NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
एक तो मंदी की मार ऊपर से महंगाई का वार
लगता है कि मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था पर पूरा का पूरा नियंत्रण खो दिया है- या शायद यह कभी उनके नियंत्रण में थी ही नहीं। 
सुबोध वर्मा
25 Nov 2019
Translated by महेश कुमार
Rice Price

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार अपने विज्ञापनों में लगातार दावा करती रही है कि 2014 के बाद से उनके शासन काल के दौरान आवश्यक वस्तुओं की क़ीमतों को नियंत्रण में रखा जा रहा है, और तथ्य यह है की कुछ पदार्थों विशेष कर खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में लगातार वृद्धि नहीं हुई है, हालांकि कई अन्य वस्तुओं के दाम बढ़े जैसे ईंधन आदि। लेकिन हाल के महीनों में यह सब बदल गया है।

हालांकि थोक की क़ीमतों में स्थिरता बनी हुई है, लेकिन उपभोक्ता स्थानीय दुकानों में जिस भाव में माल ख़रीद रहे हैं वह काफ़ी ज़्यादा है। इसकी पुष्टि सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) द्वारा 310 शहरों और 1,181 चुने गए गांवों के 1,114 बाज़ारों से एकत्र किए गए मूल्य के आंकड़ों की जांच से हो जाती है।

इसमें 12 आवश्यक खाद्य समूहों (जैसे अनाज, दालें, खाना पकाने का तेल, मांस और मछली, आदि) की क़ीमतें एक साल पहले की तुलना में अक्टूबर 2019 में लगभग 8 प्रतिशत की चौंकाने की दर से बढ़ी है। वास्तव में, एक साल पहले मुद्रास्फ़ीति नकारात्मक थी। [नीचे चार्ट देखें]

graph 1_2.JPG

खाद्य पदार्थ किसी भी परिवार के ख़र्च का बड़ा हिस्सा होता है, और ग़रीब परिवारों के लिए (जिसका अर्थ है अधिकांश भारतीय) यह कुल परिवार के बजट का लगभग आधा होता है। इसलिए, बढ़ती खाद्य क़ीमतें परिवार की आर्थिक स्थिति पर बहुत ही बुरा असर डालती हैं, ख़ासकर ग़रीब परिवारों के ऊपर।

एमओएसपीआई का ’वेयरहाउस’ डाटा (ऊपर लिंक किया गया है) भी खाद्य समूह के आधार पर क़ीमतें बताता है। कुछ महत्वपूर्ण खाद्य समूहों में वृद्धि, जो कि अधिकांश भारतीय परिवारों का मुख्य भोजन है, उसका उल्लेख नीचे समग्र चार्ट में किया गया हैं। ध्यान रहे कि व्यावहारिक रूप से सभी खाद्य समूह में पिछले एक साल के मुक़ाबले क़ीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है।

graph 2_0.JPG

वर्तमान में सब्ज़ियों और दालों दोनों को बहुत अधिक मुद्रास्फ़ीति दर का सामना करना पड़ रहा है। पिछले वर्ष की तुलना में सब्ज़ियों की क़ीमतें 26 प्रतिशत की गति से बढ़ रही हैं। यह आपात स्थिति इसलिए भी है कि एक उदासीन सरकार भी घोषणा कर रही है कि क़ीमतों को कम करने के लिए कुछ 1.2 लाख टन प्याज़ का आयात किया जाएगा। यह सरकार के दिवालिया होने का संकेत है क्योंकि देश में प्याज़ की खपत सालाना लगभग 24 मिलियन टन है या कहें कि प्रति माह 2 मिलियन टन है। सच तो यह है कि मामूली 1.2 लाख टन आयात करने से कोई मदद नहीं मिलेगी। इसका मतलब, यह सब सिर्फ़ दिखावा है। दरअसल, इससे निपटने के लिए सरकार के पास कोई सुराग़ ही नहीं है। या कहें कि सरकार में कोई इच्छाशक्ति नहीं है।

