NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
पंजाब में आप की जीत के बाद क्या होगा आगे का रास्ता?
जब जीत का उत्साह कम हो जाएगा, तब सत्ता में पहुंचे नेताओं के सामने पंजाब में दिवालिया अर्थव्यवस्था, राजनीतिक पतन और लोगों की कम होती आय की क्रूर समस्याएं सामने खड़ी होंगी।
परमजीत सिंह जज
14 Mar 2022
AAP
Image Courtesy: Oneindia

पंजाब में आम आदमी पार्टी की एकतरफा जीत का लोगों द्वारा जश्न मनाया जा रहा है। यह एक अभूतपूर्व घटना है। कनाडा स्थित टीवी चैनल प्राइम एशिया पूरी दुनिया में पंजाबी लोगों के लिए प्रसारण करता है, इस दौरान पंजाबी टीवी और लैपटॉप से चिपके नतीज़े देखते रहे। यह देखना काफ़ी शानदार था कि वे एक बिना परखी एक राजनीतिक पार्टी की जीत का जश्म मना रहे हैं, जिसके दिल्ली में प्रदर्शन को उन्होंने इस बात का लिटमस टेस्ट माना था कि ये पार्टी पंजाब का उज्जवल भविष्य सुनिश्चित कर सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमने नई चुनी हुई पार्टी के प्रति पंजाबियों की बढ़ती उम्मीदें देखीं।

यह उन्माद मुझे 1977 के लोकसभा चुनाव की याद दिलाता है, जब नई-नई बनी जनता पार्टी ने एकतरफा जीत हासिल की थी। दोनों घटनाओं के बीच समानताओं को देखिए: इंदिरा गांधी समेत कांग्रेस के सभी प्रमुख नेता उन चुनावों में हार गए थे। इसी तरह पंजाब में प्रकाश सिंह बादल, उनके बेटे, उनकी बहू, उनके दामाद और उनके भाई के दामाद और भतीजे भी चुनाव हार गए। निर्वतमान मुख्यमंत्री और उनके पहले के मुख्यमंत्री भी चुनाव हार गए। राजनेताओं, पत्रकारों, टिप्पणीकारों और राजनीतिक विशेषज्ञों समेत किसी ने भी इसका अनुमान नहीं लगाया था।

1977 में अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टी का गठबंधन ज़्यादा वक़्त तक नहीं चल सका था। 1980 में कांग्रेस वापस सत्ता में आ गई थी। यहीं इन दो आंदोलनों के बीच अंतर दिखाई देता है। ताजा मामला एक पार्टी का एक छोटे राज्य में जीत का है। इस बात का कोई सबूत नहीं है कि दूसरे राज्यों में भी ऐसा ही बड़ा बदलाव आएगा। बल्कि दूसरे राज्यों में संकेत बदलाव विरोधी हैं।

पंजाब के लोगों ने यहां अपने राज्य में बीजेपी का प्रवेश रोका है। बीजेपी, ने अकाली दल के कमज़ोर होने में अहम भूमिका निभाई है। बीजेपी केवल हिंदुत्व विचारधारा वाली पार्टी नहीं है। यह एक बहुत बड़ा कॉरपोरेशन है। हम पाकिस्तान से विशेषज्ञों को सुनते थे कि वहां की फौज़ बहुत बड़े कॉरपोरेट समूह की तरह है। बीजेपी ने भी खुद को अच्छी तरह एक कॉरपोरेशन में बदला है, जहां सेना की ताकत नहीं है, लेकिन नागरिक सेना किस्म के आक्रामक संगठन हैं, जो खुलेआम सीमित ढंग से हिंसा में लिप्त होते हैं। आज की स्थिति में यह सबसे ज़्यादा संसाधन संपन्न पार्टी है। इसके पास एक आईटी शाखा है, जो बेहूदा ढंग से सच को गढ़ने के काम करता है। पार्टी के पास कई मंच हैं, जहां से "सच" को परोसा जाता है। ऊपर से लेकर नीचे तक बीजेपी नेता खुलेआम किसी बेपरवाह शख़्स के आत्मविश्वास और भरोसे के साथ इस तथाकथित "सच" का व्याख्यान देते हैं। अब बीजेपी के इस बढ़ते रथ को पंजाब के लोगों से चुनौती मिली है। पंजाब के मतदाताओं ने बताया है कि उनके जश्न में बीजेपी की विभाजनकारी नीतियों को खारिज करने की बात छुपी हुई है। कई लोगों का मानना है कि यह क्रांति से कम नहीं है, जिसमें जेपी की संपूर्ण क्रांति की भावना उद्वेलित होती है। इन मतों को जीत के उन्माद में जकड़े लोगों का विचार समझा जा सकता है।

