NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्या एक माफ़ी प्रशांत भूषण को महात्मा बना देगी?
जनता को क़ानून की सीमा के भीतर ख़ुद को व्यक्त करने का अधिकार है और किसी भी व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को सुनना चाहिए।
सुधांशु मोहंती
28 Aug 2020
Translated by महेश कुमार
क्या एक माफ़ी प्रशांत भूषण को महात्मा बना देगी?

सबसे पहले, एक स्वीकारोक्ति: मैं अक्सर अदालत से जुड़े समाचार को पढ़ता हूं, विशेष रूप से शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान द्विअर्थी संवाद और विचारो के आदान-प्रदान को सुनता हूं। जब मैं थका हुआ होता हूं, तो मुझे बार और बेंच के बीच इस तरह की हल्की-फुल्की बहस काफी उल्लासपूर्ण लगती है। उच्चतम न्यायालय की बड़ी प्रतिष्ठा के बावजूद, इस तरह के संवाद या आदान-प्रदान से यह भी पता चलता है कि माननीय न्यायाधीश भी आखिर मानव हैं। समय-समय पर उच्चतम न्यायालय के किसी भी फैसले को पढ़ने से हमारे न्यायिक स्वास्थ्य और उसकी बेहतरी में मदद मिल सकती है। माननीय अदालत ने खुद कहा है कि न्यायपालिका एक "केंद्रीय स्तंभ" है। (यह ओडिय़ा कहावत के अनुसार है जो धोबी घाटों को ऊंचा उठाने के बारे में  है- जहां हम अपने गंदे कपड़ों को साफ करते हैं- जो किसी गांव के स्वास्थ्य और स्वच्छता का सर्वोत्तम संकेतक माना जाता है।)

लेकिन 25 अगस्त को प्रशांत भूषण के मामले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा  ऋषि मुनी वाणी वाले शब्द मेरी आत्मा को कुछ हिला नहीं पाए। अदालत, अगर निष्पक्ष रूप से कहा जाए तो समझदार नहीं बल्कि हताश नज़र आई, जो लौकिक तिनके के सहारे पार पाना चाह रही थी। न्यायाधीश ने मामले में फैसला सुरक्षित रखते हुए पुंछा: "आप मुझे बताए कि’ माफी शब्द के इस्तेमाल में क्या गलत है? क्या माफी मांगना गलत है”? क्या माफी मांगना  दोषी होने को प्रतिबिंबित करता है? माफी एक जादुई शब्द है, जो कई चीजों को ठीक कर सकता है। ये मैं आम बात कर रहा हूं न की प्रशांत के बारे में बात कर रहा हूं। यदि आप माफी मांगते हैं तो आप महात्मा गांधी की श्रेणी में आ जाएंगे। गांधीजी ऐसा करते थे। यदि आपने किसी को तकलीफ दी है, तो आपको ही उसका इलाज़ करना चाहिए। किसी को किसी का अनादर नहीं करना चाहिए।”

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, भूषण के वकील राजीव धवन ने अदालत की अवमानना पर पीठ के उस फैंसले की आलोचना कराते हुए जिसमें भूषण से "बिना शर्त माफी" के लिए कहा था, को  "जबरदस्ती का दबाव या अभ्यास" माना गया है। लाइवलॉं के अनुसार, धवन ने अदालत के आदेश पर प्रतिकृया जताते हुए कहा, “कानून के शिकंजे से बचने के लिए माफी नहीं मांगी जा सकती। माफी के लिए ईमानदार होना जरूरी है।” उन्होंने कहा कि उन्होंने शीर्ष अदालत पर 900 से अधिक लेख लिखे हैं और उन्होंने इन लेकोन में एक बार यह भी कहा था कि "सुप्रीम कोर्ट का स्वभाव 'मध्यम वर्ग' जैसा है।" क्या यह कथन अवमानना है? ” उन्होंने न्यायमूर्ति मिश्रा को याद दिलाया कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप आपने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ उनकी टिपणी के लिए कि न्यायाधीश भ्रष्ट हैं, अवमानना की कार्रवाई शुरू नहीं की थी। धवन ने कहा, "उस वक़्त लॉर्डशिप ने मुख्यमंत्री की हैसियत को ध्यान में रखा था।"

मैं व्यक्तिगत रूप से सबसे अधिक ऊंचे उच्चारणों के बीच उनसे माफी की विनती करूंगा, जिसे मैंने कभी नहीं सुना है, नागरिकों के अपर्याप्त मौलिक अधिकारों के सबसे बड़े रक्षक के रूप में शीर्ष अदालत का उत्सव। मैंने पढ़ा कि आपने "माफ़ी मांगो तो आप महात्मा गांधी की श्रेणी में जाएंगे" शब्दों को पढ़ा और फिर दोबारा पढ़ा।  

वास्तव में!

