NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
पुलवामा हमला और नए कश्मीरी आतंकवाद का उदय
शांति और सैन्य कार्रवाई एक साथ नहीं हो सकता है। ठोस बातचीत के जरिए ही इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है जो कश्मीरी सहित सभी लोगों के हित में है। यही लोकतांत्रिक तरीक़ा भी है।
बशारत शमीम
22 Feb 2019
kashmiri
image courtesy- zubair sofi

श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर पुलवामा लेथापोरा में सीआरपीएफ के काफिले आदिल डार नाम के आतंकवादी द्वारा किए गए आत्मघाती हमले में सीआरपीएफ के 40 से ज़्यादा जवान शहीद हो गए और कई घायल हो गए। इस घटना के बाद ये बात सामने आई है कि आज-कल कश्मीर में आतंकवादियों की नई पीढ़ी उभर कर सामने आई है जो अपने समूह के पहले के आतंकवादियों की तुलना में ज्यादा कट्टरपंथी और अपने प्रतिबद्धता में अधिक दृढ़ है।

सबसे ज़्यादा चिंता की बात यह है कि उनके हिंसक होने के चलते हमने साल 2014 के बाद लेथापोरा या अन्य घटनाओं को देखा। कई मायनों में लेथापोरा इस चरम हिंसक आवेश की सबसे बड़ी घटना थी। इस तरह का आतंकवाद कई क़ीमती ज़िंदगियों को लील रहा है, चाहे वह आम लोग हों, सुरक्षाकर्मी हों या खुद युवा कश्मीरी आतंकवादी। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। यह घटना लगातार बढ़ रहा है। लेथापोरा हमले के बाद से कई घटनाएं हुईं। आतंकवाद के प्रति कश्मीरी युवाओं के झुकाव को लेकर गंभीर समीक्षा को निरंतर नकारा गया?

जब इसे लिखा जा रहा था तो ठीक उसी वक़्त पुलवामा ज़िले में एक अन्य मुठभेड़ चल रहा था जिसमें सैनिकों, नागरिकों और आतंकवादियों के मारे जाने की ख़बर आई। सरकार ने बताया कि कश्मीर में पिछले दो वर्षों में आतंकवादियों की संख्या में कमी आई लेकिन सच्चाई यह है कि दक्षिण कश्मीर के साथ कश्मीर घाटी में सक्रिय आतंकवादियों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है जो तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

लेथपोरा हमला निस्संदेह उन सभी में सबसे ज़्यादा दिल दहलाने वाला था लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि साल 2015 के बाद से आतंकवादी अक्सर सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस पर लगातार हमला करते रहे हैं। आतंकवादियों के अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले लोगों की संख्या अक्सर ज़्यादा होती है। इन आतंकवादियों को भारी जन समर्थन और सहानुभूति मिलती है; वास्तव में ऐसा उनके साथ 1989 से हो रहा था लेकिन अब कश्मीरी युवाओं की नई पीढ़ी इसमें खुल्लमखुल्ला है। वे मुठभेड़ स्थलों के पास बार-बार पथराव करते हैं ताकि आतंकवादी बच जाएं। ज़्यादातर मामलों में यह सुरक्षाकर्मियों का ध्यान भटकाने में सफल साबित होता है।

बीजेपी सरकार की उदासीनता और उपेक्षा

सही सोच वाले लोग कश्मीरियों के भारत के प्रति गहरे अविश्वास और अलगाव के उद्गार को लेकर चिंतित हैं जो अक्सर सड़कों पर और मुठभेड़ स्थलों, जनाजे के जुलूसों और जुमे की नमाज़ या यहां तक कि सोशल मीडिया पर विरोध के रुप में सामने आते हैं। ये लगातार बढ़ रहा है। हालांकि किसी को गलतफहमी नहीं होना चाहिए कि बड़ी संख्या में लोग मुठभेड़ स्थलों और आतंकवादियों के जनाजों में शामिल हो रहे हैं क्योंकि हिंसा का मार्ग जो आतंकवादी अपनाते हैं उसको लोगों का सीधा समर्थन है। उनका मानना है कि यही वो स्थान है जिसे लोग अब अपनी दबी आवाज को व्यक्त करने के लिए तलाश रहे हैं। कश्मीर के मामलों में हिंदू राष्ट्रवाद के अपने एजेंडे को जोड़ कर बीजेपी की अगुवाई वाली वर्तमान सरकार के शासन में ये उदासीनता और उपेक्षा अपने नई ऊंचाई तक पहुंच गया है।

ऐसा लगता है कि राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था ने इस निराशाजनक प्रवृत्ति को स्वीकार नहीं किया है। अगर ऐसा किया गया होता तो लेथापोरा हमले से पहले ही इस समस्या का ईमानदारी से आकलन और परिणामी सुधारात्मक उपाय हो जाता। लेकिन इस आतंकवाद को ख़ारिज करना और उस पर रोक लगाना जो पूरी तरह से अपनी नीति में स्थानीय है क्योंकि पूरी तरह से पड़ोसी देश की खुफिया एजेंसी की करतूत होना निश्चित रूप से उचित और विवेकपूर्ण मूल्यांकन नहीं है।

कुछ प्रश्न जिन्हें सभी को उठाना चाहिए वे हैं: यह अलगाव कहां से उत्पन्न है? और युवाओं में अलगाव और हताशा की गहरी जड़ें खत्म करने के लिए क्या करें?

