NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
शीर्ष राजनेताओं के दल से इतर विचार
इसे हाल ही में हरियाणा सरकार के मंत्री और संघ से प्रारम्भ करने वाले भाजपा के नेता श्री अनिल विज के बयान से समझा जाये।
वीरेन्द्र जैन
03 Feb 2017
शीर्ष राजनेताओं के दल से इतर विचार
यह इकलौता मामला नहीं है, और न ही किसी एक दल के नेता से जुड़ा है। इसे हाल ही में हरियाणा सरकार के मंत्री और संघ से प्रारम्भ करने वाले भाजपा के नेता श्री अनिल विज के बयान से समझा जाये। प्रत्येक सफल व्यक्ति की लोकप्रियता के साधनों को आत्मसात करने वाले नरेन्द्र मोदी का गाँधी जी की तरह चरखा कातने वाला चित्र जब खादी ग्रामोद्योग की पत्रिका और कलेन्डर पर प्रकाशित हुआ तो स्वाभाविक रूप से विरोध में भारी शोर हुआ। उसी समय श्री अनिल विज ने बयान दिया कि महात्मा गाँधी का नाम खादी से जोड़ने पर खादी का महत्व बढा नहीं है और उसकी बिक्री घट गई थी। गाँधी का चित्र हटा कर मोदी का चित्र लगाना एक अच्छा कदम है। मोदी गान्धीजी की तुलना में बेहतर ब्रान्ड हैं, इससे खादी की बिक्री 14% बढ गई है। जब से महात्मा गाँधी का फोटो रुपयों पर आया तब से रुपये की कीमत गिरती गई इसलिए कुछ दिनों बाद वे नोटों पर से भी गायब होने वाले हैं।
 
श्री विज के इस अनावश्यक बयान को भाजपा संगठन ने उनका निजी विचार बता कर अपनी जिम्मेवारियों से पल्ला झाड़ लिया। बाद में विज ने भी बिना कोई खेद प्रकट किये इसे वापिस लेने की घोषणा भी कर दी किंतु क्या यह सब कुछ इतना सरल है? सवाल यह है कि किसी संगठन के महत्वपूर्ण नेता का सार्वजनिक जीवन से सम्बन्धित संगठन से अलग निजी विचार सामने आने पर उसके दल की क्या भूमिका होना चाहिए। क्या वह व्यक्ति दल से भिन्न विचार रख कर भी संगठन में यथावत अपने पद पर बना रह सकता है?

आइए इन्हीं अनिल विज के जीवन को देख कर कुछ और समझने की कोशिश करें। 63 वर्षीय अनिल विज का राजनीतिक जीवन संघ परिवार के जन संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से प्रारम्भ हुआ जिसमें वे 1970 में ही जनरल सेक्रेटरी चुन लिये गये। 1974 में स्टेट बैंक आफ इंडिया में नौकरी करने वाले विज को 1990 में नौकरी छुड़वा कर अम्बाला कैंट सीट से चुनाव लड़वाया गया जिसमें वे जीत गये। यह सीट श्रीमती सुषमा स्वराज के राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद खाली हुयी थी। भाजपा की निगाह में श्री विज का महत्व इसी से समझा जा सकता है। अपने विचार के लिए आजीवन अविवाहित रहने का फैसला करने वाले विज हरियाणा में संघ के कद्दावर, ईमानदार और समर्पित नेता माने जाते रहे हैं। रणनीतिक रूप से दो बार उन्हें निर्दलीय रूप से भी संघ ने चुनाव लड़वाया व जिताया गया और दो बार भाजपा के उम्मीदवार के रूप में भी वे जीते, पर संघ से उनके रिश्ते अटूट रहे। 2014 के विधानसभा चुनावों के बाद पहली बार भाजपा हरियाणा में स्वतंत्र रूप से सरकार बनाने की स्थिति में आयी और विज के मुख्यमंत्री बनने की सम्भावनाएं व्यापक रूप से चर्चा में रहीं। उनकी जगह खट्टर के मुख्य मंत्री बनने पर राजनीतिक क्षेत्रों में आश्चर्य व्यक्त किया गया था। उन्हें केबिनेट मंत्री बनाया गया व तीन प्रमुख विभाग दिये गये जिनेमें स्वास्थ, निर्वाचन व खेलकूद विभाग शामिल थे। वे साक्षी महाराज की तरह विवादास्पद बयान देकर चर्चा में बने रहते हैं। पिछले वर्ष ही उन्होंने कहा था कि जो लोग बिना बीफ खाये नहीं रह सकते उन्हें हरियाणा आने की जरूरत नहीं है। वे महिला आईपीएस अधिकारी के साथ टकराव वाले मामले में भी चर्चा में रहे, डेरा सच्चा सौदा को बड़ी रकम देने व रियो ओलम्पिक में भी चर्चा में रहे हैं।

