NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
राष्ट्रीय पार्टी और प्रादेशिक नीतियां
किसी राष्ट्रीय पार्टी की एक पहचान, पूरे देश में एक सी नीतियों की पक्षधरता भी होती है।
वीरेन्द्र जैन
04 Apr 2017
राष्ट्रीय पार्टी और प्रादेशिक नीतियां
किसी राष्ट्रीय पार्टी की एक पहचान, पूरे देश में एक सी नीतियों की पक्षधरता भी होती है। उसका यही गुण उसे क्षेत्रीय पार्टियों से अलग करता है। हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन से पैदा हुयी भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी इसी कारण से राष्ट्रीय बनी क्योंकि उसने स्वतंत्रता के बाद भी लम्बे समय तक स्वतंत्रता आन्दोलन वाले मूल्य बना कर रखे जो पूरे देश में निर्विवादित थे। सोनिया गाँधी के नेतृत्व के सवाल पर काँग्रेस से टूट कर ही एनसीपी को कई राज्यों में विभाजित हिस्सों का समर्थन मिलने के कारण राष्ट्रीय होने का दर्जा मिल गया। काँग्रेस के बाद राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा कम्युनिष्ट पार्टी को मिलता है जो अपने सिद्धांतों व आन्दोलनों में बिना जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, लिंग का भेद किये मेहनतकश वर्ग की पक्षधरता के मूल्यों पर गठित है और इस पक्षधरता में वह देश की सीमाएं को भी बाधा न मान कर दुनिया के मजदूरों को एक करने की बात करती है। सरकारी कर्मचारियों, सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों, विभिन्न भूमि सुधार आन्दोलनों से जुड़े होने के कारण इस पार्टी का चरित्र राष्ट्रीय रहा, जो दो चुनावी दलों में विभाजित होने के बाद भी जारी रहा। भले ही संसदीय चुनाव में जीती उनकी सीटों की संख्या कम रही हो किंतु उनके सदस्य और जनसंगठन कश्मीर से केरल और त्रिपुरा से राजस्थान तक एक ही एजेंडे पर काम करते हुए देखे जाते हैं। बहुजन समाज पार्टी एक आन्दोलन से शुरू हुयी थी। इसका बीज सरकारी नौकरियों में आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की सुनिश्चित उपस्थिति से पड़ा। पहले से प्रशासन पर अधिकार जमाये सवर्णों द्वारा इस वर्ग के अधिकारों को सहन करने में विलम्ब हुआ। उनके साथ किये गये उपेक्षापूर्ण व्यवहार ने उन्हें एकजुट कर दिया, जिसने क्रमशः आगे चल कर एक राजनीतिक दल का रूप लिया किंतु सत्ता में उलझ जाने व हल्दी की गांठ पाकर पंसारी बन जाने की जल्दी ने उसे एक राज्य व एक जाति तक सीमित कर दिया। अब वे केवल तकनीकी रूप से राष्ट्रीय दल हैं। यदि वे आन्दोलन को पुनर्गठित करके पार्टी में लोकतंत्र स्थापित कर सकें तो वे फिरे से खड़े हो सकते हैं।   
 
इन सब के विपरीत भाजपा ऐसी पार्टी है जो राष्ट्रीय दल की मान्यता होते हुए भी ऐसी नीतियां रखती है जो राज्यवार बदलती रहती हैं। यह पार्टी एक अस्पष्ट सा राष्ट्रवाद, अव्याख्यायित हिन्दुत्व, के नाम पर हिडेन एजेंडा रख कर सत्ता के लिए किसी भी तरह के सिद्धांतहीन समझौते करने, चुनावी कूटनीतियां गढने के लिए सदैव ही तत्पर रहने वाले दल की तरह पहचानी जाती है। इस दल का उदय और विकास दूसरे संगठनों से  आयतित नेताओं और संविद सरकारों के भग्नावेषों को जोड़ने से बना है। संसद में कमजोर पड़ने पर उन्होंने एक अस्पष्ट इतिहास की घटना से उत्तेजना पैदा कर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को आधार बनाया। यही कारण रहा कि उनका विकास उन हिन्दीभाषी राज्यों में प्रमुख रूप से हुआ जहाँ राम की पूजा होती है। संकीर्णता से लाभान्वित होने की उनकी प्रवृत्ति ने कभी हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान के नारे का समर्थन किया था, जिस कारण उन्हें दक्षिण तक पहुँचने में समय लगा। उनकी ताज़ा सफलता इस बात में है कि उसके चमत्कारी नेता ने वर्षों से वंचित रहे अपने अनुयायिओं को सत्ता सुख दिला कर इतना आज्ञाकारी और भयभीत बना लिया है कि कहीं से भी कोई असहमति का स्वर सुनाई नहीं देता जबकि इन्हीं नेताओं में पहले अनुशासन की ऐसी वृत्ति देखने को नहीं मिलती थी। यह प्रवृत्ति भले ही नेताओं के हित में हो किंतु लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है।
 
विधानसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत से विजयी होने के बाद भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चयन में भाजपा नेतृत्व को लम्बा समय लगा। ये चुनाव मुद्दा विहीन चुनाव थे व भाजपा द्वारा किसी को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित किये बिना लड़े गये थे। स्पष्ट कार्यक्रम के अभाव में कोई नेतृत्व स्वाभाविक रूप से उभर कर सामने नहीं आया व इस दौरान लगातार कई तरह के कयास लगाये जाते रहे। कौन् नहीं जानता कि सत्तारूढ काँग्रेस का विरोध, भ्रष्टाचार के मामले में मोदी की बेदाग छवि, उग्र हिन्दुत्व का प्रदर्शन, कार्पोरेट सहयोग, कुशल चुनाव प्रबन्धन, दलबदल को भरपूर प्रोत्साहन, और अवसरवादी चुनावी समझौतों के सहारे भाजपा लोकसभा चुनाव जीती थी। किंतु यह जीत भी उसे देश की पश्चिम मध्य क्षेत्र की पार्टी से अखिल भारतीय पार्टी नहीं बना सकी थी। उत्तर-पूर्व के सात राज्यों में इसकी उपस्थिति नाममात्र की थी, बंगाल, त्रिपुरा, उड़ीसा, तामिलनाडु, केरल, कर्नाटक, व महाराष्ट्र के बड़े हिस्से में वे सफल नहीं हुये। कश्मीर में उन्होंने सत्ता के लालच में बहुत गैरसैद्धांतिक समझौता किया। बाद में असम में काँग्रेसी नेता से दलबदल करा कर वे वहाँ सरकार बना सके। यही हाल नागालेंड और मणिपुर ही नहीं गोआ और उत्तराखण्ड में भी अपनाया। उनके नेतृत्व का दबदबा इससे प्रकट हुआ कि वे सभी जगह वे केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा तय किये गये नाम पर मुहर लगवाने में सफल रहे।
 
उत्तर प्रदेश में नये मुख्यमंत्री द्वारा बिना मंत्रिमण्डल की बैठक बुलाये पुरानी व्यवस्था के अनुरूप बने नियमों की ओट में नये थानेदार जैसा आतंक का प्रयास शुरू कर दिया गया है। चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया गया था कि पहले दिन ही किसानों का सारा कर्ज माफ कर दिया जायेगा, जिसे बाद में धीरे से लघु और सीमांत किसानों तक सीमित कर दिया। यह फैसला अभी तक लागू नहीं किया जा सका है क्योंकि उनके गठबन्धन के सदस्य शिवसेना ने सवाल उठा दिया है कि किसानों की कर्ज़माफी केवल उत्तर प्रदेश तक ही क्यों, जबकि कर्ज़ से परेशान किसानों की आत्महत्या की खबरें तो महाराष्ट्र से अधिक आ रही हैं? दूसरी ओर बैंकों ने भी कर्ज़माफी से होने वाले नुकसान पर इशारा किया है। प्रश्न बहुत सही भी है, क्योंकि ऐसी घोषणाएं बिना सोचे समझे सतही जुमलेबाजियों का परिणाम होती हैं, जो यह नहीं देखतीं कि दूसरे क्षेत्रों पर इनका क्या प्रभाव पड़ेगा। इसी बीच देश के कृषि मंत्री बोल गये कि ऋण माफी का खर्च केन्द्र सरकार देगी, पर वित्त मंत्री ने कहा कि यह खर्च राज्य ही देगा
 
