NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
ख़बरों के आगे-पीछे : संसद का मखौल, बृजभूमि का ध्रुवीकरण और अन्य
'ख़बरों के आगे-पीछे' के इस अंश में बीते हफ़्ते ख़बरों की दुनिया में क्या कुछ हुआ, इस पर राय रख रहे हैं अनिल जैन।
अनिल जैन
26 Dec 2021
ख़बरों के आगे-पीछे : संसद का मखौल, बृजभूमि का ध्रुवीकरण और अन्य

संसद की परवाह प्रधानमंत्री को ही नहीं तो सांसद भी क्यों करें? 

महात्मा गांधी से जुड़ा यह किस्सा बहुत प्रचलित है कि एक महिला ने उनसे अपने छोटे बच्चे की मीठा खाने की आदत छुड़ाने का अनुरोध किया तो गांधी जी ने उस महिला को एक हफ्ते बाद बुलाया और तब बच्चे को समझाया कि ज्यादा मीठा नहीं खाना चाहिए। जब उनसे पूछा गया कि यह बात तो वे एक हफ्ते पहले भी कह सकते तो उन्होंने कहा कि एक हफ्ते पहले वे खुद भी काफी मीठा खाते थे, इसलिए किसी और से मीठा छोड़ने को कैसे कहते? कहने का मतलब है कि किसी को उपदेश देने से पहले आपको अपना आचरण उसके अनुरूप करना होता है। संभवत: यही कारण है कि प्रधानमंत्री का उपदेश काम नहीं आ रहा है। वे पिछले सात साल से अपनी पार्टी के सांसदों को उपदेश दे रहे हैं कि संसद की कार्यवाही के दौरान उनको मौजूद रहना चाहिए। इसके बावजूद उनके सांसद नदारद रहते हैं तो इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि प्रधानमंत्री खुद संसद की कार्यवाही मे हिस्सा नहीं लेते हैं। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान कांग्रेस के सांसदों ने इसका ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया कि तीन हफ्ते में प्रधानमंत्री सत्र के पहले दिन यानी 29 नवंबर को सत्र की कार्यवाही में शामिल हुए थे। उसके बाद से एक भी दिन कार्यवाही में शामिल नहीं हुए। इस दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश में कई जनसभाएं, उद्घाटन और शिलान्यास किए। उन्होंने उत्तराखंड और गोवा में भी जनसभा की। यानी चुनावी राज्यों का दौरा करते रहे। इसलिए उनकी पार्टी के सांसद भी सदन से नदारद रहे। प्रश्न पूछ कर भी सांसद सदन से गैरहाजिर रहे तो कई बार मंत्रियो ने भी सदन में मौजूद रहने की जरूरत नहीं समझी। प्रधानमंत्री ने इस सत्र के दौरान पार्टी के संसदीय दल की बैठक में सांसदो को चेतावनी भी दी कि वे खुद को बदले नही तो बदल दिए जाएंगे, तब भी सांसदों ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

संसद की मंजूरी के बगैर ही बेचे जाएंगे बैंक! 