अगर आप उपरोक्त चार्ट पर ध्यान दें तो आप देखेंगे कि मांस, मछली, अंडे और दूध जैसे पौष्टिक और आवश्यक प्रोटीन स्रोतों वाली सामग्री की क़ीमतों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। और शाकाहारियों के लिए  प्रोटीन का स्रोत दालें हैं। उच्च क़ीमतों की वजह से इन वस्तुओं की खपत में कमी से विशेषकर बच्चों में, उनके स्वास्थ्य के लिए विनाशकारी परिणाम होंगे। वैसे भी, भारत में कुपोषित बच्चों की संख्या बहुत अधिक है। महंगाई के कारण किसी भी तरह की कमी बहुत ही हानिकारक होगी – जबकि इससे पूरी तरह से बचा जा सकता है।

मंदी के संदर्भ में, इस तरह की मूल्य वृद्धि काफ़ी घातक है। सेंटर ऑफ़ मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के मासिक आंकड़ों के अनुसार, बेरोज़गारी 8 प्रतिशत की दर से अधिक है। ऐसे परिवार जिनके घर में एक बेरोज़गार व्यक्ति है, ऐसे में उनके लिए भोजन के लिए अधिक भुगतान करना काफ़ी असहनीय बात है। इसका मतलब होगा अधिक से अधिक तबाही, क़र्ज़ और बर्बादी का होना। यहां तक कि जो लोग काम में  हैं, उनको भी कमाई में कटौती का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि बाज़ार में मांग काफ़ी कम है। उनके लिए, भोजन पर अधिक ख़र्च करने का मतलब अधिक संकट है।

फिर भी, मोदी सरकार इस व्यापक संकट से अंजान है और उल्टे कॉर्पोरेट जगत को अधिक रियायतें, टैक्स में भारी छूट और उनकी सहायता के लिए अधिक धन मुहैया कराने की घोषणा कर रही है।

सरकार का महंगाई को कम करने का तरीक़ा भी ग़रीबों से अमीरों को संसाधनों को स्थानांतरित करना है। इन हालात में सरकार की अक्षमता और बढ़ती क़ीमतों पर चुप्पी न केवल लोगों के लिए अधिक संकट का कारण बनेगी बल्कि यह स्थिति जनता को सत्ताधारी पार्टी से दूर भी कर देगी। बीजेपी के प्रबंधकों को इस बारे में देर होने से पहले सोच लेना चाहिए? सवाल है कि क्या उनमें सोचने की क्षमता है भी?

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

On Top of Slowdown, Prices Are Now Zooming Up

Food Inflation
Food Prices
PRICE RISE
unemployment
Joblessness
MOSPI
Modi government

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश


बाकी खबरें

  • bose
    प्रबीर पुरकायस्थ
    मोदी सरकार और नेताजी को होलोग्राम में बदलना
    28 Jan 2022
    बोस की सच्ची विरासत को उनकी होलोग्राफिक छवि के साथ खत्म कर देना : बिना किसी सार और तत्व के प्रकाश तथा परछाइयों का खेल। यह लगातार मोदी सरकार की वास्तविक विरासत बनती जा रही है!
  • Taliban
    एम. के. भद्रकुमार
    पश्चिम ने तालिबान का सहयोजन किया 
    28 Jan 2022
    अफगानिस्तान में हो रही घटनाओं पर प्रतिबिंबों की श्रंखला में इस बार के लेख में इंगित  किया गया है कि कैसे पश्चिमी राजनयिकों और तालिबान अधिकारियों के एक कोर ग्रुप के बीच ओस्लो में हुए तीन दिवसीय…
  • up elections
    महेश कुमार
    यूपी चुनाव: पश्चिमी यूपी के लोग क्यों भाजपा को हराना चाहते हैं?
    28 Jan 2022
    पश्चिमी उत्तर प्रदेश राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है और किसान आंदोलन का गढ़ है। चर्चा से तो लगता है कि लोग बदलाव चाहते हैं।
  • fact check
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेकः योगी का दावा ग़लत, नहीं हुई किसानों की आय दोगुनी
    28 Jan 2022
    सदन में कृषि मंत्री का लिखित जवाब और नेशनल सैंपल सर्वे दोनों ही बताते हैं कि यूपी के किसानों की आय में 2015-16 की अपेक्षा मात्र 3 रुपये मासिक की वृद्धि हुई है।
  • covid
    डॉ. ए.के. अरुण
    बजट 2022-23: कैसा होना चाहिए महामारी के दौर में स्वास्थ्य बजट
    28 Jan 2022
    कुछ अपवादों को छोड़ दें तो 85 फ़ीसद अस्पताल और उपचार केन्द्र धन के अभाव में महज़ ढाँचे के रूप में खड़े हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License