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भारत
राजनीति
एंटी-सीएए विरोध की आत्मा को फिर से जीवंत करती एक ग्राफ़िक बुक
इटा मेहरोत्रा की 'शाहीन बाग़: ए ग्राफ़िक रिकॉलेक्शन' दृश्यात्मक अर्थ विज्ञान की तलाश करती एक ऐसी किताब है, जो प्रतीक बन चुके विरोध स्थल को मुश्किल समय में फिर से जीवंत करने में मदद करती है।
सौरभ शर्मा
07 Aug 2021
शाहीन बाग़ में लगे हुए भारत के मानचित्र
शाहीन बाग़ में लगे हुए भारत के मानचित्र

दिसंबर 2019 में नागरिकता विरोधी क़ानूनों और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों पर अर्धसैनिक बलों की कार्रवाई के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए मुस्लिम महिलाओं ने शाहीन बाग़ की सड़क के एक हिस्से पर कब्ज़ा जमा लिया था। उनका 101 दिन का वह धरना प्रदर्शन कोविड-19 के प्रकोप को रोकने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन की आड़ में ही ख़त्म हो पाया था। देश भर में पसरे भयानक सन्नाटे ने सरकार, दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों को इसका एक सुनहरा मौक़ा दे दिया था और उन्होंने शाहीन बाग़ स्थल को 'सैनिटाइज़' करना शुरू कर दिया था, वहां रखी कलात्मक चीज़ों को छिन्न भिन्न कर दिया गया, भित्तिचित्रों पर सफ़ेदी पोत दी गयी।

मगर, सवाल है कि क्या ऐसा करके सरकार लोगों की ज़ेहन  में बैबस्त हो चुकी शाहीन बाग़ की यादों को भी मिटा पायी? इसका जवाब है-नहीं, बिल्कुल नहीं। इटा मेहरोत्रा की किताब, ‘शाहीन बाग़: एक ग्राफ़िक रिकॉलेक्शन्स’ (योडा प्रेस, 2021) इस हक़ीक़त की सुबूत है कि चाहे कुछ भी हो, यादें वह प्राथमिक स्थल बनी रहेगी, जहां सांस्कृतिक नागरिकता का निर्माण होता है और राज्य का इस पर बहुत कम या कोई नियंत्रण नहीं होता।

शाहीन बाग़ की दादी, दीदी और नानी

क्या असहमति को ख़त्म किया जा सकता है?

इस किताब की प्रस्तावना में ग़ज़ाला जमील का कहना है कि "राष्ट्र पैदा नहीं होते, बल्कि कड़ी मेहनत और सोच समझकर बनाये जाते हैं।" इस प्रस्तावना के बाद इस किताब के अध्यायों में उस राष्ट्रव्यापी विरोध की भावना को दिखाया गया है, जिसने भारत की आत्मा को फिर से जीवंत कर दिया था और बढ़ते हुए उन खतरों को दिखाया गया है, जिन्होंने इस राष्ट्र के बहुलवाद को नष्ट कर दिया है। मेहरोत्रा के ये रेखाचित्र बताते हैं कि शाहीन बाग़ ने हमारी सामूहिक स्मृति में क्यों और किस तरह से एक स्थायी स्थान बना लिया है।

जैसा कि जमील कहती हैं कि शाहीन बाग़ "महज़ एक प्रतिष्ठित धऱना स्थल" नहीं था। सौम्यब्रत चौधरी की किताब, ‘नाउ इट्स कम टू डिस्टेंस: नोट्स ऑन शाहीन बाग एंड कोरोनावायरस, एसोसिएशन एंड आइसोलेशन’ (नवायना, 2020) के शब्दों में शाहीन बाग़ एक "हस्तक्षेप" था।

उनके मुताबिक़, इसने एक ऐसा माहौल तैयार किया था, जिसमें "जहां कहीं भी इंसाफ़ के विचार की शुरुआत होगी, शाहीन बाग़ वजूद में आने लगेगा।" चूंकी भारत ने फिर से नाइंसाफ़ी को सर उठाते हुए देखा है, और लामबंद धरना-प्रदर्शन स्थलों की ग़ैर-मौजूदगी में यह शाहीन बाग़ उन्हीं नाइंसाफ़ि के ख़िलाफ़ प्रतिरोध स्थल के रूप में फिर से उभरा है और इस किताब के रूप में जीवंत हो गया है।

करीने से भारत के मिज़ाज पर पकड़

इस किताब में एक साथ कई कहानियां समानांतर चलती हैं, जिनमें से प्रत्येक कहानी 2019 में देश में उबाल ला देने वाले विरोध स्थलों की नक़ल उतारती है, इन सभी के अलग-अलग स्वरूप दिखायी देते हैं,जिससे इस तरह के विरोध को देखा जा सकता है।

शाहीन बाग़ में लंबे समय से रह रहे और काम करने वाले परिवारों के लिए दिसंबर 2019 में शुरू होने वाले धरनों के बाद जो कुछ हुआ, उससे सामंजस्य बिठा पाना असंभव था। इस किताब के विषय वस्तु के निर्माण में सहायक रहे कई लोगों ने इस भावना को प्रतिध्वनित किया है कि विरोध शुरू होने के बाद सत्ता में बैठे लोग उनके ख़िलाफ़ निजी तौर पर पोषित कट्टरता का दुष्प्रचार करने लगे और टेलीविज़न मीडिया उस दुष्प्रचार को आगे बढ़ाने में लगा रहा। उन्हीं में से एक कहता है, “मैं कभी दोस्त हुआ करता था और अब तुम मुझे देशद्रोही कहते हो।”

'भारत हमारा देश है!'