सरकारी बैंकों के कर्मचारियो ने दो दिन की राष्ट्रव्यापी हड़ताल की लेकिन सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है। सरकार अच्छी तरह जानती है कि किसानों की तरह आंदोलन कर उसे झुकाने की हैसियत इन कर्मचारियों की नहीं है और इनमें से ज्यादातर कर्मचारी मध्यवर्गीय सोच के तहत अंतत: भाजपा को ही वोट देंगे। इसीलिए सरकार इससे बेपरवाह होकर बैंकों के निजीकरण के अभियान में आगे बढ़ रही है। जानकार सूत्रों के मुताबिक सरकार एक विधेयक पर विचार कर रही है, जिसमें यह प्रावधान किया जा रहा है कि सरकार बैंकों का प्रबंधन अपने हाथ में रखते हुए अपनी हिस्सेदारी कम करे। इस आशय का एक विधेयक संसद में लाया जा सकता है। इसमें यह प्रावधान भी हो सकता है कि बैंकों में भागीदारी कम करने यानी उसमें सरकारी हिस्सेदारी बेचने के लिए हर बार संसद में जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी। एक बार यह विधेयक पारित हो जाएगा तो सरकार खुद ही बैंकों में हिस्सेदारी की मात्रा तय कर सकेगी। गौरतलब है कि इस समय कुल 12 सरकारी बैंक हैं, जिनमें से चार के निजीकरण की तैयारी है। इन चार के अलावा आठ बैंकों में सरकारी की हिस्सेदारी 51 फीसदी से लेकर 90 फीसदी तक है। सूत्रों के मुताबिक सरकार जो नया विधेयक लाने की तैयारी कर रही है, उसके कानून बन जाने के बाद बैंकों में 51 फीसदी से कम हिस्सेदारी होने के बावजूद प्रबंधन सरकार के हाथ में ही रहेगा। 

इस बार ब्रजभूमि से होगा ध्रुवीकरण का प्रयास

उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर, कैराना और सहारनपुर को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण माध्यम बनाया था। इस बार इसके लिए उसने ब्रजभूमि यानी मथुरा को चुना है। उसका हर छोटा-बडा नेता मथुरा में भव्य कृष्ण मंदिर की बात कर रहा है। ऊपर से विपक्षी नेता भी जाने-अनजाने उसके इस जाल में फंस रहे हैं। राष्ट्रीय लोकदल के नेता जयंत चौधरी जयंत चौधरी ने कहा है कि वे मथुरा से सांसद रहे हैं और अगर किसी ने मथुरा का माहौल बिगाड़ने की कोशिश की तो वे उसका जवाब देंगे। मथुरा में कृष्ण मंदिर के निर्माण की बात को माहौल बिगाड़ने की कोशिश बताना जयंत चौधरी और अखिलेश यादव के लिए भारी पड़ सकता है। भाजपा भी चाहती है कि रालोद और सपा के नेता मथुरा में मंदिर निर्माण के मामले में ऐसे ही बयान दें। फिलहाल अयोध्या की तर्ज पर मथुरा के मंदिर को लेकर कोई आंदोलन नहीं चल रहा है। अभी भाजपा के नेता सिर्फ बयानबाजी कर रहे है। ऐसे में अगर रालोद और सपा के नेताओं ने उनके बयान पर प्रतिक्रिया देनी शुरू की तो उससे भाजपा को इसे बड़ा मुद्दा बनाने में मदद मिलेगी। गौरतलब है कि पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मथुरा मे कृष्ण जन्मभूमि मंदिर के 20 किलोमीटर के दायरे को धर्म क्षेत्र घोषित करते हुए वहां मांस की बिक्री पर रोक लगा दी। उसके बाद उन्होंने एक कार्यक्रम मे कहा कि अगर मथुरा में कारसेवा होती है तो कृष्ण भक्तों पर गोली नहीं चलाई जाएगी, बल्कि पुष्प वर्षा होगी। उसके बाद उनके उप मुख्यमंत्री ने अयोध्या हमारी है, मथुरा-काशी की बारी है का नारा दिया। पिछले दिनों भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश और ब्रज क्षेत्र का प्रभारी अमित शाह को बनाया है। 

महापुरुष भी अपने-अपने परिवारों के हुए!

