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'अंकल सैम' कर रहे हैं आपकी जासूसी : आख़िर इसमें नया क्या है?
हुवाई के उपकरण, अमेरिकी उपकरणों की अपेक्षा ज़्यादा सुरक्षित हैं, जिनमें एनएसए द्वारा बैकडोर लगाए जाने का साबित इतिहास रहा है। जबकि चीन द्वारा अगर हुवाई में एक भी बैकडोर लगाया गया तो कंपनी ख़त्म हो जाएगी। क्योंकि कंपनी की दुनियाभर में कड़ी जांच होती है और इसपर काफ़ी दबाव होता है।
बप्पा सिन्हा
17 Feb 2020
'अंकल सैम' कर रहे हैं आपकी जासूसी

वांशिगटन पोस्ट ने सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी (सीआईए) पर एक पुरानी स्टोरी को दोबारा उठाया है। स्टोरी सीआईए के गुप्त मालिकाना हक़ वाली कंपनी ''क्रिप्टो AG'' के बारे में है। इस बार स्टोरी का शीर्षक ''द इंटेलीजेंस कूप ऑफ द सेंचुरी'' रखा गया है। क्रिप्टो AG एक स्विस कंपनी थी, जो सरकारों को एनक्रिप्टेड संदेश भेजने के लिए ज़रूरी साज़ो-सामान बेचती थी।

इसके ग्राहकों में लातिन अमेरिका की मिलिट्री जुंटा, ईरान, भारत और पाकिस्तान, यहां तक कि वेटिकन भी शामिल था। कंपनी का मालिकाना हक़ गुप्त रूप से सीआईए के पास था। कंपनी द्वारा दिए गए उपकरणों पर सीआईए का प्रभाव होता था, जिसका इस्तेमाल सीआईए संबंधित सरकारों की जासूसी के लिए करती थी।  

नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के क्रिप्टो AG के साथ संबंधों का खुलासा द बाल्टीमोर सन ने 1995 में किया था। ऐसा नहीं है कि अमेरिकी गुप्तचर संस्थाओं द्वारा क्रिप्टोग्राफिक सिस्टम को तोड़ने या मित्र देशों समेत दूसरी सरकारों की जासूसी का यह पहला क़िस्सा हो। लेकिन अब वाशिंगटन पोस्ट ने स्टोरी को दोबारा क्यों उठाया है, इसका तो सिर्फ़ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। जबकि इस कंपनी के उपकरणों का अब इस्तेमाल भी नहीं किया जाता। 

शायद इस स्टोरी का संबंध वाशिंगटन पोस्ट के मालिक जेफ बेजोस की कंपनी अमेज़न से हो सकता है, जिसके हाथ से हाल ही में अमेरिकी सेना का एक 10 बिलियन डॉलर का कांट्रेक्ट निकल गया।

क्रिप्टो AG के उपकरण अब अप्रासंगिक हो चुके हैं। ऐसा ''द बाल्टीमोर सन'' की स्टोरी की वजह से नहीं, बल्कि अब सरकारें और लोग संदेश भेजने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगे हैं। इनके ज़रिये एनक्रिप्टेड संदेश भी भेजे जा सकते हैं। इसलिए अब सीआईए और एनएसए का ध्यान अब इंटरनेट संचार में इस्तेमाल होने वाले हार्डवेयर और सॉफ्टेवयर पर केंद्रित है। लंबे समय से शक जताया जा रहा है कि सीआईए और एनएसए ने नामी कम्यूनिकेशन और एनक्रिप्शन सिस्टम में घुसपैठ की व्यवस्था कर ली है। इन आशंकाओं की पुष्टि एडवर्ड स्नोडेन द्वारा एनएसए की गतिविधियों से संबंधित खुलासों से भी हुई है।

इस शताब्दी की शुरुआत के बाद से ही एनएसए ने अपनी जासूसी गतिविधियों की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया है। इसके तहत संचार उपकरणों, एनक्रिप्शन सॉफ्टवेयर, माइक्रोसॉफ्ट-एपल-एंड्रॉयड जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम, सॉफ्टवेयर प्रोडक्ट जैसे- लोटस नोट्स, माइक्रोसॉफ्ट प्रोडक्ट्स और इंटरनेट सेवाओं में खामियों को खोजकर उनमें ''बैकडोर'' लगाए जाते हैं, ताकि उन्हें भेदा जा सके। स्नोडेन के दस्तावेज़ों के मुताबिक़, एनएसए ने BULLRUN कोडनेम से एक कार्यक्रम चलाया था, जिसका मक़सद एनक्रिप्शन तोड़ना था। इस कार्यक्रम के तहत कंपनियों के साथ मिलकर उनके उत्पादों में ''बैकडोर'' लगाए जाते थे।

गार्डियन के मुताबिक़, इस कार्यक्रम के ज़रिए एनएसए ने ''HTTPS, वॉयस ओवर IP और सेक्योर सॉकेट्स लेयर'' जैसे बड़े स्तर पर उपयोग किए जाने वाले ऑनलाइन प्रोटोकॉल के खिलाफ़ भी अपनी क्षमताएं विकसित कर लीं। बता दें इन प्रोटोकॉल का इस्तेमाल ऑनलाइन ख़रीददारी और बैंकिंग के लिए  होता है।

