NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
बात बोलेगी : कोरोना काल में बेपर्दा हुई मीडिया की गंदगी
ज़ी न्यूज़ का यह प्रकरण मीडिया क्षेत्र में जो सडांध हैं, उसका महज़ एक बहुत छोटा हिस्सा उजागर करता है, अंग्रेजी में इसे कहते है—Tip of iceberg . हर जगह आलम यही है। तकरीबन हर जगह छंटनी हो रही है, तनख़्वाह काटी जा रही है, बिना वेतन के छुट्टी पर भेजा जा रहा है। जितना बड़ा मीडिया संस्थान है, उतनी ही बड़ी गाज उसके पत्रकारों-कर्मचारियों पर पड़ी है।
भाषा सिंह
21 May 2020

कोरोना संकट और लॉकडाउन ने सिस्टम की तमाम गड़बड़ियों और गंदगियों को उघाड़ दिया है। ऐसा सिर्फ़ भारत के संदर्भ में ही नहीं बल्कि विश्व भर के संदर्भ में कहा जा सकता है। आप कह सकते हैं कि अच्छाइयां भी बाहर आई हैं, लेकिन व्यवस्थाओं में जो जन-विरोधी गड़बड़ियां हैं—वे पूरी विकास यात्रा पर गंभीर सवाल उठा रही हैं। मीडिया क्षेत्र भी पूरी तरह से उघड़ गया है। पर्देदारी तो पहले भी नहीं थी, लेकिन भीतर की संडांध को, ज़ी न्यूज प्रकरण ने सामने उड़ेल दिया है। बात सिर्फ़ इतनी नहीं है कि ज़ी न्यूज में कितने लोग कोरोना से पीड़ित हुए, कैसे हुए और क्या इसे बढ़ने से रोका जा सकता था या नहीं---बात यह है कि सुधीर चौधरी जैसे पत्रकार किस मानसिकता के तहत यह दावा करते हैं कि कोरोना हुआ तो क्या हुआ, हमारे लोग युद्ध में डटे हुए हैं। जब सुधीर चौधरी का एक सहयोगी कोरोना पॉजिटिव निकलता है, जो कि कहीं से भी अपराध नहीं हैं, तो सुधीर उसकी और संस्थान के बाकी लोगों को बचाने की बजाय क्या झूठी शान से दावा करते हैं----

 sudhir.JPG

जो लोग इंफेक्टेड हैं वे काम पर आए क्योंकि वे प्रतिबद्ध प्रोफेशनल हैं

ये जो तथाकथित मर्दानगी है, यह राजनीतिक व्यवस्था की मर्दानगी भरी भाषा की नकल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर तकरीबन तमाम मुख्यमंत्री इसी तरह झूठी मर्दानगी का दंभ भरते दिखाई देते हैं—हमने इतना नियंत्रण कर लिया, हमने यह कर लिया....थाली बजाकर, ताली बजाकर कोरोना भगाएंगे....इसी मानसिकता को सुधीर चौधरी अपने ट्वीट में परिलक्षित करते हैं। उसी तरह के युद्धोन्माद की बदबू आती है जो कोरोना से हमारी लड़ाई को जंग बताने, उससे लड़ने वालों, काम करने वालों को योद्धा की क्षेणी में रखा जाता है। इसे ही सुधीर चौधरी –ज़ी वॉरियर्स कहते हैं। लिहाजा वह मान के चलते हैं कि युद्ध में तो सिपाहियों को तमाम कष्ट उठाने ही होंगे। वे इसी अहम में कहते हैं...

–मैं कल से ये सुनना नहीं चाहता कि किसी को बुखार आ रहा है, खांसी आ रही है...(न्यूजलान्ड्री)

अब देखिए होता क्या है, जब ज़ी न्यूज के 28-30 कर्मचारी कोरोना पॉजिटिव निकलते हैं, तो प्रबंधन पर्दा डालने का काम करता है, निम्न स्तर का व्यवहार करता है। ये ख़बर बाहर आने के बाद जैसे कि हमें उम्मीद थी, नौकरी बचाने के चक्कर में कार्यरत लोग ज़ी प्रबंधन के पक्ष में बैटिंग कर रहे हैं। और, मीडिया घरानों में जिस तरह से दिहाड़ी मजदूरी पर पत्रकार काम कर रहे हैं, उसमें इससे अधिक की अपेक्षा करना बेवकूफ़ी होगी।

ज़ी न्यूज़ का यह प्रकरण मीडिया क्षेत्र में जो सडांध हैं, उसका महज एक बहुत छोटा हिस्सा उजागर करता है, अंग्रेजी में इसे कहते है—Tip of iceberg . हर जगह आलम यही है। तकरीबन हर जगह छंटनी हो रही है, तनख्वाह काटी जा रही है, बिना वेतन के छुट्टी पर भेजा जा रहा है। जितना बड़ा मीडिया संस्थान है, उतनी ही बड़ी गाज उसके पत्रकारों-कर्मचारियों पर पड़ी है।

