NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
चुनाव 2022
नज़रिया
विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
यूपी चुनाव: प्रदेश में नहीं टिक सकी कोई भी मुस्लिम राजनीतिक पार्टी
आज़ादी के बाद से आज तक न जाने कितनी मुस्लिम राजनीतिक पार्टियों ने उत्तर प्रदेश के चुनावों में हाथ आजमाया है, लेकिन जनता ने किसी को भी नहीं पसंद किया, अब ओवैसी इस इतिहास को बदल पाते हैं या नहीं, 10 मार्च को पता चलेगा।
रवि शंकर दुबे
15 Feb 2022
यूपी चुनाव:  प्रदेश में नहीं टिक सकी कोई भी मुस्लिम राजनीतिक पार्टी

मुसलमान एक वोट बैंक की तरह एक पार्टी को वोट करता है ये उतना ही सच है जितना यह कि हिंदू एकजुट होकर एक पार्टी को वोट करता है! हिंदुओं की तरह मुस्लिम भी हमेशा अलग-अलग पार्टियों को वोट करता रहा है। ये इसी बात से साबित है कि जिसे हम मुस्लिम बहुल सीट कहते हैं उनपर भी गैर मुस्लिम बड़ी तादाद में जीतते रहे हैं।

ख़ैर जब कुछ दल ख़ासतौर पर भारतीय जनता पार्टी सुबह-शाम हिंदू-मुस्लिम करने में लगी है, ऐसे समय में हम गौर करेंगे कि उत्तर प्रदेश में कभी कोई मुस्लिम राजनीतिक पार्टी क्यों नहीं टिक सकी या पनप सकी। हालांकि यही इस बात की गवाही है कि कट्टरता का ठप्पा झेलने वाले मुसलमानों ने, यूपी में कभी धर्म के नाम पर किसी मुस्लिम पार्टी को नहीं चुना। उसकी पार्टी और लीडर हमेशा गैर मुस्लिम और ख़ासतौर पर धर्मनिरपेक्ष ही रहे हैं चाहे वो कांग्रेस रही हो, समाजवादी पार्टी या बहुजन समाजवादी पार्टी। हेमवती नंदन बहुगुणा रहे हों, नारायण दत्त तिवारी, चौधऱी चरण सिंह, मुलायम सिंह यादव या मायावती या अब अखिलेश यादव। यहां तक कि यूपी में मुस्लिमों की बड़ी तादाद ने अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर बीजेपी को भी चुना।

जनसंख्या की दृष्टि से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है, यही कारण है यहां की सियासत भी बहुत बड़ी है। यहां हर पांच साल में प्रदेश के लिए 403 विधायक चुने जाते हैं, तो देश के लिए 80 सांसद भी यहीं से चुनकर जाते हैं। प्रदेश की जनसंख्या आज 22 करोड़ से ज़्यादा है। इस जनसंख्या का करीब बीस फ़ीसद मुस्लिम आबादी होगी। जिसे आधार बनाकर ही योगी जी ने परोक्ष रूप से 80-20 का नारा उछाला है। कहा जाता है कि राज्य की करीब 143 सीटों पर मुसलमान अपना असर रखते हैं। खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां 122 सीटें हैं। अभी जहां दूसरे दौर में 9 जिलों की 55 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुआ है वहां तो कहा जाता है कि मुसलमान वोटर्स ही नतीजा तय करते हैं। इसके बावजूद मुसलमानों के प्रति समर्पित कोई भी राजनीतिक पार्टी आज़ादी के बाद से आज तक प्रदेश में अपनी स्थाई जगह नहीं बना पाई है, और न ही किसी अन्य पार्टी ने ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार बनाए हैं।

सबसे पहले बात करते हैं “मुस्लिम मजलिस पार्टी” की...

डॉ. अब्दुल जलील फरीदी... आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों से लोहा लेने के बाद इन्होंने जगह-जगह सभाएं करनी शुरू कर दी, जागरुकता अभियान शुरू कर दिया। अपनी सभा में मुसलमानों की भीड़ उमड़ती देख फरीदी ने उत्तर प्रदेश की राजनीतिक में एक बड़े पद की मांग करने लगे, लेकिन ऐसा नहीं होने पर इन्होंने आज़ादी के 20 साल बाद आखिरकार ‘’मुस्लिम मजलिस’’ नाम की राजनीतिक पार्टी बना दी। जिसका मकसद फरीदी ने मुस्लिम बिरादरी को उनका हक दिलवाना बताया।   

पार्टी बनने के एक साल बाद यानी 1969 में विधानसभा चुनाव हुए, इन चुनावों में मुस्लिम मजलिस पार्टी ने दो सीटों पर चुनाव लड़ा और दोनों पर ज़मानत ज़ब्त हो गई। दरअसल फरीदी की पार्टी को दोनों सीटों पर मिलाकर सिर्फ 4000 वोट मिले। साल 1974 में डॉ फरीदी की मौत हो गई और मुस्लिम मजलिस का भी अंत हो गया।  

