NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
उत्तराखंड : राज्य उत्सव से जनता नदारद 
राज्य उत्सव से जनता क्यों नदारद है? आम जनता के सवाल क्यों नदारद है ? ये राज्य का उत्सव है या भाजपा का?
वर्षा सिंह
06 Nov 2019
dehradun

अगर ऊंचे स्वर में बोलने और बड़े-बड़े सम्मेलन करने से, विकास संभव है तो समझिए कि उत्तराखंड का विकास हो गया है। राज्य स्थापना दिवस पर सरकार हफ्ते भर का जश्न मना रही है। जश्न के सारे डेस्टिनेशन पर्वतीय जिलों में तय किए गए हैं। राज्य के बाहर बसे उत्तराखंडियों के साथ सरकार विकास के मुद्दे पर मंथन कर रही है। सरकार ने एक बार फिर वही पुराना “आवा अपणा घौर” का नारा दिया है।
 
लेकिन गांव-घर छोड़ गए लोगों की वापसी का रोडमैप क्या है, इस पर अब भी काम होना है। राज्य उत्सव से जनता क्यों नदारद है, ये सवाल जनता के हैं। और तो और राज्योत्सव में राज्य के लिए शहीद हुए परिवार के लोगों को तो बुला लेते, ये सवाल राज्य आंदोलनकारियों के हैं। ये राज्य का उत्सव है या भाजपा का?
 
राज्य उत्सव के कार्यक्रम

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बताया कि स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रमों में उत्तराखंड के भविष्य से जुड़ी हर रणनीति पर मंथन किया जाएगा। "राज्य स्थापना सप्ताह" मनाने का भी यही उद्देश्य है। देश-विदेश में बसे उत्तराखंड के लोगों को उनके गांव से जुड़ने की मुहिम के तहत 3 से 9 नवंबर तक राज्य के अलग-अलग जगहों पर कार्यक्रम चल रहे हैं। 3 नवंबर को टिहरी में रैबार कार्यक्रम किया गया, जिसमें सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। 4 नवंबर को देहरादून में सैनिक सम्मेलन किया गया। 6 नवंबर को श्रीनगर-गढ़वाल में मातृशक्ति सम्मेलन किया जा रहा है, जिसमें अभिनेत्री हिमानी शिवपुरी खास तौर पर आमंत्रित की गईं। 7 नवंबर को अल्मोड़ा में युवा सम्मेलन किया जा रहा है। जिसमें खास मेहमान के तौर पर बॉलीवुड से दीपक डोबरियाल आ रहे हैं। 8 नवंबर को मसूरी में फिल्म कॉनक्लेव होगा और 9 नवंबर को देहरादून में भारत-भारती कार्यक्रम।
 
लोगों के साथ सरकार का डायलॉग क्यों नहीं

एजुकेट गर्ल्स ग्लोबली संस्था से जुड़ी दीपा कौशलम राज्य भर में यात्राएं करती हैं। वह कहती हैं कि जो केंद्र में हो रहा है, वही राज्य में हो रहा है। बहुत बड़े-बड़े आयोजन हो रहे हैं, बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं। विजुअली दिमाग पर असर डालने वाली चीजें क्रिएट की जा रही हैं। लेकिन जब हम देखते हैं तो वास्तव में कोई बहुत बदलाव दिखता नहीं है। क्योंकि हमारे पास कोई नीति ही नहीं है।
 
दीपा कहती हैं कि राज्य की जरूरतों को समझा ही नहीं जा रहा है। समस्या तो यहां है। आप रैबार जैसा कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं और बाहर से लोगों को बुलाकर चर्चा कर लेते हैं। जो कार्यक्रम समुदाय के लिए है, उसमें समुदाय को ही नहीं बुलाया जाता। वे सवाल पूछती हैं कि लोग क्यों वापस पहाड़ में अपने घरों में आएंगे। बल्कि जो लोग पहाड़ों में रह रहे हैं, अभी तो उनका ही रहना मुश्किल है। दीपा कहती हैं कि सरकार का आम लोगों के साथ डायलॉग ही नहीं है, बातचीत नहीं है, फिर सरकार में शामिल लोगों को पता कैसे चलेगा कि समस्या क्या है, लोग क्या चाहते हैं।
 
वह कहती हैं कि हिमानी शिवपुरी उत्तराखंड की महिलाओं की समस्या के बारे में क्या बताएंगी। मैं फील्ड पर अपने सर्वेक्षणों के दौरान महिलाओं की दिक्कतें देखती हूं। खुद लोगों को रोते हुए देखती हूं।
 
