NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पराली जलाने की समस्या आख़िर दूर होने का नाम क्यों नहीं ले रही?
पराली जलाने की समस्या की जड़ में एक ऐसी सरकार है, जो इस समस्या का ख़्याल रखे बिना नीतियां बनाती है।
इंद्र शेखर सिंह
08 Nov 2021
 Stubble Burning
Image Courtesy: PTI

सुबह के 7 बज रहे हैं, लेकिन सूरज छुपा हुआ है। आकाश मटमैला है, और मेरे गले में खुजली हो रही है। मुझे लगता है कि मेरी नाक की आसपास की नलीकायें जाम हो गयी है, क्योंकि वे ईंधन वाष्प, धुआं और शायद पराली की कालिख जैसी एलर्जी से भरी हुई हैं। मुझे पता है कि यह बहुत प्रदूषित नवंबर है, और फिर भी कॉर्पोरेट मीडिया हमारी स्क्रीन पर फ़्लैश करता है कि 'प्रदूषण और पराली जलाना कम हुआ है'। मगर, दीपावली के बाद के धुएं से भरी सुबह तो कुछ और कहानी कह रही थी।

हर एक साल की दिवाली में होने वाली प्रदूषण समस्या के लिए पंजाब और हरियाणा में धान की रासायनिक खेती करने वाले किसानों को बार-बार बलि का बकरा बना दिया जाता है। ख़बरिया चैनल जले और राख से काले हो चुके खेतों को दिखाते हैं, और इस गड़बड़ी के लिए किसानों को ज़िम्मेदार ठहरा देते हैं। लेकिन, हक़ीक़त कुछ और है। बहुत सारे अध्ययनों से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि पराली जलाना हर साल होने वाली एक आम घटना है और उत्तर भारत में सर्द हवाओं हवा को ज़हरीला बना देने वाला चौथा सबसे बड़ा कारक है। मगर, इसके लिए ज़िम्मेदार जो सबसे बड़ा कारक है, वह है-वाहनों से होने वाला प्रदूषण, निर्माण और औद्योगिक प्रदूषण, जिसमें ग्रामीण इलाकों में ईंट भट्टे भी शामिल हैं।

पराली की समस्या?

पराली जलाना रासायनिक पदार्थों के सहारे होने वाली उस एकल फ़सल खेती का नतीजा है, जो पिछले पांच दशकों से पंजाब पर थोपी गयी है। उपजाऊ और पानी से समृद्ध इस इलाक़े को एक ऐसे कारखाने में तब्दील कर दिया गया है, जिसमें कृषि उत्पादों- गेहूं और चावल का उत्पादन होता रहा है। 1960 के दशक में पंजाब में खेती वाले इलाक़े का 5% से भी कम इलाक़ा धान की खेती के तहत आता था। आज खरीफ़ की फ़सल क्षेत्र का 84% भाग धान की खेती के तहत आता है।

पंजाब और हरियाणा के ज़्यादातर किसानों की ज़ेहन में ये यादें ताज़ा हैं कि किस तरह सरकारी वैज्ञानिकों और कृषि-विशेषज्ञों ने उन्हें रासायनिक कृषि अपनाने और धान और गेहूं की एकल फ़सल उगाने में "विविधता" लाने के लिए राज़ी कर लिया था। धान की बासमती जैसी  पारंपरिक क़िस्मों के पराली को जलाया नहीं जाता है, क्योंकि उनके भूसे का इस्तेमाल पशुओं के चारे के लिए होती है। हालांकि, नई हरित क्रांति की क़िस्मों के भूसे खाने योग्य नहीं रह गये हैं और बदलती आर्थिक और औद्योगिक परिस्थितियों ने किसानों के सामने इसके इस्तेमाल का कोई वैकल्पिक उपाय भी नहीं छोड़ा है।