देश ने 16 दिसंबर को बांग्लादेश मुक्ति संग्राम यानी 1971 मे हुई भारत-पाकिस्तान युद्ध की स्वर्ण जयंती मनाई। इस मौके पर कई सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रम हुए। राष्ट्रपति रामनाथ कोंविद खुद इसके कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बांग्लादेश के दौरे पर गए। देश के चार हिस्सों से विजय मशाल यात्रा निकाली गई, जो दिल्ली पहुंची तो एक बड़े समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसकी आगवानी की। इंडिया गेट पर स्वर्णिम विजय दिवस का बड़ा कार्यक्रम हुआ। लेकिन इस पूरे कार्यक्रम में वे तीन लोग याद नहीं किए गए, जिन्होंने युद्ध की रूप-रेखा तैयार करने से लेकर युद्ध जीतने तक की रणनीति बनाई थी। लेफ्टिनेट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा की तो फोटो कई जगह दिखाई दी क्योंकि उनके सामने ही पाकिस्तानी फौज के जनरल नियाजी और 96 हजार पाकिस्तानी फौजियों ने समर्पण किया था। इंदिरा गांधी, बाबू जगजीवन राम और फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ को यह सौभाग्य भी प्राप्त नहीं हुआ। इनको इनके परिवारों ने ही याद किया। इंदिरा गांधी उस समय देश की प्रधानमंत्री थी और इस लड़ाई के बाद ही उनको आयरन लेडी की उपाधि मिली थी। बाबू जगजीवन राम तब देश के रक्षा मंत्री थे और युद्ध के दौरान भी सीमा पर जाकर उन्होंने जवानों का हौंसला बढ़ाया था और सैम मानेकशॉ भारतीय सेना के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ थे। स्वर्णिम विजय दिवस के मौके पर इंदिरा गांधी को उनके पोते राहुल गांधी और पोती प्रियंका गांधी वाड्रा ने याद किया। तो बाबू जगजीवन राम को उनकी बेटी मीरा कुमार ने। मीरा कुमार ने एक वीडियो शेयर किया, जिसमें जगजीवन राम ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि भारत की रणनीति थी कि युद्ध होगा तो हम अपनी सीमा में नहीं लड़ेंगे, बल्कि दुश्मन की सीमा में घुस कर लड़ेंगे और तब तक लड़ेंगे, जब तक दुश्मन की फौज समर्पण नहीं करती। सरकार ने याद नहीं किया तो इंदिरा गांधी और जगजीवन राम को उनके परिवार और पार्टी ने याद कर लिया। सैम बहादुर की तो किसी को याद भी नहीं आई।

महाराष्ट्र में चल रहा है लीपापोती का खेल

महाराष्ट्र में सौ करोड़ रुपए हर महीने वसूली के मामले को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ था, अब लग रहा है कि उस पर लीपापोती शुरू हो गई है। कई महीनो तक गायब रहने के बाद मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर परमबीर सिंह अचानक प्रकट हुए और मुंबई पुलिस की अपराधा शाखा से लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) तक सबसे सामने पूछताछ के लिए हाजिर हुए। वे जिस अंदाज मे फरार बताए जा रहे थे उससे लग रहा था कि सामने आते ही उनकी गिरफ्तारी हो जाएगी। पर उलटा हो रहा है। एक-एक करके उनके खिलाफ जारी सारे वारंट रद्द किए जा रहे हैं और गिरफ्तारी की संभावना लगभग खत्म हो गई है। दूसरी ओर परमबीर सिंह ने जिस पुलिस अधिकारी सचिन वझे के हवाले से कहा था कि उसको अनिल देशमुख ने हर महीने बार और रेस्तरां से सौ करोड़ रुपए की वसूली करने का टारगेट दिया था, वह अधिकारी जांच में इस बात से मुकर गया है। सचिन वझे ने इस मामले की जांच कर रहे जस्टिस केयू चांदीवाला आयोग के सामने कहा है कि उसने एक रुपए की वसूली नहीं की है। उसने यह भी कहा कि एक रुपया भी उसने न तो अनिल देशमुख और न उनके निजी सहायक को दिया है। इस प्रकार एक तरफ आरोप लगाने वाले को राहत मिल गई, दूसरी ओर जिसके हवाले से आरोप लगाया गया था वह आरोपो से मुकर गया तो अब आगे क्या होगा? इसी तरह लीपापोती चलती रही तो पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख भी जल्दी ही जेल से छूट जाएंगे।