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग

डॉ. अब्दुल जलील फरीदी की मृत्यु के बाद गुलाम महमूद बनातवाला मुस्लिम नेता के तौर पर उभरने लगे थे, लेकिन इनका मकसद इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को रिचार्ज कर उसे अपने इशारों पर चलाना था। इन्होंने साल 1974 विधानसभा चुनावों में अपने 54 कैंडिडेट उतारे जिसमें 43 की तो ज़मानत ज़ब्त हो गई, बाकि एक सीट पर बेहद कम वोटों से जीत हासिल हुई। चुनावों में नीचे से दूसरे या तीसरे नंबर रहने से टूट चुकी पार्टी सन्नाटे में चली गई। लेकिन करीब 28 साल बाद गुलाम महमूद ने फिर दम भरा और 2002 विधानसभा चुनावों में उन्होंने 18 सीटों पर अपने कैंडिडेट उतार दिए, लेकिन एक पर भी उन्हें जीत हासिल नहीं हुई। रही-सही कसर 2007 के विधानसभा चुनाव में पूरी हो गई, यानी इस बार गुलाम महमूद ने 2 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। दोनों ही सीट हारने के बाद दुबारा ये उत्तर प्रदेश में कभी दिखे नहीं।

नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी

साल 1995 में जब भाजपा से समर्थन लेकर बसपा प्रमुख मायावती मुख्यमंत्री बनीं, तब डॉ मसूद अहमद शिक्षा मंत्री बनाए गए थे, जिसका कारण था मुसलमानों का बसपा को अथाह समर्थन। डॉ मसूद ने शिक्षामंत्री रहते हुए अल्पसंख्यकों के लिए काफी काम भी किया था, लेकिन किसी कारणवश उन्हें कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया गया, जिसके बाद अपनी बेज्जती का बदला लेने के लिए डॉ मसूद अहमद ने साल 2002 में नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी यानी नेलोपा बनाई।

खुद को मुसलमानों का नेता बताकर डॉ मसूद अहमद ने अपनी पार्टी के 130 उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारे, लेकिन यूपी की जनता के मतों ने 126 सीटों पर नेलोपा की ज़मानत ज़ब्त करवा दी। जबकि सिर्फ एक सीट पर जीत मिली। हार से निराश डॉ मसूद ने साल 2007 में सिर्फ 10 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे और सभी की ज़मानत ज़ब्त हो गई, जिसके बाद डॉ मसूद जयंत चौधरी की पार्टी रालोद में विलय हो गए।

यूपी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट

दिल्ली में मौजूद देश के मुसलमानों का सबसे बड़ा इबादत घर जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ने भी यूपी की राजनीति में गोते लगाए हैं, हालांकि कोई सफलता नहीं मिली। साल 2007 में सैयद अहमद बुखारी ने अपनी यूपी डेमोक्रेटिक फ्रंट के 54 प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था। सैयद अहमद बुखारी के 54 में से सिर्फ एक प्रत्याशी को जीत मिली जबकि 51 सीटों पर ज़मानत ज़ब्त हो गई। इस शर्मनाक हार के बाद अहमद बुखारी उत्तर प्रदेश से गायब हो गए।

पीस पार्टी

नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के उपाध्यक्ष रहे डॉ अय्यूब सर्जन ने साल 2008 में पीस पार्टी का गठन किया। डॉ अय्यूब ने राजनीति का एक अलग रास्ता अख्तियार किया और गांव-गांव जाकर मुसलमानों के मुद्दों को समझा। बारीकी से मुसलमानों को परखने के बाद साल 2012 के चुनाव में इन्होंने 208 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और सिर्फ 4 विधानसभा सीटें जीतीं। उम्मीदों से कम सीटें जीत पीस पार्टी ने साल 2017 में एक बार फिर दम भरा लेकिन इस बार खाता तक नहीं खुला।

अब बात AIMIM यानी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन की

मुसलमानों के लिए बनाई गई राजनीतिक पार्टियों में अब तक सबसे बड़ी और मशहूर AIMIM ही है, इस पार्टी ने साल 2017 में यूपी की 38 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन एक भी सीट पर जमानत नहीं बच सकी।

लेकिन अब साल 2022 में पार्टी के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी नई तैयारियों के साथ आए हैं, उन्होंने 403 सीटों में से 100 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। हालांकि ओवैसी के तेवर के हिसाब से पहले और दूसरे चरण में कामयाबी जरा कम दिख रही है, लेकिन वक्त अभी बाकी है, ऐसे में देखना होगा कि बाबू सिंह कुशवाहा की जन अधिकार पार्टी और भारत मुक्ति मोर्चा के साथ मिलकर ये कहां तक जा पाते हैं।

हालांकि सिर्फ़ पार्टी का सवाल नहीं है, सवाल यह है कि आज़ादी के आंदोलन में बराबर की भागीदारी रखने वाले मुसलमान अभी तक सबसे बड़े प्रदेश में अपना राजनीतिक अस्तित्व क्यों नहीं बना पाए हैं, इन राजनीतिक पार्टियों के अलावा भी अगर हम आज़ादी के बाद से प्रदेश में मुसलमान प्रतिनिधियों की संख्या पर नज़र डालें तो बेहद कम है..