पराली जलाने की प्रक्रिया तेज़ और कारगर होने के चलते किसान इसके आदी हो चुके हैं। उन्हें अपनी अगली फ़सल को तैयार करने के लिए अपने खेतों को साफ़ करना होता है। इस समय साल में एक या दो नहीं, बल्कि तीन-तीन फ़सलें होती हैं। उनके पास समय बहुत कम होता है और ऐसे में एक-एक दिन मायने रखता है, क्योंकि किसानों को अपने खेतों से हो रही आय में गिरावट दिख रही है और वे इस गिरती आय की हर आखिरी बूंद को निचोड़ लेना चाहते हैं। यही वजह है कि 1970 के दशक से पराली जलाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। जैसे ही पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में कंबाइन्ड हार्वेस्टर दिखायी पड़ने लगे,वैसे ही हाथ से कटाई कम होती चली गयी और पराली की समस्या भी बढ़ती गयी। खेतों में लगी फ़सलों को काटने वाली नयी मशीनें फ़सल के डंठल को ज़मीन के नीचे पर्याप्त गहराई तक नहीं काट सकती हैं। इसलिए, कटाई के बाद भी पुआल के ठूंठ ज़मीन से एक इंच या एक फुट ऊंचे चिपके हुए रहते हैं। हाथ से या अन्य मशीनों के ज़रिये खेतों को साफ़ करने के लिए अतिरिक्त लागत की ज़रूरत होती है। ऐसे में भूसे को जलाना ज़्यादा आसान है।

पराली की समस्या के जड़ जमाने के बाद नीति निर्धारक एकदम से हरक़त में आ गये। उन्होंने इस मसले के हल को लेकर किसानों के सामने हैप्पी सीडर और सुपर सीडर जैसी उन कृषि मशीनों को पेश कर दिया, जिनसे बाद में आने वाली इस समस्या का आधार तैयार कर दिया। क्योंकि,सरकार ने ग्रामीण स्तर पर भूसा प्रबंधन के लिए इस मशीनरी की सहायता का उचित प्रबंधन किया ही नहीं। सरकार के ख़ुद के अनुमान इस बात की पुष्टि करते हैं कि पूरे पंजाब क्षेत्र में इन मशीनों को मुहैया कराने के लिए पर्याप्त संख्या में हैप्पी सीडर, मल्चर आदि नहीं हैं। ऊपर से इंधन की लागत तेज़ी से बढ़ रही है और किसानों को इन मशीनों को किराये पर लेने या ख़रीदने से पूरी तरह से हतोत्साहित किया जाता रहा है।

पंजाब के ग्रामीण इलाक़ो में धान की पराली को साफ़ करने में प्रति एकड़ 2,500 रुपये का ख़र्च आता है। छोटी आय वाले छोटे किसान इतना ख़र्च उठा पाने की स्थिति में नहीं हैं। इन कृषि-मशीनरी को ख़रीदना इसलिए एक मुश्किल का काम है, क्योंकि सरकार केवल कुछ मुट्ठी भर सूचीबद्ध एजेंसियों को ही सब्सिडी देती है। किसानों के पास एक सस्ती मशीन ख़रीदने या संशोधित रोटावेटर जैसे कहीं ज़्यादा बेहतर विकल्प को अपनाने का कोई उपाय नहीं है, जिसकी क़ीमत (हैप्पी सीडर्स की 1.75 लाख रुपये की क़ीमत के मुक़ाबले) 18,000-25000 रुपये है।

उच्च स्तर के पराली प्रबंधन मशीनों के लिए 60HP से ज़्यादा वाले ट्रैक्टरों की ज़रूरत होती है, जो ग्रामीण इलाक़ों में दुर्लभ हैं। अगर किसान सुपर सीडर चाहते हैं, तो उन्हें एक नया उच्च शक्ति वाला ट्रैक्टर खरीदना होगा। इसका मतलब यह होगा कि उनके पास जितने भी कृषि उपकरण हैं, वे सभी बेकार हो जायेंगे। किसान को इन मशीनों को अपनाने से पहले खेती-बारी से जुड़ी पूरी व्यवस्था को बदलना होगा। यही वजह है कि सिर्फ़ बड़े और अमीर किसान ही इस बदलाव का ख़र्च उठा सकते हैं। सरकार को पराली की इस समस्या से निपटने के लिए छिटपुट और टुकड़ों-टुकड़ों में समाधान देने के बजाय छोटे किसानों की सहायता के लिए आगे आना होगा।

