NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
धनबाद: कोरोना महामारी में कोयला बिनाई का काम करने वालों ने गंवाई जानें और आजीविका
लॉकडाउन में कोयला खदानों के चालू रहने के बावजूद, आवाजाही पर लगे कड़े प्रतिबंधों के चलते कोयला बीनने वालों की आय खत्म हो गई।
सौरव कुमार
01 Nov 2021
asgar

अपनी साइकिल पर 50 किलो कोयला लादे दो लोग तेज लपटों से निकलकर आते हैं। भारत के सबसे ख़तरनाक कोयला क्षेत्र में कोयला इकट्ठा करने वालों के सामने आने वाली चुनौतियों को बताते हुए असगर आलम और जीन महतो कहते हैं, "कोयला ही हमारी किस्मत है और कोरोना हमारी दैनिक आजीविका के सामने पेश नई चुनौती है।" दोनों लोग झारखंड के बगदिगी गांव के रहने वाले हैं। जले हुए कोयले के अपशिष्टों और ज्वलनशील क्षेत्र के सबसे पास रहने वाले लोगों में भी यह दोनों शामिल हैं।

आलम और महतो दोनों, सुबह सूरज निकलने से पहले चार घंटे के लिए, फिर शाम को भी कुनिया कोयला क्षेत्र में जाते हैं। इस दौरान वे करीब 50 किलो कोयला अपनी साइकिलों पर बांधकर लाते हैं। इसमें से वे काम का कोयला छांटते हैं, और उसे स्थानीय बाज़ार में बेच देते हैं। इससे क़रीब 200 रुपए की कमाई हो जाती है। इस कोयले को इकट्ठे करने के लिए उन्हें "सीआईएसएफ के सुरक्षा कर्मियों के डराने वाले अनुभव से भी गुजरना पड़ता है।"

कोयला बीनने वालों के लिए कोविड महामारी का फैलना दोहरी मार थी। इस महामारी में कई जानें गईं, साथ ही महामारी ने उनकी आजीविका को तबाह कर दिया। लॉकडाउन में कोयला की खदानें काम कर रही थीं, लेकिन आवाजाही पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के चलते कोयला बीनने वालों की दिनचर्या पूरी तरह खराब हो गई। महतो उन बिनाई करने वालों में शामिल थे, जिन्होंने बाहर जाने का साहस किया। उन्हें पुलिस का कहर झेलना पड़ा, जिन्होंने गांव के आसपास बैरिकेड लगा रखे थे।

एस्मा एक्ट, 1981 की धारा 2 (12) के मुताबिक किसी संस्थान या प्रतिष्ठान में कोयले, ऊर्जा या उर्वरकों का उत्पादन, आपूर्ति या वितरण से संबंधित सेवा एक अनिवार्य सेवा मानी जाएगी। लेकिन इनसे जुड़ी गतिविधियां, जैसे कोयला बिनाई, उनके ऊपर प्रतिबंध लगने से स्थानीय बाज़ार, रेस्त्रां और परिवारों में कोयला आपूर्ति बाधित हुई।

हार्वर्ड का एक शोध अपने अनुमान में कहता है कि कोयला बेल्ट पर करीब एक से डेढ़ करोड़ लोग निर्भर हैं। सुबह दिन निकलने के पहले अपना काम चालू करने और 11 बजे सुबह अपना काम ख़तम करने वाले आनंद मांझी धनबाद के मुगमा में कपासरा की खुली खदान के पास रहते हैं। महामारी ने कोयला बीनने का उनका एकमात्र आजीविका का साधन भी छीन लिया। इस कोयले को वे स्थानीय खाने की दुकानों, भट्टों और छोटे व्यापारियों को बेचते थे, जिससे उनके 5 लोगों के परिवार का पेट पलता था। "मई से जून तक सभी पांच लोगों को दो महीने तक बिना पैसे की जिंदगी जीने को मजबूर होना पड़ा "

मांझी ने कोविड की वैक्सीन नहीं लगवाई, क्योंकि वो एक भी दिन की आय वैक्सीन लगने के बाद आने वाले बुखार के चलते नहीं छोड़ सकते थे। कपासरा में कोयला बीनने वालों की बड़ी आबादी रहती है। जो वैक्सीन कि अनुपलब्धता के चलते खतरे में पड़ गई। स्थानीय लोगों के मुताबिक, वैक्सीन की उपलब्धता की सूचना पंचायत द्वारा दी जानी थी, लेकिन सरपंच उसके ऊपर पकड़ बनाए रखा। सिर्फ उसके करीबियों को ही इसकी सूचना दी गई।

सुनीता राजापुर खदान में हर दोपहर को बास्केट भरकर कोयला बीनती हैं, जो करीब 5 किलो होता है। ऐसे कुछ बास्केट से 45-50 किलो कोयला इकट्ठा हो जाता है। फिर उनके परिवार का एक सदस्य इसे अपनी साइकिल पर गांव ले जाता है। सुनीता को हर गट्ठे पर 10 रुपए सुरक्षा अधिकारियों को देने पड़ते हैं, ताकि वे परेशान ना करें।

गांव वाले बेहद खराब स्थितियों में कोयला बीनने का काम करते हैं। कोयले के जलने पर खदान से जहरीली गैसें निकलती हैं। धनबाद में रहने वाले और कोयला बीनने का काम करने वाले विनोद यादव हर रोज एक क्विंटल कोयला धनबाद रेलवे स्टेशन के पास खाने की होटलों को बेचते हैं। वे अपने ढेर के साथ करीब 7 किलोमीटर की यात्रा अपनी साइकिल पर करते हैं। हर एक से उन्हें सिर्फ 60 रुपए मिलते हैं। अपने भाई के साथ यादव 12 साल से भी ज्यादा वक़्त से कोयला बीनने का काम कर रहे थे। दुर्भाग्य से महामारी ने उनके भाई को छीन लिया। उनके भाई टीबी के मरीज़ थे।

