NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
विश्वविद्यालयों में भेदभाव रोकने के लिए नए अध्ययन में नीतिगत उपायों की सिफारिश
ये अध्ययन अपनी तरह का पहला अध्ययन है। इसमें पाया गया है कि हाशिए के समाज के लोग विश्वविद्यालयों में स्थिति क्या हैI
पी.जी. अम्बेडकर
16 Feb 2018
पुणे यूनिवर्सिटी
Image Courtesy: DNA India

हमारे विश्वविद्यालय कितना समावेशी हैं? विश्वविद्यालयों में किस प्रकार के संवाद हो रहे हैं जो कि तेज़ी से विविध हो रहे हैं? 12 फरवरी को दिल्ली में जारी की गई ये नई रिपोर्ट इन्हीं सवालों के जवाब तलाश रही है।

संगीत कामत, अनघा तंबे, स्वाति दयाहादरोय, सिल्विया हर्टाडो और ज़़िमेना यू. ज़ुनिगा ने इस रिपोर्ट को तैयार किया है। इसका नाम 'इंक्लूसिव यूनिवर्सिटिजः लिंकिंग डायवर्सिटी,इक्विटी एंड एक्सेलेंस फॉर द 21 सेंचुरी' दिया है। ये रिपोर्ट ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब देता है। ये रिपोर्ट पुणे विश्वविद्यालय और मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट विश्वविद्यालय के संयुक्त अध्ययन का परिणाम है।

भारत में देखा गया है कि पिछले 20 वर्षों में उच्च शिक्षा के लिए छात्रों ने भारी संख्या में दाख़िला लिया है। छात्रों की संख्या में इस वृद्धि ने हाशिए पर मौजूद समाज के छात्रों के लिए निहित चुनौतियों को उजागर किया है। इनमें से कुछ ने तो पहली बार विश्वविद्यालय का चेहरा देखा है।

शैक्षिक संस्थानें विश्वविद्यालयी सीमा से बाहर मौजूद सामाजिक ढांचे और महंतशाही की प्रतिकृति और प्रतिबिंबित करते हैं। ये दोनों उस वक्त तक अलग-अलग नहीं हो सकते हैं जब तक कि हितधारकों द्वारा सक्रिय हस्तक्षेप नहीं किया जाता है। विश्वविद्यालयों में चुनौतियां और ऐसी समस्याओं का समाधान करने के लिए पर्याप्त नीतिगत उपायों की आवश्यकता क्या है इसे समझने के क्रम में अब तक कोई व्यापक अध्ययन नहीं हुआ है।

बड़े पैमाने पर ये अध्ययन पहली बार किसी उच्च शैक्षणिक संस्था में विशेष सामाजिक समूहों के समक्ष चुनौती और अवसरों के अधिकतम उपयोग करने में आने वाली समस्याओं को समाहित करता है। इस सर्वे के लिए पुणे विश्वविद्यालय के क़रीब 2000 स्नातकोत्तर छात्रों पर अध्ययन किया गया। इसके बाद अध्ययन के गुणात्मक पहलुओं को सामने लाने के लिए फोकस ग्रुप डिस्कशन (एफजीडी) किया गया। लॉस एंजिल्स स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सिल्विया हर्टाडो और अन्य द्वारा विकसित 'कैम्पस क्लाइमेट फ्रेमवर्क मॉडल'पर इस अध्ययन की अवधारणा थी। "कैम्पस क्लाइमेट रिसर्च" का यह मॉडल उच्च शिक्षा में छात्र की सफलता और शैक्षणिक उपलब्धियों में नस्लीय भेदभाव को समझने की कोशिश करता है। और भारतीय संदर्भ में 'कैम्पस क्लाइमेट मॉडल' का इस्तेमाल जाति और लिंग के मतभेदों को समझने के लिए किया गया था।

टेबल 1

स्रोत्र: अध्ययन 

अध्ययन में पाया गया है कि लगभग 50 प्रतिशत छात्र ऐसे थे जो पहली बार किसी कॉलेज में दाख़िला लिए और क़रीब 60 प्रतिशत से अधिक छात्र वित्तीय सहायता के लिए सरकार या विश्वविद्यालय पर निर्भर हैं। इस अध्ययन में पाया गया कि ज़्यादातर छात्र 'एक के बजाय कई मामलों में पिछड़े' हैं। उदाहरण के लिए अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंध रखने वाले छात्र ज़्यादातर "कम आय वाले और ग्रामीण परिवारों से, क्षेत्रीय भाषाई स्कूलों से, और पहली पीढ़ी के छात्र हैं।"