शपथ ग्रहण के ही दिन सारे बूचड़खाने बन्द करने की चुनावी गर्जना करने वाले पहले दिन केवल तीन बूचड़खानों पर ताला लगा सके जो पहले से ही बन्द थे। जिस गौहत्या की उत्तेजना के सहारे उन्होंने दूसरे राज्यों के चुनाव प्रभावित किये वहीं उनके द्वारा शासित गोआ और उत्तरपूर्व आदि राज्यों में प्रतिबन्धित तक नहीं है। यदि अवैध बूचड़खानों की बन्दी जरूरी थी तो राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात आदि के लिए भी उतनी ही जरूरी क्यों नहीं थी? वीआईपी संस्कृति का निषेध लालबत्ती की बन्दी मध्यप्रदेश में भी उतनी ही जरूरी है जहाँ भाजपा की ही सरकार है और सत्ता के दुरुपयोग की गाथाएं मीडिया घरानों का मुँह बन्द करके ही प्रकट नहीं होने दी जातीं।
जब भाजपा जेडीयू के साथ बिहार में भागीदार थी तब उन्होंने विधायक निधि समाप्त करने का महत्वपूर्ण फैसला लिया था जिसमें भाजपा की सहमति थी, किंतु इसे उन्होंने दूसरे राज्यों में लागू करने की कोशिश भी नहीं की। पंजाब में उन्होंने आतंकवादियों को सम्मानित करने वाले अकालियों का साथ दिया व राजोआना की फांसी रोकने में अकालियों के साथ खड़े रहे। इससे आतंक के खिलाफ उनके दोहरेपन के उदाहरण मिलते हैं। महाराष्ट्र के लिए इनके मानदण्ड दूसरे हैं तो गुजरात के लिए दूसरे। मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के अलग मानदण्ड हैं, तो वरिष्ठता के लिए एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में चुनावी सम्भावनाओं के अनुरूप नियम बदलते रहते हैं।
 
क्या चुनाव आयोग नीतियों के आधार पर राष्ट्रीय दल की मान्यता देने के कुछ नियम बना सकता है जिसमें संविधान के उद्देश्यों और नीति निर्देशक तत्वों को ध्यान में रखा जा सके।
भाजपा
कांग्रेस
आदित्यनाथ
वाम पार्टियाँ
चुनाव आयोग

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

एमपी गज़ब है!

ईवीएम को लेकर डीयू और चुनाव आयोग दोनों सवालों के घेरे में

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

देश की सबसे बड़ी पार्टी क्यों नहीं चाहती चुनावी खर्च की सीमा तय हो ?

दलितों और महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार के खिलाफ 2 अगस्त को वामदलों का ‘बिहार’ बंद

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

एमरजेंसी काल: लामबंदी की जगह हथियार डाल दिये आरएसएस ने


बाकी खबरें

  • UP
    सतीश भारतीय, परंजॉय गुहा ठाकुरता, शेखर
    विश्लेषण: विपक्षी दलों के वोटों में बिखराव से उत्तर प्रदेश में जीती भाजपा
    29 Mar 2022
    आज ज़रूरत इस बात की है कि जिन राज्यों में भी भाजपा को जीत हासिल हो रही है, उन राज्यों के चुनाव परिणामों का विश्लेषण बारीकी से किया जाए और यह समझा जाए कि अगर विपक्ष एकजुट रहा होता तो क्या परिणाम…
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ भारत बंद का दिखा दम !
    29 Mar 2022
    न्यूज़चक्र के इस एपिसोड में अभिसार शर्मा बात कर रहे हैं दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल की। उन्होंने नज़र डाला है दिल्ली-एनसीआर और देश में हड़ताल के व्यापक असर पर।
  • sanjay singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    विपक्ष के मोर्चे से भाजपा को फायदा: संजय सिंह
    29 Mar 2022
    इस ख़ास अंक में नीलू व्यास ने बात की आप के सांसद संजय सिंह से और जानना चाहा Aam Aadmi Party के आगे की योजनाओं के बारे में। साथ ही उन्होंने बात की BJP और देश की राजनीति पर.
  • Labour Code
    न्यूज़क्लिक टीम
    देशव्यापी हड़ताल : दिल्ली एनसीआर के औद्योगिक क्षेत्रों में दिखा हड़ताल का असर
    28 Mar 2022
    केंद्रीय मज़दूर संगठनों ने सरकार की कामगार, किसान और जन विरोधी नीतियों के विरोध में 28 और 29 मार्च दो दिन की देशव्यापी हड़ताल की शुरआत आज तड़के सुबह से ही कर दी है । हमने दिल्ली एनसीआर के साहिबाद…
  • skm
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्यों मिला मजदूरों की हड़ताल को संयुक्त किसान मोर्चा का समर्थन
    28 Mar 2022
    मज़दूरों की आम हड़ताल को किसानों का समर्थन मिला है. न्यूज़क्लिक से बातचीत में ऑल इंडिया किसान सभा के अध्यक्ष अशोक धवले ने कहा कि सरकार मजदूरों के साथ साथ किसानों के साथ वादाखिलाफी कर रही है. खाद, बीज…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License