उदाहरण के लिए, BULLRUN कार्यक्रम के तहत एनएसए ने RSA के साथ मिलकर काम किया। RSA इंटरनेट एनक्रिप्शन प्रदान करने वाली अग्रणी कंपनी है। एनएसए ने RSA के साथ मिलकर, इसके उत्पादों में बैकडोर डाले। इस खुलासे से तकनीकी दुनिया को बड़ा झटका लगा था। RSA का नामकरण, इसके निर्माताओं रॉन रिवेस्ट, एडि शामिर और लियोनार्ड एडेलमैन के उपनामों के शुरूआती शब्दों से मिलाकर किया गया है। हालांकि अब एनएसए द्वारा टेलीकम्यूनिकेशन उपकरणों और इंटरनेट राउटर्स (जैसे सिस्को सिस्टम या जूनिपर नेटवर्क) में बैकडोर लगाना आम हो गया है। 

BULLRUN की गतिविधियां सिर्फ़ व्यावसायिक हॉर्डवेयर या सॉफ्टवेयर तक ही सीमित नहीं थीं। इसके तहत ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर को भी निशाना बनाया गया। ओपन एसएसएल लाइब्रेरी में ''हार्टब्लीड'' नाम का बग पाया गया था। ओपन एसएसएल का इस्तेमाल वेबसाइट पर इंटरनेट कम्यूनिकेशन को सिक्योर करने के लिए होता है। ब्लूमबर्ग ने एक स्टोरी में बताया कि एनएसए को इस बग के बारे में दो साल से पता था। स्टोरी के मुताबिक़, एनएसए ने बग का इस्तेमाल लाखों वेबसाइट की मास्टर की चुराने के लिए किया, ताकि इनके सुरक्षित एनक्रिप्टेड कम्यूनिकेशन को तोड़कर, लोगों और इन वेबसाइट की बातचीत को पढ़ा जा सके।

2017 में विकीलीक्स ने वॉल्ट-7 नाम से दस्तावेज़ों की एक श्रंखला जारी की। इसमें सीआईए द्वारा दुनिया भर में चलाए गए हैकिंग प्रोग्राम की जानकारी थी। इन दस्तावज़ों से पता चला कि सीआईए ने एनएसए की तरह ही एक प्रोग्राम बनाया, जिसका दायरा एनएसए प्रोग्राम के बराबर ही था।

इस प्रोग्राम में 5000 से ज्यादा रजिस्टर्ज यूज़र थे और इसके ज़रिए हजारों हैकिंग सिस्टम, ट्रॉजन्स, वायरस और दूसरे मॉलवेयर हथियार बनाए गए। कहा जाता है कि इस प्रोग्राम में हैकर्स ने जितने कोड का इस्तेमाल किया, वो फेसबुक चलाने के लिए बनाए जाने वाले कोड्स की संख्या से भी ज्यादा थे।

इन औज़ारों के ज़रिए iPhones और एंड्रॉयड फोन, iPads और स्मार्ट टीवी को निशाना बनाकर उन्हें सुनने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कारों और ट्रकों में इस्तेमाल किए जाने वाले आधुनिक व्हीकल कंट्रोल सिस्टम को भी इनसे हैक किया जा सकता है। सीआईए ने इन तकनीकों का विकास व्हॉट्सएप, सिग्नल, टेलीग्राम, विबो, कॉनफॉइड और क्लॉकमैन के एनक्रिप्शन को बॉयपास करने के लिए किया है। इसके तहत इन एप्स को इस्तेमाल करने वाले स्मॉर्टफोन को हैक किया जाता है और इन उपकरणों पर एनक्रिप्शन लगाने के पहले के संदेशों को इकट्ठा किया जाता। इस कार्यक्रम के ज़रिए विडोंज़, लीनक्स जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम और कई तरह के इंटरनेट राउटर्स को निशाना बनाया गया।

सीआईए और एनएसए द्वारा चलाए जाने वाले इन ज़बरदस्त कार्यक्रमों की ताकत को देखते हुए कहा जा सकता है कि व्यवहारिक तौर पर कोई भी डिजिटल डिवाइस या संचार, अमेरिकी इंटेलीजेंस एजेंसियों की शिकारी आंखों के परे नहीं है। इस पृष्ठभूमि में अमेरिकी सरकार द्वारा हुवाई कंपनी को चीन की सरकार के साथ संबंधों की बात कहकर प्रतिबंधित करना बेहद खोखला लगता है।

अमेरिकी सरकार ने भारत सरकार समेत कई यूरोपीय सरकारों पर अगली पीढ़ी के 5G नेटवर्क के लिए हुवाई के उपकरण न ख़रीदने के लिए दबाव बनाया है। इसके लिए अमेरिका ने कंपनी द्वारा जासूसी का हवाला दिया है, जबकि इसके पक्ष में कोई सबूत नहीं दिए। लेकिन मानना होगा कि हुवाई के उपकरण, अमेरिकी उपकरणों की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित हैं, जिनमें एनएसए द्वारा बैकडोर लगाए जाने का साबित इतिहास रहा है। जबकि चीन द्वारा अगर हुवाई में एक भी बैकडोर लगाया गया, तो कंपनी खत्म हो जाएगी। क्योंकि हुवाई के उत्पादों की दुनियाभर में कड़ी जांच होती है और कंपनी पर काफी दबाव होता है।

इसलिए तकनीकी तौर पर बेहतर और सस्ते हुवाई उपकरणों को असुरक्षित अमेरिकी उपकरणों पर तरज़ीह दी जा रही है। तभी अमेरिका के मित्र देश भी अमेरिकी दबाव को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं और हुवाई के उत्पादों को ख़रीद रहे हैं। दरअसल असली कहानी अमेरिका के तकनीकी और इज़्ज़त की लड़ाई हारने की है।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Uncle Sam Is Snooping: So What’s New?

Huawei
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