NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
रहिमन चुप हो बैठिये.
राकेश कायस्थ, सौजन्य: सबरंग
16 Feb 2016

अगर परम पुनीत राष्ट्रवादी धारा रामजदगी और हरामजदगी के ढलानो से उतरती हुई देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में जा घुसी और उसे वेश्यालय में बदल दिया तो कौन सी आफत आ टूट पड़ी? धाराओ का काम बहना है और अपने साथ बहा ले जाना है। धाराएं पहले भी बहती रही हैं, बहाती और डुबाती रही हैं।

पहले तो कभी किसी ने शोर नहीं किया तो फिर आज इतना शोर क्यों है, भाई? सवालों के जवाब नहीं हैं, क्योंकि सवालों के जवाब अक्सर नहीं होते। सवालों के बदले सिर्फ सवाल होते हैं। सवालो पर सवाल दागे जा रहे हैं।



शोर के बदले उससे भी ज्यादा शोर उठ रहा है। हांव-हांव कांव-कांव, हाहाकार, फुंफकार, चीत्कार, विलाप और अट्टाहास। सुबह से लेकर रात तक यह सब करते-करते राष्ट्र का दम फूलने लगता है। थका-हारा देश फेसबुक पर गुड नाइट का मैसेज टाइप करके सो जाता है। सुबह किसी और ब्रेकिंग न्यूज़ के साथ आंख खुलती है । देश फिर से अलग-अलग टोलियों में बंट जाता है। सुबह शुरू हुई भुन-भुन शाम तक हुंवा-हुंवा में बदल जाती है। कुछ सुनाई नहीं देता, कुछ समझ नहीं आता।

ऐसे में अगर राष्ट्रवादी धारा फाटक तोड़कर कैंपस में जा घुसी और वहां विश्वविद्यालय की जगह वेश्यालय और ज्ञान की जगह आतंक छप गया तो छप गया, मैं अपना वक्त क्यों बर्बाद करूं?  धाराओं के बारे में मैं वैसे भी कुछ नहीं बोलता, क्योंकि धाराएं सब पवित्र होती हैं। कहते हैं, कर्मनाशा धारा रावण के मूत्र विसर्जन से बनी है,लेकिन लोग डुबकी तो वहां भी लगाते हैं। अपनी-अपनी श्रद्धा, अपना-अपना विश्वास, कोई भला क्या कहे! सच बताउं तो आजकल मैं किसी भी चीज़ के बारे में कुछ भी नहीं बोलता।

एक वक्त था जब देश के सवाल मूंगफली की तरह हुआ करते थे। एक-एक करके चटकाते रहो. जुगाली करते रहो, टाइम पास हो जाता था। अब तो टाइम पास भी नहीं होता। एंटी सोशल मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक उठने वाले तरह-तरह के शोर बहरा बना देते हैं।

हज़ारों खोपड़ियों में जो स्वदेशी गोबर गैस प्लांट प्रत्यारोपित हैं, उनसे प्रदीप्त ज्ञान चक्षुओं की सामूहिक चमक लगभग अंधा कर देती है।

जब कुछ देख, सुन और समझ ही नहीं सकते तो खाली-पीली बोलने का क्या फायदा? बोलने वालों की कमी इस देश में कभी नहीं रही। फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले सुनने वाले भी हुआ करते थे। अब सिर्फ बोलने वाले हैं, सुनने वाला कोई नहीं।

पब्लिक इंटलेक्चुअल स्पेस में जो मुट्ठीभर लोग हुआ करते थे, सोशल मीडिया ने उन्हे पान की दुकान पर खड़े रिटायर्ड बाबुओं के झुंड में तब्दील कर दिया है। पान चबाते बाबू लोग सऊदी अरब और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से लेकर दो पड़ोसी भाइयो के मनमुटाव तक हर समस्या पर समान रूप से चिंतित रहते हैं। आसपास से गुजरते लौंडे-लपाड़े उनकी इस चिंता को उन्ही के मुंह पर धुएं में उड़ा देते हैं।

सोशल मीडिया के बौद्धिक बाबुओ का हाल पान की दुकान वाले बाबुओ से भी गया बीता है। जिस इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को वो जनविरोधी मानते हैं, उसी उड़ाई ख़बरों पर सुबह से लेकर शाम तक बौराये फिरते हैं।

अपने निकृष्टतम रूप में होने के बावजूद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आज भी लोक संवाद का एजेंडा तय करता है। मामूली से मामूली ख़बर भी टीवी चैनलों पर किसी सस्पेंस थ्रिलर की तरह पल-पल रंग बदलती है। इन ख़बरों के पीछे-पीछे सुबह से शाम तक भागता बौद्धिक समुदाय अक्सर झांसे का शिकार बनता है। कोण दर कोण मोड़ दर मोड़ अपनी टिप्पणियां दर्ज कराता शाम तक थक कर चूर हो जाता है।