लेकिन जब सारा उत्साह खत्म हो जाएगा, तब सत्ता में आए लोगों के सामने पंजाब की दिवालिया अर्थव्यवस्था, राजनीतिक पतन और लोगों की कम होती आय की क्रूर असलियत सामने आएगी। पंजाब में अकाली-बीजेपी के दस साल और कांग्रेस के पांच साल के राज में प्रशासन का जो ढांचा बना है, वह तय करता है कि यहां पुलिस फोर्स, चुने हुए विधायकों की तीमारदारी में लगी रहे।

उच्च स्तरों पर भ्रष्टाचार से पंजाब की अर्थव्यवस्था बुरे तरीके से प्रभावित हो रही है। यह एक ऐसी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती होगी, जो एक ईमानदार और साफ़ सरकार देने का वायदा करती रही है। ईमानदार होना एक बात है; लेकिन अफ़सरशाही को नियंत्रित करने में कुशलता दिखाना पूरी तरह अलग बात है। सौभाग्य से पंजाब के भावी मुख्यमंत्री भगवंत मान दिल्ली मॉडल का पालन कर सकते हैं। लेकिन यह पालन भी आसान नहीं रहने वाला है, क्योंकि पंजाब में राजनीतिक की ज़मीन बिल्कुल अलग है।

इस पृष्ठभूमि में मान का विजय भाषण अहम हो जाता है। उन्होंने कहा है कि पंजाब दिल्ली से सीखेगा और कुछ मुद्दों पर दिल्ली पंजाब से सीखेगी। उन्होंने कुछ प्रतीकात्मक कदमों को उठाने का भी काम किया है, जिसमें बीजेपी किसी भी दूसरी पार्टी से ज़्यादा पारंगत मानी जाती है। मान ने निर्देश दिया है कि सभी सरकारी कार्यालयों में सिर्फ़ दो लोगों- शहीद भगत सिंह और डॉ बी आर आंबेडकर की ही फोटो लगी होगी। मान ने यह भी कहा कि शपथ ग्रहण समारोह शहीद भगत सिंह जिले में स्थित भगत सिंह के गांव खटकर कलां में होगा।

लेकिन फिलहाल पंजाबी चार पूर्व मुख्यमंत्रियों और एक निर्वतमान मुख्यमंत्री की जीत का जश्न मना रहे हैं। एक वायरस वॉट्सऐप मैसेज में लिखा है: "पंजाब में चुनावों ने सबको खुश कर दिया है। राहुल खुश हैं कि कैप्टन अमरिंदर सिंह की हार हुई है। कैप्टन खुश हैं कि सिद्धू नहीं जीते। सिद्ध खुश हैं कि यह साबित हो गया कि चन्नी का चुनाव गलत साबित हुआ। चन्नी खुश हैं कि वे थोड़े वक्त के लिए ही सही, पर मुख्यमंत्री बन पाए। कांग्रेस खुश है कि अकालियों को सत्ता में वापसी से रोक दिया गया। अकाली खुश हैं कि कांग्रेस सत्ता में वापस नहीं आई। चूंकि इतने सारे लोग खुश हैं, उनमें से भी ज़्यादातर पंजाबी, तो उन्हें शेयर मार्केट में स्टॉक खरीदने का सुझाव देना आसान है।"

लेखक, अमृतसर में गुरू नानक यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं। वे इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी के पूर्व अध्यक्ष भी हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

What Comes After the Euphoria Over AAP’s Punjab Victory

akali dal
Congress Punjab
aam aadmi party
Bhagwant Mann
Rahul Gandhi
chief ministers Punjab
Punjab election verdict 2022
Bhagat Singh
Farm Laws
Parkash Singh Badal
indira gandhi
Janata Party

Related Stories

हार्दिक पटेल का अगला राजनीतिक ठिकाना... भाजपा या AAP?