इस तरह के हताश शब्दों को अदालत द्वारा गंभीरता के साथ बोला गया है। हमने बेंच-हंटिंग के आरोपों को सुना है और हमने पढ़ा कि कैसे भूषण "अवमानना के योग्य भी नहीं हैं" (जैसा कि नवंबर 2017 में जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था)। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ द्वारा दिए गए न्यायाधीश लोया फैसले में भूषण और दुष्यंत दवे के खिलाफ अदालत ने एक बार अप्रैल 2018 में कहा था, "याचिकाकर्ताओं और हस्तक्षेपकर्ताओं के आचरण से अदालत की प्रक्रिया खराब हो जाती है और यह प्रथम दृष्ट्या (प्राइमा फेशी) आपराधिक अवमानना का मामला  बनता है।"

हालाँकि, अदालत ने इस पर एक "आवेगहीन विचार" लिया और आपराधिक अवमानना कार्यवाही न चलाने का फैसला किया,"... ताकि यह धारणा न बन जाए कि मुकदमेबाज और उनके लिए पेश होने वाले वकीलों को एक असमान लड़ाई लड़ने के लेई मजबूर किया जा रहा है....न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता उसके नैतिक अधिकार पर आधारित है। यह वह दृढ़ विश्वास है जिसकी वजह से हमने अवमानना में अधिकार क्षेत्र को लागू नहीं किया है। ”

मैं यहां केवल भूषण के पिता शांति भूषण के उन शब्दों को याद कर सकता हूं, जो उन्होने 2010 में पिछले मुख्य न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार के एक मामले में हलफनामे में कहे थे, जिसे एक दशक बाद एक बार फिर से जीवित किया जा रहा है:"... क्योंकि आवेदक सार्वजनिक रूप से यह कह रहा था कि भारत के अंतिम सोलह मुख्य न्यायाधीशों में से आठ निश्चित रूप से भ्रष्ट थे, तो इस आवेदक को भी इस अवमानना याचिका में एक अन्य उत्तरदाता के रूप में जोड़ा जाना चाहिए ताकि उन्हें भी अवमानना के लिए उपयुक्त रूप से दंडित किया जा सके। आवेदक का भारत के लोगों को एक ईमानदार और स्वच्छ न्यायपालिका देने के प्रयास करने में जेल काटने का विचार महान विचार होगा।”

इसलिए हालिया न्यायिक अतीत वास्तव में अवमानना के अधिकार क्षेत्र के मामले में कोई मार्गदर्शक नहीं है। देश का कानून खस्ताहाल है, अगर अवास्तविक नहीं है। एक अन्य उदाहरण का हवाला देते हुए, जिसमें शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू को न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा जारी किए गए नोटिस में अदालत की गरिमा को कम ने की बात कही गई थी।

हमें इसका सामना करना होगा। अदालत के कानून की अवमानना एक मध्ययुगीन राजतंत्रीय अनुबंध है, जब न्यायाधीशों को राजशाही द्वारा इस तरह की ताक़त दी जाती थी। अदालत के प्रति किसी भी अपराध को लगभग दैवीय शक्ति को नाराज करने जैसा माना जाता था! तो यह कितना भी रूढ़िवादी लगे, यहां तक कि इसे छिपाने वाले ब्रिटिश भी इसे फिसलने देते रहे।

शायद इसे दोहराए जाने की जरूरत नहीं है कि लोकतंत्र सार्वजनिक मास्टर से अपनी रोशनी लेता है, और लोक सेवकों को लोकतंत्र का मात्र सेवक माना जाता है। नि:संदेह मास्टर को संवैधानिक कानून और कानून के शासन की सीमा के भीतर खुद को व्यक्त करने का अधिकार है।

