NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
सीमान्त किसान: ज़मीन, मुश्किलें और समाधान
रजनीश साहिल
29 Jun 2015

असमान भूमि वितरण आज़ादी के बाद से ही अधिकांश किसानों की बेहतरी की राह में एक बाधा बना रहा है। जमीन के इस असमान वितरण पर नियंत्रण के लिए कोशिशें भी की गईं। इस संदर्भ में भूमि सुधार कार्यक्रम, हदबंदी का ज़िक्र हमने सुना है। हदबंदी में जिनके पास अधिक ज़मीन थी उनसे राज्यों ने अधिशेष भूमि तो ली, लेकिन भूमिहीनों में उसके वितरण के मामले में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। वितरण के बाद भी काफ़ी अधिशेष भूमि राज्यों के लैंड बैंक में जमा होती रही। हालाँकि भूमिहीनों को भूमि वितरण के प्रयास का लाभ यह रहा कि जिनके पास ज़मीन नहीं थी उनके मालिकाना हक़ में ज़मीन का एक टुकड़ा आया, लेकिन छोटे और सीमांत किसानों की संख्या भी बढ़ी। बावजूद इसके भूमि के असमान वितरण में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। बड़े किसानों की तादाद कम होते हुए भी आज उनके पास ज़मीन का बड़ा हिस्सा है।

                                                                                                                                      

2010-11 के एग्रीकल्चर सेंसस के मुताबिक देश के 67.04 प्रतिशत किसान परिवार सीमांत हैं, यानी उनके पास एक हैक्टेयर से भी कम ज़मीन है। इनमें भी सबसे ज़्यादा प्रतिशत उनका है जिनके पास आधा हैक्टेयर से कम ज़मीन है। इसके बाद 17.93 प्रतिशत छोटे किसान परिवारों के पास एक से दो हैक्टेयर ज़मीन है। कुल 10.05 प्रतिशत परिवारों के पास दो से चार हैक्टेयर ज़मीन है जिन्हें अर्द्ध-मध्यम श्रेणी का किसान कहा जाता है। मध्यम (चार से दस हैक्टेयर) और बड़े (10 हैक्टेयर से अधिक ज़मीन वाले) किसान कुल 4.98 प्रतिशत हैं। वर्ष 2000-2001 में सीमांत किसानों के पास औसत जमीन 0.40 हैक्टेयर थी जो कि अब 0.38 हैक्टेयर है। इस आँकड़े के आधार पर कहें तो हमारा देश सीमांत और छोटे किसानों का देश है, जिनकी जोत का आकार घटता जा रहा है।

67.04 प्रतिशत सीमांत किसान होने का मतलब है देश के अधिकांश किसानों के पास पर्याप्त संसाधनों, उन्हें वहन करने की क्षमता का अभाव। एक वक़्त था जब हर किसान परिवार के पास कम से कम एक जोड़ी बैलों की ज़रूर होती थी, हल से बुवाई का काम लिया जाता था। यानी कम लागत वाले और ख़ुद के कृषि उपकरण होते थे, पशुधन होता था। आज अधिकांश सीमांत किसान भी आधुनिक उपकरणों से खेती करते हैं। वे ट्रेक्टर, सोइंग मशीन, थ्रेशिंग मशीन ख़रीद नहीं सकते तो बड़े किसानों के पास मौजूद उपकरणों का किराये पर इस्तेमाल करते हैं। इन उपकरणों ने छोटे किसानों के घरों से धीरे-धीरे पशुधन को कम किया है। नतीजतन जो किसान दूध के लिए आत्मनिर्भर था अब वह भी ख़रीदता है। इसी तरह देखा गया है कि पानी की आपूर्ति के लिए वे बड़े किसानों के ट्यूबवेल से पानी खरीदते हैं।

इन संसाधनों के इस्तेमाल पर ख़र्च कम हो इसके लिए ज़रूरी है कि किसान उनका मालिक ख़ुद हो। लेकिन इन्हें वहन करने की क्षमता सीधे-सीधे ज़मीन के आकार से जुड़ी है। देखा गया है कि सीमांत और छोटे किसानों की संसाधनों तक सीधी पहुँच बड़ी या मध्यम जोत वाले किसानों की तुलना में न्यूनतम है। आधुनिक उपकरणों तक का रास्ता बाज़ार व तमाम फाइनेंसिंग एजेंसियों से होकर जाता है। एक तो उनके नियम-क़ायदे ही ऐसे हैं कि सीमांत किसान उनके दायरे से बाहर हो जाते हैं, दूसरे अगर कोई किसान जैसे-तैसे उन पर खरा भी उतरे तो यह उसके लिए कर्ज़ के एक और चक्र का शुरू हो जाना है। नतीजतन उनके सामने सबसे बेहतर विकल्प संसाधनों को किराये पर लेना होता है जिसके लिए उन्हें अच्छी-ख़ासी क़ीमत अदा करनी पड़ती है, जो खेती की लागत बढ़ाता है।

