NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
यदि पत्थलगड़ी "असंवैधानिक" है, तो क्या हिन्दू राष्ट्र "संवैधानिक" है?
मूर्तियों और तस्वीरों को भीI जिस संविधान को तोड़ना चाहते हैं, उसको बनाने वाले की मूर्ति पहले टूटनी चाहिएI
संजय पराते
08 May 2018
lenin
Image Courtesy: Hari Bhoomi

वे लेनिन की मूर्ति को तोड़ रहे हैं, क्योंकि वे अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन और शोषणविहीन समाज निर्माण के प्रणेता हैंI वे पेरियार की मूर्ति तोड़ रहे हैं, क्योंकि वे जातिवाद के खिलाफ संघर्ष के उत्कृष्ट नायक हैंI वे अंबेडकर की मूर्ति भंजन कर रहे हैं, क्योंकि मनु के संविधान को लागू करना चाहते हैंI वे गांधीजी की मूर्ति तोड़ रहे हैं, क्योंकि गोड़से को 'महात्मा' बनाना चाहते हैंI वे आदिवासी अधिकारों की उद्घोषणा करने वाले पत्थरों (पत्थलगड़ी) को तोड़ रहे हैं, क्योंकि उनसे जल-जंगल-जमीन के अधिअक्र को छीनना चाहते हैंI वे केवल तोड़-फोड़ करना जानते हैंIअभी तक उन्होंने कुछ बनाया नहीं है, लेकिन कह रहे हैं कि 'हिन्दू-राष्ट्र' बनाना है, इसलिए जो कुछ है, उसे तोड़ना-फोड़ना जरूरी हैI कानून को, संविधान को, मस्जिद को, किले को, संसद को, विधानसभा को –सबको- यहां तक कि

मूर्तियों और तस्वीरों को भीI जिस संविधान को तोड़ना चाहते हैं, उसको बनाने वाले की मूर्ति पहले टूटनी चाहिएI जिन दलितों-आदिवासियों और मेहनतकशों का वे दमन करना चाहते हैं, उनके आदर्शों को पहले बिखरना चाहिएI जिन किलों को स्वतंत्रता संग्राम का स्मारक बताया जा रहा है, उसे पहले बिकना चाहिएI जिसे वे दुश्मन बता रहे हैं, उसकी निशानी पहले टूटना चाहिएI इस देश की जनता ने जो कुछ पीढ़ियों से बनाया है, उसे तोड़ने के लिए 'जाहिलों की फ़ौज' चाहिएI ऐसी फ़ौज, जो तीन दिनों में 'सेना' की जगह ले सकेI जाहिलों की फ़ौज जितनी बड़ी होगी, तोड़ना-फोड़ना उतना ही आसान होगा और 'हिन्दू-राष्ट्र' की स्थापना की राह भी उतनी ही आसान होगीI

इसीलिये छत्तीसगढ़ में अब वे 'पत्थर' तोड़ रहे हैंI वे चाहते हैं कि आदिवासी उनके हिन्दू-राष्ट्र को गढ़ने के काम में आये, उन पत्थरों को गाड़ने के लिए नहीं, जो 'राष्ट्रसेवकों' की राह में कांटे बिछाएI उन्हें अब पत्थरों से भी डर लगता है, क्योंकि वे 'जीवित शिलालेख' हैं, जो आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की उद्घोषणा कर रहे हैंI इन अधिकारों को उसी संसद ने पारित किया है, जिस पर आज मोदी बैठे हैंI ऐसा करते हुए संसद ने और उस पर काबिज तब के सत्ताधारियों ने आदिवासियों से माफ़ी मांगी थी, उनके साथ हो रहे 'ऐतिहासिक अन्याय' को दूर करने का आश्वासन दिया थाI लेकिन यह माफ़ी भी चालाकी ही साबित हुईI प्रभु वर्ग ने न अंबेडकर के संविधान में रखे पांचवीं-छठी अनुसूची के प्रावधानों को उसकी भावनाओं में लागू किया, न पेसा कानून को और न ही वनाधिकार कानून कोI आदिवासी तब भी मानवाधिकारों से वंचित थे, आज भी हैंI जल-जंगल-जमीन पर उनके अधिकार आज और तेजी से छीने जा रहे हैंI इसीलिए ये पत्थर 'जीवित शिलालेख' हैं कि बस, बहुत हुआ – अब और नहींI ये हमारे संवैधानिक अधकार हैंI ये हमारे कानून हैंI ये हमारे गांव की चौहद्दी है, जिसमें किसी का अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जाएगाI पेसा कानून में ग्राम सभा की जिस 'सर्वोच्चता' को स्थापित किया गया है, हम उसे बहाल करते हैंI

