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हाथरस रेप मामले में पीड़िता को दलित लड़की कहकर पुकारना क्यों ज़रूरी है?
हाथरस वाले मामले में दोहरा संयोग या ‘प्रयोग’ ये हुआ है कि एक तो वह स्त्री थी और दूसरी बात वह दलित थी। इसलिए क्रूरता ही नहीं हुई बल्कि भयानक क्रूरता हुई। इसे ऐसे समझा जाए कि लिंग के आधार पर तो मर्दों ने उस पर अपना हक माना ही साथ में जाति के आधार पर भी अपने अंदर की नफरत को उड़ेल दिया।
अजय कुमार
02 Oct 2020
हाथरस रेप

एक बड़े बैंक में काम करने वाले मेरे दोस्त मनीष पांडे ने रात को 10 बजे मुझे फोन किया। पूरे ताव में आकर मुझसे पूछने लगा कि तुम पत्रकार लोग हाथरस वाले मामले में दलित लड़की के साथ बलात्कार क्यों लिख रहे हो? हम मानते हैं कि एक लड़की के साथ बलात्कार हुआ है। बलात्कारियों के कृत्य की खबरें पढ़कर खुद के इंसान होने पर शर्म भी आती है। लेकिन एक बात ही समझ में नहीं आती कि कई लोग दलित लड़की का बलात्कार कहकर क्यों पुकार रहे हैं?

उसकी दलित पहचान को जोड़कर ऊंची जाति के लोगों को बेवजह अपराधी क्यों बताया जा रहा है? इस तरह से समाज में बंटवारा फैलता है? अब तुम ही बताओ कि क्या बिहार से जुड़े किसी व्यक्ति के गलत काम को यह कह कर पुकारना जायज होगा कि बिहारी लोग होते ही खराब है? इसकी गलती की बजाए पूरे बिहारी समाज की गलती है?

बड़े ताव में आकर पूछे गए इन सवालों को नकारने की बजाए इनसे बात करने की जरूरत है। क्योंकि बात करने से ही बात बनती है।

सबसे पहले इनसे पूछना चाहिए इनकी पृष्ठभूमि क्या है? ये लोग आते कहां से है? इनमें से अधिकतर ऊंची जाति के वे लोग होते हैं, जिन्होंने अपने सामने की नाइंसाफियों पर कभी गौर नहीं किया होता है। इस पर कभी नहीं सोचा है कि आखिर क्यों कुछ जातियों को इन्होंने निचले पायदना पर रखा या धकेल दिया। क्यों ऐसे लोग उन्हें या उनके परिवार के लोगों को देखते ही अपने कंधे थोड़ा नीचा कर लेते हैं? कमर झुकाकर आदर देने की कोशिश करते हैं? आखिर क्यों जिंदगी की हर एक दौड़ में कई कदम पीछे कथित ऊंची जाति का 20 साल का लड़का गांव के एक दलित बुजुर्ग के सामने से गुजरता है तो बुजुर्ग दंडवत कहकर या झुक कर सम्मान करते हैं।

आखिर क्यों अभी भी गांव देहात के बहुत सारे इलाको में खेतों में अधिकतर काम करने वाले लोग पिछड़ी या अनुसूचित जाति के होते हैं? दोपहर में उन्हें चाय देते समय या उन्हें खाना देते समय उनके बर्तन को घर परिवार के बर्तन से अलग क्यों रखा जाता है? क्यों आज भी ऊंची जाति के लोग को देख कर निचली जाति से जुड़ा व्यक्ति भक्ति भाव में खड़ा होकर प्रणाम बाबू साहब कहता है? यह सब ऐसी घटनाएं हैं जो इन तथाकथित ऊंची जाति के लोगों के सामने हमेशा घटती हैं लेकिन दिक्कत यह है कि कई लोगों के मन में यह घटनाएं सवाल के रूप में तब्दील नहीं होतीं।

उन्होंने इसे समाज का स्वभाविक रीति रिवाज मानकर स्वीकार कर लिया। इसकी वजह से हुआ है यह कि उन्हें लगने लगा समाज में जो कुछ भी दिख रहा है वह गलत नहीं है। बल्कि गलत वह है जो इसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं। गलत सही का भेदभाव तब समझ में आता जब वह समाज के संस्कार से इतर उस पढ़ाई लिखाई से गुजरते जिसे आज की दुनिया में बेरोजगारों की पढ़ाई लिखाई कहा जाता है।

