NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
हाशिये पर पड़े समुदायों के लिए सामाजिक कल्याण की योजनायें – लेकिन फण्ड कहां है?
वित्तीय वर्ष 2018-19 से लेकर 2020-21 के बीच में सामजिक न्याय एवं सशक्तिकरण विभाग के लिए बजटीय आवंटन में 16% की कमी कर दी गई है।
दित्सा भट्टाचार्य
23 Sep 2021
Social Welfare Schemes
प्रतीकात्मक चित्र।

अधिकांश राज्य देश में मौजूद अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यकों एवं समाज के आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए आवंटित किये जाने वाले धन का पूर्ण उपयोग नहीं कर रहे हैं। यह जानकारी सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री, ए नारायणस्वामी के द्वारा लोकसभा में पेश किये गए आंकड़ों पर आधारित है। 

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से भारतीय जनता पार्टी के सांसद उपेन्द्र सिंह द्वारा पूछे गए एक प्रश्न का जवाब देते हुए राज्य मंत्री द्वारा सामाजिक कल्याण योजनाओं के संबंध में ये आंकड़े पेश किये गए थे। 

ये आंकड़े देश भर में धन के आवंटन, पूर्ण उपयोग और योजनाओं के क्रियान्वयन के संबंध में उठने वाले कई मुद्दों का खुलासा करते हैं। मंत्री ने हालांकि धन के पूर्ण उपयोग में कमी के पीछे की वजहों के बारे में कोई कारण नहीं बताया, हालांकि इस बारे में सवाल भी पूछा गया था। 

आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन-जाति समुदायों के छात्रों के लिए बनाई गई विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या पिछले तीन वर्षों से यथावत बनी हुई है।

मंत्री ने अपने जवाब में कहा है कि योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के लिए सरकार ने जिला प्रशासन की ओर से वार्षिक निरीक्षण जांच जैसे कदमों को अनिवार्य बनाया हुआ है। इसके अलावा बहुविषयक राज्य स्तरीय सहायता अनुदान समिति द्वारा प्रस्तावों की जांच, खातों का अनिवार्य ऑडिट स्टेटमेंट प्रस्तुतीकरण का काम, उपयोगिता प्रमाणपत्र और नियमित अंतराल पर राष्ट्रीय, स्तर, राज्य स्तर, जिला स्तर पर बैठकें आयोजित कर कार्य प्रगति की समीक्षा करना और क्षेत्रों का दौरा करने के जरिये इस योजना के सफल क्रियान्वयन को सुनिश्चित कराया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा “विभाग तीसरे पक्ष के मूल्यांकन अध्ययनों के माध्यम से योजनाओं के क्रियान्वयन की सामयिक समीक्षा करता है। विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि ये योजनायें अपने वांछित उद्देश्यों को हासिल कर पा रही हैं और इन योजनाओं को जारी रखने की सिफारिश की गई है।”

हालांकि, मंत्री ने इस बारे में विस्तार से नहीं बताया कि कैसे ये योजनायें उन लोगों को मदद पहुंचा रही हैं जो इसके वास्तविक हकदार हैं। या कैसे पिछले कुछ वर्षों के दौरान इन योजनाओं के तहत आवंटित किये जाने वाले धन में लगातार कमी की जा रही है।

दलित मानवाधिकारों के लिए राष्ट्रीय अभियान (एनसीडीएचआर) के मुताबिक, सरकार ने अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति के लिए प्रति वर्ष कुल 7,000 करोड़ रूपये आवंटित किये जाने की घोषणा की थी। इसके लिए अगले 5 वर्षों में 35,000 करोड़ रूपये आवंटित किये जाने की घोषणा की गई थी। हालांकि, वित्तीय वर्ष 2021-22 के बजट में अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए मात्र 3,866 करोड़ रूपये ही आवंटित किये गए हैं, जबकि अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए यह आवंटन 2,146 करोड़ रूपये का ही है। एनसीडीएचआर के मुताबिक, यह रकम छात्रों की बढती मांग को पूरा कर पाने के लिए नाकाफी है।

आंकड़ों पर एक नजर डालने से पता चलता है कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग द्वारा पिछले कुछ वर्षों में आवंटन में लगातार कमी की जा रही है। वित्त वर्ष 2018-19 से 2020-21 के बीच में 16% कम राशि आवंटित की गई है।

