NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अपराध
घटना-दुर्घटना
भारत
राजनीति
बुनियादी मुद्दों के एनकाउंटर का दौर
हमारा लोकतंत्र नायक और खलनायक की भाषा में सोचने लगा है। इन नायकों और खलनायकों को सत्ता अपनी सुविधा से गढ़ रही है और उचित-अनुचित तथा नैतिक-अनैतिक की अवसरवादी व्याख्याएं भी कर रही है।
15 Jul 2020
vikas

दुर्दांत अपराधी विकास दुबे की क्रूरता और नृशंसता के किस्से किसी को भी भयभीत और चिंतित कर सकते हैं किंतु अब जब विकास दुबे एक ऐसे एनकाउंटर में मारा जा चुका है जिसकी वास्तविकता शायद कभी उजागर न हो पाएगी तब राहत, आश्वासन और हौसले के स्थान पर एक अनजाना भय और हताशा मन-मस्तिष्क पर छाए हुए हैं। विकास दुबे एक घोषित अपराधी था और बेरहम बदमाशों की एक पूरी टोली उसके साथ थी। आठ पुलिसकर्मियों की निर्ममता से हत्या करने वाले अपराधी को देश के कानून के अनुसार मृत्युदंड मिलना तय था। कानून की पकड़ से भागते भयभीत अपराधी का पुलिस द्वारा पकड़ा जाना और फिर उसे देश के विधान के अनुसार दंडित किया जाना एक सामान्य प्रक्रिया है। किंतु विकास दुबे के कथित एनकाउंटर ने जो संदेश दिया है वह असामान्य है।

इस पूरे प्रकरण में पुलिस इस अपराधी को उसके अंजाम तक पहुंचाने के लिए कृतसंकल्पित नहीं लगी। वह देश के कानून द्वारा संचालित तथा अनुशासित बल की भांति आचरण करती भी नहीं दिखती। बल्कि पूरे घटनाक्रम का स्वरूप कुछ ऐसा है मानो दो संगठित अपराधी गिरोहों के बीच गैंगवार हो रहा हो। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि अराजक आतंकवादी विकास दुबे की हिंसा, आतंक और प्रतिशोध की रणनीति का मुकाबला करने के लिए संविधान और कानून के प्रति वचनबद्ध कोई ऐसा संगठन कार्य कर रहा था जिस पर आम लोगों की रक्षा करने का और उससे भी अधिक यह विश्वास उत्पन्न करने का उत्तरदायित्व है कि संविधान और कानून से ऊपर कोई नहीं है।

पूरा घटनाक्रम अपराध जगत के नियमों द्वारा संचालित लगता है। ऐसा लगता है कि विकास दुबे  विशाल अपराध तंत्र का एक छोटा सा पुर्जा मात्र था जिसने अपनी सीमाओं का अतिक्रमण किया था, जो जरूरत से ज्यादा महत्वाकांक्षी हो गया था, जो निजी प्रतिशोध को अपने आकाओं के हित से ज्यादा महत्व देने लगा था और जिसने अपने संरक्षकों का नाम लेने की अक्षम्य भूल कर दी थी - इसीलिए उसका मारा जाना आवश्यक हो गया था ताकि अन्य कोई अपराधी स्वयं को उस अपराध तंत्र से बड़ा समझने की जुर्रत फिर न करे। 

यह आशा करना कि  विकास दुबे प्रकरण राजनीति के अपराधीकरण और पुलिस महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार पर किसी व्यापक और सार्थक बहस को प्रारंभ कर सकता है जिसकी निर्णायक परिणति लंबे समय से जानबूझकर लंबित रखे गए पुलिस रिफॉर्म्स और चुनाव सुधारों के क्रियान्वयन में होगी - अतिशय भोलापन है। सच्चाई यह है कि लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेताओं और पुलिस तथा प्रशासन के अधिकारियों ने विकास दुबे के मारे जाने पर राहत की सांस ली है। अगर कोई सबक हमारी भ्रष्ट लोकतांत्रिक व्यवस्था ने सीखा भी होगा तो वह यही हो सकता है कि भविष्य में सत्ता और अपराधियों का गठजोड़ और अधिक सतर्क तथा परिष्कृत रूप से किया जाए जिससे इस तरह की असुविधाजनक परिस्थितियों से बचा जा सके।