"न्याय एक निर्जन गुण नहीं है।" हम अक्सर लॉर्ड एटकिन के क़ानूनी वाक्य के इन शब्दों का सामना करते हैं। एटकिन कहते हैं कि " न्यायपालिका को आम व्यक्तियों की मुखर टिप्पणियों के बावजूद जांच और सम्मान का सामना करना होगा"। न्यायपालिका को लोकतांत्रिक भारत के अन्य सार्वजनिक सेवा अंगों की तरह आलोचना और खुली बहस का सामना करना चाहिए। कोई भी संस्था निरपेक्ष नहीं है या आलोचना से ऊपर नहीं हो सकती है। व्यवस्था के भीतर शक्तियों का विभाजन और उन पर नज़र रखना, एक बेरोक शक्ति के बेज़ा इस्तेमाल को रोकने के सचेत डिजाइन का हिस्सा है।

वर्ष 1968 की पेरिस हड़ताल के दौरान लेखक-दार्शनिक ज्यां पॉल सार्त्र को सविनय अवज्ञा के लिए गिरफ्तारी के जवाब में फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल के यादगार शब्द आज भी मेरे कान में बज़ रहे हैं: आप वोल्टेयर को गिरफ्तार नहीं करेंगे! यह वही बात है जो एक परिपक्व लोकतंत्र को परिभाषित करता है- यह इस बात को सुनिश्चित करने की इच्छा रखता है कि नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई आंच न आए। यह अफ़सोस की बात है कि हम इसके विपरीत काम कर रहे हैं, असंतोष की आवाज़ों को दबा रहे हैं जिनमें लोकतंत्र का दिल बसता हैं।

आत्मविश्वास से भरे राष्ट्रों को इस तरह के जुल्म करने की जरूरत नहीं है। सम्मान के नाम पर किसी माफी के मंत्र को लागू करना ठीक नहीं है। जब माफी मांगी जाती है, तो माफी का सार उसकी धारणा स्वेच्छा से सिकुड़ जाती है और वाष्प बन उड जाती है। यह नागरिक की नैतिक हद के खिलाफ जबरदस्ती का सौदा है। अच्छा होता अगर पीठ भूषण के उस बयान को ध्यान में रखती जिसमें उन्होने कहा था कि माफी "मेरे विवेक की अवमानना" होगी। हम सभी को वैसी ही जीना चाहिए और करना चाहिए जैसे हमारा विवेक कहता है।

समस्या हमारे सामंती ढांचे में है। सार्वजनिक कार्यालयों में अक्सर (गलत तरीके से) सार्वजनिक लोक सेवकों की बड़ी अहमियत होती है। जो लोग सार्वजनिक पद पर काम रहते हैं, वे उन संस्थानों के मामले में भ्रमित रहते हैं। एक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ यौन उत्पीड़न का  आरोप लगाना न्यायपालिका पर हमले के रूप में देखा गया था। तो यहाँ भी यह मामला कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। जनता की सेवा में उनकी भूमिका के मामले में न्यायाधीशों को खुद के आत्मनिरीक्षण की बहुत जरूरत है। औचित्य की सीमा के भीतर, उन्हें भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविकता को स्वीकार कर अपनी अंतरात्मा की आवाज़ के साथ और विनम्रता के साथ एक ईमानदार संवाद की जरूरत है।

माफी मांगना कोई नुस्खा नहीं है। एक आम नागरिक जो एक अजीब महामारी के भयावह समय से गुजर रहा है, यहाँ हम हर सार्वजनिक अधिकारी की कुछ नैतिकताएं के बारे में कुछ सबक पेश कर रहे हैं:

1. उतना ही निवाला लें जितना कि आप चबा सकते हैं। 

2. अपनी स्वाभाविक सीमाओं से सावधान रहें।

3. आधिकारिक ताक़त से जनता को नीचा दिखाना कोई इलाज़ नहीं हैं, वह भी सोशल मीडिया के युग में ऐसा नहीं चलेगा।

4. कोई भी ढाल खंडित आंतरिक आवाज़ की रक्षा नहीं कर सकती है। आपके भीतर जो भी चल रहा वह अनचाहे तरीके से रेंगते हुए आपके मन की आंतरिक यादों में प्रकट हो जाता है।

