NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
समावेशी राष्ट्रीयता के पक्षधर थे गांधी
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती वर्ष के प्रसंग में भोपाल के बुद्धिजीवियों के समूह ‘‘हम सब’’ की ओर से गांधी विमर्श श्रृंखला के तहत सीपीएम के पूर्व राज्य सचिव बादल सरोज ने ‘हिंसक समय में गांधी’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि हिंसक समय में गांधी बहुत ही ज्यादा प्रासंगिक हैं।
राजु कुमार
20 Aug 2019
Gandhi's ideology

ऐसे समय में जब हर तरफ हिंसा की बात हो रही हो, तब यह जरूरी है कि हम न केवल गांधी को याद करें, बल्कि उनके विचारों को व्यापक जन मानस तक ले जाने का काम भी करें, ताकि आम लोग भी जान सके कि गांधी जी ने किस तरह के भारत की कल्पना की थी? आज एक ओर देश उनकी 150वीं जयंती मनाने की तैयारी कर रहा है, तो दूसरी ओर उनके हत्यारे को महिमामंडित करने वाले लोग भी सक्रिय हैं। दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े ऐसे लोग देश और समाज को विघटन की ओर ले जा रहे हैं। गांधी जी ने हमेशा तर्क और सत्य को बढ़ावा दिया, लेकिन आज तर्क का गला घोंटा जा रहा है। गांधी जी ने दुनिया को दिखाया कि अहिंसक तरीके से भी साम्राज्यवाद को हराया जा सकता है। आज गांधी के देश में नफरत और हिंसा बढ़ रही है, ऐसे समय में गांधी बहुत ही ज्यादा प्रासंगिक हैं।

उक्त बातें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के वरिष्ठ नेता बादल सरोज ने ‘हिंसक समय में गांधी’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहीं। व्याख्यान का आयोजन भोपाल के बुद्धिजीवियों के समूह ‘‘हम सब’’ की ओर से गांधी विमर्श श्रृंखला के तहत किया गया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान ने बताया कि इसके पहले इस श्रृंखला के तहत वरिष्ठ गांधीवादी राजगोपाल पी.व्ही. एवं अजित झा के व्याख्यान कराए गए थे। गांधी जी को मार्क्सवादी नजरिए से समझने के लिए तीसरी कड़ी में बादल सरोज का व्याख्यान आयोजित किया गया।

nationalist 1.jpg

इस अवसर पर वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता रघुराज सिंह ने कहा कि आज देश में चारों ओर हिंसा की नर्सरी दिख रही है। जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों में भी हिंसा है। नक्सलवाद, उग्रवाद, आतंकवाद के साथ-साथ राज्य द्वारा की जा रही हिंसा को भी इस श्रेणी में रखा जा सकता है। सवाल करने वाले लोगों को अब अर्बन नक्सल कहा जा रहा है। ऐसे समय में गांधी जी के विचारों को अहिंसा के नजरिए से समझना बहुत जरूरी है। सत्तारूढ़ दल गांधीवादी नजरिए से हिंसा रोकने की बात नहीं करती, बल्कि उन्हें सिर्फ स्वच्छता के प्रतीक बना कर छोड़ दिया है। 

इस मौके पर बादल सरोज ने कहा कि किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन उसको उसकी परिस्थितियों और देशकाल से काट कर नही किया जा सकता। गांधी जी पर बात करते समय उन पर ध्यान देना होगा। बुद्ध ने एक ब्रह्मवाक्य दिया था कि सवाल उठाओ, आंख मूंद कर यकीन न करो। इसे दुनिया के दर्शन में बड़ा योगदान दिया था। लेकिन आज सवाल करने वालों के खिलाफ की विचारधारा हावी है। गांधी जी ने भी तर्क एवं सवाल को स्वीकार किया था।

