NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्या हिंदुत्व की राजनीति फिर से कोई करतब दिखा पाएगी?
मोदी शासन अपनी कुछ चमक खो रहा है और राम नाम के कार्ड का प्रभाव भी कम हो रहा है, जिसकी वजह से भाजपा विधानसभा चुनाव से पहले डाँवाँडोल और विभाजित नज़र आ रही है। 
पार्थ एस घोष
24 Jul 2021
Translated by महेश कुमार
yogi

2022 की शुरुआत में, भारत के पांच राज्य, जिसमें गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश शामिल हैं, में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन पांच राज्यों में से, उत्तर प्रदेश सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय कर सकता है कि 2024 के संसदीय चुनाव की दिशा क्या होगी। इस प्रदेश में भारत की आबादी का 16.5 प्रतिशत हिस्सा रहता है, और संसद के कुल 543 सदस्यों में से यह अकेले ही 80 सदस्य सदन में भेजता है। भारत के अब तक के कुल 14 प्रधानमंत्रियों में नौ उत्तर प्रदेश से रहे हैं। यहां तक ​​कि वर्तमान गुजराती अंधराष्ट्रवादी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद वाराणसी निर्वाचन क्षेत्र से राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इस बात की पूरी संभावना है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा पूरे जोश के साथ  राम कार्ड खेलेगी। सवाल यह है कि क्या यह 2017 के चुनाव की तरह काम करेगा। इस तरह का संदेह हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल चुनाव के कारण पैदा होता है, जहां मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने जय श्री राम के नारे के उद्घोष के साथ जीत की सवारी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी - लेकिन इससे पार्टी को बहुत कम फायदा हुआ। सही नतीजों पर पहुँचने के लिए राम कार्ड की कीमत को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखते हुए हमारे लिए एक चुनाव की अहानिकार  घटना पर फिर से विचार करना महत्वपूर्ण हो जाता है।

अपनी एक चुनावी रैली में, तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने नाटकीय रूप से चंडीपाठ  (देवी दुर्गा की स्तुति में मंत्र पढ़ा, जिससे सभी बंगाली परिचित हैं) किया। राजनीतिक मुनाफे के लिए बनर्जी का यह सब ऐसे समय पर करना थोड़ा राजनीतिक ड्रामा तो था लेकिन काफी आवेगपूर्ण था। उनका संदेश सरल किन्तु शक्तिशाली था कि: हिंदू धर्म राम से शुरू होकर राम पर खत्म नहीं होता है। अन्य हिंदू देवताओं की भी एक मजबूत अपील है। बंगाल में राम का सम्मान हो सकता है, लेकिन दुर्गा और काली कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। भाजपा के जय श्री राम के हमले को राम का उल्लेख किए बिना भी काउंटर किया जा सकता है।  

यह बारीकी भारतीय राजनीति में तेजी से प्रासंगिक बन सकती हैं। भाजपा के खिलाफ खड़ी राजनीतिक ताकतें इस अंतर को ध्यान में रखते हुए अपना धार्मिक कार्ड खेल सकती हैं। आइए कुछ और उदाहरणों पर विचार करें। 2019 के संसदीय चुनाव के दौरान, कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी ने एक रणनीति  के तहत भगवान शिव का आह्वान किया था। चूंकि राम कार्ड पूरी तरह से भाजपा के कब्जे में है, इसलिए उन्हे भगवान शिव का इस्तेमाल करना एक अच्छा विकल्प लगा। शिव को महेश भी कहा जाता है और भगवान शिव ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिमूर्ति का ही एक हिस्सा हैं।

माथे पर सिंदूर का लेप लगा और कमर के चारों ओर धोती (पारंपरिक लंगोटी) पहन कर, गांधी ने खुद को "प्रामाणिक आर्य" के रूप में पेश करने की कोशिश की थी। उनकी राजनीतिक चुनौती को भाजपा के अलावा किसी ने ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। भाजपा का पहला रूप यानि  जनसंघ के अनुभव ने पार्टी को इस छिपे हुए खतरे के बारे में सिखाया था। उन्हे मालूम है कि  1950 और 1960 के दशक में जनसंघ अच्छा प्रदर्शन इसलिए नहीं कर पाती थी क्योंकि जनसंघ के हिंदू कार्ड को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने सॉफ्ट-हिंदू विचार के माध्यम से हथिया लिया था। पंडित जवाहरलाल नेहरू इस तरह के दृष्टिकोण के खिलाफ थे लेकिन स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं को मनाने में वे भी असमर्थ थे।