बड़े-बड़े मीडिया संस्थान जिनका मुनाफा अपरंपार है, वे अपने कर्मचारियों को लॉकडाउन के 40-50 दिन के भीतर ही ठिकाने लगाना शुरू कर देते हैं। वेतन में कटौती तो मानो इस समय सर्वमान्य सिद्धांत ही हो गया है। पत्रकार बंधु भी इसे स्वीकार कर रहे हैं, यह संतोष करके कि चलो कम से कम नौकरी तो नहीं गई। मंदी के इस दौर में नौकरी को बचाने के लिए मीडियाकर्मी क्या क्या करने को तैयार इस पर चर्चा करना बेकार है, क्योंकि इससे जो विक्टिम यानी पीड़ित है, उसे ही दोष देने का सिलसिला शुरू हो जाएगा।

और कितने लोगों की अभी तक नौकरी गई है, यह भी अभी नहीं पता चल पाएगा, क्योंकि चुपचाप इस्तीफे पर हस्ताक्षर लिये जा रहे हैं। तमाम नियमों का उल्लंघन करते हुए, एक ई-मेल या फोन-वीडियो कॉल के जरिए पत्रकारों को बताया जा रहा है कि उन्हें हटा दिया गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने केरल के अपने तीन एडिशन बंद कर दिये हैं, 13 कर्मियों को निकाल दिया। दिल्ली-एनसीआर में भी बड़े पैमाने पर पत्रकारों की नौकरी गई है। कोरोना-लॉकडाउन की आड़ में तमाम मुनाफे में डूबे हुए मीडिया घराने, अपने बैनर तले विश्वविद्यालय और रियल एस्टेट चलाने वाले समूह मीडियाकर्मियों की छुट्टी कर रहे हैं।

संकट कितना गहरा है, इसकी खूनी आहट पत्रकार साथियों की आत्महत्या की खबरें दे रही हैं। हिंदी ख़बर न्यूज चैनल के कैमरामैन सतेंद्र ने 16 मई को आर्थिक तंगी से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। उन्हें लंबे समय से वेतन नहीं मिल रहा था और परिवार चलाना मुश्किल हो रहा था। उनकी पत्नी बीमार थी और दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। इसी तरह की हृदयविदारक खबर महाराष्ट्र के नागपुर से आई, तरुण भारत के पत्रकार दिलीप दुपारे ने आर्थिक तंगी से परेशान होकर आत्महत्या करने की कोशिश की। ऐसे अनगिनत वाकये हो रहे हैं।

दिल्ली में जिन संस्थानों में मैं खुद काम कर चुकी हूं वहां के पत्रकार मित्र भी बता रहे हैं कि जनवरी के बाद से तनख्वाह नहीं मिल रही है। इनमें से बहुतों के लिए घर चलाना मुश्किल होता जा रहा है। दिक्कत यह है कि मीडिया में मीडियाकर्मियों की दशा-दिशा पर कोई चर्चा नहीं होती। कई संगठन इसके खिलाफ अदालत गए हैं और मांग की है कि इस अवधि में जो लोग नौकरी से निकाले गए या जिनके इस्तीफे हुए हैं, वे सब निरस्त किए जाएं। अब अदालतों का हाल तो हमें पता ही है, लिहाजा कब उनकी नज़रे-इनायत होंगी, ये मी-लॉर्ड ही सिर्फ जानते होंगे !

मीडिया क्षेत्र अंदर से तो लिजलिजाहट से भरा ही है, उसका आभास कोरोना संकट और लॉकडाउन के दौरान हुई कवरेज से हो जाता है। वे किस तरह से सत्ता के एजेंडे से लेकर दक्षिणपंथी सोच को पूरे बैंड बाजे के साथ आगे बढ़ाते हैं, इसका शर्मनाक उदाहरण हमारे सामने है। चाहे वह कोरोना संकट की ढाल बनाकर मुसलमानों को दुश्मन नंबर वन घोषित करने की होड़ हो या फिर प्रवासी मजदूरों को सोशल डिस्टेंसिंग तोड़ने वाला बताने का तमाशा—इसने तमाम मीडिया घरानों का जनविरोधी-धर्मनिरपेक्ष विरोधी चेहरा बेनकाब किया। कोरोना ने भारतीय लोकतंत्र के जो बाकी खतरे उजागर किए उसमें से मीडिया का इस तरह का पतन भी शामिल है।