असली हकीकत है कि हमारे अंदर की काहिलियत, जाहिलियत या कह लीजिए जानवरपन को खत्म करने का औजार हमारे सामाजिक संस्कारों के पास नहीं है। यह औजार इस दुनिया में उपलब्ध वहां होते हैं, जहां मानविकी की पढ़ाई करवाई जाती है। जहां समाज को खांगाला जाता है, उसके गहरे टूट-फूट की शिनाख्त की जाती है, और निष्कर्ष के तौर विद्यार्थी के सामने वह औजार पेश किए जाते हैं जिनके जरिए वह खुद के अंदर से अपना जानवरपन हटाकर खुद को इंसान बना पाए।

ऐसा नहीं है कि जो मानविकी के विषय से गुजरते हैं, वह भले इंसान ही बन जाते हैं। लेकिन ऐसा जरूर है कि उन लोगों में अपनी कमियां दूर करने की अधिक संभावना होती है जो मानविकी की पढ़ाई करते हैं। वैसे असल बात नज़र और नज़रिये की है। एक संवेदनशील इंसान ही अपने आसपास के नाइंसाफियों को देख पाता है।

कभी एक ऐसे ही संवेदनशील इंसान से बात करके देखिएगा। वह बता देगा कि अपने आसपास ही वह सैकड़ों नाइंसाफी या होते रोजाना देखता है। जिसे सहज और स्वाभाविक स्वीकार कर लिया जाता है। अफसोस ऐसे लोगों को हमारे समाज में पागल या बेवकूफ तक कहा जाता है। और इन दीवानों को अब सरकारें देशद्रोही कहकर पुकारने लगी हैं। समाज को तोड़ने और बांटने वाला कहकर पुकारने लगी हैं। जबकि हकीकत यह है कि ऐसे ही लोग चुपचाप समाज को संवारने के काम में लगे रहते हैं। इन्हीं की वजह से इस दुनिया में इंसाफ की संभावनाएं बची रहती हैं।
जो दूसरों के दुख-दर्द को महसूस नहीं करता। समाज की समझ नहीं रखता। वही भक से कह देता है कि दिखाओ भारत में जाति कहां है? कास्ट कहां है?

अब इसी सिरे को पकड़कर इस सवाल का जवाब ढूंढते हैं कि आखिरकार जाति की पहचान और क्षेत्र का पहचान जैसे कि बिहारी बंगाली या दूसरे पहचानों में क्या अंतर है? मोटे तौर पर समझे तो दुनिया की हर एक किस्म की पहचान लोगों के बीच अलगाव पैदा करती है। जैसे कि मैं अजय हूं आप अमित या मुकुल हैं। मैं मर्द हूं और आप औरत हैं। मैं हिंदुस्तानी हूं और आप अफ्रीकन है। मैं बिहारी हूं और आप बंगाली हैं। मैं निचली जाति से हूं और आप ऊंची जाति से हैं। इन सब पहचानों के मूल में अलगाव तो है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है। लेकिन असल सवाल है कि किस माहौल में किस तरह का अलगाव हावी हो जाता है, बहुत तीखे और गहरे तौर पर हमारे सामने आता है।

अगर वस्तुनिष्ठ तौर पर देखा जाए तो भारत जैसे माहौल में जाति की पहचान जितनी गहरी है, उतनी ज्यादा गहरी क्षेत्र की पहचान नहीं है। जाति की पहचान इतनी धंसी हुई है कि लोगों के भीतर से निकालना नामुमकिन होता है। भारत का संविधान लोगों के बीच न्याय बनाने के लिए सामाजिक न्याय का रास्ता अख्तियार करता है। इसलिए भारत जैसे माहौल में जातिगत हिंसा की तुलना क्षेत्रगत पहचानों से करना बिल्कुल नासमझी है और पूरी तरह से तर्क दोष है।

