीलों के तौर पर हमारी यात्रा 
फोटो साभार: काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट, हैदराबाद।

कानून और वकालत का कामकाज खुद में एक परोपकारी पेशा है जोकि न्याय की भावना से ओतप्रोत है। कई वकीलों को अदालतों के समक्ष हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज का प्रतिनिधित्व करने वाले कार्यकर्त्ता के तौर पर जाना जाता है। लेकिन सवाल यह है कि किस प्रकार से हम उन वंचितों को ही इस लायक बना सकें कि वे अपनी आवाज खुद बन सकें? इस लक्ष्य को हासिल करने के उद्देश्य से 2012 में काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट की ओर से आदिवासी समुदाय से आने वाले नवोदित वकीलों के लिए एक क्षमता निर्माण कार्यक्रम को तैयार किया गया था। इसके लेखकों ने अपनी इस यात्रा के बारे में बेहद गर्व और आभार के साथ लिखा है। आज दुनियाभर के आदिवासी लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के मौके पर हम उनके कानून, प्रैक्टिस और न्याय को हासिल करने के अधिकारों की उनकी लड़ाई के प्रति उनके समर्पण भाव का सम्मान करते हैं।

क़ानूनी विशेषज्ञों के तौर पर आज हमने जो मान्यता हासिल की है उस यात्रा की शुरुआत 2012 में काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट, हैदराबाद (सीएसडी) की बहुमूल्य पहल की बदौलत हो सकी थी। 

इससे पूर्व तक हम लोग आदवासी समुदाय से आने वाले साधारण वकील थे जो बिना किसी वरिष्ठ वकील के मार्गदर्शन या उत्साह वर्धन के अपने जिलों की अदालतों में प्रैक्टिस कर रहे थे। हमारे पास आदलती प्रक्रियाओं के बारे में बुनियादी जानकारी का अभाव था और हम इस बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञ थे कि हमारे भविष्य के पेशेवर जीवन में आगे क्या छिपा है।  

अब हममें से कुछ लोग उस टीम का हिस्सा हैं जिसकी ओर से छेबरोलू लीला प्रसाद मामले में सर्वोच्च न्यायालय में समीक्षा याचिका दायर की गई है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी आदेश-3 को निरस्त कर दिया था, जो आश्रम के स्कूलों में सिर्फ अनुसूचित जनजाति के शिक्षकों को इसमें रोजगार पाने के लिए अहर्ता बनाता है। हमने इस फैसले की विस्तृत आलोचना को विकसित करने का काम किया है और इस बारे में उन वकीलों के साथ चर्चा की है जो सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले में पेश होने वाले हैं।

2012 में हम बाईस वकीलों और दो कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों के एक दल ने, जोकि सभी आंध्र प्रदेश के विभिन्न जनजातियों से आने वाले आदिवासी थे, जिन्होंने सीएसडी के क्षमता-निर्माण कार्यक्रम में शिरकत की थी। 2014 में जब हमनें प्रशिक्षण पूरा किया तो हम कुल 15 लोग रह गये थे। सुश्री आभा जोशी और सुश्री सीमा मिश्रा जैसे क़ानूनी विशेषज्ञों ने 2013 और 2014 में हैदराबाद की यात्रा की थी और हमें पढ़ाया था।

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(2012 में सीएसडी के उद्घाटन कार्यक्रम में आदिवासी नेता डॉ. वासवी कीरो के साथ शामिल वकील।)

हमने जिला अदालतों में अपनी क़ानूनी प्रैक्टिस के काम को जारी रखा था और महीने में एक या दो बार सप्ताहांत पर प्रशिक्षण सत्रों में शामिल होने का क्रम बनाये रखा था। हम लगातार अपनी डायरी में नोट तैयार करने के काम को जारी रखे हुए थे, और जब कभी हम इन सत्र के दौरान मुलाकात करते थे तो मामलों पर चर्चा करते थे।

2013 में हमें अपने क़ानूनी ज्ञान को और अधिक विस्तृत करने के लिए एसवीपी नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद में मॉडल पुलिस स्टेशन और फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी का दौरा करने का अवसर प्राप्त हुआ था। यह हमारे लिए बेहद मूल्यवान सबक साबित हुआ क्योंकि यह यह आपराधिक कानून जैसे कि जमानत, एफआईआर, अग्रिम जमानत, गैर-जमानती मामलों और जमानत की याचिका के लिए कैसे तर्क पेश किये जाते हैं इत्यादि से सम्बद्ध होने के कारण इस बारे में गहराई से समझने का मौका मिला।

दिल्ली दौरे के दौरान हमने दिल्ली उच्च न्यायालय और साकेत कोर्ट में मध्यस्तता और सुलह केन्द्रों का दौरा किया। हम दिल्ली उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रोहिणी और उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति गीता मित्तल के आलावा दिल्ली के कई अन्य वरिष्ठ अधिवक्ताओं से इस दौरान मिले। हमें हरियाणा के करनाल जिले के मंगलोर गाँव का दौरा करने का भी मौका मिला जहाँ हमने गाँव में सामुदायिक मध्यस्तता को वहाँ पर समझा था। हम हरियाणा पुलिस अकादमी भी गए और हमने पुलिस प्रशिक्षण के विभिन्न पहलुओं के बारे में वहाँ पर सीखा। हमें वास्तव में इस बात को लेकर बेहद गर्व है कि हम माननीय न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर के साथ संविधान पर चर्चा कर सके।