कोरोना और लॉकडाउन के दौरान अनगिनत पत्रकार तमाम जोख़िम उठाकर सच को सामने ला रहे हैं। ऐसे पत्रकारों पर जब हमला होता है तब कोई अर्णब गोस्वामी प्रेस की आज़ादी की बात नहीं करता और न ही कोई सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है। और ऐसे में जो पत्रकार सही रिपोर्ट करते हैं, पत्रकारिता का धर्म निभाते हैं, उनके ऊपर केस बनाए जाते हैं, फंसाया जाता है, उन्हें डराया-धमकाया जाता है। उत्तर प्रदेश के तो क्या ही कहने, राशन किट में कथित गड़बड़ी को उजागर करने वाले पत्रकार रविंद्र सक्सेना के खिलाफ मामला दर्ज किया है। रविंद्र सक्सेना ने क्वारंटाइन सेंटर में मिलने वाली राशन किट में गड़बड़ी को उजागर किया था। उन पर हरिजन एक्ट, आपदा प्रबंधन और लॉकडाउन उल्लंघन जैसे मामलों में मुकदमा दर्ज किया गया है। हिमाचल प्रदेश में भी सरकार की ख़ामियों को उजागर करने वाले पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। छह पत्रकारों पर पिछले दो महीने में 14 एफआईआर दर्ज की गई है। ये सारे पत्रकार कोरोना संकट में राहत कार्य की खामियों को उजागर कर रहे थे। वरिष्ठ पत्रकार अश्वनी सैनी पर प्रवासी मजदूरों की बदहाली पर 29 मार्च को फेसबुक लाइव–मंडी लाइव—करने पर मामला दर्ज किया गया है। इसी तरह से पत्रकार ओम शर्मा पर सोलन जिले के बद्दी इलाके में प्रवासी मजदूरों की दयनीय स्थिति दिखाने पर केस दर्ज किया।

यह स्थिति कमोवेश हर जगह मौजद हैं। इससे समझना, स्वीकार करना बेहद ज़रूरी है, ताकि इसका समाधान ढूंढा जा सके। 

(भाषा सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

#Coronavirus
Corona Period
Media
dirty politics
Zee News
Sudhir Chaudhury
Narendra modi
Godi Media

Related Stories

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

धनकुबेरों के हाथों में अख़बार और टीवी चैनल, वैकल्पिक मीडिया का गला घोंटती सरकार! 

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..

ख़बरों के आगे-पीछे: राष्ट्रीय पार्टी के दर्ज़े के पास पहुँची आप पार्टी से लेकर मोदी की ‘भगवा टोपी’ तक

कश्मीर फाइल्स: आपके आंसू सेलेक्टिव हैं संघी महाराज, कभी बहते हैं, और अक्सर नहीं बहते

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल मॉडल ऑफ़ गवर्नेंस से लेकर पंजाब के नए राजनीतिक युग तक


बाकी खबरें

  • आर्ट गैलरी: प्रगतिशील कला समूह (पैग) के अभूतपूर्व कलासृजक
    डॉ. मंजु प्रसाद
    आर्ट गैलरी: प्रगतिशील कला समूह (पैग) के अभूतपूर्व कलासृजक
    27 Jun 2021
    “प्रगतिशील कला समूह के कलाकारों ने स्वतंत्रता उपरांत आधुनिक भारतीय कला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इन कलाकारों ने देश की कला को राष्ट्रीय दायरे से बाहर निकाला और पाश्चात्य कला की तकनीक एवं…
  • स्पेशल रिपोर्ट: बनारस की गंगा में 'रेत की नहर' और 'बालू का टीला'
    विजय विनीत
    स्पेशल रिपोर्ट: बनारस की गंगा में 'रेत की नहर' और 'बालू का टीला'
    27 Jun 2021
    काशी में उत्तरवाहिनी गंगा की सेहत स्वयंभू पुत्र ने ही बिगाड़ दी है। नदी का अर्धचंद्राकार स्वरूप तहस-नहस हो गया है। ललिता घाट पर हुए निर्माण से गंगा का प्राचीन स्वरूप बिगड़ गया है और इसके गंभीर नतीजे…
  • वाकई! दाग़ भी अच्छे होते हैं
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    वाकई! दाग़ भी अच्छे होते हैं
    27 Jun 2021
    किसी व्यक्ति के कपड़ों पर लगा सरसों के तेल का दाग़ अच्छा होता है और देशवासियों का स्विस बैंक में जमा रकम बढ़ने का दाग़ भी। पहला दाग़ बताता है कि घर में मुफ़लिसी नहीं है...। दूसरा दाग़ बताता है कि देश…
  • झरोखा: कलकत्ता में अलग-अलग रंग हैं, श्रीराम की एकरसता नहीं!
    शंभूनाथ शुक्ल
    झरोखा: कलकत्ता में अलग-अलग रंग हैं, श्रीराम की एकरसता नहीं!
    27 Jun 2021
    “मैं क़रीब पौने तीन साल कलकत्ता में रहा, लेकिन इसका हर क्षण मैंने जिया। इसीलिए मैं कहता हूँ, कि अगर आपने कलकत्ता को नहीं जिया तो आप ज़िंदा रहते हुए भी मृत हो।” वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल का संस्मरण
  • कश्मीर बैठक माने डिलिमिटेशन+चुनाव और इमर्जेंसी बनाम 'इमर्जेंसी'
    न्यूज़क्लिक टीम
    कश्मीर बैठक माने डिलिमिटेशन+चुनाव और इमर्जेंसी बनाम 'इमर्जेंसी'
    26 Jun 2021
    प्रधानमंत्री ने कश्मीर पर उन्हीं नेताओं की बैठक क्यों बुलाई, जिन्हें उनकी सरकार ने 'गुपकार गैंग' कहा था? बैठक में क्या हुआ और उसके बुलाने का असल वजह क्या था? इसके अलावा इस सप्ताह देश ने तानाशाही के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License