NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
मोदी सरकार को जनता का संदेश: हमें हल्के में न लें
लोगों को कमतर आंके जाने की प्रवृत्ति, उनके भरोसे को भोलेपन की तरह देखना कोई नयी बात नहीं है। हालांकि, भारत के लोगों ने पहले भी तानाशाही पर रोक लगायी है और वे ऐसा फिर कर सकते हैं।
अजय गुदावर्ती
25 Jun 2021
Emergency

1975 का आपातकाल राष्ट्र-राज्य के संकट की सामूहिक स्मृति को ताज़ा कर देता है। हालांकि, उस संकट की प्रकृति ख़ास तरह की है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि लोग एक राष्ट्र के विचार से किस तरह ख़ुद को जोड़ते हैं। आपातकाल और उसके बाद के सिलसिले में जिस बात को खारिज नहीं किया जा सकता, वह बात यह है कि दुष्प्रचार पर "सामान्य बोध" किस तरह असरदार रहा। आज जिस तरह की स्थिति है,उसी से मिलती-जुलती स्थिति उस समय भी थी। आर्थिक विफलतायें, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अस्थिरता और वैधता के मंडराते संकट को छुपाने के लिए राष्ट्र की "एकता और अखंडता" की एक ग़लत धारणा का दुष्प्रचार किया गया था। आपातकाल ने हमारी सामूहिक स्मृति में इस बात को अंकित कर दिया है कि सत्ता का दुरुपयोग किस तरह संकीर्ण निजी और राजनीतिक हितों की रक्षा कर सकता है। नागरिक अधिकारों को बेअसर बना देने की ख़ातिर राष्ट्रवाद के आदर्शों को कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है और सत्ताधारी अभिजात वर्ग की असुरक्षा को दूर करने के लिए किस तरह से ख़तरे की धारणा गढ़ी जा सकती है। ये सभी ऐसे सामूहिक सबक़ हैं,जो राष्ट्र ने उस दौरान सीखे थे।

हालांकि, आपातकाल हमें इस बात की याद भी दिलाता है कि एक अर्ध-साक्षर आबादी का मज़बूत सामान्य बोध शासक अभिजात वर्ग की बेबुनियाद बयानबाज़ी पर किस तरह हावी रहा। विरोध की इच्छा शासन का विरोध करने वालों को डराने-धमकाने और ख़त्म करने की साज़िश पर कहीं भारी पड़ गयी। अतीत को लेकर हमारी यह समझ इस समय इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि हम इससे उस भविष्य को समझने का प्रयास करते हैं, जो हमारा इंतज़ार कर रहा है। सवाल है कि क्या भारत एक और आपातकाल की ओर बढ़ रहा है? क्या यह कुछ ही समय की बात रह गयी है?

मौजूदा शासन के तहत भारत में आपातकाल वाली एक अलग ही तरह के असाधारणता हालात हैं। नेतृत्व की घटती लोकप्रियता के साथ-साथ औपचारिक आपातकाल की धुंधली दिखती संभावना से किसी को संशय हो सकता है। हालांकि, श्रीमती गांधी की तरह ही नौजूदा नेतृत्व और आरएसएस "जनसाधारण" को कमतर करके आंक रहे हैं। वे "लोगों" के सांस्कृतिक लोकाचार और प्रतीकात्मक जीवन जगत को समझते तो हैं, लेकिन वे उन्हीं लोगों को कमतर करके भी आंकते हैं। सीधे-सीधे शब्दों में कहा जाये, तो मोदी-शाह की जोड़ी और आरएसएस को यही लगता है कि विरोध और प्रतिरोध तो भारतीय समाज का महज़ सतही पहलू है। उनका मानना है कि बाक़ी सभी स्तरों पर भारतीयों का झुकाव वफ़ादारी, आस्था और विश्वास के प्रति ज़्यादा है। उन्हें लगता है कि भारतीय समाज तो निरक्षरता और स्थानीय सोच से ग्रस्त है, यह सोच अम्बेडकर की उस टिप्पणी की याद दिलाती है कि भारतीय गांव "स्थानीयता का एक कुंड, अज्ञानता का एक गुफ़ा" हैं। लेकिन,भूलना नहीं चाहिए कि ये वही लोग थे, जिन्होंने 1977 में इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। सवाल है कि कोई इसकी व्याख्या कैसे करे? हां, लोगों के बीच अज्ञानता और तटस्थतावाद तो है, फिर भी लोगों ने लोकतंत्र को बहाल तो किया था, अतार्किकतावाद का विरोध तो किया था और तानाशाही के शुरुआती संकेत पर ही रोक लगा दी थी। सही मायने में भारतीय समाज और लोकतंत्र का यह एक पेचीदा पहलू है।