यह  घटिया पटकथाओं के आधार पर देश के लोकतंत्र को संचालित करने का दौर है। हमने फार्मूला फिल्मों के युग में देखा है कि ब्लड, हॉरर,क्राइम और रिवेंज पर आधारित सेनेकन ट्रेजेडीज की विशेषताओं का निम्न स्तरीय अनुकरण करने वाली फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाया करती थीं। यह फिल्में यथार्थ से कोसों दूर हुआ करती थीं फिर भी सफलता के कीर्तिमान बनाती थीं और बुनियादी मुद्दों पर केंद्रित फिल्मों को दर्शक नहीं मिलते थे। जो फिल्में हिंसा और सेक्स का कॉकटेल परोसा करती थीं वे मुख्यधारा के सिनेमा के नाम से संबोधित की जाती थीं और साफ सुथरी शिक्षाप्रद फिल्में समानांतर सिनेमा कहलाती थीं। यही फॉर्मूले आज राजनीति में अपनाए जा रहे हैं।

बुनियादी मुद्दों पर चर्चा से बचने के लिए व्यक्तियों को लार्जर दैन लाइफ नायकों और खलनायकों में बदला जा रहा है।

विकास दुबे प्रकरण कोई अपवाद नहीं है। विकास दुबे एक दुस्साहसिक खलनायक है। किंतु उसके सामने रामभक्त योगी आदित्यनाथ जैसा नायक है जो अपराधियों का काल है। राक्षसी शक्तियों का प्रतीक विकास दुबे योगी आदित्यनाथ के सैनिकों को मार डालता है। अब योगी का प्रतिशोध आरंभ होता है। राम रावण युद्ध की भांति विकास दुबे के साथी एक एक कर मारे जाते हैं और अंत में योगी की सेना विकास दुबे का भी वध कर देती है। अपराध का अंत हो जाता है। राम राज्य की स्थापना हो जाती है। यही वह नैरेटिव है जो पिछले कुछ दिनों में मुख्य धारा के मीडिया द्वारा गढ़ा जा रहा है।

यदि कोई यह सवाल पूछता है कि क्या उचित नहीं होता यदि न्यायिक प्रक्रिया द्वारा विकास दुबे को उसके अंजाम तक पहुंचाया जाता तो उसे देशद्रोही कहने वाले मित्रों की कमी नहीं है।

हो सकता है  यह प्रतिप्रश्न भी किया जाए कि क्या एनकाउंटर पर संदेह करना विकास दुबे द्वारा मारे गए पुलिस कर्मियों की शहादत का अपमान नहीं है?

कुछ न्यूज़ चैनल चीख चीख कर कह रहे हैं कि विकास दुबे की मुठभेड़ में मौत पर संदेह करने वाले लोग वही हैं जो आतंकवादियों के मानवाधिकारों की रक्षा की बात करते हैं और सैनिकों की शहादत पर मौन रहते हैं। 

चाहे वह उत्तर प्रदेश की राजनीति हो या अपराध जगत, जाति का विमर्श यहां अपरिहार्य रूप से संबद्ध होता है। सवर्ण जातियां लोकतंत्र में सामंती शोषण को निरंतर बनाए रखने हेतु अपराध और आतंक का सहारा लेती रही हैं और जनता के एक बड़े वर्ग को मतदान से वंचित करने या प्रत्याशी विशेष के लिए मतदान करने हेतु विवश किया जाता रहा है। विकास दुबे प्रकरण अपवाद नहीं है। किंतु जाति के आधार पर निर्मित शोषण तंत्र की चीर फाड़ किसी को पसंद नहीं है। जैसे ही इस पर चर्चा आरंभ होती है मीडिया का एक हिस्सा  तेज आवाज़ में  कहने लगता है कि अपराधी की जाति नहीं होती। प्रायः यह वही पत्रकार होते हैं जो दिल्ली के दंगों या कोरोना के प्रसार के लिए अल्पसंख्यक समुदाय को जिम्मेदार ठहराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देते हैं। शायद इनका यह मानना है कि अपराधी की जाति नहीं होती लेकिन धर्म जरूर होता है। यह सिद्धांतों की अपनी सुविधानुसार अवसरवादी व्याख्या का दौर है। 

इसे पढ़ें : अपराध की जाति और धर्म

एक ऐसा अपराधी जो कई दशकों से अनेक राजनीतिक दलों का चहेता रहा था और एक बड़े क्षेत्र में पुलिस एवं प्रशासन में मौजूद भ्रष्ट तत्वों के साथ मिलकर लगभग एक समानांतर सरकार चलाता रहा था, बड़ी हड़बड़ी में अनेक अविश्वसनीय संयोगों के बीच पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारा गया। पुलिस के पास इस आतंकवादी का मुंह खुलवाने का धीरज तो नहीं था किंतु इसका मुंह बन्द करने की आतुरता पुलिस ने अवश्य दिखाई। विकास दुबे के घर को खंगालने के स्थान पर ढहाने वाली पुलिस सबूत इकट्ठा करने से ज्यादा सबूत मिटाती नजर आई। 