हाथरस वाले मामले में तो दलित लड़की के साथ बलात्कार हुआ, यह कहना बिल्कुल जरूरी है। मीडिया में छपी खबरों से यह पता चलता है कि ठाकुर परिवार के लड़कों और दलित परिवार की लड़की दोनों परिवारों में आपसी रंजिश बहुत गहरी थी। ठाकुर परिवार के लड़कों को यह साफ साफ पता था कि लड़की दलित परिवार की है। समाज के उस पायदान से आती है जिस पर मौजूद पूरा समुदाय ऊंची जातियों से संचालित होने वाले समाज में निकृष्ट और हेय लोगों की तरह देखा जाता है।

उस जातिगत समुदाय से आती है जिनके परिवारों ने ऊंची जातियों के यहां बंधक बनकर काम किया है। और ऊंची जातियों ने ऐसे परिवारों को ऐतिहासिक तौर पर अपने से कमतर मानती आई है। इस नजर से देखते आए हैं कि निचली जाति के लोगों की औकात समाज में यह है कि वह ऊंची जातियों के नीचे दबकर रहे। तो जरा सोचिए उस राज्य में जिस की शासन व्यवस्था पर जातिगत भेदभाव का जमकर आरोप लगता रहा हो, उस राज्य में ऐसे लोगों की स्वाभाविक हिम्मत कितनी अधिक बढ़ गई होगी।

अगर आप भारत के गांव के इलाके से हैं तो आप यह समझ सकते हैं कि दो अलग-अलग जाति के पड़ोसी परिवारों में जब मवेशी का रखरखाव, घर के पानी का बाहर निकलना, कूड़ा करकट को इकट्ठा करने को लेकर झगड़े को जातिगत पहचान पर हमला होने में कितनी देर लगती है।

यह सारे काम तुरंत हो जाते हैं। मां बहन बेटियों की गालियां ऊंची जातियों की तरफ से जमकर निकाली जाती है। कोई तर्क रहे या ना रहे लेकिन एक बात ऊंची जातियों की तरफ से जमकर की जाती है कि तुम फलाना जाति के लोग तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि तुम हमारे सामने अपनी आवाज उठाओ।

ऊंची जाति के मुंह से निकलने वाले यह शब्द ऐसे नफरत के भाव से सामने आते हैं, जिस नफरत का भाव हमारा समाज सिखाता है। हमारे समाज की स्वभाविक समझ लोगों के अंदर यह बात भरती रहती है कि अगर तुम ऊंची जाति के हो तो तुम्हारा हक बनता है कि तुम खुद को निचली जाति से श्रेष्ठ मानो और निचली जाति को निकृष्ट मानो।

सीएसडीएस में शोधार्थी रह चुके और मौजूदा समय में छपरा के जयप्रकाश नारायण कॉलेज के प्रोफेसर चंदन श्रीवास्तव कहते है कि बलात्कार की कई तरह की परिभाषायें हैं। एक परिभाषा यह भी है कि बलात्कार एक तरह का दंड होता है, जो तब दिया जाता है जब कोई सार्वजनिकता का अधिकारी ना हो लेकिन सार्वजनिक होता चला जाए। हमारे समाज में धर्म, जाति, लिंग, अवस्था, भाषा जैसे कई आधार पर लोगों की सार्वजनिकता रोकी जाती है। यह परिस्थितियों पर डिपेंड करता है कि बलात्कार का तीखापन और क्रूरता कितना भयानक होगा। यहां पर सार्वजनिकता को स्थूल अर्थों में समझने की जरूरत नहीं है बल्कि सूक्ष्म अर्थ में समझना चाहिए। स्त्रियों के संदर्भ में बात की जाए तो इसका मतलब यह है कि स्त्रियां वह काम बिल्कुल ना करें जिसकी समाज उन्हें इजाजत नहीं देता है। इसलिए घर के अंदर भी बलात्कार हो सकता है।

हाथरस वाले मामले में दोहरा संयोग हो गया। पहली बात तो वह औरत थी और दूसरी बात वह निचली जाति की थी। इसलिए क्रूरता ही नहीं हुई बल्कि भयानक क्रूरता हुई। इसे ऐसे समझ गए कि लिंग के आधार पर तो मर्द ने उस पर अपना हक माना ही साथ में जाति के आधार पर भी अपने अंदर की नफरत को उड़ेल दिया।