राज्य उत्सव या भाजपा का उत्सव

राज्य आंदोलनकारी मंच के जिलाध्यक्ष प्रदीप कुकरेती कहते हैं कि राज्य-उत्सव की शुरुआत टिहरी से की गई, वो गैरसैंण से भी हो सकती थी। फिर रैबार-2 के आयोजन के चलते कोटी कॉलोनी क्षेत्र के आसपास काम करने वाले स्थानीय लोग बेगार हो गए। कड़ी सुरक्षा के चलते उनकी दो दिन की रोजी-रोटी प्रभावित हुई। प्रदीप कहते हैं कि ये किस तरह का उत्सव है जिसमें लोगों को शामिल नहीं किया गया। टिहरी के स्थानीय जन प्रतिनिधियों तक को नहीं बुलाया गया। और कुछ नहीं तो कम से कम शहीद आंदोलनकारियों के परिवारों को तो निमंत्रण दे देते। सरकारी विज्ञापनों में ही ये लिखवा देते कि राज्य के लिए शहीद होने वालों को श्रद्धांजलि। राज्योत्सव में किसी अन्य राजनीतिक दल को नहीं बुलाया गया। वह कहते हैं कि ये तो सिर्फ भाजपा का उत्सव बन गया।
 
सरकार के दो और दफ्तर देहरदून हो रहे शिफ्ट

ठीक इसी समय जब सरकार ख्यातिप्राप्त उत्तराखंडियों के साथ पलायन रोकने जैसे मुद्दों पर समारोह कर रही है। राज्य के दो अहम दफ्तर पहाड़ से मैदान को उतर आए। अल्मोड़ा में राज्य के सहकारी विभाग का मुख्यालय है। जिसे अब देहरादून लाने का फ़ैसला कर लिया गया है। वहीं, वन विभाग ने मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) गढ़वाल का दफ्तर पौड़ी से देहरादून लाए जाने की पूरी तैयारी कर ली है। जबकि ये तय किया गया था कि स्थायी राजधानी जब तक तय नहीं होती, ये कार्यालय पौड़ी-गढ़वाल और अल्मोड़ा में रहेंगे।

सहकारिता विभाग के सचिव आर मीनाक्षी सुंदरम ने आदेश जारी कर कहा कि जनहित और शासकीय हित में उत्तराखंड सहकारी समिति कार्यालय को देहरादून मुख्यालय में स्थानांतरित किया गया है। उधर, अल्मोड़ा में इसका विरोध हो रहा है और कहा जा रहा है कि सरकार अफसरशाही के आगे झुक गई है और जन विरोधी फैसले ले रही है।

राज्य आंदोलनकारी मंच के जिलाध्यक्ष प्रदीप कुकरेती कहते हैं कि जब हमारा राज्य उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, उस समय डीआईजी या कमिश्नर पौड़ी में बैठते थे, राज्य बनने के बाद से वे देहरादून आ गए। फिर उन्हें डीआईजी गढ़वाल क्यों कहते हैं? नेता-अफसर खुद तो पलायन कर  मैदानों में आ गए हैं। इसीलिए उन्हें पहाड़ की मुश्किलों का अंदाज़ा नहीं है। वे शहीद आंदोलनकारियों के परिवारों को पेंशन न देने का मुद्दा भी उठाते हैं और बताते हैं कि आज तक मात्र 3 परिवारों को ही पेंशन मिल रही है। वो भी सचिवालय के कई चक्कर काटने के बाद।
 
इधर, पौड़ी का एक और गांव घोस्ट विलेज में तब्दील हो गया। यमकेश्वर के द्वारीखाल ब्लॉक के  बेसुखी गांव के 55 परिवार मूलभूत सुविधाओं के अभाव में एक-एक कर पलायन कर गए। अब यहां जंगली जानवर रह रहे हैं। कोटद्वार से विधायक डॉ हरक सिंह रावत कहते हैं कि पलायन रोकने के लिए पिछले ढाई साल में सरकार ने कई योजनाएं बनाई हैं। अब हम इन योजनओं को लागू करेंगे।
 
दरअसल, आवा अपणा घौर....का नारा बुलंदकर एक बार फिर वही सारी बातें कही जा रही हैं, जो दो वर्ष पहले भी कही गईं। पलायन रोकने के लिए पलायन आयोग के दिए इनपुट्स पर कोई काम नहीं हुए। दो साल पहले गठित पलायन आयोग की अब तक मात्र एक बैठक हुई है। यहां तक कि पलायन आयोग में अभी तक पांच सदस्य नामित नहीं हुए हैं। 