अपने पिछले सबक से सबक लेते हुए, भाजपा ने गांधी की चाल को चकमा देने के लिए अपनी दुर्जेय ट्रोल सेना को तैनात कर दिया। कुछ ही समय में, पार्टी के सोशल मीडिया सेल ने उनके कद को काट दिया, उन्हें पप्पू कहा, एक अपमानजनक शब्द जो एक मूर्खतापूर्ण बचकाना चरित्र को दर्शाता है। लेकिन दूसरों ने राहुल की चाल पर ध्यान दिया। एक अन्य भाजपा विरोधी नेता, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने बहुत पहले ही अपने राम कार्ड की ब्रांडिंग शुरू कर दी थी, हालांकि उनका तरीका थोड़ा जटिल था। 

दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने श्री रामायण एक्सप्रेस का प्रस्ताव रखा, जो हिंदू तीर्थयात्रियों को दिल्ली से राम भगवान से संबंधित तीर्थ स्थलों जैसे सीतामढ़ी, जनकपुर (नेपाल), वाराणसी, प्रयाग, चित्रकूट, हम्पी, नासिक और रामेश्वरम तक यात्रा कराने के बारे में था। इसलिए अपनी धर्मनिरपेक्ष साख के साथ विश्वासघात किए बिना, जो भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण भी हैं, उन्होंने मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा की शुरूवात की। इस योजना के तहत सभी धर्मों के वरिष्ठ नागरिक स्वर्ण मंदिर, वाघा बॉर्डर, आनंदपुर साहिब, वैष्णो देवी, मथुरा, वृंदावन, हरिद्वार, ऋषिकेश, नीलकंठ, पुष्कर और अजमेर के दर्शन कर सकते हैं।

संक्षेप में, कोई भी भारतीय राजनेता धर्म से मुंह मोड़ने की हिम्मत नहीं कर सकता। हर कोई  बस भारत की बदलती परिस्थितियों के अनुकूल काम करता है। केजरीवाल खुद को कभी भी भगवान राम और भगवान हनुमान के सबसे प्रमुख भक्त के रूप में पेश करने में विफल नहीं होते हैं। भाजपा के अत्यंत शक्तिशाली राम कार्ड के कारण, हर पार्टी अन्य देवताओं की तलाश में रहती है। अब जबकि केजरीवाल अपने चुनावी मैदान का विस्तार कर रहे हैं, उन्होंने अहमदाबाद के एक मंदिर में भगवान कृष्ण का आशीर्वाद लेकर गुजरात में अपने चुनावी मिशन की शुरुवात की। वे जानते है कि भगवान कृष्ण राज्य में सबसे लोकप्रिय देवता हैं।

तो, अपने सवाल पर लौटते हुए, कि क्या भाजपा का राम कार्ड आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव में अपना पिछला जादू दिखा पाएगा? ऐसा हो सकता है, लेकिन मुझे यह भी लगता है कि यह कुछ हद तक अपनी चमक खो चुका है, मुख्यतः तीन कारणों से। एक, राम कार्ड को कम करके आँकने या उसे अधिक हाँकने से ऐसा हो सकता है, क्योंकि बजाए इसके वह सांस्कृतिक रूप से अधिक टिकाऊ शक्ति है; दूसरा, वैकल्पिक या स्वतंत्र समाचार और सोशल मीडिया, भाजपा समर्थक गोदी मीडिया के मुक़ाबले शक्तिशाली ताक़त के रूप में उभरे हैं; और तीसरा, मोदी का करिश्मा कम हो रहा है, जो पार्टी के भीतर नेतृत्व के अन्य दावेदारों, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर किसी का ध्यान नहीं गया है। नतीजतन, मोदी और योगी दोनों के बीच राम के नाम की हाथापाई हो सकती है, जो राम कार्ड की प्रभावशीलता को कमजोर कर सकती है।

भारत में राम की पूजा बड़ी और विविध है जिसे अयोध्या के एक मंदिर के भीतर बंद होकर पूरी नहीं किया जा सकता है, चाहे फिर मंदिर कितना भी भव्य क्यों न हो। जैसा कि ओहायो के ओबेरलिन कॉलेज में धर्म की मानद प्रोफेसर पाउला रिचमैन ने अपने सूक्ष्म शोध में दिखाया है, कि परंपरागत राम की एक पूरी दुनिया है जिस पर राम मंदिर की राजनीति का कब्जा नहीं हुआ है। मुझे याद है कुछ साल पहले गुवाहाटी में एक भाषण देने के बाद प्रोफेसर रिचमैन ने अपने दर्शकों से अनुरोध किया था कि वे असम के दैनिक जीवन में राम परंपरा के बारे में जो कुछ भी जानते हैं उसे साझा करें। मैं असमिया भाषा में ऐसे वाक्यांशों की प्रचुरता से चकित था जिसमें परंपरागत राम का संदर्भ था। एक ऐसे पल का प्रतिबिंब हमें यह समझाने के मामले में काफी होना चाहिए कि अन्य भारतीय भाषाओं में भी यही सच है। मैं निश्चित रूप से उन दो भाषाओं के बारे में बोल सकता हूं जिनसे मैं सबसे ज्यादा परिचित हूं: बंगाली और हिंदी।