अंग्रेजों के आने से पहले भारत का जीडीपी 30 प्रतिशत था जिसको अंग्रेजों ने ध्वस्त किया। उन्होंने पूरी की पूरी उत्पादन शक्ति और खेती को बर्बाद किया। उन्होंने तार्किक पूंजीवाद को भारत में नहीं आने दिया। ऐसे समय में जब अंग्रेज भारत को सामाजिक एवं आर्थिक रूप से तोड़ रहे थे, तब गांधी जी ने देश को एक करने का काम किया। वे अपने समय को अच्छी तरह से समझ रहे थे। जब पूरा देश अलग-अलग रजवाड़ों में बंटा था, तब उन सारे रजवाड़ों की जनता के बीच समन्वय करते हुए राष्ट्रवादी चेतना लाने का काम गांधी जी ने किया।

गांधी जी के राष्ट्रवाद में विविधता की जगह है। वे कहते थे कि हमें अलग-अलग वर्गों में बंटा समाज  नहीं चाहिए। उन्होंने अपने समय की जाति एवं सांप्रदायिकता की पीड़ा को संवेदना के साथ देखा था, इसलिए उनके सामने यह चुनौती थी कि एक ओर देश को अंग्रेजों से मुक्त कराया जाए, तो दूसरी ओर समावेशी राष्ट्रीयता को विकसित किया जाए। इस राष्ट्रीय उभार को वे अहिंसक आंदोलन तक सीमित रखने के लिए प्रयास करते रहे। अहिंसक तरीकों को ईजाद कर उन्होंने दुनिया को बताया कि सामाजिक एवं राजनीतिक परिवर्तन इस तरह से भी किया जा सकता है।

महात्मा गांधी ने महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए भी काम किया। महिलाओं एवं दलितों के अधिकार को उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जोड़ दिया था। उन्होंने अपने विचारों में भी लगातार संशोधन किया, क्योंकि वे देश-दुनिया की घटनाओं को लगातार देखते रहते थे और उनसे सीखते भी थे। गांधी जी बहुत ही लोकतांत्रिक थे और नागरिक अधिकारों के संरक्षण पर बहुत दृढ़ विश्वास रखते थे। वे एक बहुत बड़े रणनीतिकार थे। खांटी धार्मिक हिंदू होने के बावजूद पक्के धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे। उन्होंने कहा राज्य का कोई धर्म नहीं होना चाहिए क्योंकि धर्म व्यक्ति का निजी मामला है। उनकी स्पष्ट सोच थी कि धर्म एवं सांप्रदायिकता एक नहीं है और सांप्रदायिकता देश के लिए जहर है। उनकी कमी यह रही कि वे देश में सांप्रदायिकता की सोच को बढ़ने से न रोक सके। आजाद देश की तत्कालीन नेहरु सरकार उनकी शहादत को आगे रखते हुए हम सांप्रदायिक कीटाणुओं का खात्मा कर सकती थी, जो नहीं हो पाया।

गांधी जी भारतीय संस्कृति को बहुत ही व्यापक नजरिए से देखते थे। उन्होंने कहा था कि भारतीय संस्कृति विविधता की संस्कृति है। हमारी संस्कृति दरवाजे बंद नहीं करती और न ही दीवार खड़ी करती है। इसमें दुनिया की सुगंधी आनी चाहिए। भारत दुनिया के धर्मों एवं संस्कृति की बगिया है। 

बादल सरोज ने कहा कि गांधी जी अपने आप को समाजवादी भी कहते थे। 1925 में यंग इंडिया में लिखे संपादकीय में उन्होंने एम.एन. राय की तारीफ की थी। आज देश में गांधीवादी विचारक हैं, लेकिन गांधीवादी नहीं हैं। गांधी जी अपने विचारों को दूसरे पर थोपते नहीं थे, बल्कि उसे स्वयं के आचरण में उतारते थे। आज अगर देश में कोई गांधी के सबसे नजदीक है, तो वे कम्युनिस्ट हैं। यह धारणा है कि मार्क्सवाद में हिंसक साधनों को महत्व दिया गया है, लेकिन यह धारणा गलत है। गांधीवाद से मार्क्सवाद में सिर्फ इतनी भिन्नता है कि मार्क्सवाद में हिंसक दमन के खिलाफ जनता की एकता से प्रतिवाद को महत्व दिया गया है। शायद आज गांधी जी होते, तो वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए वे भी कहते कि किसी को थप्पड़ मत मारो, अहिंसक तरीके से विरोध करो, लेकिन यदि कोई थप्पड़ मारे, तो तुम भी उसे थप्पड़ मारो।