आज़ादी से अभी तक चुने गए मुस्लिम विधायक

भले ही राजनीति में मुस्लिमों की भागीदारी को ज्यादा तरजीह न दी जाती हो, लेकिन मुसलमान वोटर को भी पूरा हक़ है कि वह अपनी मांगों को रखते हुए वोट करे।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक

· यूपी की 143 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर का असर है।
· करीब 70 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 से 30 प्रतिशत के बीच है।
· 43 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है।
· यूपी की 36 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम प्रत्याशी अपने बूते जीत हासिल कर सकते हैं।
· 107 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम जीत हार तय कर सकते हैं।
· मौजूदा विधानसभा में 23 मुस्लिम विधायक हैं, यह संख्या बीते 50 साल में सबसे कम है।  
 

UP ELections 2022
Muslim
right wing politics
FREEDOM

Related Stories

सियासत: अखिलेश ने क्यों तय किया सांसद की जगह विधायक रहना!

यूपी चुनाव नतीजे: कई सीटों पर 500 वोटों से भी कम रहा जीत-हार का अंतर

यूपी के नए राजनीतिक परिदृश्य में बसपा की बहुजन राजनीति का हाशिये पर चले जाना

यूपी चुनाव: कई दिग्गजों को देखना पड़ा हार का मुंह, डिप्टी सीएम तक नहीं बचा सके अपनी सीट

जनादेश—2022: वोटों में क्यों नहीं ट्रांसलेट हो पाया जनता का गुस्सा

जनादेश-2022: यूपी समेत चार राज्यों में बीजेपी की वापसी और पंजाब में आप की जीत के मायने

यूपी चुनाव: प्रदेश में एक बार फिर भाजपा की वापसी

यूपी चुनाव: रुझानों में कौन कितना आगे?

यूपी चुनाव: इस बार किसकी सरकार?

यूपी चुनाव: नतीजों के पहले EVM को लेकर बनारस में बवाल, लोगों को 'लोकतंत्र के अपहरण' का डर


बाकी खबरें

  • MGNREGA
    सरोजिनी बिष्ट
    ग्राउंड रिपोर्ट: जल के अभाव में खुद प्यासे दिखे- ‘आदर्श तालाब’
    27 Apr 2022
    मनरेगा में बनाये गए तलाबों की स्थिति का जायजा लेने के लिए जब हम लखनऊ से सटे कुछ गाँवों में पहुँचे तो ‘आदर्श’ के नाम पर तालाबों की स्थिति कुछ और ही बयाँ कर रही थी।
  • kashmir
    सुहैल भट्ट
    कश्मीर में ज़मीनी स्तर पर राजनीतिक कार्यकर्ता सुरक्षा और मानदेय के लिए संघर्ष कर रहे हैं
    27 Apr 2022
    सरपंचों का आरोप है कि उग्रवादी हमलों ने पंचायती सिस्टम को अपंग कर दिया है क्योंकि वे ग्राम सभाएं करने में लाचार हो गए हैं, जो कि जमीनी स्तर पर लोगों की लोकतंत्र में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए…
  • THUMBNAIL
    विजय विनीत
    बीएचयू: अंबेडकर जयंती मनाने वाले छात्रों पर लगातार हमले, लेकिन पुलिस और कुलपति ख़ामोश!
    27 Apr 2022
    "जाति-पात तोड़ने का नारा दे रहे जनवादी प्रगतिशील छात्रों पर मनुवादियों का हमला इस बात की पुष्टि कर रहा है कि समाज को विशेष ध्यान देने और मज़बूती के साथ लामबंद होने की ज़रूरत है।"
  • सातवें साल भी लगातार बढ़ा वैश्विक सैन्य ख़र्च: SIPRI रिपोर्ट
    पीपल्स डिस्पैच
    सातवें साल भी लगातार बढ़ा वैश्विक सैन्य ख़र्च: SIPRI रिपोर्ट
    27 Apr 2022
    रक्षा पर सबसे ज़्यादा ख़र्च करने वाले 10 देशों में से 4 नाटो के सदस्य हैं। 2021 में उन्होंने कुल वैश्विक खर्च का लगभग आधा हिस्सा खर्च किया।
  • picture
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अर्जेंटीना ने लिया 45 अरब डॉलर का कर्ज
    27 Apr 2022
    अर्जेंटीना की सरकार ने अपने देश की डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के साथ 45 अरब डॉलर की डील पर समझौता किया। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License