पंजाब-हरियाणा के किसानों ने सब्सिडी नीतियों को प्रभावित करने में कॉर्पोरेट के हस्तक्षेप की भी शिकायत की है। अगर हम इन मशीनों को लेकर महंगाई की तुलना करें, तो ज़्यादातर किसानों की शिकायत यही है कि जब से सरकार ने सब्सिडी का ऐलान किया है, तबसे कृषि से जुड़े इन मशीनों की क़ीमतें भी बढ़ी हैं। जिस हैप्पी सीडर की क़ीमत पहले 1 लाख रुपये हुआ करती थी, अब 1.75 लाख रुपये के आस-पास पड़ती है।

ख़राब नीति के चलते हर साल पराली जलाने की समस्या बढ़ जाती है। नीति निर्माता किसानों की नहीं सुन रहे हैं कि आख़िर वे चाहते क्या हैं। इसके बजाय, हमने बार-बार देखा है कि वे उन पर अपने उन 'समाधानों' को थोपने की कोशिश कर रहे हैं, जिनकी तरफ़ किसानों का ध्यान ही नहीं जाता।

अब  सवाल उठता है कि क्या खेतों का हाथ से सफ़ाई और इन मशीनों के विकल्प हैं ? हां, कृषि-मशीनरी निर्माताओं को पैसे देने से बचने और किसानों को अपने खेतों की पराली को साफ़ कराने के लिए नक़द देना संभव है। इससे पराली जलाना बंद हो जायेगा और लोगों को कुछ दिनों के लिए खेती से जुडा काम भी मिल जायेगा। महंगाई के साथ-साथ समय और ईंधन लागत की बचत को ध्यान में रखते हुए किसानों को पराली जलाने से ख़ुद को रोकने में कहीं ज़्यादा खुशी होगी।

इस समस्या से पार पाने की दिशा में बढ़ाया गया दूसरा कदम होगा- धान की खेती की जगह उन फ़सलों की खेती करना, जिसकी जैविक  खेती करना कहीं ज़्यादा आसान हो और वास्तव में विविधपूर्ण हो। रासायनिक खेती करने वाला हर किसान ख़रीफ़ धान की उपज पर अपेक्षाकृत ज़्यादा कमाता है। हालांकि, अगर हम बढ़ती निवेश लागत को ध्यान में रखते हैं, तो उत्पाद से शुद्ध लाभ अभी भी अपेक्षाकृत कम है। यही वजह है कि उन्हें अगली फ़सल के लिए अपने खेतों की तैयारी के साथ-साथ जल्दबाज़ी करने के लिए मजबूर होना होता है। खेती की मौजूदा व्यवस्था में शामिल पारिस्थितिकी और पानी की लागत पंजाब के खेतों को तबाह कर रही है। धान की खेती से बाहर निकलने के दौरान किसानों को कम से कम तीन सालों के लिए मूल्य समर्थन पाने का यह एक और कारण बनता है।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि इन तीन सालों के दौरान उनकी आय प्रभावित न हो, इसके लिए किसानों को जैविक प्रमाणन पाने और बहु-फसल के तौर-तरीक़ों को फिर से सीखने के लिए प्रोत्साहन मिलना चाहिए। जैविक उत्पाद के लिए नियमित रासायनिक फ़सलों के मुक़ाबले चार गुना ज़्यादा क़ीमत मिलती है, और यह मिट्टी और किसानों के स्वास्थ्य के लिहाज़ से भी फ़ायदेमंद है। यहां तक कि जैविक प्रमाणन वाले तिलहन या फलियों की फ़सले को अपनाने से भी उन्हें इस तरह का फ़ायदा मिल सकता है। यही कारण है कि अपने खेतों में अलग-अलग तरह की फ़सलों को उपजाना पंजाब के किसानों की ज़रूरत है।