ज़मीन का आकार आपातकालीन स्थितियों को झेलने की क्षमता को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। प्रतिशत में भले ही दोनों का नुक़सान बराबर हो लेकिन दस एकड़ के किसान की आधी फ़सल बर्बाद होना और एक एकड़ के किसान की आधी फ़सल बर्बाद होना एक ही बात नहीं है। एक एकड़ के किसान के लिए इसका मतलब है कि वह अपने परिवार का चंद महीने भी पेट नहीं भर सकता। पिछले सालों में फ़सलों के नुक़सान के बाद देखा गया है कि मध्यम या बड़े किसान अगली फ़सल की तैयारी करने में अधिक सक्षम थे, जबकि सीमांत किसानों के पास कोई और काम तलाश करने जैसी स्थिति बनी। 2014 की एनएसएसओ की रिपोर्ट भी यह दर्शाती है कि खेती छोड़ पलायन करने वालों में सबसे ज़्यादा तादाद सीमांत किसानों की है।

भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में सीमांत किसानों के पास बराबर ज़मीन होने पर भी उत्पादन कहीं कम कहीं ज़्यादा है। फिर भी अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए उन्हें खेती के इतर अतिरिक्त मेहनत-मजदूरी करनी पड़ती है, क्योंकि सारी परिस्थितियाँ अनुकूल रहने पर भी उनके पास मौजूद ज़मीन पर एक सीमा से अधिक उत्पादन असंभव है, जो ज़रूरतें पूरी करने के लिए अपर्याप्त है।

कम ज़मीन होने का एक संकट यह भी है कि उपज की मात्रा कम होती है जिसे मंडी या बाज़ार तक पहुँचाना बहुत ख़र्चीला साबित होता है। मध्य प्रदेश में 35-40 कि.मी. की दूरी से मंडी तक अनाज पहुँचाने के बदले ट्रेक्टर-ट्राली के मालिक 2000 से 2500 रुपये किराया लेते हैं। अगर किसी किसान के पास पाँच क्विंटल गेहूँ है, जिसका दाम मंडी में उसे 1450 रुपये प्रति क्विंटल मिलना है, तो ट्रेक्टर मालिक का किराया चुकता करने पर उसके हाथ में अधिकतम 5250 रुपये आएंगे। सो अक्सर किसान अपनी फ़सल गाँव के ही दुकानदार या बड़े किसान को 1200-1250 रुपये प्रति क्विंटल में बेच देते हैं, ताकि उनके हाथ में 6000 रुपये के आसपास राशि आ सके। यानी निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ किसान चाहते हुए भी नहीं ले पाता। दूसर पक्ष यह है कि अधिकांश सीमांत किसानों के पास अमूमन इतनी अधिशेष उपज होती ही नहीं कि वह उसे बाजार में बेचने के बारे में सोच भी सकें।

इसके अलावा एक और समस्या है खेतों में समुचित व्यवस्था की। वर्षा आधारित क्षेत्रों में किसी एक सीमांत किसान के लिए खेत में पानी के प्रबंधन की व्यवस्था बनाना बेहद मुश्किल और ख़र्चीला काम है। न तो यह उसके अकेले की आर्थिक क्षमता के दायरे में होता है और न ही वह अकेला उसे बेहतर अंजाम दे सकता है। अगर कोई सिर्फ़ अपने खेत के लिए इंतजाम करता भी है, तो उससे कोई बड़ा बदलाव नज़र नहीं आता। बेशक एक खेत की पैदावार बढ़ जाएगी, लेकिन क्षेत्र के सीमांत किसानों की स्थिति में कोई बदलाव आएगा यह ऐसे एकल प्रयासों से मुमकिन नहीं है।