इस अध्ययन में पाया गया कि विश्वविद्यालय में आने वाले पुरुष छात्र महिलाओं के मुकाबले निम्न प्रतिष्ठित परिवारों के थे। इस रिपोर्ट में क़ानून, प्रबंधन तथा प्रौद्योगिकी जैसे पेशेवर डिग्री में "सामाजिक असमानताएं" पाई गई। यह अध्ययन उस प्रवृत्ति को शामिल करता है और उस पाठ्यक्रम को भी दर्शाता है जिनके "निम्न व्यावसायिक हैसियत" हैं उनमें "आरक्षित श्रेणी"वाले छात्रों की सबसे ज़्यादा संख्या है।

टेबल 2

स्रोत्र: अध्ययन 

कक्षाओं और विश्वविद्यालयों में छात्रों की भागीदारी को कौन सा कारक प्रभावित किया?

अंग्रेजी में धाराप्रवाह बातचीत करने की क्षमता विश्वविद्यालयी जीवन अर्थात शैक्षिक और सामाजिक जीवन पर छात्रों के प्रदर्शन पर महत्वपूर्ण असर था। हालांकि छात्रों ने कहा कि उनकी शैक्षिक क्षमता या उनके दृढ़ संकल्प और आकांक्षाओं का छात्रों के आकलन पर इसका कोई असर नहीं था।"

छात्रों को बेहतर करने के लिए रोल मॉडल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वंचित समुदायों के छात्रों के लिए यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। इस अध्ययन से पता चलता है कि छात्रों के बीच हुई जनसांख्यिकीय परिवर्तन का बावजूद वे प्राध्यपकों में शामिल नहीं किए गए। अध्ययन में पाया गया है कि "प्राध्यापक सदस्य ज़्यादातर पुरूष, अगड़ी जाति और शहरके कॉलेज से शिक्षित परिवारों से होते हैं।"

अध्ययन ने इस पहलू पर भी ग़ौर किया। सर्वे में पाया गया कि 56% छात्रों ने कहा कि उनके शिक्षकों की उनसे काफी ज़्यादा अपेक्षाएं थी और 43% छात्रों ने कहा कि प्राध्यापक ने उन्हें कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित किया। लेकिन इस अध्ययन में यह भी सामने आया है कि "सामाजिक न्याय या विवादास्पद मुद्दों" जैसे मसलों पर "कक्षा में चर्चा के लिए छात्रों को प्राध्यापक संभवतः शामिल करना नहीं चाहते हैं।"

प्रगतिशील सामाजिक न्याय नीतियों के परिणामस्वरूप भारतीय विश्वविद्यालय हमारे बेहद विविध राष्ट्र का अब एक सूक्ष्म जगत बन गया है। यह वही स्थान है जहां हमारे पूर्वाग्रहों और गलत धारणाओं को स्पष्ट किया जाता है या हम पहली बार "दूसरों" से सीखते हैं। इस सर्वे से पता चलता है कि "छात्रों के बीच बड़े पैमाने पर अंतरजातीय बातचीत होती है और क़रीब80% छात्रों का कहना है कि वे भिन्न जाति पृष्ठभूमि के छात्रों के साथ अक्सर बातचीत करते हैं। हालांकि, (... ..) इन आंकड़ों से पता चलता है कि पुरूषों तथा महिलाओं, विभिन्न भाषाई समूहों, तथा घरेलू एवं अतंरराष्ट्रीय छात्रों के बीच संवाद और संचार बेहद कम और मुश्किल से होता है।" इस अध्ययन में कक्षा के माहौल और छात्रों के सीखने की आदतों को भी शामिल किया गया।

इस अध्ययन में यह अनुशंसा की गई है कि "केवल समावेशी संस्थागत वातावरण जो असुविधा, असमानताओं और मतभेदों के प्रति उत्तरदायी है, उच्च शिक्षा में उत्कृष्टता और उच्च मानकों के राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं" और चेतावनी दी गई है कि "संस्थागत दूरदर्शिता और नेतृत्व के बिना रचनात्मक विविधता असमानता, विशेषाधिकार और बहिष्कार की ऐतिहासिक प्रतिरूप को उत्पन्न कर सकती है।"