यही 'पत्थलगड़ी' है, जिसके खिलाफ 'हिन्दू-राष्ट्र' के सैनिक आक्रामक हैंI वे इसे नक्सलवादी आंदोलन बता रहे हैंI वे इसे सामाजिक सद्भाव को तोड़ने की चाल बता रहे हैंI वे इसे धर्मांतरण की साजिश बता रहे हैंI वे इन 'जीवित शिलालेखों' को तोड़ने के लिए यात्राएं निकल रहे हैंI भाजपा सरकार की ताकत 'पत्थरतोड़ी' करने वालों के साथ हैंI

तो इस सरकार से सवाल पूछा ही जाना चाहिए : क्या हमारा संविधा, हमारा पेसा कानून, 5वीं-6वीं अनुसूची, वनाधिकार कानून – ये सब नक्सलवाद के जनक हैं? क्या ये सब धर्मांतरण को बढ़ावा दे रहे हैं?? क्या 'राष्ट्र सेवकों' द्वारा परिभाषित 'सामाजिक सद्भाव' को बनाए रखने के लिए आदिवासियों को अपने अधिकारों, मानवाधिकारों और विशेषाधिकारों का त्याग कर देना चाहिए? सत्ता में बैठी कोई भी सरकार – भाजपा भी – इन सवालों का जवाब "नहीं" में ही देगीI तब यह भी पूछा जाना चाहिए कि फिर इन संवैधानिक प्रावधानों को आज तक लागू क्यों नहीं किया गया? क्यों आदिवासी आज भी अपने ईलाकों में 'दोयम दर्जे' का नागरिक बनकर जीने के लिए अभिशप्त हैं? सरकार बताएं कि कहां, कब और किस मामले में उनके अधिकारों को मान्यता दी गई है? यदि आदिवासी ईलाकों में 'आदिवासी स्वशासन' को ही मान्यता नहीं दी जाएगी, तो आदिवासी अपने ईलाकों में किसी रमन-मोदी या टाटा-अंबानी-अडानी को ही राज करने की इजाजत क्यों दें??

लोकतंत्र निरंकुश बहुमत और अल्पसंख्यकों के दमन का तंत्र नहीं होता, जैसा कि स्वघोषित राष्ट्रसेवक समझाना चाहते हैंI पूरी दुनिया के लोकतंत्र का इतिहास यही बताता है कि यह अल्पसंख्यक और कमजोर समुदायों के सम्मान और उनके अधिकारों की प्रतिष्ठा पर टिका होता हैI सामजिक सद्भाव के लिए भी यह जरूरी हैI हमारा संविधान व्यक्ति को किसी भी धर्म, ईश्वर को मानने या न मानने या इन पर अपनी आस्था बदलने का भी अधिकार देता हैI लेकिन धर्मांतरण का हौवा खड़ा करके आदिवासियों के खिलाफ गैर-आदिवासियों को लामबंद करना संघी गिरोह की बहुत पुरानी चाल हैI 'पत्थलगड़ी' के खिलाफ 'पत्थरतोड़ी' अभियान भी इसी चाल का हिस्सा हैI वे आदिवासी-अधिकारों की उद्घोषणा करने वाले पत्थरों को तोड़ रहे हैं और उनके अधिकारों के दमन का जश्न मना रहे हैंI

