NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
रोज़गार में तेज़ गिरावट जारी है
जनवरी 2017 से 1 करोड़ से अधिक नौकरियाँ ख़तम हो गयीं, लेकिन सरकार को इससे फर्क नहीं पड़ रहा।
सुबोध वर्मा
11 Aug 2018
Translated by महेश कुमार
बेरोज़गारी

नवीनतम सीएमआईई आँकड़ों के मुताबिक भारत में रोज़गार प्राप्त व्यक्तियों की संख्या जनवरी 2017 में 40 करोड़ 80 लाख 4 हजार से घटकर जुलाई 2018 में 39 करोड़ 70 लाख 5 हजार हो गई, यानि पिछले डेढ़ साल में 1 करोड़ 9 लाख  रोज़गार की ख़त्म हो गया। यह सच्चाई सरकार द्वारा आँकड़ों के साथ फुटबॉल खेलने के महीनों के बाद आता है। मोदी सरकार विविध संस्थाओं से कई संख्याओं को निकाल और अधिक संदिग्ध - स्रोतों के ज़रिए एक खुशनुमा तस्वीर पेश करने की कोशिश की है जबकि आलोचकों ने कहा कि यह भारी त्रुटियों की ओर इंगित करता है।

एक नमूना सर्वेक्षण के माध्यम से एकत्रित सीएमआईई डेटा, साल के पहले भाग में रोज़गार  की कमी को एक मौसमी चक्र की तरह दिखाता है और दूसरे छमाही में वह बढ़ता भी है। यह दुर्बल गर्मियों के महीनों से संबंधित है जो साल के पहले भाग में पड़ते हैं। हालांकि, इसके बावजूद, जुलाई 2018 में रोज़गार  में एक साल पहले के जुलाई 2017 के मुकाबले 50 लाख 70 हजार कम था। इससे पता चलता है कि हालात तेज़ी से चीजें नीचे जारी हैं।

unemployment grows in india1.jpg

यह याद रखना चाहिए कि कामकाजी आयु के लोगों की जनसंख्या निरंतर और निष्पक्ष रूप से बढ़ती है। उदाहरण के लिए, सीएमआईई का अनुमान है कि जून 2017 और जून 2018 के बीच, 2 करोड़ 40 लाख 9 हजार नए लोग कामकाजी आयु आबादी (15 वर्ष से उपर की आयु) में शामिल हो गए होंगे। यहां तक कि अगर कोई मानता है कि उनमें से केवल आधा ही नौकरियां लेने के लिए तैयार थे (शेष महिलाएं जो काम नहीं कर रही हैं या छात्र इत्यादि हैं) इसका मतलब है कि लगभग 1 करोड़ 20 लाख 45 हजार लोग नौकरी तलाशने वालों की सेना में एक वर्ष में जुड़ गए हैं।

चूंकि नौकरियों में कोई वृद्धि नहीं हुई है – तो वास्तव में गिरावट आयी है - बेरोजगारों की सकल संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकार के सभी दावों जिसमें आत्म-रोज़गार  (मुद्रा ऋण इत्यादि) या औपचारिक क्षेत्र के खुलने (ईपीएफओ डेटा) से नौकरियां पैदा करने की बात की गयी है अगर यह सही भी है तो भी यह इस  समस्या को हल नहीं कर पायेगी। वास्तव में, सरकार के दावे ज्यादातर संदिग्ध है, स्थिति 'संकट' स्तर काफी आगे बढ़ गयी है।

सरकार जिस में असफल रही है - या स्वीकार करने से इनकार कर रही है - यह समझना होगा कि नौकरियों को पैदा करने के लिए कृषि और उद्योग दोनों में भारी निवेश की जरूरत है। चूंकि निजी क्षेत्र का निवेश महीनों से  बहुत कमजोर रहा है, इसलिए सरकार के लिए एकमात्र रास्ता है कि वह बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निवेश को बढ़ाए। इससे न केवल नौकरियां पैदा होंगी, इससे मांग भी बढ़ेगी। यह निवेश शुरू करने के लिए निजी क्षेत्र के लिए भी स्थितियां पैदा करेगा।

यह भी पढ़ें: सरकार को बढ़ती बेरोजगारी पर कोई चिंता नहीं

हालांकि, मोदी सरकार अस्वीकृत नव उदारवादी सिद्धांत के दास के रूप में खुल कर सामने आ गया है और  निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका की इजाजत देकर सरकारी निवेश में कटौती कर ली है। यह घातक विचार है- और मोदी ने इसके प्रति अपनी कठोर प्रतिबद्धता से भारत को इस संकट में पहुंचाया है।