रोमिला थापर ने अपनी हालिया किताब, ‘वॉयस ऑफ डिसेंट: एन एसे’ में बताया है कि विरोध राष्ट्र के "सामूहिक अवचेतन" का प्रतीक है, जैसा कि अमर्त्य सेन को भी लगता है कि हम तर्कवादी हैं। थापर ने अपनी किताब में असहमति और मतभिन्नता की उस श्रमिक परंपरा को भी चिह्नित किया है, जिसकी जड़ें प्राचीन भारत, बौद्ध धर्म और भक्ति आंदोलन से जुड़ी हुई हैं। वहीं सेन ने वैदिक परंपरा में उस तार्किकता की मौजूदगी को भी चिह्नित किया है, जो हिंदू धर्म की विभिन्न धाराओं के बीच मौजूद थी। इसलिए, एक ऐसा समाज, जो निष्क्रिय, बेहद बंटा हुआ और जाति और लिंग के आधार पर चलने वाला दिखता है, उसके भीतर भी विरोध का स्वर था। बदलाव और निरंतरता "भारतीय शैली" में बहुत कठोरता के साथ आपस में जुड़े हुए हैं। इसे समझाने के कई तरीक़े हैं, लेकिन इस परिकल्पना के मूल में वह तनाव है, जो राजनीतिक और सांस्कृतिक जगत के बीच है, जिसे कमतर करके नहीं देखा जा सकता है। भारतीय दोनों ही जगत के बीच एक स्वस्थ पारस्परिक संदेह को जगह देते हैं और पूरी तरह से न तो  राजनीतिक हैं और न पूरी तरह से सांस्कृतिक हैं।

मौजूदा शासन और सर्वोच्च नेतृत्व उन धार्मिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय प्रतीकवाद से अपनी वैधता हासिल करते हैं, जिसका वे आह्वान करते हैं। यह राष्ट्र के प्रति निष्ठा और धार्मिक संवेदनाओं में विश्वास की ऐसी भावना है, जो उन्हें "लोगों" के विश्वास और सद्भावना उपलब्ध करा देती है। परिभाषा के मुताबिक़ आस्था और विश्वास मूल्यांकन की चीज़े हैं; वे किसी भी तरह से बेबुनियाद नहीं हैं। बीजेपी-आरएसएस की जोड़ी आस्था और निष्ठा पर विचार करते हुए आदतन अक्सर ग़लती कर जाती है, बल्कि यह जोड़ी इन सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की मूल्यांकन सामग्री को देखने में भी नाकाम रहती है। लोग कहते रहते हैं कि "मोदी भगवान की तरह हैं", लेकिन वे हमेशा यह भी कहते हैं कि अगर मोदी विफल रहते हैं, तो वे उन्हें सत्ता से हटा देंगे क्योंकि "वह राष्ट्र और देश के लोगों से ऊपर नहीं है"।

भाजपा और आरएसएस इतिहास को उसकी वफ़ादारी और आस्था के पहले ही पायदान पर रोक देने की कोशिश कर रहे हैं। वे डराने-धमकाने, दुष्प्रचार, विपक्ष को कमज़ोर करने, नयी-नयी चुनावी रणनीतियों, विपक्ष के नेताओं को फांसने, संस्थानों को निष्क्रिय करने, और इसी तरह की दूसरी गतिविधियों के ज़रिये राष्ट्र के मूल्यांकन के पहलुओं को बदल देना चाहते हैं। मोदी को जो लंबी डोर मिली है, वह देश के विश्वास और अपनेपन के गहरे सहारे को दर्शाती है। छुपे हुए धार्मिक प्रतीकवाद से जुड़ी राष्ट्रवाद की एक गहरी सामूहिक स्मृति शक्तिशाली तो साबित हुई है, लेकिन यह लोगों की मूल्यांकन करने की क्षमता की जगह नहीं ले सकती है। श्रीमती गांधी न सिर्फ़ पराजित हुई थीं, बल्कि जनता का प्रयोग जब बेअसरदार रहा,तो वह फिर से चुन ली गयी थीं। इसी तरह, 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद उत्तर प्रदेश का चुनाव भाजपा हार गयी थी।

हम ग़ैर-मामूली स्थिति को सामान्य बना देने की क़वायद के लिए आपातकाल को याद करते हैं, लेकिन हमें इसे सामान्य सामूहिक विचार प्रक्रिया का हिस्सा बनने वाले लोगों की असाधारण क्षमता के लिहाज से भी याद रखना चाहिए। भारत एक अजीब तरह से बंटा हुआ और इसके बावजूद एक खुला हुआ समाज है। इसके लिए एक गहन विश्लेषण की ज़रूरत है, लेकिन संक्षेप में आपातकाल दुष्प्रचार को मात देने वाले सामान्य बोध की क्षमता का भी प्रतीक है।