दक्षिण कश्मीर के आंतरिक इलाकों के विभिन्न जगहों में युवाओं के साथ बातचीत करते समय किसी को भी यह समझ में आ सकता है कि युवाओं को भारत के प्रति घृणा से कैसे भरा जाता है कि वे दूसरों को दर्द देने या खुद सहने को लेकर परवाह नहीं करते हैं। दिल से वे भी हत्याओं और हिंसा को लेकर खुश नहीं होते हैं जैसा कि बताया जा रहा है लेकिन उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया जाता है जैसे कि वे अपने जीवन को संरचित कर रहे है, आकार दे रहे है और प्रभावित कर रहे है।

सरकार का दमन और जवाबी प्रतिक्रिया

जब सरकार हिंसक कार्रवाई को मंजूरी देकर खुद को परिभाषित करती है तो एक जवाबी परिभाषा होती है जो कई बार जैसे कश्मीर घाटी के मामले में चीजों को अन्य चरमसीमा पर ले जाती है। हालांकि यह सच है कि साल 2006 और 2014 के बीच कश्मीर में आतंकवाद में लगातार कमी आई थी। एक अन्य चीज जिसकी लगातार अनदेखी हुई वह सरकार की सबसे ज़्यादा सख्ती है जो बाद के वर्षों के दौरान तेज़ हो गई है। इन वर्षों में निस्संदेह कुछ युवा आतंकवादी संगठनों में शामिल हो रहे थें लेकिन 2008 की शुरुआत में भारी दमन हुआ। लोकतांत्रिक स्थानों पर अवरोध का अनूठा तरीका देखा गया। साल 2008, 2009 और 2010 के नागरिक आंदोलन के दौरान सेनाओं द्वारा लगातार अधिकारों का उल्लंघन, 2009 में शोपियां में दो महिलाओं के साथ क्रूर बलात्कार और हत्या, कानून-व्यवस्था की समस्याओं से निपटने में पुलिस की विफलता और अक्षमता के परिणामस्वरूप अत्याचार और अपमान जिसका सामना हर रोज़ कश्मीरी करते हैं।

साल 2016 में इसकी पुनरावृ्त्ति हुई। सड़कों पर विरोध प्रदर्शन के दौरान 100 से अधिक युवाओं की मौत हो गई और सैकड़ों लोगों ने पेलेट गन की गोलियों से अपने आंख की रौशनी गंवा दी। पिछले कुछ वर्षों में मुठभेड़ स्थलों के पास विरोध प्रदर्शन के दौरान 100 से अधिक युवा मारे गए हैं। कई अन्य को सख्त कानूनों के तहत कैद किया गया है या गैरकानूनी हिरासत केंद्रों में यातना दी गई और पूछताछ की गई। साधारण युवा रहा बुरहान वाणी कई मायनों में कश्मीरी युवाओं के लिए प्रतीक बन गया।

यदि रिपोर्टों पर विश्वास किया जाए तो आदिल डार भी सरकारी बलों द्वारा क्रूरता से पेश आने से पहले कभी एक साधारण युवा था (उसके माता पिता के अनुसार उसका धर्म में कोई वास्तविक रुचि नहीं था और वह भारतीय क्रिकेट टीम के कट्टर प्रशंसक था)। इसी चीज ने उसे आतंकवाद में धकेल दिया और वह आत्मघाती हमलावर बनकर अपनी ज़िंदगी को ख़त्म कर लिया। निश्चित रूप से किसी भी तरह से उसके कृत्य को माफ नहीं किया जा सकता है लेकिन यह सिर्फ एक उदाहरण है कि वर्तमान में कश्मीर में हालात कैसे हो रहे हैं। यह भी तात्पर्य है कि संघर्ष धार्मिक कट्टरवाद द्वारा निर्धारित नहीं होते है जैसा कि लोग आरोप लगाते हैं। दूसरे शब्दों में धार्मिक कट्टरवाद केवल एक प्रभाव है यह एक प्राथमिक कारण नहीं है, और प्राथमिक कारण अभी भी राजनीतिक दमन है जो एक खाई का निर्माण करता है जिसे अतिवादी लोगों द्वारा शोषण किया जाता है।