इस बीच, कृषि बड़े अनुपात के संकट की पकड़ में  है। यहां तक कि उत्पादन बढ़ता जा रहा है, किसानों की आय और कृषि मजदूरी स्थिर या गिरावट की तरफ है। यह स्थिति ज्यदा से ज्यादा लोगों को नौकरी बाजार में धकेल रहा जहाँ स्थति पहले से ही गंभीर। 9 अगस्त को 400 से अधिक जिलों में आयोजित किसानों / मजदूरों के प्रदर्शन में किसानों के संकट का साक्ष्य ऋण छूट, फसल की कीमतों में वृद्धि और बेहतर मजदूरी की मांग में था।

इस चौंकाने वाली नौकरी के संकट को देखते हुए, यह आश्चर्य की बात है कि 3 करोड़ युवाओं ने इस साल की शुरुआत में भारतीय रेलवे द्वारा विज्ञापित 98,000 नौकरियों के लिए आवेदन किया था। इस भर्ती अभियान के लिए ऑनलाइन परीक्षा के हाल के दौर में, 47 लाख उम्मीदवार ने देश भर में 440 परीक्षा केंद्रों में यात्रा की  हैं। बिहार से इन हताश युवाओं को विभिन्न केंद्रों में लाने के लिए विशेष ट्रेनों का आयोजन किया जाना था।

लेकिन मोदी सरकार अपनी आंखों के सामने प्रकट होने वाली त्रासदी से लापरवाह/उदासीन है, और अपने आपको इससे दूर कर रही है। वास्तव में, मोदी और अमित शाह अगले साल आम चुनावों के लिए अपनी योजना को अम्ल करने में व्यस्त हैं। क्या नौकरी तलाशने वाले परेशान युवा, जो 1 करोड़ नौकरियों के लंबे वादों को याद रखेंगे, ओर क्या फिर मोदी एंड कंपनी पर भरोसा करेंगे?

बेरोज़गारी
घटता रोज़गार
नरेंद्र मोदी
मोदी सरकार
unemployment
Modi Govt
jobloss

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

सरकारी एजेंसियाँ सिर्फ विपक्ष पर हमलावर क्यों, मोदी जी?

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

भारत में संसदीय लोकतंत्र का लगातार पतन

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?


बाकी खबरें

  • art
    डॉ. मंजु प्रसाद
    सार्थक चित्रण : सार्थक कला अभिव्यक्ति 
    31 Oct 2021
    आसान नहीं है मानव और समाज की सचाई को कला में निपुणता से उतार देना। कलाकार सृजित भी कर दे भद्र जनों को ग्राह्य नहीं है।
  • tirchi nazar
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: 'सरकार जी' ने भक्तों के साथ की वर्चुअल मीटिंग
    31 Oct 2021
    दीपावली के शुभ अवसर पर आयोजित उस मीटिंग में सरकार जी ने सबसे पहले भक्तों को भक्त होने का महत्व बताया। भक्तों को बताया कि वह चमचों से किस तरह अलग हैं।
  • raid
    राजेंद्र शर्मा
    लक्ष्मी जी और ईडी का छापा
    31 Oct 2021
    जब ईडी ने लक्ष्मी जी पर मनी लॉन्डरिंग के आरोप में कर डाली छापेमारी!
  • Communalism
    शंभूनाथ शुक्ल
    अति राष्ट्रवाद के भेष में सांप्रदायिकता का बहरूपिया
    31 Oct 2021
    राष्ट्रवाद का अर्थ है अपने देशवासियों से प्रेम न कि किसी राजनीतिक विचारधारा के प्रति समर्पण। अपने देश के संविधान को मानना और उस पर अमल करना ही राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव है।
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी में भाजपा के आगे विपक्षी इतने सुस्त क्यों और तीन अन्य खबरें
    30 Oct 2021
    यूपी में भाजपा के आगे मुख्य विपक्षी इतने सुस्त क्यों नजर आ रहे हैं? एनसीबी या इस जैसी अन्य एजेंसियां संविधान और राज्य के प्रति जवाबदेह हैं या सरकार चलाने वाले सर्वसत्तावादी सियासतदानों के प्रति? 32…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License