हमें पंजाब को कृषिगत उत्पादों का उत्पादन करने वाले इलाक़े से खाद्य उत्पादन करने वाले इलाक़े में ढालने की ज़रूरत है। यह आश्चर्य की बात हो सकती है, लेकिन हक़ीक़त है कि पंजाब के गांव में रहने वाले परिवार चावल का इस्तेमाल बहुत ही कम करते हैं। फिर भी, पूरे राज्य में चावल का उत्पादन होता है। यह मिट्टी, पानी और समाज की तबाही पर आधारित एक कृत्रिम रूप से निरंतर चलने वाली व्यवस्था है।

थर्मल प्लांट के लिए गैसीकरण(उच्च तापमान पर कार्बनिक या जीवाश्म-आधारित कार्बनयुक्त पदार्थों को परिवर्तित करने की प्रक्रिया) या धान की पुआल से बने कोयला बनाने जैसे समाधान के चर्चे भी ज़ोरों पर हैं, लेकिन वे सरकार की हैप्पी सीडर परियोजना की तरह ही अव्यावहारिक हैं। इन औद्योगिक समाधानों की ओर रुख़ करके नीति निर्माता पंजाब में अगली समस्या को जन्म देने जा रहे हैं। इसके अलावा, पुआल को मिट्टी में मिला देना चाहिए। आधुनिक दौर की प्राकृतिक खेती के जनक मासानोबु फ़ुकुओका ने जापान में अपने चावल के खेतों की मिट्टी में पराली को मिलाये जाने की अहमियत को स्थापित किया है और उन्होंने यह भी साबित कर दिया है कि किसान अपने खेतों में पुआल जलाकर अपने सबसे क़ीमती उर्वरक को बेतरह नुक़सान पहुंचा रहे हैं। पंजाब में भी इस तरह के नये स्वर सुनायी देने लगे हैं, जो पराली जलाने के बजाय प्राकृतिक खेती के इन्हीं तरीकों को अपनाने पर ज़ोर दे रहे हैं। पराली जलाने का आख़िरी विकल्प मशरूम की खेती जैसी गतिविधियां हैं। मशरूम उत्पादक धान के भूसे का व्यापक रूप से कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करते हैं। पैडी स्ट्र मशरूम,ऑयस्टर आदि जैसी मशरूम की विभिन्न क़िस्में धान की भूसी पर अच्छी तरह से विकसित होती हैं और किसान अपने पोषण और आय को बढ़ाने के लिए इसकी खेती कर सकते हैं।

हालांकि, ये सभी व्यवस्थायें एक हद तक ही काम कर सकती हैं। सरकार के लिए पराली जलाने का एकमात्र दीर्घकालिक व्यावहारिक समाधान कम लागत और निम्न तकनीक वाली उन मशीनों का समर्थन करना है, जो ग्रामीण स्तर पर पराली का प्रबंधन करती हैं और किसानों को उनके कृषि-जलवायु क्षेत्रों के अनुकूल फ़सल उगाने में मदद करती है। धान ख़रीद से जुड़ी किसी डीबीटी(प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण) नीति को लेकर भी यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि सरकारी व्यवस्था को आपूर्ति करने वाले सभी किसान पराली नहीं जला रहे हैं और बदले में पराली प्रबंधन के लिए मूल्य समर्थन हासिल कर रहे हैं।

लेखक एक स्वतंत्र नीति विश्लेषक हैं और कृषि और पर्यावरण पर लिखते हैं। इनके विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Why the Stubble Burning Problem Refuses to Go Away

stubble burning
Air Pollution
Punjab Haryana stubble burning
Paddy Cultivation
crop diversification
farm subsidies
corporate farms

