NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
नज़रिया
भारत
राजनीति
शाहीन बाग़ की गुमनाम महिलाओं को इतिहास कैसे याद रखेगा?
शाहीन बाग की गुमनाम महिलाओं ने इतिहास में अपना नाम दर्ज करा दिया है। असल में यह बेहद साहसी महिलाओं के संकल्प और प्रयासों का इतिहास है। लेकिन इन महिलाओं के साथ इतिहास में न्याय कितना होगा यह कहना मुश्किल है।
अमित सिंह
31 Dec 2019
shaheen bagh

नागरिकता (संशोधन) कानून के विरोध में चल रहे आंदोलन की सबसे बड़ी ख़ासियत या ख़ूबसूरती है, महिलाओं का नेतृत्व। एक ऐसे दौर में जब पितृसत्तात्मक ताकतें एक बार फिर हावी होने की कोशिशें कर रही हैं, सत्ता उन्हें बराबरी का मौका देने को तैयार नहीं है, महिलाएं 'पिंजरा तोड़' से लेकर आज़ादी तक के नारे लगा रही हैं।  ऐसे ही दौर में संविधान बचाने के संकल्प के साथ दिल्ली के एक पिछड़े से मोहल्ले शाहीन बाग की महिलाएं पिछले एक पखवाड़े से सड़क पर हैं। यहां हाड़ कंपा देने वाली ठंड में सैकड़ों महिलाएं अपने छोटे छोटे बच्चों के साथ धरने पर बैठी हैं। उनका धरना दिन-रात चल रहा है।

नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से चल रहे इस प्रदर्शन के लिए उचित व्यवस्थाएं भी की गई हैं। इसमें प्रदर्शनकारियों के लिए खाने-पीने और बैठने की अच्छी व्यवस्था के साथ ठंड से बचने के लिए रजाई और कंबल के भी इंतजाम हैं। इसके अलावा डॉक्टर और दवा की भी व्यवस्था है, जिससे प्रदर्शनकारियों को किसी तरह की परेशानी न हो।
image 2_3.JPG
आपको बता दें कि 15 दिसंबर से कालिंदी कुंज से सरिता विहार जाने वाले रोड पर शाहीन बाग बस स्टॉप के पास लोग धरने पर बैठे हैं। इस पूरे आंदोलन की अगुआई महिलाएं कर रही हैं।

यहां आ रही महिलाओं का तरीका शांत और शानदार है। इतना शानदार कि मीडिया का एक ख़ास वर्ग चाहकर भी उनके ऊपर उपद्रवी या पत्थरबाज़ का लेबल नहीं चिपका पा रहा है।  इनके हाथ में लाठी डंडे और तमंचे नहीं हैं। जमीन पर बैठकर प्रदर्शन करने वाली इन महिलाओं और लड़कियों के हाथों में प्लेकार्ड है। ये पोस्टर और पैम्पलेट लेकर प्रदर्शन कर रही हैं।

सबसे खास बात यह है कि इस इलाके में शाम सात बजे के बाद लड़कियां और महिलाएं सड़क पर यदा कदा ही दिखती थीं लेकिन अभी यहां सैकड़ों तादाद में महिलाएं हैं। साथ ही इस प्रदर्शन में शामिल होने वाली महिलाएं बहुत ही आम परिवार से हैं। वो हाउसवाइफ हैं। पढ़ाई करने वाली हैं। नौकरी करने वाली हैं।
image 3_2.JPG
इन महिलाओं की मांग हैं कि ये तब तक अपना धरना नहीं ख़त्म करेंगी जब तक सरकार नागरिकता कानून को वापस नहीं लेती। शाहीनबाग की ये प्रदर्शकारी महिलाएं अपने इस धरने को अधिकारों की लड़ाई बता रही हैं और इस लड़ाई में वो सरकार और मौसम दोनों से एकसाथ मोर्चा ले रही हैं।

अगर इस धरने पर गौर किया जाए तो मिलता है कि कई सालों बाद ये पहला मौका है जब हम इस तरह का कोई ऐसा प्रोटेस्ट देख रहे हैं। ये एक ऐसा प्रोटेस्ट है जो शांतिपूर्ण हैं और जिसमें प्रदर्शनकारी किसी और को नहीं बल्कि अपनी मांगों के लिए खुद को तकलीफ पहुंचा रहे हैं।