एक साक्षात्कार में, प्रो॰ रिचमैन ने इस बात पर प्रकाश डाला कि यह परंपरा भारत तक ही सीमित नहीं है। यह इस बारे में भी है कि कैसे मनुष्य "जीवन में चुनौतियों और बाधाओं का सामना करते हुए और जीवन का अर्थ पाने के लिए एक व्यवस्था बनाता है। सभी ग्रन्थों की तरह राम और सीता की कहानी आज भी हमारे दायरे में गहरी छाप छोड़े हुए है और खुद के पात्रों और एपिसोड के कारण सार्थक बनी हुई है ... क्योंकि जिन लोगों के लिए रामायण केंद्रीय है, वे भारत, थाईलैंड, इंडोनेशिया सहित विभिन्न देशों में दुनिया भर में रहते हैं जैसे कि दक्षिण अफ्रीका, फिजी, त्रिनिदाद, सूरीनाम, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, यूरोप के कुछ हिस्सों और अन्य जगहों पर, यह वास्तव में एक वैश्विक पाठ के साथ-साथ थिएटर का एक वैश्विक हिस्सा बन गया है।

राम की भारतीय वंदना को जितना रोकना असंभव है, वैसे ही भारतीय मीडिया की बदलती धारणा को रोकना असंभव है। पिछले कुछ वर्षों में, एक वैकल्पिक मीडिया उभरा है और अब वह तथाकथित गोदी मीडिया के प्रभाव का असरदार ढंग से मुकाबला करने का एक शक्तिशाली स्रोत बन गया है। ये वैकल्पिक मीडिया पोर्टल नियमित रूप से भाजपा की राम-केंद्रित राजनीति का खोखलापन दिखाते रहते हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने राम मंदिर के लिए जमीन की खरीद में वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों का डटकर प्रसारण किया, इसने भाजपा द्वारा मामले को दरकिनार करने की सर्वोत्तम प्रयासों को सफलतापूर्वक विफल कर दिया था। अब जब समाजवादी पार्टी, आप और कांग्रेस जो उत्तर प्रदेश के पक्के दावेदार हैं इस मामले को जोरदार तरीके से उठा रहे हैं, तो यह बात तय है कि चुनाव की तारीख नजदीक आने के साथ-साथ इस कहानी का महत्व बढ़ेगा।

मोदी का निजी करिश्मा कम होता जा रहा है और योगी आदित्यनाथ के साथ उनकी बढ़ती प्रतिद्वंद्विता की कहानियों से अफवाहों का बाज़ार गर्म है। दो परस्पर विरोधी विचार इन दिनों प्रचलन में हैं। एक तो यह कि योगी आदित्यनाथ ने नरेंद्र मोदी को शर्मिंदा करने और उन्हें मंदिर का एकमात्र श्रेय लेने से रोकने के लिए राम मंदिर भूमि घोटाले की जानकारी लीक की; और दूसरा, मोदी मंदिर के फंड में आर्थिक गड़बड़ी को लेकर योगी को शर्मिंदा करने पर तुले हुए हैं।

वाराणसी इंटरनेशनल कोऑपरेशन एंड कन्वेंशन सेंटर 'रुद्राक्ष' के उद्घाटन समारोह में मोदी का 15 जुलाई का भाषण योगी आदित्यनाथ की इतनी प्रशंसा से भरा था जो कि एक मजाक की तरह लग रहा था। अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दों में योगी के शासन का उल्लेख करते हुए, मोदी ने इस बात की विशेष प्रशंसा की कि राज्य ने कोविड-19 महामारी को कैसे संभाला। जबकि इस मोर्चे पर राज्य का विनाशकारी रिकॉर्ड रहा है, जिससे यह प्रशंसा शायद ही कोई शाब्दिक रूप ले सकती है। उनके बीच बढ़ते आपसी संदेह को देखते हुए इसमें कोई शक नहीं है कि योगी आदित्यनाथ भी इसे समझ रहे हैं।