पंजाब ने त्रिशंकु फैसला क्यों नहीं दिया

ख़बरों के आगे-पीछे: राष्ट्रीय पार्टी के दर्ज़े के पास पहुँची आप पार्टी से लेकर मोदी की ‘भगवा टोपी’ तक

भगवंत मान ने पंजाब के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की

पांचों राज्य में मुंह के बल गिरी कांग्रेस अब कैसे उठेगी?

त्वरित टिप्पणी: जनता के मुद्दों पर राजनीति करना और जीतना होता जा रहा है मुश्किल

बनारस का रण: मोदी का ग्रैंड मेगा शो बनाम अखिलेश की विजय यात्रा, भीड़ के मामले में किसने मारी बाज़ी?

पंजाब चुनाव: पार्टियां दलित वोट तो चाहती हैं, लेकिन उनके मुद्दों पर चर्चा करने से बचती हैं

"चुनाव से पहले की अंदरूनी लड़ाई से कांग्रेस को नुकसान" - राजनीतिक विशेषज्ञ जगरूप सिंह

पंजाब विधानसभा चुनाव: प्रचार का नया हथियार बना सोशल मीडिया, अख़बार हुए पीछे


बाकी खबरें

  • lalu
    अनिल अंशुमन
    बिहार विधान सभा उपचुनाव क्या वाकई कोई नया संकेत देने वाला होगा?
    27 Oct 2021
    ये चुनाव सिर्फ दो विधान सभा सीटों का उपचुनाव मात्र नहीं है, बल्कि यह पटना और दिल्ली में बैठी सरकारों द्वारा जनता पर थोपी गयी बेलगाम महंगाई, विकराल बेरोज़गारी, जानलेवा चौपट स्वास्थ्य व्यवस्था के…
  • पेगासस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बनाई समिति, कहा निजता के उल्लंघन से सुरक्षा प्रदान करना जरूरी
    न्यूज़क्लिक टीम
    पेगासस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बनाई समिति, कहा निजता के उल्लंघन से सुरक्षा प्रदान करना जरूरी
    27 Oct 2021
    उच्चतम न्यायालय ने इज़राइली स्पाईवेयर ‘पेगासस’ के जरिए भारत में कुछ लोगों की कथित जासूसी के मामले की जांच के लिए बुधवार को विशेषज्ञों की तीन सदस्यीय समिति का गठन किया और कहा कि प्रत्येक नागरिक को…
  • पूरी आबादी के डबल डोज़ की राह अभी बहत दूर!
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    पूरी आबादी के डबल डोज़ की राह अभी बहत दूर!
    27 Oct 2021
    भारत ने 100 करोड़ वैक्सीन डोज़ का आंकड़ा पार किया है, लेकिन डबल डोज अभी भी 21 -22 % आबादी को दिया गया है | कोविड शो के इस एपिसोड में सत्यजीत रथ और प्रबीर पुरकायस्थ चर्चा कर रहे हैं कि 100 करोड़…
  • Modi
    राजेंद्र शर्मा
    अबकी बार, मोदी जी के लिए ताली-थाली बजा मेरे यार!
    27 Oct 2021
    कटाक्ष: फ्री वैक्सीन के चक्कर में पेट्रोल-डीजल के दाम सैकड़ा पार कर गए, तो कर गए, रसोई गैस हजारी हो गयी तो हो गयी, मोदी जी टस से मस नहीं हुए, सौ करोड़ मुफ्त टीके लगवाकर ही माने। क्या अब भी हम उनका…
  • Cartoon Click: Ah Democracy!, Wow Democracy!
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: आह लोकतंत्र!, वाह लोकतंत्र!
    27 Oct 2021
    हमारे गृह मंत्री से अच्छा लोकतंत्र का पाठ कौन पढ़ा सकता है। नहीं...नहीं...ये कोई व्यंग्य नहीं है, यक़ीन न हो तो लोकतंत्र को लेकर दिल्ली में आयोजित तीन दिन के राष्ट्रीय सम्मेलन में केंद्रीय गृह मंत्री…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License