राज्य सरकार टिहरी, अल्मोड़ा, पौड़ी, मसूरी, टिहरी में जश्न के सम्मेलन कर रही है और इसी समय में अल्मोड़ा और पौड़ी से दो महत्वपूर्ण सरकारी दफ्तर देहरादून शिफ्ट कर दिए गए। ताकि अफसरों को पहाड़ में न रहना पड़े। वे आराम से देहरादून में रह सकें। जो सरकार खुद पहाड़ में अपने घरों में नहीं चढ़ना चाह रही, वो फिर कैसे लोगों को वापस बुला रही है। अपने कार्यकाल का आधा सफ़र तय कर चुकी त्रिवेंद्र सरकार अपने वादे आधे भी नहीं निभा पायी है। समय आ गया है कि पलायन रोकने के लिए जो योजनाएं सरकार ने बनाईं हैं, उन्हें अमल में लाया जाए। राज्य के उत्सव में राज्य की जनता खुद को शामिल महसूस कर सके।
 

Uttrakhand
uttarkhnad rajy utsav
utrakhnd raibar
puadi gadwaal
utrakahnd people

Related Stories

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

उत्तराखंड: क्षमता से अधिक पर्यटक, हिमालयी पारिस्थितकीय के लिए ख़तरा!

दिल्ली से देहरादून जल्दी पहुंचने के लिए सैकड़ों वर्ष पुराने साल समेत हज़ारों वृक्षों के काटने का विरोध

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव परिणाम: हिंदुत्व की लहर या विपक्ष का ढीलापन?

उत्तराखंड में बीजेपी को बहुमत लेकिन मुख्यमंत्री धामी नहीं बचा सके अपनी सीट

EXIT POLL: बिग मीडिया से उलट तस्वीर दिखा रहे हैं स्मॉल मीडिया-सोशल मीडिया

उत्तराखंड चुनाव: एक विश्लेषण: बहुत आसान नहीं रहा चुनाव, भाजपा-कांग्रेस में कांटे की टक्कर

उत्तराखंड चुनाव: भाजपा के घोषणा पत्र में लव-लैंड जिहाद का मुद्दा तो कांग्रेस में सत्ता से दूर रहने की टीस

उत्तराखंड चुनाव: मज़बूत विपक्ष के उद्देश्य से चुनावी रण में डटे हैं वामदल

बजट 2022: क्या मिला चुनावी राज्यों को, क्यों खुश नहीं हैं आम जन


बाकी खबरें

  • रवि कौशल
    डीयूः नियमित प्राचार्य न होने की स्थिति में भर्ती पर रोक; स्टाफ, शिक्षकों में नाराज़गी
    24 May 2022
    दिल्ली विश्वविद्यालय के इस फैसले की शिक्षक समूहों ने तीखी आलोचना करते हुए आरोप लगाया है कि इससे विश्वविद्यालय में भर्ती का संकट और गहरा जाएगा।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पश्चिम बंगालः वेतन वृद्धि की मांग को लेकर चाय बागान के कर्मचारी-श्रमिक तीन दिन करेंगे हड़ताल
    24 May 2022
    उत्तर बंगाल के ब्रू बेल्ट में लगभग 10,000 स्टाफ और सब-स्टाफ हैं। हड़ताल के निर्णय से बागान मालिकों में अफरा तफरी मच गयी है। मांग न मानने पर अनिश्चितकालीन हड़ताल का संकेत दिया है।
  • कलिका मेहता
    खेल जगत की गंभीर समस्या है 'सेक्सटॉर्शन'
    24 May 2022
    एक भ्रष्टाचार रोधी अंतरराष्ट्रीय संस्थान के मुताबिक़, "संगठित खेल की प्रवृत्ति सेक्सटॉर्शन की समस्या को बढ़ावा दे सकती है।" खेल जगत में यौन दुर्व्यवहार के चर्चित मामलों ने दुनिया का ध्यान अपनी तरफ़…
  • आज का कार्टून
    राम मंदिर के बाद, मथुरा-काशी पहुँचा राष्ट्रवादी सिलेबस 
    24 May 2022
    2019 में सुप्रीम कोर्ट ने जब राम मंदिर पर फ़ैसला दिया तो लगा कि देश में अब हिंदू मुस्लिम मामलों में कुछ कमी आएगी। लेकिन राम मंदिर बहस की रेलगाड़ी अब मथुरा और काशी के टूर पर पहुँच गई है।
  • ज़ाहिद खान
    "रक़्स करना है तो फिर पांव की ज़ंजीर न देख..." : मजरूह सुल्तानपुरी पुण्यतिथि विशेष
    24 May 2022
    मजरूह सुल्तानपुरी की शायरी का शुरूआती दौर, आज़ादी के आंदोलन का दौर था। उनकी पुण्यतिथि पर पढ़िये उनके जीवन से जुड़े और शायरी से जुड़ी कुछ अहम बातें।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License