यह साफ़ है कि कम खेती की ज़मीन सीमांत किसानों की मुश्किलों की एक बड़ी वजह है। इसका हल यही हो सकता है कि ज़मीन का आकार बड़ा हो और ज़मीन एक ही जगह हो। बाज़ार के मुताबिक इसका जो उपाय है उसके एक शब्द को हम अक्सर सुनते हैं; कॉर्पोरेट खेती। यह खेती को आधुनिक करने के साथ-साथ ज़मीन को संगठित कर उस पर योजनाबद्ध ढंग से खेती करने की अवधारणा तो है, लेकिन यह खेती को बाज़ार के हाथ में सौंप देने की अवधारणा भी है जहाँ उपज, बाज़ार तक पहुँच सबकुछ बेहतर होगा पर लाभ किसानों के बजाय कंपनी मालिक का होगा। इस अवधारणा में खेती प्रमुख है, खेती में जुटे लोगों की समस्याओं का हल नहीं। तो फिर क्या उपाय हो कि ज़मीन का आकार भी बड़ा हो और किसानों की जेब पर बोझ भी न्यूनतम पड़े?

देश में मौजूद कई और उदाहरण ऐसे हैं जिनमें ज़मीन को संगठित करना, खेती को आधुनिक और योजनाबद्ध करना तो है ही, किसानों की समस्याओं का हल और उनकी स्थिति में सुधार प्रमुखता से शामिल है। यह उदाहरण जिस अवधारणा से उपजे हैं वह है - कोआपरेटिव खेती; यानी मिलजुलकर की जाने वाली साझी खेती।

इसके दो सफल उदाहरण हैं आंध्र प्रदेश और केरल के महिलाओं के समूह। केरल सरकार द्वारा संचालित ‘कुडुम्बश्री’ कार्यक्रम के तहत अधिकतम 10 किसानों के समूह को लीज़ पर ज़मीन दी जाती है जिस पर वे सामूहिक खेती करते हैं। इसमें 46,000 से ज़्यादा महिला समूह 68,000 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन पर खेती कर रहे हैं। क्या, कब, कैसे उगाना है से लेकर उत्पादों को बाज़ार तक पहुँचाने, वित्तीय प्रबंधन आदि सबकुछ इन समूहों और इनकी अपनी गठित समितियों के नियंत्रण और देखरेख में है। इसके प्रत्यक्ष लाभ यह हैं कि एक तो इन समूहों को जो सरकारी स्वामित्व की पड़ती या बंजर ज़मीन दी गई वह खेती योग्य भूमि में तब्दील हुई। दूसरा, इन समूहों का कृषि संबंधी सभी गतिविधियों पर सामुहिक नियंत्रण और मालिकाना हक़ होने से खेती के सभी ज़रूरी हिस्सों पर आने वाली लागत कम हुई, उत्पादन बढ़ा और किसानों की आमदनी में इज़ाफ़ा हुआ। जिस तरह लागत का बोझ किसी एक किसान पर पड़ने के बजाय बँट जाने के कारण कम हुआ है उसी तरह नुक़सान का प्रभाव भी बँट जाने से उसकी गंभीरता में कमी आई। आज स्थिति यह है कि इन समूहों ने खेती के इतर रोज़गार के अपने उपक्रम भी शुरू किए, अपने साप्ताहिक बाज़ार स्थापित किए। इन से जुड़े सभी किसान आत्मनिर्भर हैं और खेती उनके लिए घाटे का सौदा नहीं रही।

दूसरा और ग़ैर-सरकारी उदाहरण आंध्र प्रदेsश की महिलाओं के समूह हैं। इन महिलाओं ने पास-पास मौजूद खेतों को संगठित किया, उनके मालिकों के छोटे-छोटे समूह बनाए, फ़सलों के चुनाव और उत्पादन की प्रणाली पर सामुहिक योजना तय की और खेती शुरू की। इन समूहों ने अपने पारंपरिक बीज और कृषि प्रणाली पर अधिक भरोसा किया और आधुनिक खेती के उन सभी तत्वों को नकारा जिनके ज़रिये बाज़ार उन पर हावी हो सकता था। हालाँकि यह उतना व्यापक तो नहीं है लेकिन इस प्रयास का नतीजा भी कुडुंबश्री जैसा ही सुखद है।