टीवी पर ख़बरों की मियाद एक या दो दिन होती है। फिर नई ख़बर आती है और उसी हिसाब से सार्वजनिक विमर्श के मुद्धे बदल जाते हैं। मुद्धे कहां से आते हैं, इन्हे कौन लाता है और कहां और क्यों गुम हो जाते हैं, यह मौजूदा दौर के लोकचिंतन का विषय नहीं है।

असाधारण रूप से कूढ़मगज  शासन तंत्र, बेईमान प्रतिपक्ष, कम मेहनत में काम चलाने वाला अपनी निजी पहचना के संकट से गुजरता बौद्धिक समुदाय और टीआरपी, सर्कुलेशन और हिट्स के लिए सगे बाप को भी बेच खाने वाला कॉरपोरेट मीडिया। उम्मीद कौन करे कहां, कहां करे और किससे करे! देश के सवालों पर बात करना अब कायदे का टाइम पास भी नहीं रहा।

बच्चो के साथ पार्क में क्रिकेट खेलना, लांग ड्राइव पर गाने सुनना, एनिमल प्लानेट पर तरह-तरह जानवर देखना और यहां तक कि सनी लियोनी को नेट पर सर्च करना तक भी देश की आबोहवा पर बात करने से ज्यादा रचनातात्मक काम हैं। इतने सारे अच्छे कामो के होते हुए अपना दिमाग कौन खराब करे।

देवालयों की जगह शौचालय बनने थे। लेकिन अब विश्वविद्यालय की जगह वेश्यालय बन रहे हैं, बने मेरी बला से। 

सौजन्य: सबरंग

जेएनयू
भाजपा
आरएसएस
एबीवीपी
संघ
कन्हैया कुमार

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

बढ़ते हुए वैश्विक संप्रदायवाद का मुकाबला ज़रुरी

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा भी बोगस निकला, आप फिर उल्लू बने

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

एमरजेंसी काल: लामबंदी की जगह हथियार डाल दिये आरएसएस ने

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप


बाकी खबरें

  • जितेन्द्र कुमार
    मुद्दा: बिखरती हुई सामाजिक न्याय की राजनीति
    11 Apr 2022
    कई टिप्पणीकारों के अनुसार राजनीति का यह ऐसा दौर है जिसमें राष्ट्रवाद, आर्थिकी और देश-समाज की बदहाली पर राज करेगा। लेकिन विभिन्न तरह की टिप्पणियों के बीच इतना तो तय है कि वर्तमान दौर की राजनीति ने…
  • एम.ओबैद
    नक्शे का पेचः भागलपुर कैंसर अस्पताल का सपना अब भी अधूरा, दूर जाने को मजबूर 13 ज़िलों के लोग
    11 Apr 2022
    बिहार के भागलपुर समेत पूर्वी बिहार और कोसी-सीमांचल के 13 ज़िलों के लोग आज भी कैंसर के इलाज के लिए मुज़फ़्फ़रपुर और प्रदेश की राजधानी पटना या देश की राजधानी दिल्ली समेत अन्य बड़े शहरों का चक्कर काट…
  • रवि शंकर दुबे
    दुर्भाग्य! रामनवमी और रमज़ान भी सियासत की ज़द में आ गए
    11 Apr 2022
    रामनवमी और रमज़ान जैसे पर्व को बदनाम करने के लिए अराजक तत्व अपनी पूरी ताक़त झोंक रहे हैं, सियासत के शह में पल रहे कुछ लोग गंगा-जमुनी तहज़ीब को पूरी तरह से ध्वस्त करने में लगे हैं।
  • सुबोध वर्मा
    अमृत काल: बेरोज़गारी और कम भत्ते से परेशान जनता
    11 Apr 2022
    सीएमआईए के मुताबिक़, श्रम भागीदारी में तेज़ गिरावट आई है, बेरोज़गारी दर भी 7 फ़ीसदी या इससे ज़्यादा ही बनी हुई है। साथ ही 2020-21 में औसत वार्षिक आय भी एक लाख सत्तर हजार रुपये के बेहद निचले स्तर पर…
  • JNU
    न्यूज़क्लिक टीम
    JNU: मांस परोसने को लेकर बवाल, ABVP कठघरे में !
    11 Apr 2022
    जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दो साल बाद फिर हिंसा देखने को मिली जब कथित तौर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से संबद्ध छात्रों ने राम नवमी के अवसर कैम्पस में मांसाहार परोसे जाने का विरोध किया. जब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License