वर्तमान समय में यह जरूरी है कि फासीवादी ताकतों के विरोध के लिए और बहुलतावादी संस्कृति की रक्षा के लिए गांधी, अंबेडकर, फूले और मार्क्स के विचारों को जोड़कर मोर्चा बनाया जाए। संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए देश में चल रहे हर छोटे-बड़े आंदोलन को एक साथ लाया जाए।

Mahatma Gandhi
Gandhi's 150th Jubilee
CPM
Badal saroj
Gandhian ideology
gandhian idea's

Related Stories

वैष्णव जन: गांधी जी के मनपसंद भजन के मायने

कांग्रेस चिंता शिविर में सोनिया गांधी ने कहा : गांधीजी के हत्यारों का महिमामंडन हो रहा है!

कौन हैं ग़दरी बाबा मांगू राम, जिनके अद-धर्म आंदोलन ने अछूतों को दिखाई थी अलग राह

गाँधी पर देशद्रोह का मामला चलने के सौ साल, क़ानून का ग़लत इस्तेमाल जारी

मैंने क्यों साबरमती आश्रम को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की है?

देशव्यापी हड़ताल को मिला कलाकारों का समर्थन, इप्टा ने दिखाया सरकारी 'मकड़जाल'

प्रधानमंत्री ने गलत समझा : गांधी पर बनी किसी बायोपिक से ज़्यादा शानदार है उनका जीवन 

"गाँधी के हत्यारे को RSS से दूर करने का प्रयास होगा फेल"

चंपारण: जहां अंग्रेजों के ख़िलाफ़ गांधी ने छेड़ी थी जंग, वहाँ गांधी प्रतिमा को किया क्षतिग्रस्त

हम भारत के लोगों की असली चुनौती आज़ादी के आंदोलन के सपने को बचाने की है


बाकी खबरें

  • ऋचा चिंतन
    WHO की कोविड-19 मृत्यु दर पर भारत की आपत्तियां, कितनी तार्किक हैं? 
    25 Apr 2022
    भारत ने डब्ल्यूएचओ के द्वारा अधिक मौतों का अनुमान लगाने पर आपत्ति जताई है, जिसके चलते इसके प्रकाशन में विलंब हो रहा है।
  • एजाज़ अशरफ़
    निचले तबकों को समर्थन देने वाली वामपंथी एकजुटता ही भारत के मुस्लिमों की मदद कर सकती है
    25 Apr 2022
    जहांगीरपुरी में वृंदा करात के साहस भरे रवैये ने हिंदुत्ववादी विध्वंसक दस्ते की कार्रवाई को रोका था। मुस्लिम और दूसरे अल्पसंख्यकों को अब तय करना चाहिए कि उन्हें किसके साथ खड़ा होना होगा।
  • लाल बहादुर सिंह
    वीर कुंवर सिंह के विजयोत्सव को विभाजनकारी एजेंडा का मंच बनाना शहीदों का अपमान
    25 Apr 2022
    ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध हिन्दू-मुस्लिम जनता की एकता की बुनियाद पर लड़ी गयी आज़ादी के लड़ाई से विकसित भारतीय राष्ट्रवाद को पाकिस्तान विरोधी राष्ट्रवाद (जो सहजता से मुस्लिम विरोध में translate कर…
  • आज का कार्टून
    काश! शिक्षा और स्वास्थ्य में भी हमारा कोई नंबर होता...
    25 Apr 2022
    SIPRI की एक रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार ने साल 2022 में हथियारों पर जमकर खर्च किया है।
  • वसीम अकरम त्यागी
    शाहीन बाग़ की पुकार : तेरी नफ़रत, मेरा प्यार
    25 Apr 2022
    अधिकांश मुस्लिम आबादी वाली इस बस्ती में हिंदू दुकानदार भी हैं, उनके मकान भी हैं, धार्मिक स्थल भी हैं। समाज में बढ़ रही नफ़रत क्या इस इलाक़े तक भी पहुंची है, यह जानने के लिये हमने दुकानदारों,…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License