Related Stories

वर्ष 2030 तक हार्ट अटैक से सबसे ज़्यादा मौत भारत में होगी

बिहार की राजधानी पटना देश में सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहर

दिल्ली से देहरादून जल्दी पहुंचने के लिए सैकड़ों वर्ष पुराने साल समेत हज़ारों वृक्षों के काटने का विरोध

साल 2021 में दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी थी : रिपोर्ट

विश्व जल दिवस : ग्राउंड वाटर की अनदेखी करती दुनिया और भारत

देहरादून: सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट के कारण ज़हरीली हवा में जीने को मजबूर ग्रामीण

हवा में ज़हर घोल रहे लखनऊ के दस हॉटस्पॉट, रोकने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने तैयार किया एक्शन प्लान

कृषि क़ानूनों के निरस्त हो जाने के बाद किसानों को क्या रास्ता अख़्तियार करना चाहिए

हर नागरिक को स्वच्छ हवा का अधिकार सुनिश्चित करे सरकार

किसानों की बदहाली दूर करने के लिए ढेर सारे जायज कदम उठाने होंगे! 


बाकी खबरें

  • poonam
    सरोजिनी बिष्ट
    यूपी पुलिस की पिटाई की शिकार ‘आशा’ पूनम पांडे की कहानी
    16 Nov 2021
    आख़िर पूनम ने ऐसा क्या अपराध कर दिया था कि पुलिस ने न केवल उन्हें इतनी बेहरमी से पीटा, बल्कि उनपर मुकदमा भी दर्ज कर दिया।
  • UP
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी : जनता बदलाव का मन बना चुकी, बनावटी भीड़ और मेगा-इवेंट अब उसे बदल नहीं पाएंगे
    16 Nov 2021
    उत्तर-प्रदेश में चुनाव की हलचल तेज होती जा रही है। पिछले 15 दिन के अंदर यूपी में मोदी-शाह के आधे दर्जन कार्यक्रम हो चुके हैं। आज 16 नवम्बर को प्रधानमंत्री पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का उद्घाटन करने…
  • Ramraj government's indifference towards farmers
    ओंकार सिंह
    लड़ाई अंधेरे से, लेकिन उजाला से वास्ता नहीं: रामराज वाली सरकार की किसानों के प्रति उदासीनता
    16 Nov 2021
    इस रामराज में अंधियारे और उजाले के मायने बहुत साफ हैं। उजाला मतलब हुक्मरानों और रईसों के हिस्से की चीज। अंधेरा मतलब महंगे तेल, राशन-सब्जी और ईंधन के लिए बिलबिलाते आम किसान-मजदूर के हिस्से की चीज।   
  • दित्सा भट्टाचार्य
    एबीवीपी सदस्यों के कथित हमले के ख़िलाफ़ जेएनयू छात्रों ने निकाली विरोध रैली
    16 Nov 2021
    जेएनयूएसयू सदस्यों का कहना है कि एक संगठन द्वारा रीडिंग सत्र आयोजित करने के लिए बुक किए गए यूनियन रूम पर एबीवीपी के सदस्यों ने क़ब्ज़ा कर लिया था। एबीवीपी सदस्यों पर यह भी आरोप है कि उन्होंने कार्यक्रम…
  • Amid rising tide of labor actions, Starbucks workers set to vote on unionizing
    मोनिका क्रूज़
    श्रमिकों के तीव्र होते संघर्ष के बीच स्टारबक्स के कर्मचारी यूनियन बनाने को लेकर मतदान करेंगे
    16 Nov 2021
    न्यूयॉर्क में स्टारबक्स के कामगार इस कंपनी के कॉर्पोरेट-स्वामित्व वाले स्टोर में संभावित रूप से  बनने वाले पहले यूनियन के लिए वोट करेंगे। कामगारों ने न्यूयॉर्क के ऊपर के तीन और स्टोरों में यूनियन का…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License