संभव है कि अगले कुछ दिनों में चुनावी आचार संहिता के नाम पर या फिर गणतंत्र दिवस की तैयारी के नाम पर इन महिलाओं को धरने से उठा दिया जाएगा। विडंबना यह है कि यह सब उसी गणतंत्र के सेलिब्रेशन के नाम पर होगा, जिसकी दुहाई देकर ये महिलाएं धरने पर बैठी हैं। हालांकि इससे फर्क भी नहीं पड़ता, उनकी मांग पर सरकार का क्या रुख होता है यह तो देखने वाली बात होगी लेकिन इतने दिनों तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन करके इन गुमनाम महिलाओं ने इतिहास में अपना नाम दर्ज करा दिया है।
image 4_0.JPG
हमें इस आंदोलन का मूल्यांकन करने के लिए इतिहास में झांकना होगा। इतिहास के पन्नों में ऐसे कई उदाहरण हैं जब महिलाओं ने ऐसे शांतिपूर्ण और गांधीवादी तरीके से आंदोलन किए हैं। इसमें से कुछ सफल भी हुए हैं। 1961 में मुंबई के गोरेगांव में पानी को लेकर महिलाओं द्वारा किया गया आंदोलन, पेड़ से चिपक कर पर्यावरण की रक्षा करतीं चिपको आंदोलन की महिलाएँ, अफ्स्पा जैसे काले कानून के खिलाफ लगभग 16 साल तक इरोम शर्मिला का अनशन इसकी एक बानगी है। अस्तित्व के लिए कड़ाके की ठंड में दिन-रात सड़क पर धरने पर बैठी शाहीनबाग की औरतों की यह कहानी भी इतिहास में निसंदेह दर्ज होगी।

हालांकि इन महिलाओं के साथ इतिहास में न्याय कितना होगा यह कहना मुश्किल है। क्योंकि यह परंपरा बहुत पुरानी रही है कि औरत के योगदान को सामान्यतया नज़रअंदाज कर दिया जाता है। क्योंकि जब भी इस तरह के आंदोलनों को जिक्र होता है तो यह कहा जाता है कि इस आंदोलन में महिलाओं की मुख्य और सक्रिय भूमिका रही है, उन्होंने इस आंदोलन में बहुत बढ़चढ़कर हिस्सा लिया लेकिन उनकी मुख्य भूमिका को बस एक पंक्ति में ही समेट दिया जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आजतक महिलाओं के साथ ऐसा ही किया गया है।

हालांकि शाहीन बाग में तिरंगा लहराती और तमाम तरह के क्रांतिकारी गानों को गाती महिलाओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। उन्हें तो इस बात से भी फर्क नहीं पड़ रहा है कि इतिहास उन्हें याद रखेगा या नहीं। ऐसे में दुधमुंहे बच्चों तक को छोड़कर आई इन महिलाओं को सिर्फ सलाम कीजिए। उनकी इस लड़ाई को देखिए, महसूस कीजिए या फिर इस कहानी को सुनाइए और इतिहास में अपना नाम दर्ज कराइए।

Shaheen Bagh
NRC
CAA
BJP
RSS
Amit Shah
Narendra modi
Women protest

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

शाहीन बाग से खरगोन : मुस्लिम महिलाओं का शांतिपूर्ण संघर्ष !

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

CAA आंदोलनकारियों को फिर निशाना बनाती यूपी सरकार, प्रदर्शनकारी बोले- बिना दोषी साबित हुए अपराधियों सा सुलूक किया जा रहा

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल


बाकी खबरें

  • make in india
    बी. सिवरामन
    मोदी का मेक-इन-इंडिया बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा श्रमिकों के शोषण का दूसरा नाम
    07 Jan 2022
    बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गिग कार्यकर्ता नई पीढ़ी के श्रमिक कहे जा सकते  हैं, लेकिन वे सीधे संघर्ष में उतरने के मामले में ऑटो व अन्य उच्च तकनीक वाले एमएनसी श्रमिकों से अब टक्कर लेने लगे हैं। 
  • municipal elections
    फर्राह साकिब
    बिहारः नगर निकाय चुनावों में अब राजनीतिक पार्टियां भी होंगी शामिल!
    07 Jan 2022
    ये नई व्यवस्था प्रक्रिया के लगभग अंतिम चरण में है। बिहार सरकार इस प्रस्ताव को विधि विभाग से मंज़ूरी मिलने के पश्चात राज्य मंत्रिपरिषद में लाने की तैयारी में है। सरकार की कैबिनेट की स्वीकृति के बाद इस…
  • Tigray
    एम. के. भद्रकुमार
    नवउपनिवेशवाद को हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका की याद सता रही है 
    07 Jan 2022
    हिंद महासागर को स्वेज नहर से जोड़ने वाले रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण लाल सागर पर अपने नियंत्रण को स्थापित करने की अमेरिकी रणनीति की पृष्ठभूमि में चीन के विदेश मंत्री वांग यी की अफ्रीकी यात्रा काफी…
  • Supreme Court
    अजय कुमार
    EWS कोटे की ₹8 लाख की सीमा पर सुप्रीम कोर्ट को किस तरह के तर्कों का सामना करना पड़ा?
    07 Jan 2022
    आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग को आरक्षण देने के लिए ₹8 लाख की सीमा केवल इस साल की परीक्षा के लिए लागू होगी। मार्च 2022 के तीसरे हफ्ते में आर्थिक तौर पर कमजोर सीमा के लिए निर्धारित क्राइटेरिया की वैधता पर…
  • bulli bai aap
    सना सुल्तान
    विचार: शाहीन बाग़ से डरकर रचा गया सुल्लीडील... बुल्लीडील
    07 Jan 2022
    "इन साज़िशों से मुस्लिम औरतें ख़ासतौर से हम जैसी नौजवान लड़कियां ख़ौफ़ज़दा नहीं हुईं हैं, बल्कि हमारी आवाज़ और बुलंद हुई है।"
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License