इस प्रकार के एक्सपोज़र ने हमें संविधान के मूल सिद्धांतों को आत्मसात करने में मदद पहुँचाई। हम संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकारों और मार्गदर्शक सिद्धांतों को समझ सके। सबसे महत्वपूर्ण बात, हम उन तरीकों को समझ सके जिनके माध्यम से हम अधिकारों के हनन की स्थिति में चुनौती दे सकते हैं, जैसे कि किसी अवैध गिरफ्तारी के मामले में।

हर किसी से हमारा परिचय आदिवासी वकीलों के तौर पर कराया गया और हमें लगातार इस बात के लिए प्रेरित किया गया कि हम उनसे विभिन्न मुद्दों पर बहस मुबाहिसे में भाग लें। हमने वकीलों के तौर पर अपने कौशल को विकसित किया और कानून के बारे में अपनी समझ को इस प्रकार से मजबूत किया है कि जिससे कि हमें गर्व होता है कि हम आज कौन हैं।

हम दूर-दराज के गावों से आते हैं। हमने अपनी शिक्षा-दीक्षा पूरी करने के लिए संघर्ष किया है और किसी तरह अपनी कानून की डिग्री को हासिल कर पाए हैं। लेकिन इस सबके बावजूद यहाँ हम सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समक्ष बातचीत कर पा रहे थे- और जिस सम्मानपूर्ण तरीके से वे हमारे साथ पेश आये थे, उसने हमें 'हम कौन हैं', पर गर्व का अहसास कराया था। अगले दिन न्यायमूर्ति लोकुर के साथ हमारी चर्चा आदिवासी अधिकारों की रक्षा करने वाले कानूनों के कार्यान्वयन और 2014 में राज्य पुनर्गठन के कारण आदिवासियों को हुए नुकसान पर केंद्रित थी।

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(माननीय न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर के साथ वकीलों की टोली।)

हम विभिन्न आदवासी समुदायों को पेश आने वाली मुश्किलों को गहराई से समझना चाहते हैं। और इस प्रकार सीएसडी के जरिये हमने 2014 और 2015 में आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना में आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक, स्वास्थ्य और शैक्षणिक स्थिति के बारे में राज्यवार सर्वेक्षण किये।

जो कुछ हमने इस बीच सीखा उसका उपयोग सिर्फ खुद को मजबूत करने के लिए नहीं अपितु हमने इस ज्ञान को अन्य लोगों के बीच में भी बिखेरा है।

2013 में ‘प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित’ करने के एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जहाँ हमने भद्राचलम में स्थित एकीकृत आदिवादी विकास एजेंसी में सहायक-क़ानूनी वालंटियर्स को प्रशिक्षित करने के बारे में सीखा। हमने कानून के कई पहलुओं जिनमें पारिवारिक कानून, अनौपचारिक क्षेत्र में श्रम सम्बंधी सुरक्षा, पीसीपीएनडीटी एक्ट, यौन उत्पीड़न और अपराधिक कानूनों से लेकर कानून के विभिन्न पहलुओं को इसमें छुआ। हमारा पहला प्रशिक्षण कार्यक्रम बेहद सफल रहा। हमें सभी हलकों में बेहद सराहा गया और इसने हमें इस कार्यक्रम को श्रीसैलम आईटीडीए के आदिवासी युवाओं के बीच ले जाने और उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए प्रेरित किया।

जब हम दिल्ली से लौट कर वापस पहुँचे, तो यह हमारे लिए सबसे बेशकीमती अनुभव इन्तजार कर रहा था। भद्राचलम आईटीडीए के तत्कालीन परियोजना अधिकारी ने हमें आईटीडीए ऑफिस में एक क़ानूनी प्रकोष्ठ बनाने की जिम्मेदारी सौंपी और 700 से अधिक आईटीडीए अदालत में लम्बित मामलों के लिए संक्षिप्त विवरण तैयार करने का कार्यभार सौंपा था।

यह जिम्मेदारी हमारे लिए किसी भी उपहार से बढ़कर थी।

हम सभी जंगल के बच्चे हैं- हमें अपने साथ लेकर चलने, अपने अनुभवों को हमारे साथ साझा करने के लिए, और हमारे कौशल को धारदार बनाने के लिए ताकि हम आदिवासी वकीलों के तौर पर अपने मस्तक को शान के साथ ऊँचा रख कर चल सकें, इस सबके लिए हम हमेशा पूरी सीएसडी टीम के प्रयासों को सदैव याद रखेंगे। 

(लेखकगण तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश के विभिन्न जिलों में कार्यरत आदिवासी वकील हैं। इस लेख के संपादन और तेलुगु से अंग्रेजी में अनुवाद का काम कल्पना कन्नाबीरन ने किया है, जिसे हिंदी में आपके समक्ष पेश किया जा रहा है।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

“We are Children of the Forest”: Our journey as Adivasi Lawyers

Adivasi Lawyers
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Supreme Court of India
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