फिर चुनाव के बीच पेश होगा बजट 

संसद का अगला बजट सत्र परंपरा के नई मुताबिक 29 जनवरी को शुरू होगा और इसका पहला चरण फरवरी में दूसरे-तीसरे हफ्ते तक चलेगा। इस दौरान पांच राज्यों- उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा के चुनाव हो रहे होंगे। पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा जनवरी के पहले हफ्ते में होने की संभावना है और चुनाव मार्च के पहले हफ्ते तक चलेगा। इसका मतलब है कि जिस समय संसद का बजट सत्र शुरू होगा, उस दौरान मतदान नहीं हुआ होगा लेकिन प्रचार चरम पर होगा। सोचने वाली बात है कि ऐसे समय में बजट का चुनाव पर क्या असर हो सकता है? सरकार बजट मे बड़ी बड़ी घोषणाएं करेगी, लोगों को मुफ्त में कई चीजें देने की घोषणा हो सकती है और प्रत्यक्ष कर में भी बदलाव हो सकता है। इसके बावजूद इसको चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नही माना जाएगा। गौरतलब है कि इन पांच राज्यों के पिछले विधानसभा चुनाव के समय भी यह मुद्दा उठा था। पिछले चुनाव की घोषणा चार जनवरी को हुई थी और पहले चरण का मतदान चार फरवरी को हुआ था। उससे तीन दिन पहले एक फरवरी को आम बजट पेश हुआ था। कई पार्टियों ने बजट से पहले इसका विरोध किया था और चुनाव आयोग में शिकायत भी की थी मतदान की तारीखों से ठीक पहले बजट से चुनाव प्रभावित होगा। हालांकि इस पर कोई सुनवाई नही हुई थी और सब कुछ तय कार्यक्रम के हिसाब से हुआ था। इस बार फिर चुनाव के बीच बजट सत्र होगा। बजट तो नहीं टलेगा लेकिन इसकी पूरी संभावना है कि चुनाव प्रचार के लिए सत्र छोटा कर दिया जाए और आधा सत्र टाल दिया जाए। 

टैक्स चोरी में अन्य लोगों से पूछताछ क्यों नहीं?

दुनिया भर के खोजी पत्रकारों के समूह ने दुनिया भर के टैक्स चोरों के स्वर्ग पनामा की एक कंपनी के लीक हुए दस्तावेजों के आधार पर पनामा पेपर्स तैयार किया है, जिसमें भारत के भी करीब पांच सौ लोगों के नाम शामिल हैं। इन लोगों ने टैक्स चोरी या किसी अन्य मकसद से दुनिया के उन देशों में कंपनियां बनाईं या खाते खोले, जो टैक्स चोरी के लिए कुख्यात रहे है। खोजी पत्रकारों की ओर से की गई जांच-पड़ताल में अनिल अंबानी का भी नाम आया है, जिनका करीब 10 हजार करोड़ रुपया टैक्स हैवन देशों में जमा था। यह उस समय की बात है, जब अनिल अंबानी ने दुनिया को बताया था कि उनकी कंपनी दिवालिया हो गई है और उनके पास कोई नकदी नहीं है। उस समय उनके 10 हजार करोड़ रुपए नकद जमा थे। क्या टैक्स चोरी की जांच कर रही एजेसियां अनिल अंबानी की जांच करेगी? प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की ओर से उनको और उनके परिवार के लोगो को समन भेजा जाएगा? ध्यान रहे पनामा पेपर्स के खुलासे के कारण पाकिस्तान में सरकार गिर गई थी और नवाज शरीफ को जेल जाना पड़ा था। लेकिन भारत में अभी कुछ नहीं हुआ है। ईडी के अधिकारी अमिताभ बच्चन के परिवार से पूछताछ कर रहे हैं। अभिषेक बच्चन और उनकी पत्नी ऐश्वर्या राय की पेशी ईडी के सामने हो चुकी है और कहा जा रहा है कि अमिताभ बच्चन को भी पेश होना होगा। सचमुच की जांच के कारण ऐसा हुआ है या समाजवादी पार्टी की ओर से जया बच्चन की सक्रियता इसका कारण है? इस सवाल का जवाब तभी मिलेगा, जब यह पता चलेगा कि एजेसियां बाकी लोगों को बुलाती है या नहीं और बुलाती है तो उसका क्या नतीजा सामने आता है।

