NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
रहने को घर नहीं हिंदोस्तां हमारा!
सपना है, ज़रूरत है, ज़रूरतमंद हैं, योजना है, सरकार है, विज्ञापन है, दलाल हैं, प्रोपर्टी डीलिंग और रियल इस्टेट का पूरा कारोबार है। लेकिन घर नहीं है।
राज कुमार
25 Apr 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy : DocumentaryMaker

हम जिस देश में रहते हैं जरूरी नहीं है कि वहां हमारा घर भी हो। भारत में ऐसे लाखों लोग हैं जो किराये पर, झोपड़पट्टी में, सड़कों पर, नालों के किनारे, पुल के नीचे, तिरपाल के नीचे और खुले आसमान के नीचे भी रहते हैं। यानी हम ऐसे देश में रहते हैं जिस देश में हमारा घर नहीं है।

हां, घर का सपना अभी भी है। युवा लोग अभी भी लव स्टोरी फिल्म के गीत, "फूलों के शहर में हो घर अपना" वाला सपना देखते हैं। घर की आस में अधेड़ हो चुके गृहस्थ ज्यादा रियलिस्टिक होकर, घर के बारे में नहीं बल्कि 50 या 100 गज के प्लाट के बारे में सोचते हैं। दो दिवाने शहर में आशियाना ढूंढते हुए अपने आस-पास ही देखे जा सकते हैं। जरूरी नहीं है कि ये दो दिवाने कपल ही हों। अच्छी बात ये है कि सपने अभी भी हैं। लेकिन यथार्थ ज्यादा कठोर हो गया है।

ये सपने कभी होम लोन के विज्ञापनों के साथ तो कभी आवास योजना के फार्मों के साथ उलझते हैं। मुक्तिबोध के हवाले से "अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया" वाली मिडिल क्लास 2बीएचके और 3बीएचके के सपने देखती है। वो लोग भी इसी देश के नागरिक हैं जिनके सिर पर न छत है और न ही घर का सपना बचा है। फुटपाथ ही उनका राष्ट्र है। घर बेशक न हो लेकिन राष्ट्र है।

सपना है, ज़रूरत है, ज़रूरतमंद हैं, योजना है, सरकार है, विज्ञापन है, दलाल हैं, प्रोपर्टी डीलिंग और रियल इस्टेट का पूरा कारोबार है। लेकिन घर नहीं है। यूं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र भी हैं और 2019 का चुनाव भी है लेकिन घर नहीं है। घोषणा-पत्र भी है, रैली भी है, भाषण भी है। लेकिन घर नहीं है। घर चुनाव का कोई मुद्दा भी नहीं है।

घोषणा हो चुकी है बल्कि कहना चाहिये कि आकाशवाणी हुई है कि पिछले 4 साल में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 1 करोड़ से ज्यादा घर बनाये गये हैं। प्रधानमंत्री ने खुद भी ट्वीट करके ये जानकारी दी है। जो जानकारी देनी है वो दे दी गई है। बहुत सी नहीं दी गई है। मसलन ये नहीं बताया गया कि कितने घर अधूरे पड़े हैं, कितने सिर्फ़ कागजों में बने हैं, ऐसे घर कितने हैं जो योजना के अंतर्गत स्वीकृत हुए लेकिन किस्त नहीं आई लोगों ने कर्ज लेकर घर बनाये।

जो जानकारी देनी है वो दे दी है बहुत सी जानकारी नहीं दी गई है। मसलन ये नहीं बताया है कि कितने घर तोड़े गये हैं, कितनी झोपड़-पट्टियों पर बुलडोज़र चला है। खुले आसमान के नीचे होने की वजह से शीतलहर और लू की चपेट में आकर कितने लोग मरे हैं।

ह्यूमन राइट ला नेटवर्क की एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले वर्ष 2017 में 53 हजार 700 घर तोड़े गये हैं, यानी 147 घर हर रोज तोड़े गये हैं। आंकड़ा बताता है कि हर घंटे लगभग 30 लोगों को जबरन अपने घर से बेदखल किया गया है। जिसकी वजह से लगभग 2 लाग 60 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। तथाकथित विकास प्रोजक्टों के चलते लगभग 6 लाख लोगों पर बेदखली की तलवार लटक रही है। नेटवर्क ने रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि आने वाले समय में ये आंकड़ा और भी बढेगा।

तो सिर्फ घोषणाएं है, जिन पर कोई सवाल नहीं है। घोषणाएं अपने आप में ब्रह्मवाक्य है जिसकी सत्यता की जांच नहीं है। हां यूं तो आरटीआई भी है, देश में लोकतंत्र भी है लेकिन घर नहीं है। आपके पास घर है या नहीं है, जिनके पास है उनके सुरक्षित है या नहीं है। ये सवाल नहीं है क्योंकि बताया जा रहा है कि वो राष्ट्र सुरक्षित हाथों में है जिसमें आपका घर नहीं है।

लोगों के पास घर नहीं है पर चौकीदार है। चौकीदार सचमुच है कि नहीं है, इस पर कोई सवाल नहीं है। 2019 में चुनाव हो रहे हैं ये बात भी बिल्कुल सही है, लेकिन 2024 में भी होंगे इसकी कोई गारंटी नहीं!