पिछले तीन वर्षों के दौरान जनजातीय उप-योजना के लिए विशेष केन्द्रीय सहायता (एससीए से टीएसएस) योजना और ‘अनुसूचित जनजाति के कल्याण के लिए स्वैच्छिक संगठनों को सहायता अनुदान की योजना के तहत जारी की गई धनराशि’ भी कुछ इसी प्रकार का रुझान दर्शाती है।

मंत्री के अनुसार, पीएमयू राज्य समन्वयकों के द्वारा औचक निरीक्षणों और प्राप्त शिकायतों के आधार पर शराब और नशीले पदार्थों के सेवन की रोकथाम के लिए सहायता योजना एवं नशीली दवाओं की मांग में कमी के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीडीडीआर) के तहत कार्यरत 111 संगठनों को सहायता अनुदान रोक दिया गया है। इसी प्रकार से वरिष्ठ नागरिकों के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीएसआरसी) के तहत चल रही 85 परियोजनाओं के काम को रोक दिया गया है और अनुसूचित जातियों के लिए काम करने वाले स्वैच्छिक एवं अन्य संगठनों को सहायता अनुदान योजना के तहत 42 परियोजनाओं को कम कार्य-निष्पादन का दोषी पाया गया है।  

‘आदिवासी शोध संस्थानों को समर्थन’ योजना के तहत जारी किये जाने गये धन में भी 2018-19 से लेकर 2020-21 के बीच में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इसी प्रकार से अधिकांश अन्य सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए भी धन को आवंटित किया गया है।

हालांकि, घटते आवंटन के बावजूद अधिकांश राज्यों द्वारा उन्हें जारी की गई धनराशि के पूर्ण उपयोग के बारे में सूचित नहीं किया है। जारी की गई धनराशि और राज्यों द्वारा रिपोर्ट किये गए इसके पूर्ण उपयोग के बीच में भारी अंतर मौजूद है।

मंत्री ने इसकी कोई वजह नहीं बताई है और न ही उन्होंने इस बात का उल्लेख किया है कि क्या केंद्र सरकार ने इन मदों के बेहतर उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए इस बारे में कोई कदम उठाने को लेकर योजना बना रखी है। एनसीडीएचआर ने कहा है कि इस धन का पूर्ण उपयोग नहीं किया गया, यहां तक कि बजट में इसे एससी और एसटी समुदायों को लाभान्वित करने वाली योजनाओं के तौर पर ही आवंटित किया गया था। संबंधित योजनाओं के लिए आवंटित बजट और उनके वास्तविक उपभोग के बीच के अंतर को “बजट विश्वसनीयता अंतर” के तौर पर परिभाषित किया जाता है। दलित आदिवासी बजट विश्लेषण 2021-22 में उन्होंने कहा है “जैसा कि सबको पता है कि बजटीय आवंटन पहले से ही काफी कम है, लेकिन इसके बावजूद भी यदि ये बजट भी अप्रयुक्त रह जाते हैं तो यह अनिवार्य रूप से प्रभावित समुदायों के प्रति सरकार की विश्वसनीयता और इरादे पर प्रश्नचिन्ह खड़े करता है।”

लोक सभा में जो आंकड़े पेश किये गए हैं वे जवाबों से कहीं ज्यादा प्रश्न खड़े करते हैं। किसी को भी इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करने से नहीं रोका जा सकता है कि क्या केंद्र सरकार और राज्य सरकारें वास्तव में समाज के सबसे उपेक्षित एवं हाशिये ले वर्गों से संबंधित लोगों के उत्थान और सशक्तिकरण के प्रति सही मायने में गंभीर है। 

एनसीडीएचआर के मुताबिक, अनुसूचित जाति के लिए बजट के तहत कुल 1,12,863 करोड़ रूपये के आवंटन और अनुसूचित जनजाति के बजट के तहत 60,247 करोड़ रूपये के आवंटन में काफी अंतर है। अनुसूचित जाति के लिए आवंटित कुल बजट में से सिर्फ 48,397 करोड़ रूपये ही लक्षित योजनाओं (4.5%) के लिए आवंटित किये गए हैं। उसी तरह अनुसूचित जनजाति के लिए यह रकम 27,830 करोड़ रूपये (2.6%) है। इस प्रकार कह सकते हैं कि अधिकांश आवंटन या तो काल्पनिक है या सामान्य प्रकृति का है। 