सरकार और अन्य ताक़तवर घटक और उनकी समर्थन प्रणाली उस किसी भी व्यक्ति को राष्ट्र-विरोधी के रूप में पेश करती रहती है, जो अपनी आवाज़ उठाता है या असहमति जताता है। उनकी मांग है कि मुसलमान अपनी नागरिकता साबित करें। लेकिन, भारत के लोगों ने इन सरकार प्रायोजित ख़तरों को शिल्प बानाने के अवसर में बदल दिया था।

इस किताब में एक मज़ाहिया पोस्टर दिया गया है,जिस पर लिखा है: “यहां पिछले साल की सर्दी की टोपी नहीं मिल रही। इन्हें 1970 के पेपर्स चाहिए ?!"  

मिथकों और अफ़वाहों का खात्मा

यह किताब इस बात को स्थापित करती है कि चल रही वह "लड़ाई उन ग़रीबों, बेघरों, बेरोज़गारों, बेज़ुबानों की है, जिनके पास एक या किसी अन्य कारणों से अपनी पहचान साबित करने के लिए काग़ज़ात नहीं हैं।" लेकिन, इस लड़ाई को मीडिया के उस बड़े हिस्से ने पूरी मुस्तैदी के साथ ग़लत तरीक़े से पेश किया,-जिससे हर जगह ग़लतफ़हमियां पैदा हुईं। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि उस आंदोलन की अगुवाई उन मुस्लिम महिलाओं ने की थी, जिनके बारे में कई लोगों को लगता है कि देशव्यापी विरोध को संगठित करने और प्रेरित करने के लिए उनके पास कोई एजेंसी नहीं थी।

ऐसी अफ़वाहें थीं कि महिलाओं को विरोध करने, या विरोध स्थल पर बिरयानी खाने के लिए उन्हें पैसे दिये जा रहे थे, या फिर एक ख़ास तरह का आरोप यह भी लगाया गया था कि वहां बच्चों के गुर्दे बेचे जाते हैं।

इन ख़ास तरह के विरोधों पर टिप्पणी करते हुए ज़ोया हसन शाहीन बाग़ एंड द आइडिया ऑफ़ इंडिया: राइटिंग्स फ़्रॉम अ मूवमेंट फ़ॉर लिबर्टी,जस्टिस एंड इक्वलिटी (स्पीकिंग टाइगर, 2020) में लिखती हैं, “हमने आज़ादी के आंदोलन के दौरान भी महिलाओं के वर्चस्व वाली अखिल भारतीय नागरिक समाज की ऐसी सतत और सामूहिक लामबंदी कभी नहीं देखी।”

अस्मा ख़ातून, बिलकिस और सरवरी

दिल्ली की भीषण सर्दी में भी शाहीन बाग़ की अस्सी और नब्बे साल की दादी और नानी की मौजूदगी ने उस धरना में जान फूंक दी थी। आंदोलन के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता साफ़ तौर पर दिखायी दे रही थी।

टाइम मैगज़ीन ने बिलकिस (82) को 2020 के 100 सबसे असरदार लोगों में शामिल किया था। बिलकिस ने प्रधानमंत्री को चुनौती देते हुए कहा था,"वह मुझसे पूछ सकते हैं, मुझे सात पीढ़ियों के अपने पूर्वजों के नाम याद हैं ...।" मौजूदा व्यवस्था को नब्बे दशक की उम्र पूरी करने जा रही उस महिला को अपनी जड़ से उखाड़ फेंकने में कुछ भी ग़लत नहीं लगता है, जिसकी पीढ़ियां भारत में जायज़ तरीक़े से रहती आयी हैं।

बिलकिस और अन्य लोगों की आवाज़ इस दृश्य शिल्प के ज़रिये उत्साह की भावना पैदा कर देती है, जिसे इटा ने दर्शाया है। यह किताब आपको अपने पन्ने पलटवाने पर विवश करती जाती है, और विरोध स्थलों पर जाने वाले (मेरे जैसे) किसी भी व्यक्ति  के लिए यह दृश्य भाषा बेहद जज़्बाती हो सकती है।

सीएए विरोधी प्रदर्शनों ने देशव्यापी विरोध को हवा दी

यह किताब मायने क्यों रखती है

शाहीन बाग़ जैसे हस्तक्षेप को बचाये रखा जाना चाहिए। इसके लिए हमें दूसरों की भावना को महसूस करने वाली इटा जैसी शोधकर्ताओं की ज़रूरत है, बल्कि इसके लिए कार्य करने की भी ज़रूरत है।
लेखिका और आलोचक,ओलिविया लैंग अपनी किताब, ‘फ़नी वेदर: आर्ट इन ऐन इमरजेंसी’ में लिखती हैं, “हमदर्दी कोई ऐसी चीज़ नहीं होती, जो डिकेंस को पढ़ते हुए हमारे साथ होती है। यही रचनात्मकता है। कला का इतना ही काम है कि वह आपको नयी दस्तक,नयी संभावनाओं पर विचार करने के लिए विषय-वस्तु देती है। उसके बाद, दोस्त, यह आप पर निर्भर करता है।”

यह किताब इसी तरह की एक "रचना" है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके विचार निजी हैं। सभी चित्र: ईटा मेहरोत्रा, योदा प्रेस।

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें। 

A Graphic Book Rekindles Spirit of Anti-CAA Protests

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