विज का उक्त विवादास्पद बयान गाँधीजी की विचारधारा और व्यक्तित्व के प्रति संघ के रुख से भिन्न नहीं है। किंतु भाजपा अपने चुनावी लाभों के लिए समय समय पर गाँधीजी के प्रति जिस नकली श्रद्धा का दिखावा करती है उससे भिन्न अवश्य है। विज को स्वतंत्रता है कि वे देश के किसी भी राजनेता के प्रति अपने स्वतंत्र विचार रखें और यदि उनके विचार उनकी पार्टी के विचारों या रणनीतियों से भिन्न है तो वे पार्टी छोड़ दें या पार्टी उन्हें महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेवारियों से हटा दे। निजी विचार रखने वालों को भिन्न विचारों की पार्टी के पद पर बैठ कर फैसले लेते रहने का अधिकार नहीं हो सकता। भले ही ऐसी घटनाएं भाजपा में बहुतायत से होती रहती हैं किंतु दूसरे बड़े दल भी इससे मुक्त नहीं है। देखा गया है कि भाजपा सबसे अधिक दोहरे चरित्र की पार्टी है।

कोई व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में जितने बड़े पद पर रहता है, उसका विचार उस समूह के विचार अनुशासन से बँधता जाता है जिस समूह का वह प्रतिनिधि होता है। किसी भी वकील को अपने वादी द्वारा बतायी गयी कहानी में से ही अपने तर्क तलाशने होते हैं। जब से प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित व्यक्ति अपने वादों को चुनावी जुमला कहलवाने लगता है तो वह उस महान पद की गरिमा गिरा रहा होता है। नरेन्द्र मोदी को छोड़ कर कोई प्रधानमंत्री ऐसा नहीं हुआ है जिसने भाषा में अमिधा की जगह व्यंजना का प्रयोग किया हो। अटल बिहारी वाजपेयी ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद भाषण शैली बदल दी थी। श्री विज खुद त्यागपत्र देकर आदर्श कायम कर सकते हैं, या भाजपा उन्हें कुछ समय के लिए पद मुक्त कर के संकेत दे सकती है। खेद है कि ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा और भारतीय लोकतंत्र में सक्रिय दलों के प्रति लोगों की घृणा बढती जा रही है जो लोकतंत्र के लिए घातक है।

खादी
नरेंद्र मोदी
महात्मा गाँधी
अनिल विज
भाजपा
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

महात्मा का दूसरा पक्ष

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

रोज़गार में तेज़ गिरावट जारी है

भारत को हिंदु राष्ट्र बनाने का एक और प्रयासः एनएसयूआई

अविश्वास प्रस्ताव: विपक्षी दलों ने उजागर कीं बीजेपी की असफलताएँ

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

यूपी-बिहार: 2019 की तैयारी, भाजपा और विपक्ष

चुनाव से पहले उद्घाटनों की होड़

अमेरिकी सरकार हर रोज़ 121 बम गिराती हैः रिपोर्ट


बाकी खबरें

  • yogi bulldozer
    सत्यम श्रीवास्तव
    यूपी चुनाव: भाजपा को अब 'बाबा के बुलडोज़र' का ही सहारा!
    26 Feb 2022
    “इस मशीन का ज़िक्र जिस तरह से उत्तर प्रदेश के चुनावी अभियानों में हो रहा है उसे देखकर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इसे स्टार प्रचारक के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।”
  • Nagaland
    अजय सिंह
    नगालैंडः “…हमें चाहिए आज़ादी”
    26 Feb 2022
    आफ़्सपा और कोरोना टीकाकरण को नगालैंड के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है, जिसके ख़िलाफ़ लोगों में गहरा आक्रोश है।
  • women in politics
    नाइश हसन
    पैसे के दम पर चल रही चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नामुमकिन
    26 Feb 2022
    चुनावी राजनीति में झोंका जा रहा अकूत पैसा हर तरह की वंचना से पीड़ित समुदायों के प्रतिनिधित्व को कम कर देता है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व नामुमकिन बन जाता है।
  • Volodymyr Zelensky
    एम. के. भद्रकुमार
    रंग बदलती रूस-यूक्रेन की हाइब्रिड जंग
    26 Feb 2022
    दिलचस्प पहलू यह है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने ख़ुद भी फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से सीधे पुतिन को संदेश देने का अनुरोध किया है।
  • UNI
    रवि कौशल
    UNI कर्मचारियों का प्रदर्शन: “लंबित वेतन का भुगतान कर आप कई 'कुमारों' को बचा सकते हैं”
    26 Feb 2022
    यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया ने अपने फोटोग्राफर टी कुमार को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान कई पत्रकार संगठनों के कर्मचारी भी मौजूद थे। कुमार ने चेन्नई में अपने दफ्तर में ही वर्षों से वेतन न मिलने से तंग आकर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License