एनसीडीएचआर द्वारा संकलित आंकड़े इस बात को दर्शाते हैं कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदायों के लिए किया गया आवंटन नीति आयोग के द्वारा निर्धारित मानदंडों से भी कम किया जा रहा है। इस वित्तीय वर्ष में अनुसूचित जातियों के लिए 1,26,259 करोड़ रुपये और अनुसूचित जनजातियों के लिए इसे 79,942 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया है। एडब्ल्यूएससी (अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए योजना) एवं एडब्ल्यूएसटी (अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए आवंटन) के तहत क्रमशः 330 योजनायें एससी के लिए और 326 योजनायें एसटी के लिए आवंटित की गई हैं। अनुसूचित जाति बजट के तहत लक्षित योजनाओं का अनुपात 48,397 करोड़ रूपये के आवंटन के साथ कुल 38% है। इसी प्रकार अनुसूचित जनजाति बजट के तहत इसमें 27,830 करोड़ रूपये के आवंटन के साथ 35% का प्रावधान किया गया है। हालांकि एनसीडीएचआर के मुताबिक, “ये असल में केवल ‘आम योजनायें’ ही हैं, जिसमें एससी और एसटी बजट योजनाओं का सिर्फ मुखौटा पहनाया गया है। ये अनुसूचित जाति एवं अनसूचित जनजाति योजनाओं के तौर पर पात्रता के हकदार नहीं हैं जिनसे इच्छित समुदायों को वाकई में लाभ पहुंचता हो।”

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Social Welfare Schemes for the Marginalised Communities — Where are the Funds?

Dalits
Social Welfare Schemes
Bharatiya Janata Party
Department of Social Justice and Empowerment
National Campaign on Dalit Human Rights

Related Stories

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

बागपत: भड़ल गांव में दलितों की चमड़ा इकाइयों पर चला बुलडोज़र, मुआवज़ा और कार्रवाई की मांग

मेरे लेखन का उद्देश्य मूलरूप से दलित और स्त्री विमर्श है: सुशीला टाकभौरे

गुजरात: मेहसाणा कोर्ट ने विधायक जिग्नेश मेवानी और 11 अन्य लोगों को 2017 में ग़ैर-क़ानूनी सभा करने का दोषी ठहराया

मध्यप्रदेश के कुछ इलाकों में सैलून वाले आज भी नहीं काटते दलितों के बाल!


बाकी खबरें

  • राज वाल्मीकि
    अब साहित्य का दक्षिण टोला बनाने की एक कोशिश हो रही है: जयप्रकाश कर्दम
    13 Feb 2022
    इतवार विशेष: दलित साहित्य और दलित लेखकों के साथ भेदभाव हो रहा है जैसे गांव में होता है न, दलित बस्ती दक्षिण टोला। दलित साहित्य को भी यह मान लीजिए कि यह एक दक्षिण टोला है। इस तरह वे लोग दलित साहित्य…
  • Saharanpur
    शंभूनाथ शुक्ल
    यूपी चुनाव 2022: शांति का प्रहरी बनता रहा है सहारनपुर
    13 Feb 2022
    बीजेपी की असली परीक्षा दूसरे चरण में हैं, जहां सोमवार, 14 फरवरी को वोट पड़ेंगे। दूसरे चरण में वोटिंग सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा, संभल, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, बदायूँ, शाहजहांपुर ज़िलों की विधानसभा…
  • Uttarakhand
    कृष्ण सिंह
    चुनाव 2022: उत्तराखंड में दलितों के मुद्दे हाशिये पर क्यों रहते हैं?
    13 Feb 2022
    अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी दलित समाज के अस्तित्व से जुड़े सवाल कभी भी मुख्यधारा के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्न नहीं रहे हैं। पहाड़ी जिलों में तो दलितों की स्थिति और भी…
  • Modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: अगर आरएसएस न होता...अगर बीजेपी नहीं होती
    13 Feb 2022
    "...ये तो अंग्रेजों की चापलूसी में लगे थे। कह रहे थे, अभी न जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं"
  • election
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: चुनाव आयोग की साख पर इतना गंभीर सवाल!
    13 Feb 2022
    हर हफ़्ते की कुछ खबरें और उनकी बारिकियाँ बड़ी खबरों के पीछे छूट जाती हैं। वरिष्ठ पत्रकार जैन हफ़्ते की इन्हीं कुछ खबरों के बारे में बता रहे हैं। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License