NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सरकारों के लिए न्यूनतम मज़दूरी बस कागज़ी बातें हैं
सत्य यह है की इस न्यूनतम वेतन का लाभ कामगारों के बहुत बड़े तबके को नहीं मिलता है | सरकारें अपने इन फैसलों से केवल औपचारिकता पूरी करती है |
मुकुंद झा
10 Apr 2018
न्यूनतम वेतन
Image Courtesy:navodaytimes

बीते 4 अप्रेल को दिल्ली सरकार ने कामगारों के महँगाई भत्तों में बढ़ोतरी की जिससे कामगारों के न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी होगीI लेकिन सच यह है कि इस न्यूनतम वेतन का लाभ कामगारों के बहुत बड़े तबके को नहीं मिलता है | सरकारें अपने इन फैसलों से केवल  औपचारिकता  पूरी करती है | वो कभी भी इसे गम्भीरता से लागू नहीं करतींI इसी करण इसका लाभ गरीब कामगारों को नहीं मिलता |  दिल्ली के असंगठित क्षेत्र में न्यूनतम मज़दूरी देने के नियम का पालन न के बराबर ही होता है |

न्यूनतम वेतन

न्यूनतम मज़दूरी  अधिनियम 1948 के तहत सरकारें 5वर्ष में न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी करने के लिए बाध्यकारी है | इसलिए सरकारें समय-समय पर न्यूनतम मज़दूरी  की दरें तय कर जारी करती हैं परन्तु कभी भी इसे लागू करने की इच्छाशक्ति  ज़ाहिर नहीं करती हैं | इस पर दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कई बार कड़ी टिप्पणी की है, एक सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था की जो उद्योग मजदूरों को उनका न्यूनतम वेतन नहीं दे रही उन्हें चालू रहने का कोई हक नही है | इसके साथ ही कोर्ट ने  दिल्ली सरकार जब न्यूनतम वेतन को लागु करने में जानबूझकर देरी कर रही थी तो उसे कोर्ट ने नोटिस भेजा था,तब जा करके सरकार ने न्यूनतम मज़दूरी  को लागु किया था |

इसके बाबजूद भी  हम देखते हैं कि दिल्ली के अधिकतम उद्योग मालिक अपने मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी नहीं देते और उनके खिलाफ कोई कार्यवाही भी नहीं की जाती | इसका सबसे बड़ा कारण शासन और प्रशासन का ढीला रवैया है| इसके साथ ही, मज़दूरों में इस नियम की जानकारी का अभाव होना भी एक बहुत बड़ी समस्या हैI वे अपने ज़्यादातर अधिकारों से अनभिज्ञ हैंI  

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए मज़दूरों ने कई तरह की दिक्कतें बताई गाँधी नगर के कपड़े मार्किट में काम करने वाले विजय ने बताया की वो एक दुकान पर 12 साल से कम रहे है और उनकी तनख्वाह अभी भी 9,000 रु है | जब हमने उन्हें बताया कि उन्हें न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं मिल रही है| तो उनका जबाब था की ये क्या होता है?

इसके बाद एक और मज़दूर जो कि सदर बाज़ार में काम करते हैं उन्होंने बताया कि मालिक उनसे 12-12 घन्टे काम करवाता है परन्तु ना तो ओवरटाइम और न ही न्यूनतम वेतन ही देता है | उन्होंने कहा की उनकी मजबूरी है की वो कुछ बोल नहीं सकते है| कुछ बोलेंगे तो मालिक उन्हें हटा कर किसी नये व्यक्ति को रख लेगा| नौकरी जाने के डर से वो चुपचाप  काम करने को मजबूर हैं |

इसी तरह से एक इंशोरेंस कम्पनी में डेटा एंट्री का कम करने वाली महिला ने बताया कि उनका मैनेजर उनसे साइन तो कई वाउचर और अधिक सैलरी पर करता है, परन्तु उन्हें वो देता नहीं है | इसी प्रकार से अन्य जगह भी ऐसा ही होता उन्होंने बतया |

परन्तु जब हमने इन सबसे पूछा की वो इसकी शिकायत क्यों नहीं करते है तो सभी ने एक जबाब था की नौकरी चली जाएगी | कई को तो प्रक्रिया का ही नहीं पता था ,जिसे पता है भी वो अपने नौकरी चले जाने के डरे से चुप है |

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए दिल्ली भरतीय केन्द्रीय ट्रेड यूनियन (सीटू) के प्रदेश सचिव अनुराग सक्सेना कहा की  सरकार नवउदारवादी नीतियों के करण मजदूरों को नयूनतम वेतन नहीं देना चाहती है |