देश के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह के कई और छोटे-छोटे उदाहरण मौजूद हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि सीमांत किसानों की समस्याओं का हल खेती की साझा व्यवस्था यानी कोआपरेटिव खेती से निकल सकता है। अगर दो-ढाई एकड़ तक के मालिक 5-6 सीमांत किसान मिलकर सामुहिक खेती करते हैं तो वे भी इन्हीं उदाहरणों की तरह बेहतर और दूरगामी परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। हाँ इस उपाय को अपनाने के लिए पहली ज़रूरत इस बात की होगी कि किसान ‘पहले मेरा खेत’, निजी लाभ-हानि और जाति-धर्म के बँटवारे जैसी चीजों से ऊपर उठकर सामुहिक लाभ और प्रगति के बारे में सोंचें और सामुहिक रूप से ज़िम्मेदारी निभाने को तैयार हों, क्योंकि यह मालिक-मज़दूर जैसी पूँजीवादी व्यवस्था के बिल्कुल उलट ‘सभी मालिक-सभी मज़दूर’ वाली सहकारी व्यवस्था होगी।

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।

 

भूमिअधिग्रहण कानून
किसान
आर्थिक तंगी
भाजपा
नवउदारवाद

Related Stories

किसान आंदोलन के नौ महीने: भाजपा के दुष्प्रचार पर भारी पड़े नौजवान लड़के-लड़कियां

आंदोलन कर रहे पंजाब के किसानों की बड़ी जीत, 50 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ी गन्ने की कीमत

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

योगी की गाय-नीति : कैसे होगा उत्थान; किसान मजबूर, अफसर परेशान

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

पीएमएफबीवाई- बीमा कंपनियाँ को बेतहाशा मुनाफा और किसान बेहाल

महाराष्ट्र के कारोबारी ने किसानों के नाम पर लिया 5,400 करोड़ रूपये का लोन

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

किसानी की हालत सुधारनें में फेल हैं सरकारी नीतियाँ

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार


बाकी खबरें

  • झारखंड सरकार ने निजी कंपनियों से किया एमओयू करार, उठ रहे हैं कई बड़े सवाल
    अनिल अंशुमन
    झारखंड सरकार ने निजी कंपनियों से किया एमओयू करार, उठ रहे हैं कई बड़े सवाल
    30 Aug 2021
    दिल्ली के होटल ताज़ में दो दिनों तक चले इस निवेश सम्मलेन के आखिरी दिन देश की कई दिग्गज निजी कंपनियों के साथ 10 हज़ार करोड़ निवेश पर सहमति बनी।
  • कर्मचारी संगठनों ने ई-श्रम पोर्टल का स्वागत किया पर कमियाँ भी बताईं
    रौनक छाबड़ा
    कर्मचारी संगठनों ने ई-श्रम पोर्टल का स्वागत किया पर कमियाँ भी बताईं
    30 Aug 2021
    संगठनों ने कहा है कि रेजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया की वजह से कई मज़दूर इसमें शामिल होने में असमर्थ होंगे।
  • काबुल पर अमेरिकी ड्रोन हमले में बच्चों समेत कई नागरिकों की मौत
    पीपल्स डिस्पैच
    काबुल पर अमेरिकी ड्रोन हमले में बच्चों समेत कई नागरिकों की मौत
    30 Aug 2021
    स्थानीय लोग अमेरिका के उस दावे को ख़ारिज करते हैं जिसमें उसने कहा कि उसने काबुल हवाई अड्डे पर फिर से हमला करने के लिए एक कार में विस्फोटक लोड करने की कोशिश कर रहे दो कथित आतंकवादियों पर हमला किया था।
  • क्या श्रम मंत्रालय अपने श्रम सुविधा पोर्टल के जरिये सुप्रीम कोर्ट को ठग रहा है?
    बी. सिवरामन
    क्या श्रम मंत्रालय अपने श्रम सुविधा पोर्टल के जरिये सुप्रीम कोर्ट को ठग रहा है?
    30 Aug 2021
    यह कहना कि सरकार केवल पोर्टल चलाएगी और बाक़ी सिरदर्द श्रमिक का है, अत्यधिक ग़ैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार है।
  • केन्या : वेतन समझौता लागू करने में विफलता पर सरकारी विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसरों की हड़ताल
    पीपल्स डिस्पैच
    केन्या : वेतन समझौता लागू करने में विफलता पर सरकारी विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसरों की हड़ताल
    30 Aug 2021
    केन्या में यूनिवर्सिटीज़ एकेडमिक स्टाफ़ यूनियन (यूएएसयू) ने चेतावनी दी है कि हड़ताल तब तक जारी रहेगी जब तक कि वेतन समझौता लागू नहीं हो जाता और लंबित बकाया राशि का भुगतान नहीं कर दिया जाता।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License