"स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे" के आदर्शों को प्राप्त करने के लिए इस अध्ययन में समय पर दिए गए सुझावों को नीति निर्माताओं और विश्वविद्यालय प्रशासकों द्वारा ध्यान देने की ज़रूरत है जो संविधान की आत्मा में निहित हैं।

उच्च शिक्षा
जाति व्यवस्था
जातिगत भेदभाव

Related Stories

मौजूदा सरकार एक डरपोक सरकार है: छात्र नेता, पूजा शुक्ला

मणिपुर विश्वविद्दालय: राज्य सरकार ने कुलपती पर लगे आरोपों की जाँच की माँग की

बीजेपी सरकार की 'वैदिक शिक्षा बोर्ड' गठन करने की योजना

मणिपुर विश्वविद्यालय: कुलपति के खिलाफ छात्र और शिक्षक भूख हड़ताल पर

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

विशेषज्ञों के मुताबिक उच्च शिक्षा आयोग संस्थानों की स्वायत्तता को प्रभावित करेगा

छात्र संगठनों ने कहा, वायवा वॉयस पर यूजीसी का पीछे हटना एक आंशिक जीत; पूर्ण रोलबैक तक लड़ना जारी रहेगा

छात्र शांतिपूर्ण तरीके से अपना आन्दोलन जारी रख सकते हैं : TISS की हड़ताल पर बॉम्बे हाई कोर्ट

दिल्ली में हज़ारों छात्रों और शिक्षकों ने उच्च शिक्षा को बचाने के लिए किया प्रदर्शन

तेरी, मेरी, सबकी बात (एपिसोड 6) - शिक्षा की बात


बाकी खबरें

  • अनिल सिन्हा
    उत्तर प्रदेशः हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं जनमत के अपहरण को!
    12 Mar 2022
    हालात के समग्र विश्लेषण की जगह सरलीकरण का सहारा लेकर हम उत्तर प्रदेश में 2024 के पूर्वाभ्यास को नहीं समझ सकते हैं।
  • uttarakhand
    एम.ओबैद
    उत्तराखंडः 5 सीटें ऐसी जिन पर 1 हज़ार से कम वोटों से हुई हार-जीत
    12 Mar 2022
    प्रदेश की पांच ऐसी सीटें हैं जहां एक हज़ार से कम वोटों के अंतर से प्रत्याशियों की जीत-हार का फ़ैसला हुआ। आइए जानते हैं कि कौन सी हैं ये सीटें—
  • ITI
    सौरव कुमार
    बेंगलुरु: बर्ख़ास्तगी के विरोध में ITI कर्मचारियों का धरना जारी, 100 दिन पार 
    12 Mar 2022
    एक फैक्ट-फाइंडिंग पैनल के मुतबिक, पहली कोविड-19 लहर के बाद ही आईटीआई ने ठेके पर कार्यरत श्रमिकों को ‘कुशल’ से ‘अकुशल’ की श्रेणी में पदावनत कर दिया था।
  • Caste in UP elections
    अजय कुमार
    CSDS पोस्ट पोल सर्वे: भाजपा का जातिगत गठबंधन समाजवादी पार्टी से ज़्यादा कामयाब
    12 Mar 2022
    सीएसडीएस के उत्तर प्रदेश के सर्वे के मुताबिक भाजपा और भाजपा के सहयोगी दलों ने यादव और मुस्लिमों को छोड़कर प्रदेश की तकरीबन हर जाति से अच्छा खासा वोट हासिल किया है।
  • app based wokers
    संदीप चक्रवर्ती
    पश्चिम बंगाल: डिलीवरी बॉयज का शोषण करती ऐप कंपनियां, सरकारी हस्तक्षेप की ज़रूरत 
    12 Mar 2022
    "हम चाहते हैं कि हमारे वास्तविक नियोक्ता, फ्लिपकार्ट या ई-कार्ट हमें नियुक्ति पत्र दें और हर महीने के लिए हमारा एक निश्चित भुगतान तय किया जाए। सरकार ने जैसा ओला और उबर के मामले में हस्तक्षेप किया,…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License