झारखंड में सबसे ज्यादा कोयले के भंडार हैं (भारत का करीब 32 फीसदी हिस्सा), लौह अयस्क के दूसरे सबसे ज्यादा (25.07 फ़ीसदी), तांबा अयस्क के तीसरे सबसे ज्यादा (18.48 फीसदी), बॉक्साइट के सातवें सबसे ज्यादा भंडार हैं। झारखंड खाना बनाने वाले कोयले का अकेला उत्पादक है। लेकिन उच्च खनिज सम्पदा से राज्य में उन्नति नहीं आई है। झारखंड सरकार के मुताबिक़, राज्य में 39.1 फ़ीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, जो देश के 29.8 फ़ीसदी स्तर से ज्यादा है।

भारत कोलियरी कामगार यूनियन के लोधाना यूनिट अध्यक्ष, शिबालक पासवान ने न्यूज़क्लिक को बताया कि धनबाद में कोयला बीनना आजीविका का अंग है। सन 2000 में भारत कोकिंग कोल लिमिटेड ने खुली खदानें या सुरंगें बनाकर खनन चालू किया था। इन्हें दोबारा नहीं भरा गया और ये स्थानीय लोगों के लिए बचे हुए कोयले को इकट्ठा करने का आकर्षण बन गए। कोयला इकट्ठा करते हुए कई गांव वाले मारे गए। कई मौतें तो सामने नहीं आतीं, क्योंकि परिवार को कोयले के अवैध एकत्रीकरण के लिए पुलिस प्रताड़ना और बीसीसीएल की कार्रवाई का डर होता है। पासवान कहते हैं, "दुख महसूस करते हुए अपने खाने का प्रबंध करना बिनाई करने वालों की नियति होती है।"

झरिया क्षेत्र में कई बिनाई करने वाले कोरोना की पहली लहर में मृत पाए गए थे। जहरीली गैसों से उनका रोज पाला पड़ता था। इसके चलते उन्हें कोरोना से सबसे ज्यादा खतरा था। महामारी के फैलाव के बाद झरिया अस्पताल में बड़ी संख्या में अस्थमा और टीबी की शिकायत करने वाले मरीज आए थे।

इसे लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें: 

Coal Scavengers in Dhanbad Lose Lives, Livelihood in Pandemic

Jharkhand
Coal
COVID
Jharia
coalfield
Coal Mine
dhanbad
Corona
Pandemic

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

झारखंड: बोर्ड एग्जाम की 70 कॉपी प्रतिदिन चेक करने का आदेश, अध्यापकों ने किया विरोध

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

झारखंड की खान सचिव पूजा सिंघल जेल भेजी गयीं

झारखंडः आईएएस पूजा सिंघल के ठिकानों पर छापेमारी दूसरे दिन भी जारी, क़रीबी सीए के घर से 19.31 करोड़ कैश बरामद

बिजली संकट को लेकर आंदोलनों का दौर शुरू

कोरोना महामारी अनुभव: प्राइवेट अस्पताल की मुनाफ़ाखोरी पर अंकुश कब?

खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं

बिजली संकट: पूरे देश में कोयला की कमी, छोटे दुकानदारों और कारीगरों के काम पर असर


बाकी खबरें

  • Cuba
    ऋचा चिंतन
    वैश्विक एकजुटता के ज़रिये क्यूबा दिखा रहा है बिग फ़ार्मा आधिपत्य का विकल्प
    11 Jan 2022
    दुनिया को बिग फ़ार्मा के एकाधिकारवादी चलन का एक विकल्प सुझाते हुए क्यूबा मुनाफ़े से कहीं ज़्यादा अहमियत लोगों को देता है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, राज्य से वित्त पोषित अनुसंधान को बढ़ावा देता…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 1,68,063 नए मामले, 277 मरीज़ों की मौत 
    11 Jan 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 2.29 फ़ीसदी यानी 8 लाख 21 हज़ार 446 हो गयी है।
  • kashi
    विजय विनीत
    काशी विश्वनाथ कॉरिडोर: कैसे आस्था के मंदिर को बना दिया ‘पर्यटन केंद्र’
    11 Jan 2022
    काशी विश्वनाथ मंदिर के समीप सड़क के किनारे श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर का न्यास सुविधा केंद्र है। यहां एक हेल्प डेस्क है, जिसके बाहर कांच के गेट पर 300 रुपये में सुगम दर्शन का पोस्टर चस्पा किया गया है।…
  • security lapse
    शिव इंदर सिंह
    “मोदी की सुरक्षा में चूक या राजनीतिक ड्रामा?” क्या सोच रहे हैं पंजाब के लोग! 
    11 Jan 2022
    जिला लुधियाना के नौजवान किसान जगजीत सिंह का कहना है, “पहली बात तो किसान मोदी के काफिले से करीब एक किलोमीटर दूरी पर थे। दूसरी बात उनके पास कोई हथियार नहीं थे। वह कम से कम मोदी को काले झंडे दिखा सकते…
  • Rahul and Modi
    ओंकार पूजारी
    2022 तय कर सकता है कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का भविष्य
    11 Jan 2022
    कमज़ोर कांग्रेस इतनी कमज़ोर नहीं है कि औपचारिक मोर्चे या भाजपा विरोधी ताक़तों की अनौपचारिक समझ के मामले में किसी भी अखिल भारतीय भाजपा विरोधी परियोजना से बाहर हो जाए।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License