 “उन्होंने कहा की इसे लागु करने का ज़िम्मा उपश्रमायुक्तो का होता है | उपश्रमायुक्त श्रम दरोगा  (लेबर इंस्पेक्टर) के माध्यम से इसे लागु करना होता है | परन्तु सरकारे जानबूझकर इनकी स्टाफ की भर्ती नहीं करती है ,अभी पूरी दिल्ली में केवल 11 से 12 श्रम दरोगा ( लेबर इंस्पेक्टर) है” | जबकी इनकी संख्या इससे कही ज़्यदा है |

सरकारे न्यूनतम मज़दूरी  को केवल कागजों में लागु कर देती है परन्तु ज़मीनी स्तर पर इसका कोई असर नहीं दिखता है ,क्योकि सरकारो को  मजदूरों से अधिक उद्योग मालिको के चिंता होती है | सरकार किसी भी दल की हो वो हमेशा ही मज़ुदुरो के सवाल पे एक ही रुख रहता है और उनपर व्यपारियो  के पक्ष में नीति निर्माण और संरक्षण का दबाब होता है | 

 

न्यूनतम वेतन
दिल्ली सरकार
भारतीय श्रमिक
सीटू

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

सरकार द्वारा न्यूनतम वेतन को लेकर किये जा रहे दावों की सच्चाई?

5 सितम्बर : देश के लोकतांत्रिक आंदोलन के इतिहास में नया अध्याय

''सिलिकोसिस बीमारी की वजह से हज़ारो भारतीय मजदूर हो रहे मौत के शिकार''

दिल्ली: 20 जुलाई को 20 लाख मज़दूर हड़ताल पर जायेंगे

दिल्ली सरकारी स्कूल: छात्र अपने मनचाहे विषय में दाखिला ले सकेंगे!

दिल्ली सरकारी स्कूल: सैकड़ों छात्र लचर व्यवस्था के कारण दाखिला नहीं ले पा रहे

दिल्ली में पानी संकट चरम पर, सरकार को समय पर कदम उठाने चाहिए

दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य की माँग पर जनता की राय

दिल्ली में कक्षा 12वीं तक ईडब्ल्यूएस छात्र शिक्षा ले सकतें है?


बाकी खबरें

  • up
    सोनिया यादव
    यूपी चुनाव 2022: कई जगह जमकर लड़ीं महिला उम्मीदवार, कई सीटों पर विजयी
    10 Mar 2022
    बीते विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार महिला उम्मीदवारों की संख्या में 4 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है और वो फिलहाल मैदान में 30 से अधिक सीटों पर आगे चल रही हैं।
  • biren singh
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मणिपुर में भाजपा सरकार बनाने की प्रबल दावेदार केवल बहुमत का इंतज़ार
    10 Mar 2022
    मणिपुर की बात करें तो मणिपुर में विधानसभा की कुल 60 सीटें हैं। बहुमत के लिए 31 सीटों की जरूरत है। खबर लिखने तक मणिपुर में भी भाजपा 60 में से 15 सीट जीत चुकी है और 13 सीट पर आगे चल रही है।
  • आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: महंगाई-बेरोज़गारी पर हावी रहा लाभार्थी कार्ड
    10 Mar 2022
    यूपी की ज़मीन पर इस बार किसान आंदोलन से लेकर लखीमपुर कांड और हाथरस कांड की गूंज थी। कोविड की पहली लहर और दूसरी लहर की मार थी, छुट्टा पशु की परेशानी थी, महंगाई, बेरोज़गारी जैसे बड़े मुद्दे थे। विपक्ष…
  • अनिल अंशुमन
    झारखंड : मुआवज़े की मांग कर रहे किसानों पर एनटीपीसी ने किया लाठीचार्ज
    10 Mar 2022
    अपने खेतों के बदले उचित मुआवज़े की मांग कर रहे प्रदर्शनकारी किसानों पर हुए लाठीचार्ज से किसान आक्रोशित हो गए और जवाब में अधिकारियों पर पथराव किया।
  • bela and soni
    सौरव कुमार
    सोनी सोरी और बेला भाटिया: संघर्ष-ग्रस्त बस्तर में आदिवासियों-महिलाओं के लिए मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली योद्धा
    10 Mar 2022
    भारत की सामूहिक उदासीनता ने आदिवासियों के अधिकारों को कुचलने वालों के प्रतिरोध में कुछ साहसी लोगों को खड़ा करने का काम किया है, और उनमें सबसे उल्लेखनीय दो महिलाएं हैं- सोनी सोरी और बेला भाटिया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License