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रफ़ाल कचौटने के लिए फिर वापस आया
कॉर्पोरेट घरानों को मुनाफा पहुँचाने के लिए सरकार ने अधिक महँगा सौदा किया।
गौतम नवलखा
09 Feb 2018
Translated by महेश कुमार
Rafale Deal

भाजपा-आरएसएस की अगवायी वाली सरकार ने दावा किया है कि उनके द्वारा की गयी रफ़ाल डील “क्षमता, मूल्य, उपकरण, वितरण, रख-रखाव, प्रशिक्षण आदि के संदर्भ में [यूपीए] सरकार द्वारा की गयी डील से बेहतर है जिसे वे दस साल में भी अंतिम रूप नहीं दे पाएI" कोई शक नहीं की यह भी एक मज़बूत मुहंजोही (बयानबाजी) के अलावा कुछ नहीं है, लेकिन इस बयानबाज़ी के शब्दों में अब वह दम नहीं क्योंकि यह बयानबाजी तथ्यों का कतई समर्थन नहीं करते। यह हज़म करना मुश्किल है कि एक तिहाई के मूल्य की “राष्ट्रीय” डील की तुलना में कैसे 1,600 करोड़ रुपए की डील बेहतर सौदा है, और वह डील जो घरेलू क्षमता भी पैदा करती थी।

निर्मला सीतारमण अपने पूर्ववर्तियों मनोहर पर्रिकर और अरुण जेटली जैसे ही इस डील के बारे में तब तक कुछ भी नहीं जानते थे जब तक कि यह समझौता नहीं हो गया। 10 अप्रैल, 2015 को प्रधानमंत्री ने इस सौदे की घोषणा की थी लेकिन पिछले कुछ दिनों से रक्षा मंत्रालय अभी भी 10 वर्ष पुरानी “राष्ट्रीय” डील पर "विचार-विमर्श" के बारे में बात कर रहा था। {रफ़ाल पर टाइमलाइन देखें} बुधवार को स्क्रॉल.इन के अनुसार 2017 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में निर्मला सीतारमन ने आश्वासन दिया कि सरकार आपको "(मीडिया को) देगी ... लागत और राशि जो भी भुगतान की जा रही है, भुगतान करने पर जो सहमती हुई हैं, क्योंकि ये सार्वजनिक धन का सवाल हैI” अचानक अब "सार्वजनिक धन" और "पारदर्शिता" गायब हो गई है, और इनकी जगह अब "गोपनीयता" और "वर्गीकृत जानकारी" ने ले ली है। यह उन लोगों का तरीका है जिनके पास छिपाने के लिए बहुत कुछ है। यही करण है कि वे अपने स्वयं की बयानबाजी में उलझ जाते हैं।

राफेल डील की समयरेखा

1. मार्च 03, 2014: नितिन गोखले ने एनडीटीवी में लिखा था कि डैसॉल्ट और एचएएल ने एक काम के साझा समझौते पर हस्ताक्षर किए।

2. फ़रवरी 19, 2015: डेसॉल्ट के सीईओ एरिक ट्रैपरियर का कहना है कि मूल्य निर्धारण का मुद्दा बहुत स्पष्ट है। हमारी कीमत एलआईई के पहले दिन से तय है तो उस मोर्चे पर है "

3. 25 मार्च, 2015: ट्रापियर ने दो अपग्रेड मिराज 2000 को भारतीय टीम को सौंपने के अवसर पर बोलते हुए कहा कि एचएएल के साथ उनकी कंपनी के लम्बे समय से संबंध हैं और 126 एमएमआरसीए सौदा के आदेश से इसे और मजबूत किया जाएगा।

4. 27 मार्च, 2015: भारतीय रक्षा समाचार द्वारा उठाए गए एएफपी रिपोर्ट में दासॉल्ट के सीईओ का हवाला देते हुए कहा गया है कि राफेल सेनानी के लिए भारतीय अनुबंध पूरा करने पर काम चल रहा है लेकिन यह सौदा "95 प्रतिशत पूरा" है।

5. अप्रैल 08, 2015: भारतीय विदेश सचिव एस जयशंकर ने यह कहकर रिपोर्ट दी थी कि: "राफेल के संदर्भ में, मेरी समझ यह है कि फ्रैंच कंपनी, हमारे रक्षा मंत्री, एचएएल के बीच चल रही चर्चाएं इसमें शामिल हैं"।

6. अप्रैल 10, 2015: पीटीआई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह कहते हुए बताया कि "भारत में लड़ाकू विमानों की महत्वपूर्ण परिचालन आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए मैंने उनके (फ्रांसीसी राष्ट्रपति) से बात की है और जितनी जल्दी हो सके उड़ान भरने वाले 36 विमानों के लिए अनुरोध किया, एक सरकार से सरकारी सौदे के तहत।"