युद्ध और हिंसा की राग अलापने के बजाय वक्त की ज़रुरत है कि कश्मीर के ज़रुरी राजनीतिक सवाल का तत्काल निवारण हो क्योंकि कश्मीरियों और इस क्षेत्र के अन्य लोगों की गरिमा और सुरक्षा इस पर निर्भर है। जब तक यह पूरी तरह से हल नहीं हो जाता तब तक कश्मीर में शांति और स्थिरता बहाल होना एक सपना होगा। नकारने के बजाए इसे हर किसी को महसूस करने की आवश्यकता है। इस मुद्दे के व्यापक निवारण की आवश्यकता है।

इस समस्या का समाधान आतंकवादियों को स्वभाव से बेअसर करने के माध्यम से नहीं हो सकता है। आखिरकार उन्हें कुछ राजनीतिक आकांक्षाओं के लिए आश्वस्त किया जाता है और राजनीतिक आकांक्षाओं को गोलियों और मोर्टार के गोलों से कैसे मारा जा सकता है? जैसा कि मेरा विश्वास है हिंसा और सभी प्रकार की हत्याओं के दुष्चक्र पर विराम लगाने के लिए कश्मीरियों के साथ उनकी बात सुनकर और गरिमापूर्ण समाधान के लिए काम करना पहले से कहीं अधिक अनिवार्य हो गया है। यह सभी के हित में है और इससे ज़्यादा कश्मीरियों के हित में है कि गंभीर बातचीत के माध्यम से इस संघर्ष के समाधान की ओर बढ़ना है जो एकमात्र लोकतांत्रिक तरीका है। इसके अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

लेखक कश्मीर के कुलगाम में एक्टिविस्ट के तौर पर सक्रिय है। लेखक के विचार व्यक्तिगत हैं।

Kashmir crises(3181)
pulwama attack
India
kashmi
pakisatn
islamic radicalaism
Islamic Fundamentalism

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भारत में तंबाकू से जुड़ी बीमारियों से हर साल 1.3 मिलियन लोगों की मौत

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आईपीईएफ़ पर दूसरे देशों को साथ लाना कठिन कार्य होगा

UN में भारत: देश में 30 करोड़ लोग आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर, सरकार उनके अधिकारों की रक्षा को प्रतिबद्ध

वर्ष 2030 तक हार्ट अटैक से सबसे ज़्यादा मौत भारत में होगी

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

वित्त मंत्री जी आप बिल्कुल गलत हैं! महंगाई की मार ग़रीबों पर पड़ती है, अमीरों पर नहीं

रूस की नए बाज़ारों की तलाश, भारत और चीन को दे सकती  है सबसे अधिक लाभ

प्रेस फ्रीडम सूचकांक में भारत 150वे स्थान पर क्यों पहुंचा

‘जलवायु परिवर्तन’ के चलते दुनियाभर में बढ़ रही प्रचंड गर्मी, भारत में भी बढ़ेगा तापमान


बाकी खबरें

  • Western media
    नतालिया मार्क्वेस
    यूक्रेन को लेकर पश्चिमी मीडिया के कवरेज में दिखते नस्लवाद, पाखंड और झूठ के रंग
    05 Mar 2022
    क्या दो परमाणु शक्तियों के बीच युद्ध का ढोल पीटकर अंग्रेज़ी भाषा के समाचार घराने बड़े पैमाने पर युद्ध-विरोधी जनमत को बदल सकते हैं ?
  •  Mirzapur
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी: चुनावी एजेंडे से क्यों गायब हैं मिर्ज़ापुर के पारंपरिक बांस उत्पाद निर्माता
    05 Mar 2022
    बेनवंशी धाकर समुदाय सभी विकास सूचकांकों में सबसे नीचे आते हैं, यहाँ तक कि अनुसूचित जातियों के बीच में भी वे सबसे पिछड़े और उपेक्षित हैं।
  • Ukraine return
    राजेंद्र शर्मा
    बैठे ठाले:  मौत के मुंह से निकल तो गए लेकिन 'मोदी भगवान' की जय ना बोलकर एंटिनेशनल काम कर गए
    05 Mar 2022
    खैर! मोदी जी ने अपनी जय नहीं बोलने वालों को भी माफ कर दिया, यह मोदी जी का बड़प्पन है। पर मोदी जी का दिल बड़ा होने का मतलब यह थोड़े ही है कि इन बच्चों का छोटा दिल दिखाना ठीक हो जाएगा। वैसे भी बच्चे-…
  • Banaras
    विजय विनीत
    बनारस का रण: मोदी का ग्रैंड मेगा शो बनाम अखिलेश की विजय यात्रा, भीड़ के मामले में किसने मारी बाज़ी?
    05 Mar 2022
    काशी की आबो-हवा में दंगल की रंगत है, जो बनारसियों को खूब भाता है। यहां जब कभी मेला-ठेला और रेला लगता है तो यह शहर डौल बांधने लगाता है। चार मार्च को कुछ ऐसा ही मिज़ाज दिखा बनारस का। यह समझ पाना…
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में क़रीब 6 हज़ार नए मामले, 289 मरीज़ों की मौत
    05 Mar 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 5,921 नए मामले सामने आए हैं। देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 29 लाख 57 हज़ार 477 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License