5. जो सालन बत्तख के लिए काम करेगा वही हंस के लिए भी काम करेगा।

लॉर्ड सैल्मन ने, एजी बनाम ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग काउंसिल, 1981 के मामले में, "अदालत की अवमानना" शब्द को भ्रामक बताया था। "इसका उद्देश्य न्यायालय की गरिमा की रक्षा करना नहीं है, बल्कि न्याय प्रशासन की रक्षा करना है।"

यह एक अंतिम एसिड जांच है जो हमें खुद को आश्वस्त करने में मदद कर सकती है, जिसमें सार्वजनिक कार्यालय शामिल हैं। इससे माफी की मांग नहीं धुलेगी।

लेखक पूर्व सिविल सेवक हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

Contempt of Court
Public service
prashant bhushan

Related Stories

लखीमपुर खीरी कांड में एक और अहम गवाह पर हमले की खबर  

चंपारण से बनारस पहुंची सत्याग्रह यात्रा, पंचायत में बोले प्रशांत भूषण- किसानों की सुनामी में बह जाएगी भाजपा 

कार्टून बनाने वाले दूत की हत्या

एक्टीविस्ट, न्यायविद एवं पत्रकारों ने कहा- ‘अलोकतांत्रिक एवं जन-विरोधी’ मोदी सरकार संस्थाओं को बर्बाद करने पर तुली है 

दिल्ली दंगे: “असली दोषियों” को सज़ा के लिए न्यायिक जांच आयोग के गठन की मांग

प्रशांत भूषण ने अवमानना का दोषी ठहराने के फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर की

'सुप्रीम कोर्ट ने अपनी गरिमा घटाई है'

प्रशांत भूषण को जेल क्यों नहीं जाना चाहिए था?

प्रशांत भूषण पर एक रुपये का जुर्माना, दिल्ली में गहराता भोजन संकट और अन्य

पुनर्विचार याचिका दायर करने का अधिकार सुरक्षित: भूषण


बाकी खबरें

  • spain
    डीडब्ल्यू
    स्पेन : 'कंप्यूटर एरर' की वजह से पास हुआ श्रम सुधार बिल
    08 Feb 2022
    स्पेन की संसद ने सरकार के श्रम सुधार बिल को सिर्फ़ 1 वोट के फ़ासले से पारित कर दिया- विपक्ष ने कहा कि यह एक वोट उनके सदस्य ने ग़लती से दे दिया था।
  • Uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव 2022 : बदहाल अस्पताल, इलाज के लिए भटकते मरीज़!
    08 Feb 2022
    भारतीय रिजर्व बैंक की स्टेट फाइनेंस एंड स्टडी ऑफ़ बजट 2020-21 रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड सरकार के द्वारा जन स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च किया गया है।
  • uttarakhand
    न्यूज़क्लिक टीम
    चमोली जिले का थराली विधानसभा: आखिर क्या चाहती है जनता?
    07 Feb 2022
    उत्तराखंड चुनाव से पहले न्यूज़क्लिक की टीम ने चमोली जिले के थराली विधानसभा का दौरा किया और लोगों से बातचीत करके समझने का प्रयास किया की क्या है उनके मुद्दे ? देखिए हमारी ग्राउंड रिपोर्ट
  • election
    न्यूज़क्लिक टीम
    धर्म का कार्ड नाजी दौर में ढकेलेगा देश को, बस आंदोलन देते हैं राहत : इरफ़ान हबीब
    07 Feb 2022
    Exclusive इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने देश के Living Legend, विश्व विख्यात इतिहासकार इरफ़ान हबीब से उनके घर अलीगढ़ में बातचीत की और जानना चाहा कि चुनावी समर में वह कैसे देख रहे हैं…
  • Punjab
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाबः बदहाल विश्वविद्यालयों पर क्यों नहीं बात करती राजनैतिक पार्टियाँ !
    07 Feb 2022
    पंजाब में सभी राजनैतिक पार्टियाँ राज्य पर 3 लाख करोड़ के कर्ज़े की दुहाई दे रही है. इस वित्तीय संकट का एक असर इसके विश्वविद्यालयों पर भी पड़ रहा है. अच्छे रीसर्च के बावजूद विश्वविद्यालय पैसे की भारी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License