16 नवंबर 2016 को राज्य मंत्री सुभाष भावे ने एक लिखित उत्तर में प्रति यूनिट लागत के रूप में प्रति जेट के लिए 670 करोड़ रूपए का मूल्य बताया था, जो 23 सितंबर, 2016 को हस्ताक्षरित अंतर-सरकारी समझौते के अनुसार था। हथियार मिश्रण, और सभी पुर्जों और 75 प्रतिशत बेड़े की उपलब्धता और प्रदर्शन आधारित रसद के लिए लागत, पहले पांच वर्षों के लिए समर्थन के लिए 1000 करोड़ को अलग रखा गया है। वास्तव में गुरुवार को इंडियन एक्सप्रेस और बिजनेस स्टैंडर्ड दोनों ही वरिष्ठ रक्षा मंत्रालय अधिकारियों द्वारा पृष्ठभूमि की जानकारी के आधार पर सौदा के बारे में अतिरिक्त जानकारी प्रदान करते हैं। इसके अनुसार सौदे का कुल मूल्य यूरो 7.9 अरब था। लड़ाकू विमानों की लागत 3402 मिलियन यूरो; हथियार की लागत 710 मिलियन यूरो; स्पेयर पार्ट्स और घटकों के लिए 1800 मिलियन यूरो; मौसम और इलाके की अनुकूलता के ल;इए 1700 मिलियन यूरो फिट बैठती है; और प्रदर्शन आधारित रसद 353 मिलियन यूरो दी गयी।

प्रत्येक लड़ाकू जेट विमानों की कीमत केवल 560 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं है, जो कि यूपीए -2 के द्वारा "ध्यान से" बातचीत पर तय की गई थी, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नए सौदे के तहत 670 करोड़ रुपये की कीमत पर बातचीत की है, इस कीमत के ब्रेकअप से पता चलता है कि यह हथियार मिश्रण नहीं है लेकिन स्पेयर पार्ट्स और घटक और 75 प्रतिशत बेड़े की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए है, जिसके लिए भारत झुक कर भुगतान कर रहा है।

किसी के लिए यह दावा करना कि प्रत्येक जेट के लिए 1600 करोड़ रुपये 560 करोड़ रुपये से बेहतर हैं, जिसमें एचएएल द्वारा घरेलू लाइसेंस प्राप्त उत्पादन भी शामिल है (जो पहले से ही मिराज 2000 परियोजना में डैसॉल्ट के साथ जुड़ा हुआ है) पर विश्वास करना बड़ा ही भोलापन का काम होगा। डैसॉल्ट के साथ काम करने से एचएएल ही न केवल अच्छी स्थिति में होगा, बल्कि वह तकनीक को अवशोषित करने और अपनी क्षमताओं को उन्नत करने के लिए एक बेहतर स्थिती में रहेगा, इसके लिए दीर्घकालिक स्वदेशी बैक-अप सुनिश्चित किया जाना चाहिए था। जिस गति के साथ सौदा किया गया है, यह संदेह की वजह भी है क्योंकि डैसॉल्ट ने एचएएल को निरस्त कर और अनिल अंबानी के नेतृत्व वाले समूह को स्वीकृत किया जिसका इस क्षेत्र में शून्य अनुभव है। वाणिज्यिक सौदों में कोई 'मुफ्त लंच' नहीं हैं। और जल्दबाजी के फैसले के लिए हमेशा ही कीमत चुकानी पड़ती है। यह निष्ठावान नरेंद्र मोदी ही है, जो अपने निरंकुश सर्वश्रेष्ठ कदम के रूप में, एक ऐसा सौदा करता है जो कॉर्पोरेट घरों को सीधे लाभ देता है। इसके अलावा, यह सौदा एक समय का ही सौदा है, यानी प्रत्येक नई खरीद के लिए नए सिरे से बातचीत करनी होगी, और स्वदेशीकरण के लिए कुछ भी नहीं होगा क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र की एचएएल, जो अकेले क्षमता को प्रौद्योगिकी को अवशोषित करती है और डैसॉल्ट के साथ काम करने में पाँच दशकों से अधिक काम करने का तजुर्बा है को अलग-थलग कर दिया गया और प्रधानमंत्री के पसंदीदा कॉर्पोरेट को समझौते दे दिया गया, जिन्होंने सिर्फ कहने पर 29,000 करोड़ रुपये का उपहार दिया था।

इससे "राष्ट्रीय सुरक्षा" की लफ्फाजी और "सैन्य तैयारियों" का संगीत जिंगोवाइस्ट(युद्ध-उन्मादी) और चापलूस के कानों में जरूर बज रहा होगा, परन्तु जो अचूक है, वह यह है कि राफेल के करार से बदबू आ रही है और सार्वजनिक संसाधनों को कमजोर करने के लिए कॉर्पोरेट क्रोनियों को समायोजित क्र लिया गया है। देश इस सरकार की "विचारपूर्वक बातचीत" की कीमत लगभग तीन गुणा देगी इसका अंदाजा देश को नहीं था। अगर यह घोटाला नहीं तो क्या है?

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Manohar Parrikar
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Arun Jaitley
Narendra modi

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