अब सवाल आता है कि जब हम दलित महिला के साथ रेप कह कर पुकारते हैं तो अप्रत्यक्ष तौर पर ऊंची जाति पर भी आरोप लगा रहे होते हैं। क्या यह आरोप लगाना सही है? इसका जवाब यह है कि औरतों को समाज में एक प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। औरत परिवार की होती है जाति की होती है, मोहल्ले की होती है, गांव की होती है, समुदाय की होती है, समाज की होती है लेकिन अपनी नहीं होती है। औरतों को समाज इसी प्रतीक में ढाल कर देखता है। कई बार आपने अपने जीवन में देखा होगा की एक मोहल्ले के लड़के दूसरे मोहल्ले के लड़कों को इसलिए हड़का रहे होते हैं कि उसने उनकी मोहल्ले की लड़की से बात क्यों की?

इस लिहाज से अगर किसी दलित लड़की के साथ कोई रेप हुआ है तो उसमें वे सब मर्द जिम्मेदार होते हैं, जिनके अंदर से उनका सवर्ण या ऊंची जाति का होना अभी गायब नहीं हुआ है। उत्तर भारत के तमाम ऊंची जाति के लोगों ने तो अभी भी अपने अंदर की जातिगत श्रेष्ठता और उससे पनपने वाली मिल्कियत को नहीं छोड़ा है। इस लिहाज से आप खुद ही तय कर लीजिए कि दलित लड़की के साथ रेप कहना क्यों जरूरी है।

रामकुमार एक बहुत ही प्रतिबद्ध दलित कार्यकर्ता हैं। इस समय पिछले 10 सालों में हुए दलित हिंसा को डॉक्यूमेंट्री की शक्ल में पेश करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। द प्रिंट डिजिटल पोर्टल पर इनका वक्तव्य छपा है। रामकुमार कहते हैं कि ऐसा सवाल ही हम तब पूछते हैं जब बलात्कार करने वाले ऊंची जाति के लोग होते हैं अगर बलात्कार करने वाले दलित और मुस्लिम समुदाय के लोग होते तो ऐसा सवाल हमारे सामने पेश नहीं होता।

रामकुमार कहते हैं कि अगर बलात्कारी मुस्लिम समुदाय का होता तो अब तक मुद्दा हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता का बन चुका होता। दंगा भी हो चुका होता और पता नहीं न जाने क्या क्या होता। मौजूदा हालात में इसकी कल्पना करना कोई बड़ी बात नहीं है। अगर बलात्कारी दलित जाति का लड़का होता तो अब तक उस पूरे इलाके में दलितों के खिलाफ हिंसा भड़क चुकी होती।

मैंने अपने जीवन में ऐसे तमाम मामले देखे हैं जहां पर अगर कोई एक दलित परिवार न्याय के लिए खड़ा होता है तो उसकी मां और बेटियों के साथ बलात्कार करने की धमकी दी जाती है। खुलेआम कहा जाता है कि तुम्हारी औकात क्या है? एफआईआर लिखवाने से कई तरह के दबाव बनाकर रोका जाता है।

रामकुमार आगे कहते हैं कि ऊंची जाति के अधिकतर मर्दों को यह लगता है कि निचली जाति के औरतों के शरीर पर उनका हक है। मैंने देखा है कि निचली जाति के कई माता पिता अपने बच्चियों को ऊंची जाति के मर्दों से दूर रखने की सलाह देते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि वह न्याय की लड़ाई नहीं लड़ पाएंगे। हालांकि स्थितियां बदल रही है लोग इंसाफ के लिए खड़ा हो रहे हैं।

इन सारी बातों से यह तो साफ है कि दलितों के खिलाफ हो रही हिंसा दलित महिलाओं के बलात्कार तक जुड़ती है। ऊंची जाति के अधिकतर लोग दलित पहचान को अपनी मिल्कियत मानते हैं। अगर यह सच है तो यह कहना बिल्कुल गलत है कि दलित लड़की का रेप कहने से जातिगत भेदभाव को बढ़ावा मिलता है। यह ठीक ऐसा ही तर्क है जैसा यह तर्क कि जब घर की औरतें अपने खिलाफ हो रहे जुल्म के लिए आवाज उठाती हैं तो वह घर तोड़ने का काम करती है।

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