तो जब आप सपनों में डूबकर ये गाना गा रहे हों कि "झिलमिल सितारों का आंगन होगा, रिमझिम बरसता सावन होगा" उस दौरान ये भी सोचें कि ये किस पंचवर्षीय योजना में होगा। क्योंकि पंचवर्षीय योजना की रूपरेखा आनंद बख्शी नहीं लिखते।

मुझे पता है कि आपकी दुविधा बड़ी है। घर के सपने और देशभक्ति में कई बार कशमकश चलती होगी। तो आपके लिये एक मशविरा है, जिससे आपके घर के सपने के साथ देशभक्ति भी बरकरार रहेगी। आपको बस इतना करना है, अगली बार जब भारत माता का जयकारा लगाएं तो ये नारा भी साथ में लगाएं कि रहने को घर नहीं हिंदोस्तां हमारा।

Homeless People
slums
Government schemes
policies Failure
anti-people policies
2019 आम चुनाव
General elections2019
2019 Lok Sabha elections
BJP Govt
Narendra modi

Related Stories

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..

ख़बरों के आगे-पीछे: राष्ट्रीय पार्टी के दर्ज़े के पास पहुँची आप पार्टी से लेकर मोदी की ‘भगवा टोपी’ तक

कश्मीर फाइल्स: आपके आंसू सेलेक्टिव हैं संघी महाराज, कभी बहते हैं, और अक्सर नहीं बहते

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल मॉडल ऑफ़ गवर्नेंस से लेकर पंजाब के नए राजनीतिक युग तक

उत्तर प्रदेशः हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं जनमत के अपहरण को!


बाकी खबरें

  • भाषा
    ईडी ने फ़ारूक़ अब्दुल्ला को धनशोधन मामले में पूछताछ के लिए तलब किया
    27 May 2022
    माना जाता है कि फ़ारूक़ अब्दुल्ला से यह पूछताछ जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (जेकेसीए) में कथित वित्तीय अनिमियतता के मामले में की जाएगी। संघीय एजेंसी इस मामले की जांच कर रही है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    एनसीबी ने क्रूज़ ड्रग्स मामले में आर्यन ख़ान को दी क्लीनचिट
    27 May 2022
    मेनस्ट्रीम मीडिया ने आर्यन और शाहरुख़ ख़ान को 'विलेन' बनाते हुए मीडिया ट्रायल किए थे। आर्यन को पूर्णतः दोषी दिखाने में मीडिया ने कोई क़सर नहीं छोड़ी थी।
  • जितेन्द्र कुमार
    कांग्रेस के चिंतन शिविर का क्या असर रहा? 3 मुख्य नेताओं ने छोड़ा पार्टी का साथ
    27 May 2022
    कांग्रेस नेतृत्व ख़ासकर राहुल गांधी और उनके सिपहसलारों को यह क़तई नहीं भूलना चाहिए कि सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई कई मजबूरियों के बावजूद सबसे मज़बूती से वामपंथी दलों के बाद क्षेत्रीय दलों…
  • भाषा
    वर्ष 1991 फ़र्ज़ी मुठभेड़ : उच्च न्यायालय का पीएसी के 34 पूर्व सिपाहियों को ज़मानत देने से इंकार
    27 May 2022
    यह आदेश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बृजराज सिंह की पीठ ने देवेंद्र पांडेय व अन्य की ओर से दाखिल अपील के साथ अलग से दी गई जमानत अर्जी खारिज करते हुए पारित किया।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    “रेत समाधि/ Tomb of sand एक शोकगीत है, उस दुनिया का जिसमें हम रहते हैं”
    27 May 2022
    ‘रेत समाधि’ अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार जीतने वाला पहला हिंदी उपन्यास है। इस पर गीतांजलि श्री ने कहा कि हिंदी भाषा के किसी उपन्यास को पहला अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार दिलाने का जरिया बनकर उन्हें बहुत…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License