इतिहास ख़ुद को दोहरा रहा है। हमारे सामने अभूतपूर्व विघटन और कमज़ोर कर दिये जाने के सात साल हैं। 1975 की तरह हमारे पास एक ऐसा कमज़ोर विपक्ष है,जिसके पास कोई वैकल्पिक विचार नहीं है, लेकिन लोग अपने दम पर इस समय भी घटनाओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं। मसलन, लोग यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मौजूदा सरकार महामारी के दौरान होने वाली मौतों को रोकने में आख़िर नाकाम क्यों रही? 'क्या यह मोदी के बिना मुमकिन है या यह उनके अहंकार का नतीजा है?' इसी तरह, लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या अयोध्या में राम मंदिर और अनुच्छेद 370 को निरस्त किया जाना बहुसंख्यक धर्म के प्रति शासन की सच्ची प्रतिबद्धता को दिखाता है या सिर्फ़ बयानबाज़ी है और ध्यान भटकाने की चाल है? भले ही ये सवाल महज़ शब्दों का जाल लगते हों, लेकिन लोग अब पूछने लगे हैं कि क्या हम इन "उपलब्धियों" से ख़ुश हैं या उनके बिना भी ज़िंदा रह सकते हैं?

आपातकाल और उसकी नाकामी ने एक नयी परिकल्पना को वजूद में लाने में मदद की है। आज जिस तरह की लामबंदी हो रही है, उसमें भी गहन चिंतन की संभावना छुपी हुई है। लोगों ने आपातकाल को खारिज कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद श्रीमती गांधी फिर से निर्वाचित हुई थीं। इस तरह, लोग अपने सामने के मुश्किल विकल्पों से "हल निकालने" में सक्षम हैं और ऐसी कोई वजह नहीं कि वे एक बार फिर वैसा नहीं कर सकते।

(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय  में राजनीतिक अध्ययन केंद्र में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। इनके विचार निजी हैं।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Emergency
Emergency in India 1975
Narendra modi
Modi regime
authoritarianism

Related Stories

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..

ख़बरों के आगे-पीछे: राष्ट्रीय पार्टी के दर्ज़े के पास पहुँची आप पार्टी से लेकर मोदी की ‘भगवा टोपी’ तक

कश्मीर फाइल्स: आपके आंसू सेलेक्टिव हैं संघी महाराज, कभी बहते हैं, और अक्सर नहीं बहते

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल मॉडल ऑफ़ गवर्नेंस से लेकर पंजाब के नए राजनीतिक युग तक

उत्तर प्रदेशः हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं जनमत के अपहरण को!


बाकी खबरें

  • ganguli and kohli
    लेस्ली ज़ेवियर
    कोहली बनाम गांगुली: दक्षिण अफ्रीका के जोख़िम भरे दौरे के पहले बीसीसीआई के लिए अनुकूल भटकाव
    19 Dec 2021
    दक्षिण अफ्रीका जाने के ठीक पहले सौरव गांगुली बनाम विराट कोहली की टसल हमारी टीवी पर तैर रही है। यह टसल जितनी वास्तविक है, यह इस तथ्य पर पर्दा डालने के लिए भी मुफ़ीद है कि भारतीय टीम ऐसे देश का दौरा कर…
  • modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    चुनावी चक्रम: लाइट-कैमरा-एक्शन और पूजा शुरू
    19 Dec 2021
    सरकार जी उतनी गंभीरता, उतना दिमाग सरकार चलाने में नहीं लगाते हैं जितना पूजा-पाठ करने में लगाते हैं। यह पूजा-पाठ चुनाव से पहले तो और भी अधिक बढ़ जाता है। बिल्कुल ठीक उसी तरह, जिस तरह से किसी ऐसे छात्र…
  • teni
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे : जयपुर में मौका चूके राहुल, टेनी को कब तक बचाएगी भाजपा और अन्य ख़बरें
    19 Dec 2021
    सवाल है कि अजय मिश्र को कैसे बचाया जाएगा? क्या एसआईटी की रिपोर्ट के बाद भी उनका इस्तीफा नहीं होगा और उन पर मुकदमा नहीं चलेगा?
  • amit shah
    अजय कुमार
    अमित शाह का एक और जुमला: पिछले 7 सालों में नहीं हुआ कोई भ्रष्टाचार!
    19 Dec 2021
    यह भ्रष्टाचार ही भारत के नसों में इतनी गहराई से समा चुका है जिसकी वजह से देश का गृह मंत्री मीडिया के सामने खुल्लम-खुल्ला कह सकता है कि पिछले 7 सालों में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ।
  • A Critique of Capitalism’s Obscene Wealth
    रिचर्ड डी. वोल्फ़
    पूंजीवाद की अश्लील-अमीरी : एक आलोचना
    19 Dec 2021
    पूंजीवादी दुनिया में लगभग हर जगह ग़ैर-अमीर ही सबसे ज़्यादा कर चुकाते हैं और अश्लील-अमीरों की कर चोरी के कारण सार्वजनिक सेवाओं में होने वाली कटौतियों की मार बर्दाश्त करते रहते हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License