इस मामले पर एक शरारती टिप्पणीकार ने मजाकिया अंदाज में कहा कि उन्हे 2010 की बॉलीवुड ब्लॉकबस्टर दबंग का प्रसिद्ध संवाद याद आ गया, संवाद में, नायिका अपने महबूब से कहती है: 'थप्पड़ से डर नहीं लगता साहब, प्यार से लगता है- आपका थप्पड़ मुझे डराता नहीं है, सर, आपका प्यार डराता है। उसी तरह, योगी आदित्यनाथ खुद से कह रहे होंगे: नरेंद्र मोदी को को उनके ही माइक्रोफोन का इस्तेमाल कर मेरी प्रशंसा सुनने से बेहतर होगा कि उन्हे अपने से सुरक्षित दूरी पर रखा जाए। 

लेखक सामाजिक विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में सीनियर फेलो हैं और पूर्व में आईसीएसएसआर नेशनल फेलो और जेएनयू में दक्षिण एशियाई स्टडीज़ के प्रोफेसर रह चुके हैं। विचार व्यक्तिगत हैं

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।

Will Hindutva Politics Do The Trick Again?

Narendra modi
Yogi Adityanath
Uttar Pradesh election
politics over Ram
ram temple
ayodhya

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़


बाकी खबरें

  • ग्राउंड रिपोर्टः  यूपी में सवा सौ से ज्यादा बच्चों की मौत, अभी और कितनी जान लेगा 'मिस्ट्री फीवर'!
    विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्टः  यूपी में सवा सौ से ज्यादा बच्चों की मौत, अभी और कितनी जान लेगा 'मिस्ट्री फीवर'!
    09 Sep 2021
    रंग-बिरंगी चूड़ियों के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के साथ ही दुनिया की पुरातन सांस्कृतिक नगरी काशी (बनारस) में रहस्यमयी फीवर का कहर बरपा हुआ है। पश्चिम से पूरब तक मिस्ट्री फीवर का खौफ है।…
  • करनाल में तीसरे दिन भी किसानों का प्रदर्शन जारी, SDM पर कार्रवाई की मांग
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    करनाल में तीसरे दिन भी किसानों का प्रदर्शन जारी, SDM पर कार्रवाई की मांग
    09 Sep 2021
    वहीं सरकार का पक्षकार माने जाने वाले किसान संगठन ''भारतीय किसान संघ'' जो आरएसएस से जुड़ा हुआ है, ने भी विवादित तीन कृषि कानूनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और दिल्ली में प्रदर्शन किया।
  • अनियंत्रित ‘विकास’ से कराहते हिमालयी क्षेत्र, सात बिजली परियोजनों को मंज़ूरी! 
    डी रघुनंदन
    अनियंत्रित ‘विकास’ से कराहते हिमालयी क्षेत्र, सात बिजली परियोजनों को मंज़ूरी! 
    09 Sep 2021
    उत्तराखंड के अपर-गंगा क्षेत्र में, 7 विवादित पन-बिजली परियोजनाओं के लिए मंजूरी दे दी गई है। इन परियोजनाओं में, धौलीगंगा पर बनने वाली 512 मेगावाट की तपोवन-विष्णुगढ़ पन-बिजली परियोजना भी शामिल है, जिसे…
  • मीडिया लीक की जांच के लिए दिल्ली पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता: आसिफ तन्हा के वकील
    सबरंग इंडिया
    मीडिया लीक की जांच के लिए दिल्ली पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता: आसिफ तन्हा के वकील
    09 Sep 2021
    अगस्त 2020 में, तन्हा के पुलिस को दिए गए कथित कबूलनामे को समाचार मीडिया में लीक कर दिया गया था, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कबूल किया था कि वह फरवरी 2020 की दिल्ली हिंसा की साजिश में शामिल थे।
  • 150 से अधिक प्रतिष्ठित नागरिक जावेद अख़्तर और नसीरुद्दीन शाह के समर्थन में उतरे
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    150 से अधिक प्रतिष्ठित नागरिक जावेद अख़्तर और नसीरुद्दीन शाह के समर्थन में उतरे
    09 Sep 2021
    प्रख्यात नागरिकों के एक समूह को इन दो जानी-मानी हस्तियों के प्रति अपने समर्थन को व्यक्त करने के लिए एक बयान जारी करना पड़ा है जब दोनों के द्वारा हिन्दू और मुस्लिम दक्षिणपंथियों के खिलाफ की गई…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License