khabron ke aage peechhe
Parliament
mathura
PM MODI

Related Stories

कानपुर हिंसा: दोषियों पर गैंगस्टर के तहत मुकदमे का आदेश... नूपुर शर्मा पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं!

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही मस्जिद ईदगाह प्रकरण में दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल

धर्म के नाम पर काशी-मथुरा का शुद्ध सियासी-प्रपंच और कानून का कोण

सिख इतिहास की जटिलताओं को नज़रअंदाज़ करता प्रधानमंत्री का भाषण 

श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मामले में फ़ैसला सुरक्षित

100 राजनयिकों की अपील: "खामोशी से बात नहीं बनेगी मोदी जी!"

प्रधानमंत्री जी... पक्का ये भाषण राजनीतिक नहीं था?

17वीं लोकसभा की दो सालों की उपलब्धियां: एक भ्रामक दस्तावेज़

संसद में तीनों दिल्ली नगर निगम के एकीकरण का प्रस्ताव, AAP ने कहा- भाजपा को हार का डर


बाकी खबरें

  • farmers
    चमन लाल
    पंजाब में राजनीतिक दलदल में जाने से पहले किसानों को सावधानी बरतनी चाहिए
    10 Jan 2022
    तथ्य यह है कि मौजूदा चुनावी तंत्र, कृषि क़ानून आंदोलन में तमाम दुख-दर्दों के बाद किसानों को जो ताक़त हासिल हुई है, उसे सोख लेगा। संयुक्त समाज मोर्चा को अगर चुनावी राजनीति में जाना ही है, तो उसे विशेष…
  • Dalit Panther
    अमेय तिरोदकर
    दलित पैंथर के 50 साल: भारत का पहला आक्रामक दलित युवा आंदोलन
    10 Jan 2022
    दलित पैंथर महाराष्ट्र में दलितों पर हो रहे अत्याचारों की एक स्वाभाविक और आक्रामक प्रतिक्रिया थी। इसने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया था और भारत की दलित राजनीति पर भी इसका निर्विवाद प्रभाव…
  • Muslim Dharm Sansad
    रवि शंकर दुबे
    हिन्दू धर्म संसद बनाम मुस्लिम धर्म संसद : नफ़रत के ख़िलाफ़ एकता का संदेश
    10 Jan 2022
    पिछले कुछ वक्त से धर्म संसदों का दौर चल रहा है, पहले हरिद्वार और छत्तीसगढ़ में और अब बरेली के इस्लामिया मैदान में... इन धर्म संसदों का आखिर मकसद क्या है?, क्या ये आने वाले चुनावों की तैयारी है, या…
  • bjp punjab
    डॉ. राजू पाण्डेय
    ‘सुरक्षा संकट’: चुनावों से पहले फिर एक बार…
    10 Jan 2022
    अपने ही देश की जनता को षड्यंत्रकारी शत्रु के रूप में देखने की प्रवृत्ति अलोकप्रिय तानाशाहों का सहज गुण होती है किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री का नहीं।
  • up vidhan sabha
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: कई मायनों में अलग है यह विधानसभा चुनाव, नतीजे तय करेंगे हमारे लोकतंत्र का भविष्य
    10 Jan 2022
    माना जा रहा है कि इन चुनावों के नतीजे राष्ट्रीय स्तर पर नए political alignments को trigger करेंगे। यह चुनाव इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि यह देश-दुनिया का पहला चुनाव है जो महामारी के साये में डिजिटल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License