अब आदिवासियों को भी समझ में आ रहा है कि वर्तमान भाजपा राज्य में या भविष्य के कथित 'हिन्दू राष्ट्र' में उनके अधिकार सुरक्षित नहीं हैI उन्हें 'स्वशासन' का अपना अधिकार त्यागकर 'हिन्दू राष्ट्र की पालकी ढोने वाले कहारों' के रूप में ही रहना होगा, जिसमें उन्हें अपने नायकों की नहीं, गोड़से-सावरकर की पूजा करने के लिए बाध्य किया जाएगा, जिसमें उनके देवों की स्थिति हिन्दू देवों के अधीनस्थ चरणों की ही होगीI अंबेडकर ने ठीक ही कहा था कि 'हिन्दू राष्ट्र' दलित-दमितों के लिए विपदा ही होगी और उनकी गुलामी की घोषणाI

lenin
B R Ambedkar

Related Stories

मज़दूर दिवस : हम ऊंघते, क़लम घिसते हुए, उत्पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे

कौन हैं ग़दरी बाबा मांगू राम, जिनके अद-धर्म आंदोलन ने अछूतों को दिखाई थी अलग राह

एक आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण की डॉ. आंबेडकर की परियोजना आज गहरे संकट में

दलित और आदिवासी महिलाओं के सम्मान से जुड़े सवाल

दलित पैंथर के 50 साल: भारत का पहला आक्रामक दलित युवा आंदोलन

65 साल बाद भी जीवंत और प्रासंगिक बाबासाहब

भारतीय संविधान पर चल रहे अलग-अलग विमर्शों के मायने!

विशेष: संविधान की रक्षा कौन करेगा?

भारतीय संविधान के पहले संशोधन पर फिर से एक नज़र

यूपी: क्या चुनाव नज़दीक आते ही भाजपा को बाबा साहेब की याद आ गई है?


बाकी खबरें

  • सत्यम् तिवारी
    वाद-विवाद; विनोद कुमार शुक्ल : "मुझे अब तक मालूम नहीं हुआ था, कि मैं ठगा जा रहा हूँ"
    16 Mar 2022
    लेखक-प्रकाशक की अनबन, किताबों में प्रूफ़ की ग़लतियाँ, प्रकाशकों की मनमानी; ये बातें हिंदी साहित्य के लिए नई नहीं हैं। मगर पिछले 10 दिनों में जो घटनाएं सामने आई हैं
  • pramod samvant
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेकः प्रमोद सावंत के बयान की पड़ताल,क्या कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार कांग्रेस ने किये?
    16 Mar 2022
    भाजपा के नेता महत्वपूर्ण तथ्यों को इधर-उधर कर दे रहे हैं। इंटरनेट पर इस समय इस बारे में काफी ग़लत प्रचार मौजूद है। एक तथ्य को लेकर काफी विवाद है कि उस समय यानी 1990 केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी।…
  • election result
    नीलू व्यास
    विधानसभा चुनाव परिणाम: लोकतंत्र को गूंगा-बहरा बनाने की प्रक्रिया
    16 Mar 2022
    जब कोई मतदाता सरकार से प्राप्त होने लाभों के लिए खुद को ‘ऋणी’ महसूस करता है और बेरोजगारी, स्वास्थ्य कुप्रबंधन इत्यादि को लेकर जवाबदेही की मांग करने में विफल रहता है, तो इसे कहीं से भी लोकतंत्र के लिए…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    फ़ेसबुक पर 23 अज्ञात विज्ञापनदाताओं ने बीजेपी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा किये 5 करोड़ रुपये
    16 Mar 2022
    किसी भी राजनीतिक पार्टी को प्रश्रय ना देने और उससे जुड़ी पोस्ट को खुद से प्रोत्सान न देने के अपने नियम का फ़ेसबुक ने धड़ल्ले से उल्लंघन किया है। फ़ेसबुक ने कुछ अज्ञात और अप्रत्यक्ष ढंग
  • Delimitation
    अनीस ज़रगर
    जम्मू-कश्मीर: परिसीमन आयोग ने प्रस्तावों को तैयार किया, 21 मार्च तक ऐतराज़ दर्ज करने का समय
    16 Mar 2022
    आयोग लोगों के साथ बैठकें करने के लिए ​28​​ और ​29​​ मार्च को केंद्र शासित प्रदेश का दौरा करेगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License