अपनी पहचान बताकर लगभग आत्मसमर्पण करने वाले इस दुर्दांत अपराधी को उज्जैन से कानपुर लाते वक्त न्यायिक प्रक्रिया और सामान्य सुरक्षा सावधानियों की उपेक्षा की गई। अंत में मीडिया को कुछ दूरी पर रोक दिया गया और समाचार मिला कि विकास दुबे को ले जा रही गाड़ी  दुर्घटनाग्रस्त हो गई तथा मौके का फायदा उठाकर  भागने की कोशिश में पुलिस के हथियार छीनकर पुलिस बल पर गोलियां चलाता विकास दुबे पुलिस द्वारा आत्मरक्षार्थ चलाई गई गोलियों से मारा गया।

इस प्रकार उन भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों और पुलिस तथा प्रशासन के उन पतित अधिकारियों तक पहुंचने का मार्ग बंद हो गया जिन्होंने दशकों से संरक्षण और प्रोत्साहन देकर विकास दुबे को आतंक का पर्याय बनाया था। अब विकास दुबे के निर्माता दूसरा विकास दुबे गढ़ने के लिए स्वतंत्र हैं। विकास दुबे के सारे राजदारों तक यह संदेश पहुंच गया है कि मुंह खोलने का अंजाम क्या होता है?

भ्रष्ट व्यवस्था को बार बार विकास दुबे के संरक्षकों के विषय में बताने वाले शहीद पुलिस अधिकारी के परिजनों को भी संदेश मिल गया है कि जितना न्याय उन्हें मिल गया है वे उतने से ही संतोष कर लें। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे हत्या में प्रयुक्त किसी हथियार को नष्ट कर यह दावा किया जाए कि हत्यारे को मार गिराया गया है। विकास दुबे अपने आकाओं का एक अस्त्र मात्र था। 

विकास दुबे की मौत के बाद जो कुछ चल रहा है वह आश्चर्यजनक रूप से निर्लज्जतापूर्ण है। विकास दुबे की सुरक्षा में गंभीर लापरवाही बरतने वाली यूपी पुलिस के साहस की प्रशंसा में उच्च पुलिस अधिकारी और सरकारी अफसर तथा नेता बयान पर बयान दे रहे हैं। यदि कोई पुलिस की लापरवाही की चर्चा कर रहा है तो उसे पुलिस का मनोबल गिराने वाला और निर्वाचित सरकार पर संदेह करने वाला अराजकतावादी करार दे दिया जा रहा है।

यह सब बिल्कुल वैसा ही भोंडा है जैसे बड़े आराम से अनेक राज्यों की सीमा पार करते हुए विकास के मध्यप्रदेश के उज्जैन पहुंचने पर टीवी चैनलों की यह सुर्खी – योगी के खौफ से राज्य दर राज्य भटकता कायर विकास! या शिवराज की पुलिस ने भगोड़े विकास को धर दबोचा-  जैसी अनेक समाचार पत्रों की हेडलाइंस। कुछ समाचार पत्र न्याय प्रक्रिया की विसंगतियों और न्याय पालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की दुहाई देकर विकास दुबे के और इससे मिलते जुलते एनकाउंटर्स को उचित ठहरा रहे हैं। ऐसा लगने लगा है कि हमारा लोकतंत्र इतना अक्षम और लाचार है कि अब न्याय प्राप्ति और नागरिक सुरक्षा के लिए हमें आदिम बर्बरता और जंगल के कानून का सहारा लेना होगा। 

राजनीति से जुड़े डिस्कोर्स में यह गंभीर और घातक परिवर्तन जितने चिंताजनक हैं उससे भी ज्यादा खतरनाक है हमारा इस डिस्कोर्स का आदी बन जाना। जब हम “ योगी के उत्तरप्रदेश में अपराधियों की खैर नहीं” या “मोदी के भारत में कोरोना को मिला मुंहतोड़ जवाब” या “डोभाल की घुड़की से पीछे हटा चीन” या “विपिन रावत के चक्रव्यूह में लाचार पाकिस्तान” जैसी सुर्खियों को पचाने लगते हैं और इनके आधार पर सोचना प्रारंभ कर देते हैं तो हम लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के संचालन के कुछ आधारभूत सूत्रों को रद्दी की टोकरी में डाल देते हैं। अनामता का सिद्धांत, व्यक्ति निरपेक्ष शासन व्यवस्था की अवधारणा, सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत, विदेश नीति की निरंतरता का विचार, संवैधानिक मूल्यों की सर्वोपरिता का आदर्श जैसे कितने ही बहुमूल्य और समय परीक्षित लोकतांत्रिक मूल्यों को हाशिए पर धकेल दिया गया है।

हमारा लोकतंत्र नायक और खलनायक की भाषा में सोचने लगा है। इन नायकों और खलनायकों को सत्ता अपनी सुविधा से गढ़ रही है और उचित-अनुचित तथा नैतिक-अनैतिक की अवसरवादी व्याख्याएं भी कर रही है। लोकतंत्र अतिरंजना और अतिरेक का स्वभावतः विरोधी है किंतु इनके द्वारा ही लोकतंत्र को संचालित करने की कोशिश की जा रही है।

विकास दुबे प्रकरण अपराध को जीवित रखने के लिए अपराधी को मार डालने का अनूठा उदाहरण है। लेकिन इससे भी घातक है इसे न्यायोचित ठहराने और नायक-खलनायक के मुहावरे में ढालने की कोशिश। भ्रष्टाचार, राजनीति का अपराधीकरण, पुलिस रिफॉर्म्स, चुनाव सुधार, जातिगत सर्वोच्चता की स्थापना के लिए हिंसा जैसे कितने ही बुनियादी मुद्दों का एनकाउंटर किया जा रहा है और हम मूक दर्शक बने हुए हैं।

(डॉ. राजू पाण्डेय वरिष्ठ लेखक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Vikas Dubey Encounter
encounter and democracy
yogi aaditynath
politics and criime
crime and justice
electrol politics and crime

Related Stories

यूपी की कानून व्यवस्था: विवेक तिवारी से लेकर विकास दुबे एनकाउंटर तक एक विश्लेषण


बाकी खबरें

  • aicctu
    मधुलिका
    इंडियन टेलिफ़ोन इंडस्ट्री : सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के ख़राब नियोक्ताओं की चिर-परिचित कहानी
    22 Feb 2022
    महामारी ने इन कर्मचारियों की दिक़्क़तों को कई गुना तक बढ़ा दिया है।
  • hum bharat ke log
    डॉ. लेनिन रघुवंशी
    एक व्यापक बहुपक्षी और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता
    22 Feb 2022
    सभी 'टूटे हुए लोगों' और प्रगतिशील लोगों, की एकता दण्डहीनता की संस्कृति व वंचितिकरण के ख़िलाफ़ लड़ने का सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि यह परिवर्तन उन लोगों से ही नहीं आएगा, जो इस प्रणाली से लाभ उठाते…
  • MGNREGA
    रबीन्द्र नाथ सिन्हा
    ग्रामीण संकट को देखते हुए भारतीय कॉरपोरेट का मनरेगा में भारी धन आवंटन का आह्वान 
    22 Feb 2022
    ऐसा करते हुए कॉरपोरेट क्षेत्र ने सरकार को औद्योगिक गतिविधियों के तेजी से पटरी पर आने की उसकी उम्मीद के खिलाफ आगाह किया है क्योंकि खपत की मांग में कमी से उद्योग की क्षमता निष्क्रिय पड़ी हुई है। 
  • Ethiopia
    मारिया गर्थ
    इथियोपिया 30 साल में सबसे ख़राब सूखे से जूझ रहा है
    22 Feb 2022
    इथियोपिया के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में लगभग 70 लाख लोगों को तत्काल मदद की ज़रूरत है क्योंकि लगातार तीसरी बार बरसात न होने की वजह से देहाती समुदाय तबाही झेल रहे हैं।
  • Pinarayi Vijayan
    भाषा
    किसी मुख्यमंत्री के लिए दो राज्यों की तुलना करना उचित नहीं है : विजयन
    22 Feb 2022
    विजयन ने राज्य विधानसभा में कहा, ‘‘केरल विभिन्न क्षेत्रों में कहीं आगे है और राज्य ने जो वृद्धि हासिल की है वह अद्वितीय है। उनकी टिप्पणियों को राजनीतिक हितों के साथ की गयी अनुचित टिप्पणियों के तौर पर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License